लोकप्रिय साहित्य के क्षेत्र में नीलम जासूस कार्यालय की सराहनीय कोशिश है 'तहकीकात'

संस्करण विवरण:

फॉर्मैट: पेपरबैक | पृष्ठ संख्या: 150 | प्रकाशक: नीलम जासूस कार्यालय

पुस्तक लिंक: अमेज़न



मेरा  हिंदी लोकप्रिय लेखन से रिश्ता बहुत देर में कायम हुआ और जब हुआ तब तक हिंदी में यह जॉनर लगभग गायब होने के कगार पर था। लेकिन अब पिछले कुछ वर्षों से इस लेखन में दोबारा से उछाल देखने में आया है और कई नए लेखक अब लोकप्रिय लेखन की अलग-अलग विधाओं जैसे अपराध, हॉरर, सामाजिक इत्यादि में हाथ आजमा रहे हैं। पर लोकप्रिय लेखन विशेषकर अपराध लेखन से जुड़ी एक ऐसी चीज भी थी जो कि बिलकुल गायब हो गई थी। अगर आप हिंदी अपराध लेखन के इतिहास को देखते हैं तो पाते हैं कि यह चीज ऐसी थी जिन्होंने उपन्यासों के आने से पहले लोकप्रिय लेखन को लोकप्रिय बनाया था। अगर आप लोकप्रिय साहित्य में रुचि रखते हैं तो अब तक जान चुके होंगे कि मैं किस चीज की बात कर रहा हूँ और अगर मेरे जैसे नए हैं तो आपको बता दूँ मैं जासूसी पत्रिकाओं या जिन्हें उर्दू में रिसाला कहा जाता था कि बात कर रहा हूँ। जहाँ तक मैने पढ़ा है पहले अपराध साहित्य के उपन्यास सीधे किताब के रूप में नहीं बल्कि पत्रिकाओं के रूप में आया करते थे। भारत के पहले जासूसी उपन्यास लिखने वाले लेखक गोपाल राम गहमरी ने मई 1900 इसवीं में ‘जासूस’ नाम की पत्रिका निकाली जिसका वह लगातार 38 वर्षों तक प्रकाशन करते रहे थे। 

जासूस के बाद इस विधा में अनेक पत्रिकाएँ जैसे जासूसी दुनिया, नीलम जासूस पत्रिका इत्यादि निकलीं। यह पत्रिकाएँ काफी प्रसिद्ध हुआ करती थीं और पाठकों को इन मासिक पत्रिकाओं का इंतजार रहता था। पर जब तक मैने लोकप्रिय साहित्य की तरफ रुख किया तो ऐसी पत्रिकाएँ लगभग गायब हो चुकी थी। अपराध कथा की बात की जाए तो केवल सत्य कथाएँ और मनोहर कहानियां जैसी पत्रिकाएँ ही बाजार में नजर आती थी जिन्हें अपराध साहित्य तो नहीं ही कहा जा सकता है। मैंने इन्हें भी पढ़ा था लेकिन इनमें सच्ची घटनाओं को मिर्च मसाला लगाकर परोसा जाता था जो कि एक अपराध कथा जैसा मज़ा तो नहीं ही देता था। हाँ, अगर आपका ध्येय खाली ये मिर्च मसाला पढ़कर उत्तेजना पाना हो तो वह अलग बात थी। मैंने तो ये सोच ही लिया था कि शायद जासूसी पत्रिका शायद ही अब कभी देखने को मिले लेकिन कब क्या हो जाए ये कौन जानता है। 

ऐसे दौर में जब बड़े-बड़े प्रकाशन पत्रिकाओं से किनारा कर रहे हैं नीलम जासूस कार्यालय ने ‘तहकीकात’ नामक पत्रिका का प्रकाशन किया है जो कि सराहनीय पहल है। जी हाँ, जासूसी पत्रिकाओं की कमी पूरा करने अब तहकीकात आई है और प्रकाशक ने इसमें अपराध कथाएँ तो दी ही हैं साथ ही गंभीर साहित्य भी पाठकों को परोस कर इसे एक पूरी साहित्यिक थाली के रूप में पाठकों को परोसा है।

