Saturday, February 16, 2019

सपनों की होम डिलीवरी - ममता कालिया

किताब फरवरी 9 2019 से फ़रवरी 10 2019 के बीच पढ़ा गया

संस्करण विवरण:
फॉर्मेट: पेपरबैक
पेज काउंट: 96
प्रकाशक : लोकभारती प्रकाशन
आईएसबीएन: 9789352211623



सपनों की होम डिलीवरी - ममता कालिया
सपनों की होम डिलीवरी - ममता कालिया

पहला वाक्य:
इस बिन्दु पर पहुँच कर यह कहना मुश्किल था कि हालात ने यह शौक बनाया था या शौक ने हालात।

रूचि शर्मा एक जानी मानी पाक कला विशेषज्ञ थीं। उनके अपने दो दो टीवी शो चलते थे। अखबारों में पाककला के ऊपर लेख आते थे और उनकी किताबों की श्रृंखलाएं भी काफी मशहूर थी। लेकिन फिर भी ऐसा कुछ था जिसकी कमी उन्हें खलती थी।

सर्वेश नारंग एक खोजी पत्रकार था। अपने काम में तल्लीन था लेकिन अपने जीवन में मौजूद कमी का अहसास उसे भी था।

 और फिर सर्वेश और रूचि की मुलाकात हुई तो दोनों को नजदीक आने में वक्त नहीं लगा। दोनों उम्र के इस दौर में थे कि दोनों में से किसी ने नहीं सोचा था कि वे कभी प्यार में पड़ेंगे। दोनों ही असफल शादी से निकले थे और दूध के जले की तरह छाछ को फूँक फूँक कर पीने में विश्वास रखते थे।

इस सबके बावजूद रूचि और सर्वेश नज़दीक आये और उन्होंने शादी की। दोनों ही खुश थे।

लेकिन फिर शादी के कुछ वक्त बाद ही दोनों की एक तस्वीर सभी समाचारों का हिस्सा बन गई। तस्वीर में सर्वेश रूचि का गला दबाता सा लग रहा था और इससे मीडिया में बवाल होना ही था।

आखिर ऐसा क्या हुआ था दोनों के बीच? कैसे दोनों इस स्थिति में पहुँचे थे? इस घटना से उनके रिश्तों में क्या असर पड़ा?
मुख्य किरदार:
रूचि शर्मा - एक महशूर पाक कला विशेषज्ञ
सर्वेश नारंग - एक पत्रकार
वीरेंद्र सिंह - रूचि के टीवी प्रोग्राम में सहायक
कुर्बान अली - रूचि के दूसरे प्रोग्राम में सहायक
शमशेर सिंह - रूचि का मकान मालिक
जिज्ञासा सिंह- रूचि की सहेली
दामिनी पिल्लई - रूचि की सहेली
प्रभाकर - रूचि का पहला पति
गगन - रूचि का बेटा
मंजीत - सर्वेश की पहली पत्नी
अंश - सर्वेश का बेटा
मंदा - सर्वेश के घर में काम करने वाली बाई

'सपनो की होम डिलीवरी' ममता कालिया जी का एक लघु उपन्यास है। 96 पृष्ठों में फैला यह उपन्यास एक सच्ची घटना से प्रेरित है। ममता जी उपन्यास के शुरुआत में ही बताती हैं कि नाइजैला लॉसन और उसके पति साची की तस्वीर समाचार पत्रों और टीवी में देखने के बाद ही इस उपन्यास को लिखने की प्रेरणा बनी। अगर आपको याद नहीं है तो कुछ सालों पहले यह तस्वीर काफी वायरल हुई थी। तस्वीर में नाइजैला लॉसन का पति उसका गला दबाता सा लग रहा रहा था। यह सब एक रेस्टोरेंट में हो रहा था और फिर इनके बीच के रिश्ते के ऊपर टीका टिपण्णी होने लगी थी। यही घटना इस उपन्यास का मुख्य बिंदु है।

उपन्यास की नायिका भी एक पाककला विशेषज्ञ है। उसका पति सर्वेश नारंग है। और दोनों की ऐसी ही तस्वीर वायरल हो जाती है। आखिर ये स्थिति क्यों आई और इस तस्वीर के वायरल होने के बाद उनके रिश्तों में क्या फर्क आया यह सब इस उपन्यास के माध्यम से समझने की कोशिश की गई है।

उपन्यास में ज़िन्दगी के कई पहलुओं पर बात की गई है।

रूचि एक सफल महिला हैं लेकिन फिर इनसान भी  हैं। उन्हें एक साथी की तलाश है जो सर्वेश के रूप में उन्हें मिलता है। दोनों का रिश्ता भी प्यारा है। वो दोनों एक दूसरे को एक तारीक से बुलाते हैं जो कि मुझे पसंद आया। उसमें निहित अर्थ गहरे हैं।

