बदमाशों की बस्ती - वेद प्रकाश काम्बोज

 संस्करण विवरण:

फॉर्मैट: पैपरबैक | पृष्ठ संख्या:  128 | प्रकाशन: नीलम जासूस कार्यालय |  शृंखला: विजय

पुस्तक लिंक: अमेज़न



कहानी 

कोटाम्बू नामक शहर बदमाशों की बस्ती नाम से जाना जाता था। वहाँ के बाशिंदे आपराधिक चरित्र के यूरोपियन नस्ल के लोग थे और आम आदमी वहाँ जाने से घबराता था। 

ऐसे में विजय को क्या जरूरत पड़ गई कि उसे कोटाम्बू जाना पड़ा। 

कोटाम्बू में विजय के साथ क्या हुआ? 
वहाँ उसके सामने आई मुसीबतों से वह कैसे बचा?
क्या वह अपना मकसद हासिल कर पाया?


मुख्य किरदार 

रघुनाथ - पुलिस सुप्रीटेंडेंट
रैना - रघुनाथ की पत्नी
विजय - नायक जो कि सीक्रेट सर्विस में एजेंट है लेकिन बेवकूफियाँ करता रहता है 
ठाकुर साहब - विजय के पिता और रघुनाथ के चाचा जी
सार्जेंट जमाली - रघुनाथ का मातहत
किशोर - विजय का दोस्त जो कि एक हथियार बनाने वाली कम्पनी में कार्य करता था
रोशी - होटल सोल्येल के मालिक की लड़की
जैकी - होटल सोल्येल का मालिक 
जिमी - रोशी का भाई और जैकी का लड़का 
स्मिथ - एक गुंडा
मास्टर कैनिथ - कोटाम्बू का एक अपराधी
ओहारा - आदिवासियों का सरदार
शबाला - ओहारा की बेटी
ब्लैक बॉय - सीक्रेट सर्विस का एक व्यक्ति
पवन - वह व्यक्ति जो कि ब्लैक बॉय का रूप धरता है और लोगों के नज़रों में सीक्रिट सर्विस का चीफ है
आशा - सीक्रेट सर्विस की एक मुलाजिम
मिस्टर सान्याल - गृह मंत्री
अशरफ, बलदेव, विक्रम, नाहर, परवेज - सीक्रेट सर्विस की एजेंट

मेरे विचार


अगर शहरों की बात की जाए तो हर एक शहर में एक ऐसा इलाका जरूर होता है जहाँ पर उस शहर के आपराधिक चरित्र के लोग पाये जाते हैं। यह इलाका ऐसा होता है जहाँ कोई भी शरीफ व्यक्ति जाने से कतराता है। कानून के रखवालों को भी इस इलाके का पता होता है लेकिन वो भी या तो डर से या फिर स्वार्थवश यहाँ अपनी हेकड़ी नहीं दिखाते हैं। उनकी हेकड़ी अक्सर गरीब और कमजोरों के लिए बची रहती हैं। लेकिन तब क्या होगा जब एक पूरे के पूरे शहर पर आपराधिक चरित्र वाले लोगों द्वारा कब्जा जमा दिया गया हो। ऐसे शहर में कौन शरीफ आदमी जाना चाहेगा? और जाएगा तो लौटकर कैसे आ पाएगा?

प्रस्तुत उपन्यास 'बदमाशों की बस्ती' एक ऐसे ही शहर कोटाम्बू की कहानी कहता है। उपन्यास की शुरुआत विजय के रघुनाथ के घर जाने से होती है। यहाँ वो अपने सामान्य मस्ती कर रहे होते हैं कि रघुनाथ को उसके मातहत का फोन आता है जो उसे बताता है कि उनके शहर राजनगर के होटल व्हाइट लाइट में एक कत्ल हो गया है। विजय भी रघुनाथ के साथ मौका-ए-वारदात तक पहुँचता है और उसे वहाँ ऐसी जानकारी मिल जाती है जहाँ से उसका कोटाम्बू जाना पक्का हो जाता है। 