पत्रिका का पहला अंक जनवरी 2022 में आया था और अब मुझे इसे पढ़ने का समय लगा है। पत्रिका दो भागों में विभाजित है। पहला भाग अपराध कथाओं और उनकी रचनाओं के लिए समर्पित है और दूसरा भाग सत्यबोध परिशिष्ट है जिसमें प्रकाशक ने गंभीर साहित्य के अंतर्गत आने वाली रचनाओ को प्रकाशित किया है।  

अपराध साहित्य वाले हिस्से की बात की जाए तो इसमें चार रचनाएँ और एक समीक्षा है। यह रचनाएँ निम्न हैं:

चरित्रहीन और हत्यारा कौन

चरित्रहीन और हत्यारा कौन सत्यकथाएँ जिसमें इन दो ऐसे आपराधिक मामलों का जिक्र है जो कि आजादी से पहले असल में घटित हुए थे। इन मामलों की तहकीकात जिन पुलिस अफसरों (अहमद यार खाँ ने चरित्रहीन और सफ़दर हयात खाँ ने हत्यारा कौन) ने की उन्हीं ने इन रचनाओं को लिखा है। मूलतः उर्दू में लिखी रचनाओं का हिंदी अनुवाद इश्तियाक खाँ द्वारा किया गया है। अनुवाद अच्छा हुआ और अगर उस समय की पुलिस की कार्यशैली आप जानना चाहते हैं तो यह रचनाएँ आपको जरूर रोचक लगेंगी। 

इन रचनाओं पर विस्तृत तौर पर अलग से लेख लिख चुका हूँ जिन्हें आप निम्न लिंक पर जाकर पढ़ सकते हैं:
चरित्रहीन  | हत्यारा खान 


शराबी कातिल 

'शराबी कातिल' लेखक वेद प्रकाश काम्बोज द्वारा लिखी उपन्यासिका है। वैसे तो यह रहस्यकथा है लेकिन साथ में कई सामाजिक मुद्दों पर बात भी करती है। इस रचना पर भी मैंने विस्तृत तौर पर लिखा है जिसे आप निम्न लिंक पर जाकर पढ़ सकते हैं:
शराबी कातिल


रहस्यमय खबरी

रहस्यमय खबरी अंग्रेजी कहानी द बर्गलर्स घोस्ट का हिंदी अनुवाद है। अनुवाद मेरे द्वारा किया गया है। कैसा है ये तो पाठक ही बता पाएंगे। 

हाँ, अगर आप अनुवाद पढ़ना चाहें तो मेरी वेबसाईट पर जाकर उसे पढ़ सकते हैं:
रहस्यमय खबरी


पत्रिका में इस भाग में आखिरी रचना गुरप्रीत बुट्टर द्वारा लिखी चीते की आँख की समीक्षा है जो कि उपन्यास के प्रति उत्सुकता जागृत करती है। 

पत्रिका का दूसरा भाग सत्यबोध परिशिष्ट है जिसमें दो कहानियाँ, गजलें, एक लेख, दो समीक्षाएँ और कुछ लतीफे प्रकाशित हुए हैं जो कि पाठक को पढ़ने, सोचने और मुस्कुराने के लिए बहुत कुछ दे जाते हैं। मैं यहाँ गद्य रचनाओं की ही बात करूँगा क्योंकि पद्य पर बात करना मुझे आता नहीं आता है और लतीफे आप खुद ही पढ़ें तो बेहतर रहेगा।  

चील-कव्वे

परिशिष्ट की पहली रचना रोशनलाल सूरीवाला की कहानी ‘चील कव्वे’ है। यह एक मार्मिक कहानी है जो कि समाज का एक रूप दर्शाती है। कहानी का किरदार सावित्री आपका मन छू लेती है और यह मसल चरितरार्थ करती है पूत कपूत हो सकते हैं लेकिन माता कुमाता अक्सर नहीं होती है। कहानी पठनीय है।   

