औरतों का शिकार - जनप्रिय लेखक ओम प्रकाश शर्मा

संस्करण विवरण:

फॉर्मैट: पेपरबैक | पृष्ठ संख्या: 120 | प्रकाशन: नीलम जासूस कार्यालय | शृंखला: चक्रम #1

पुस्तक लिंक: अमेज़न

समीक्षा: औरतों का शिकार

कहानी 

गणेश दिल्ली के एक अमीर खानदान का युवक था जो कि आजकल काफी परेशान चल रहा था। उस पर अपनी पत्नी प्रिया के कत्ल की कोशिश का इल्जाम था।

उसके वकील का कहना था कि इस मुसीबत से उसे केवल एक व्यक्ति निकाल सकता था और वो था प्राइवेट जासूस चक्रम।

आखिर गणेश की पत्नी प्रिया ने उस पर मुकद्दमा क्यों दायर किया था?
क्या सचमुच गणेश ने अपनी पत्नी पर हमला किया था?
आखिर  कौन था ये औरतों का शिकारी? और उसका इस मामले से क्या संबंध था?


मुख्य किरदार

गणेश - एक अट्ठाइस वर्षीय युवक
प्रिया - गणेश की पत्नी
नन्दलाल - प्रिया के पिता
वासंती - प्रिया की माता
चौखट चन्द चोखानी - गणेश का वकील
चक्रम - प्राइवेट जासूस
हवाबाज - चक्रम का पालतू कुत्ता जिसका बहुत महत्व था
मैनाराम - गणेश का मुंशी
मालती - पैराडाइज क्लब की सेक्रेटरी जो कि चालीस वर्षीय महिला थी
मनोरमा - पैराडाइज क्लब के ऑफिस की सेक्रेटरी
मुकुल - एक हाई कोर्ट का वकील जो प्रिया की मदद कर रहा था
इन्स्पेक्टर राय - कलकत्ता पुलिस के इन्स्पेक्टर
पाँचू और लाल - दो अपराधी

विचार

'औरतों का शिकार' जनप्रिय लेखक ओम प्रकाश शर्मा (Janpriya Lekhak Om Prakash Sharma) द्वारा लिखित चक्रम शृंखला (Chakram Series) का पहला उपन्यास है। यह उपन्यास पहली बार 1964 में प्रकाशित हुआ था और फिर 2021 में नीलम जासूस कार्यालय (Neelam Jasoos Karyalay) द्वारा पुनः मुद्रित किया गया है। चक्रम से अगर आप वाकिफ नहीं है तो वह एक पैंतालीस वर्षीय व्यक्ति है जो कि एक प्राइवेट डिटेक्टिव है। वह अपने पालतू कुत्ते हवाबाज के साथ मिलकर मामलों को सुलझाता है। 

उपन्यास की बात करूँ तो उपन्यास की शुरुआत वकील चौखट चन्द चोखानी द्वारा अपने मुवक्किल गणेश को चक्रम तक जाने की सलाह दिए जाने से होती है। गणेश पर उसकी पत्नी प्रिया ने अपने कत्ल की कोशिश का इल्जाम लगाया है। अब चक्रम मामले को लेने के बाद वह क्या तहकीकात करता है और कैसे इस मामले से गणेश को छुड़वाता है और इस दौरान उसे किन किन चीजों से दो चार होना पड़ता है यही कथानक में दिखता है। जैसे जैसे तहकीकात आगे बढ़ती है वैसे वैसे कहानी में नए चरित्र जुड़ते जाते है जिनके माध्यम से कथानक में रोचकता बढ़ती जाती है।

यह एक रहस्यकथा है जो कि अपनी मंथर गति से आगे बढ़ती है। अगर तेज रफ्तार और एक्शन से भरपूर कथानक आप पढ़ने के शौकीन है तो इस उपन्यास को पढ़ना थोड़ा आपको अटपटा लग सकता है लेकिन अगर गति और एक्शन से आपको इतना फर्क नहीं पड़ता तो उपन्यास आपको जरूर पसंद आयेगा।

उपन्यास का कथानक एक षड्यंत्र के इर्द गिर्द घूमता है। अगर आपके पास दौलत हो तो कैसे दौलत के भूखे आपकी दौलत पर नजर गढ़ाने के लिए मौजूद रहते हैं और कैसे सीधे रहकर आप उनसे नहीं जूझ सकते यह आपको इससे दिखता है।