कोटाम्बू एक ऐसा शहर है जहाँ बदमाश ही रहा करते है। यह एक ऐसा शहर है जहाँ यूरपीयन नस्ल के लोग रहते हैं। यह सभी लोग अपराधी हैं और शहर में हर आपराधिक गतिविधि होती है। बाहरी लोग यहाँ आने से डरते हैं। शहर में दो ही लोग ऐसे हैं जिनकी तूती इधर बोलती है। एक तो होटल सोल्येल की मालकिन रोशी है और एक होटल ग्रीनस्टार का मालिक कैनेथ है। इन दोनों समूहों के बीच टकराव भी होता है लेकिन शहर का कोई भी व्यक्ति इनसे टकराने की जुर्रत नहीं कर पाता है। 

यह एक बहुत ही अजीब शहर है। यहाँ के समस्त निवासी योरोपियन टाइप के हैं। सबकी पोशाकें भी लगभग एक सी हैं। ऐसा क्यों है मैं स्वयं नहीं जानती। यहाँ के निवासी मौत से नहीं डरते। वे केवल मुझसे और कैनेथ से ही डरते हैं।  (पृष्ठ  51)

इस शहर में विजय की एंट्री होती है और फिर उसके साथ जो-जो होता है वही उपन्यास का कथानक बनता है।  यह एक सीधा सादी रोमांचकथा है जहाँ एक के बाद एक मुसीबत नायक पर आती है और पाठक यह देखने के लिए उपन्यास पढ़ता जाता है कि वह किस तरह इस मुसीबत से निकलेगा। 

उपन्यास में विजय द्वारा कई ऐसे करतब भी दिखलाये जाते हैं जो कि अतिशयोक्ति ही कहलाएगी। मसलन वह फोन पर रोशी की आवाज की हूबहू नकल कर देता है। वहीं लड़ते वक्त भी वह कई बार ऐसी उछल कूद कर देता है जो कि थोड़ा अधिक लगता है।  

विजय पाठकों के बीच अपनी मसखरी के लिए जाना जाता है और उसका ये रूप इधर बहुत अच्छी तरह से दिखता है।  उपन्यास के शुरुआत से लेकर आखिर तक उसकी मसखरी ऐसी रहती है कि आपके चेहरे पर मुस्कान आये बिना नहीं रह पाती है। वैसे तो विजय हर किसी से मसखरी करने से बाज नहीं आता है लेकिन पहली दफा ऐसा इस उपन्यास में दिखता है जहाँ पर वह खुद को मसखरी करने से रोकता है:

विजय ने पहले तो सोचा कि थोड़ी देर इन्हें घिसे परन्तु फिर उसने सोचा कि उजड्ड कौम है, कहीं बात बिगड़ गई तो जान बचानी मुश्किल हो जाएगी। इसलिए उसने इस बार गम्भीर होना ही उचित समझा। (पृष्ठ 66)

यह पढ़ते हुए मैं यही सोच रहा था कि क्या विजय के साथ ऐसा पहले या बाद में भी हुआ है जहाँ पर वह किसी को घिसना छोड़कर गम्भीर हो गया हो? अगर आपको ऐसे उपन्यासों के नाम पता है तो मुझे जरूर बताइएगा। 

उपन्यास के किरदार कथानक के अनुरूप हैं। चूँकि उपन्यास में ज्यादा फैलाव नहीं है तो जरूरत भर को ही इन्हें विस्तार दिया गया है। इसलिए वह उतने प्रभावित नहीं कर पाते हैं। फिर चाहे वो रोशी हो, जैकी हो, ओहारा हो या कैनेथ हो। जरूर भर का ही विवरण इधर दिया गया है। मुझे लगता है कि इनके विषय में ज्यादा जानकारी दी जाती तो बेहतर रहता। 