ऐसा नहीं है कि दोनों में टकराव नहीं है। वो तो है लेकिन फिर भी दोनों एक दूसरे को आजादी देते हैं। यह उनकी परिपक्वता दर्शाता है जो कि भारतीय पुरुष में बहुत कम देखने को मिलती है।

उपन्यास में यह भी देखने को मिलता है कि हर रिश्ते में बातचीत जरूरी है। बातचीत न होने पर गलत फहमियाँ बढ़ सकती हैं। और यह बातचीत तब ज्यादा जरूरी हो जाती है जब सामने वाला समझदार है और रिश्ते में आपको खुल्ली छूट मिली है। अगर ऐसा नहीं होगा तो रिश्ते में अविश्वास उत्पन्न होता है और वो रिश्ते को मार भी सकता है। सर्वेश का गुस्सा तो मुझे जायज लगा था लेकिन उसका गुस्से में संतुलन खोना जायज नहीं था।

उपन्यास में आज की पीढ़ी की तरफ भी इशारा है। टूटते परिवारों का असर बच्चों पर ज्यादा पड़ता है। ऐसा नही है कि जो बच्चे टूटे हुए परिवार से आते हैं वो ही नशे की गिरफ्त में आते हैं लेकिन उनकी सम्भावना ज्यादा होती है। युवा कैसे भी परिवार से आते हों लेकिन नशे के कारण वो अपनी ज़िन्दगी बर्बाद कर रहे हैं और साथ में अपने परिवार को भी तबाह कर रहे हैं।

इसके आलावा उपन्यास आधुनिक शहरी जीवन में मौजूद एकाकीपन, सामाज का दबाव, काम का दबाव, असुरक्षा इत्यादि सभी पहलुओं को उपन्यास छूता है।

आजकल मीडिया कैसे आमजन जीवन में हावी है यह भी उपन्यास दिखलाता है। किसी का भी व्यक्तिगत क्षण व्यकितगत नहीं रहा है। आप हमेशा कैमरे की नज़र में हैं और आपके व्यक्तिगत पलों को कभी भी कोई भी संसार के सामने ला सकता है। यह स्थिति सोचकर डर तो लगता है लेकिन यह आज का यथार्थ बन चुका है। फिर उन तस्वीरों और विडियो के आधार पर हर कोई आपके चरित्र और आपके जीवन का छिद्रान्वेषण कर सकता है।

उपन्यास शुरू से लेकर आखिर तक पठनीय है। आज के जीवन के कई पहलुओं को छूता यह उपन्यास अंत तक अपनी रोचकता बरकार रखता है। उपन्यास खत्म होने पर आपको सोचने के लिए भी कई मुद्दे दे देता है।

अगर आपने इसे नहीं पढ़ा है तो आपको पढ़ना चाहिए।

उपन्यास की कुछ पंक्तियाँ जो मुझे पसंद आई:
अकेली रहने वाली लड़कियाँ भयंकर असुरक्षा बोध से घिरी रहती हैं।..
सवाल ये था कि अकेली जीने वाली लड़कियाँ आखिर क्या करें? वे कहाँ, किससे, किस हद तक सामजिक सम्पर्क बनाएँ।(पृष्ठ 33)

पहली बार जीवन में तब उसे एकाकीपन का मर्म समझ आया। तुम घर से निकलो और घर पर ताला लगाना पड़े या घर लौटो तो ताले का काला मुँह देखना पड़े, कितनी बड़ी सजा है ये।(पृष्ठ 33)

एक चालीस साल की लड़की अपने जीवन के पिछले सालों पर नज़र डालती है तो पाती है उसने उन वर्षों में खूब काम किया, नाम किया, धन और यश कमाया, बस मुहब्बत के खाते में बड़ा-सा अंडा पाया उसने। वह आगामी दस वर्षो के समय पर नज़र डालती है तो थर्रा उठती है। ऐसे में 'जो उपलब्ध है वही श्रेष्ठ' का सिद्धांत मजबूरन सामने रखन पड़ता है। यह पता होता है कि प्रस्तुत व्यक्ति आदर्श नहीं किन्तु दिल-दिमाग सब गलत सिग्नल देते हैं।(पृष्ठ 35)

रिश्तों में इतनी जान होती है कि वे प्लेट-प्यालों की तरह नहीं टूटते। हम बार-बार उनमें पट्टी बाँध कर काम चलाते हैं।(पृष्ठ 50)

मेरी रेटिंग : 3.5/5

अगर आपने इस लघु-उपन्यास को पढ़ा है तो आपको यह कैसा लगा? अपने विचारों से मुझे कमेंट्स के माध्यम से अवगत करवाईयेगा।

अगर आपने इसे नहीं पढ़ा है तो आप इसे निम्न लिंक से मँगवा सकते हैं:
पेपरबैक

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