उपन्यास का एक पहलू औरतों का शिकारी भी है। यह चक्रधर नाम का कुख्यात अपराधी है जो अमीर घर की औरतों को अपने प्रेम जाल में फांसकर उनसे दौलत हासिल कर लेता है और फिर या तो उन्हे बेच देता है या उनका कत्ल कर देता है।  उपन्यास में चक्रम अपने मामले के चलते इससे दो चार होता है और उससे चक्रम का निपटना किस तरह होता है यह देखना भी रोचक रहता है।

उपन्यास में लेखक रहस्य और रोमांच तो रखा ही है साथ ही उपन्यास में हास्य भी मौजूद है। चक्रम और मालती की मुलाकात और उसके मालती को लेकर भाव कई बार चेहरे पर मुस्कुराहट ले आते हैं। चक्रम की खुद की हरकतें भी कई बार हास्य उत्पन्न करते हैं।

उपन्यास चूँकि चक्रम शृंखला का है तो इससे पहली बार पाठक वाकिफ होता है। उसके तौर तरीको के विषय में वह जानता है और उसकी यह पहली मुलाकात चक्रम से दूसरी मुलाकात के लिए पाठक को लालायित करती है। वह एक अतरंगी किरदार है जिसका दिमाग जितना तेज तर्रार है उतना ही उसका व्यवहार अटपटा है। वह तीखा बोलने वाला व्यक्ति है जिससे हर कोई खौफ खाता है। वहीं वह अक्सर शिकारियों सी पोशाक में मौजूद रहता है और औरतों से दूरी बनाकर चलता है। मुझे तो चक्रम पसंद आया। 

चक्रम के साथ तहकीकात में उसका पालतू कुत्ता हवाबाज भी काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इस किरदार के माध्यम से ही चक्रम मामले की तह तक पहुँचता और कई राज उसे पता चलते हैं। पढ़ते हुए आपके मुँह से बरबस ही निकल पड़ता है कि पालतू हो तो हवाबाज जैसा। 

उपन्यास के बाकी किरदार कथानक के अनुरूप है। गणेश जैसे भोंदू किरदार आपको आपके आस पास दिख जाते हैं जो दिल के अच्छे होते हैं लेकिन कई बार गोल्ड डिगर्स यानी दौलत की लालची महिलाओं के साथ फँस जाते हैं। आपके मन में गणेश के लिए एक तरह की सहानुभूति रहती है। प्रिया का किरदार आपको चिढ़ने पर विवश कर देता है क्योंकि वह दिल की बुरी नहीं है लेकिन कान की कच्ची जरूरी है। 

चूँकि उपन्यास 1964 में लिखा था तो इसमें उस वक्त की भाषा और समाज दर्शाया गया है। यह चीज एक साथ जानी पहचानी और अनजान भी लगती है। चूँकि किरदार शहरी और आधुनिक हैं तो वो आम शहरियो जैसे दिखते हैं। ऐसे किरदार आज भी शहरो में आपको दिख जायेंगे लेकिन उनका लहजा एक गुजरे जमाने की याद दिलाता है जिसे पढ़ना रोचक रहता है। ऐसा लगता है आप एक पुरानी दुनिया में विचर रहे हों।

उपन्यास के शीर्षक की बात करूँ तो इसका शीर्षक औरतों का शिकार है और मामला भी एक औरत के शिकार का निकलता है लेकिन उपन्यास पर उस शिकारी की छाया इतनी मजबूत नहीं रहती है। यानी चक्रम औरतों के शिकारी के पीछे नहीं पड़ा रहता है बल्कि अपने मामले में काफी आगे बढ़ने (लगभग अंत) पर उसे यह पता चलता है कि उसका समाना औरतों के शिकारी से हो रहा है।  ऐसे में खलनायक उतना प्रभावी नहीं बन पाया है। अगर खलनायक केंद्र में होता तो शीर्षक के साथ ज्यादा न्याय होता और फिर एक अलग तरह का उपन्यास पाठक को पढ़ने को मिलता। चूँकि अभी खलनायक और नायक का सामना अंत के करीब आने तक नहीं होता है और जो होता है उसमें भी ज्यादातर बार यह सामना सभ्यता के आवरण में होता है तो उतने खतरनाक दाँव पेंच उनके बीच नहीं होते हैं। मुझे लगता है मसूरी जैसे इलाके में एक रोमांचक क्लाइमैक्स तो बनता था। लेखक क्लाइमैक्स को अधिक रोमांचक बना पाते तो बेहतर होता

अंत में यही कहूँगा कि औरतों का शिकार एक पठनीय रचना है। अगर आप एक हल्की-फुल्की रहस्य कथा पढ़ना चाहते है तो यह आपका मनोरंजन करेगी। चक्रम का किरदार चूँकि मुझे पसंद आया तो मैं उसको लेकर लिखे गए अन्य उपन्यास जरूर पढ़ना चाहूँगा।

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