उपन्यास की कमियों की बात करूँ तो कई बार उपन्यास में विजय के लिए चीजें अत्यधिक सरल होती दिखती हैं। मसलन उसका आते ही इत्तेफाकन रोशी के होटल में आना। फिर वहाँ उसे राजनगर के कत्ल की जानकारी पता लगना। उसका आदिवासी से ऐसा अभिवादन करना कि वह उसे दोस्त मानने लगे। फिर उपन्यास में विजय की शादी भी आदिवासी की लड़की से होती है। विजय वहाँ से भाग भी जाता है लेकिन आखिर में जब वह फँसा हुआ होता है तो वह इसी शादी के कारण बच भी जाता है। उस वक्त मैं यही सोच रहा था कि कौन सा आदिवासी ऐसा होगा जो कि अपनी बेटी को छोड़कर गए व्यक्ति को इस तरह छोड़ेगा। तार्किक रूप से देखें तो कम से कम हड्डी पसली तो उसे तोड़नी ही चाहिये थी। कैनेथ और विजय का टकराव भी अजीब ही लगता है। विजय एक बार कैनेथ को मारकर बेहोश छोड़ देता है जबकि उसका औचित्य नहीं था। वह सीक्रेट सर्विस का व्यक्ति है जब कैनेथ बेहोश हो चुका था तो वह उसे गिरफ्तार करके अपने पास रख सकता था लेकिन उसका उसे ऐसे खुले आम छोड़ना तार्किक नहीं लगता है। वह छोड़ता है और इसका खामियाजा उसे भुगतना पड़ता है। दो आदिवासियों की जान भी इस हरकत के कारण जाती है। 

इसके अलावा कथानक में एक डायरी का जिक्र भी जो कि विजय को होटल व्हाइट लाइट में पाए गए मृतक से मिलती है। इस डायरी से विजय को क्या जानकारी मिली थी इस पर भी कोई रोशनी नहीं डाली गई थी। 

एक पाठक के तौर पर मैं कोटाम्बू के विषय में अधिक जानना चाहता था लेकिन जरूरत भर की जानकारी ही इधर है। कैनेथ और रोशी कैसे इस क्षेत्र में सबसे ताकतवर बने इस पर भी ज्यादा रोशनी नहीं डाली गई है। बस यह बता दिया गया है कि ये थे। अगर थोड़ा बहुत इनकी कहानी भी बताई होती तो अच्छा होता। 

उपन्यास के प्रस्तुत संस्करण की बात करूँ तो इसमे प्रूफिंग की काफी गलतियाँ थीं। काफी जगह वर्तनी गलत की गई है और एक आध जगह वाक्य अधूरे हैं।  यह वर्तनी की गलतियाँ हर दूसरे तीसरे पृष्ठ में मौजूद थीं। यह गलतियाँ पढ़ते हुए खटक रही थीं। प्रकाशक द्वारा यह जानकारी मिली है कि नवीन संस्करण में यह गलतियाँ सुधार दी हैं। मेरी राय यही रहेगी कि अगर आप इस उपन्यास को पढ़ना चाहते हैं तो नवीन संस्करण ही लीजिएगा। 

अंत में यही कहूँगा कि यह एक सीधी-सादी कहानी है जिसे एक बार पढ़कर देख सकते हैं। उस समय शायद ऐसे कथानक चल जाते हो लेकिन अबके पाठकों को यह कथानक अत्यधिक सरल लग सकता है। ऐसे में अगर आप जटिल घुमावदार कथानक पढ़ने के शौकीन हैं तो शायद आपको इसे पढ़कर निराशा हो। हाँ, उपन्यास में मौजूद विजय की हास्यास्पद हरकतों के लिये भी उपन्यास पढ़ा जा सकता है। 

अगर आपने इस उपन्यास को पढ़ा है तो मुझे पुस्तक के प्रति अपनी राय से जरूर अवगत करवाइएगा।


पुस्तक लिंक: अमेज़न


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2 Comments
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  1. उपन्यास के विषय में रोचक जानकारी प्रदान की।
    यह उपन्यास मेरे पास उपलब्ध है, जल्दी पढने की‌ कोशिश रहेगी।

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    Replies
    1. लेख आपको पसंद आया यह जानकर अच्छा लगा। आभार।

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