अहसान का कर्ज

परिशिष्ट की दूसरी रचना प्रकाशक सुबोध भारतीय की कहानी अहसान का कर्ज है। कहते हैं कर भला तो तो हो भला। कहानी के नायक सुखबीर को यह चीज इस कहानी में पता लगती है। कहानी पठनीय है और सुखबीर के घर आए मेहमान गुरविंदर सिंह रहेजा कौन है यह जानने के लिए आप कहानी पढ़ते चले जाते हैं। हाँ, कहानी में सुखबीर के घर पर पहले लोग किराये पर रहते थे और बाद में उसके परिवार की हालत खस्ता हो जाती है। परिवार की आर्थिक स्थिति कैसे डामाडोल हुई इस पर भी लेखक ने कहानी में प्रकाश डाला होता तो अच्छा रहता। 

चमचा-योनि 

इसी परिशिष्ट में रोशनलाल सूरीवाला की लघु-कथा चमचा-योनि मौजूद है। लघु-कथा रोचक है और कम शब्दों में चमचे कितने खतरनाक हो सकते हैं यह दर्शाती है। 

किताबों के दिन

परिशिष्ट में गोविंद गुंजन द्वारा लिखा गया लेख किताबों के दिन उन दिनों (साठ सत्तर के दशक) में आपको ले चलता है जिन्हें किताबों का स्वर्णयुग भी कहा जा सकता है।  वहीं लेखक लोकप्रिय साहित्य के रचनाकारों से लेकर बाकी साहित्यकारों का उनके प्रति भाव और आज के वक्त में पढ़ने की आदत के कम होने पर भी अपने लेख में बात करते हैं। 

इन रचनाओं के अलावा दो समीक्षाएँ भी परिशिष्ट में मौजूद हैं। जनप्रिय लेखक ओम प्रकाश शर्मा के उपन्यास रुक जाओ निशा पर लेखक जितेंद्र नाथ और जनप्रिय के ही दूसरे उपन्यास साँझ का सूरज पर लेखक राकेश सिंह की समीक्षाएँ इन रचनाओं के प्रति आपकी उत्सुकता तो जगाती ही है साथ में इनके विभिन्न पहलुओं पर भी नजर डालती है।  

पत्रिका की रचनाओं के इतर इसके प्रकाशन पर भी बात करूँ तो यह पत्रिका अच्छे कागज पर उच्च गुणवत्ता के साथ प्रकाशित की गई है। इस कारण इस पत्रिका की कीमत 150 रुपये हो गई है। गुणवत्ता को देखते हुए 150 पेज की इस पत्रिका के 150 रुपये कीमत वाजिब लगती है लेकिन अगर आप बाजार में मौजूद दूसरी साहित्यिक पत्रिकाओं से इसकी तुलना करते हैं तो यह ज्यादा प्रतीत होती है। मेरी प्रकाशक को यही सलाह होगी कि अगर हो सके तो बाकी पत्रिकाओं जैसा प्रयोग किया जा रहा कागज वह प्रयोग में लाए और इस पत्रिका की कीमत को जितना कम हो सकें उतना कम करें। अगर वो ऐसा करने में कामयाब हो जाते हैं तो यह पत्रिका काफी पाठकों तक अपनी पहुँच बनाने में कामयाब हो जाएगी। वहीं अगर वह चाहें तो कुछ विशेष संग्रहणीय अंकों को कभी कभी इस तरह सफेद कागज पर उच्च कीमत पर प्रकाशित कर सकते हैं। 

पत्रिका के आने वालों अंकों का मुझे तो इंतजार रहेगा और अगर लोकप्रिय लेखन में आपकी रुचि है तो एक बार आपको भी इसे खरीद कर इस मुहिम में प्रकाशक का सहयोग करना चाहिए। 

(अगर आपने पत्रिका पढ़ी है तो आपको यह पत्रिका कैसी लगी यह मुझे बताना न भूलिएगा। वहीं अगर पहले जो जासूसी पत्रिकाएँ आती थीं उनके नाम आप जानते हों तो उनके नाम भी कमेंट्स के माध्यम से साझा करिएगा। )

पुस्तक लिंक: अमेज़न


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