तहकीकात प्रवेशांक: हत्यारा कौन - मलिक सफ़दर हयात | इश्तियाक खाँ

संस्करण विवरण:

फॉर्मैट: पेपरबैक | पृष्ठ संख्या: 29 | प्रकाशक: नीलम जासूस कार्यालय | अनुवादक: इश्तियाक खाँमूल भाषा: उर्दू

पुस्तक लिंक: अमेज़न



कहानी

रायपुर गाँव के बाहरी तरफ पड़ता वह कुआँ बेरी वाला कुआँ कहलाता था। उसी कुएँ के पास एक सुबह गाँव की आबिदा नाम की महिला की लाश मिली थी। 

आबिदा के घर में उसके सास ससुर और बेटी को छोड़कर कोई नहीं रहता था। उसका पति विदेश में नौकरी कर रहा था। घर वालों की माने तो रात को वो घर का दरवाजा बंद करके सो चुके थे। 

ऐसे में प्रश्न उठता था कि फिर आबिदा कैसे कुएँ तक पहुँची थी।  

आखिर किसने किया था आबिदा का कत्ल? 

उसे कत्ल क्यों कर दिया गया? 

पुलिस कातिल तक कैसे पहुँची?


मेरे विचार

'हत्यारा कौन' तहकीकात पत्रिका में प्रकाशित हुई दूसरी रचना है। यह मलिक सफ़दर हयात द्वारा लिखी गई एक सत्य कथा (ट्रू क्राइम) है। मूलतः उर्दू में  लिखी इस रचना को इश्तियाक खाँ द्वारा हिन्दी में अनूदित किया गया है। अनुवाद अच्छा हुआ है और उसके लिए अनुवादक बधाई के पात्र हैं। 

मलिक सफ़दर हयात पूर्व पुलिस अफसर थे जिन्होंने अहमद यार खाँ की तरह ही अपने द्वारा सुलझाए गए मामलों को पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया था। इन्होंने अक्सर ग्रामीण पंजाब के अपने अनुभवों को लिखा था। 'हत्यारा कौन' भी इनकी एक ऐसी ही रचना है। 

वह कुआँ बेरी वाला कुआँ कहलाता था जहाँ उस औरत की लाश मिली थी। पुलिस ने किस तरह उसके कातिल का पता लगाया यही इस संस्मरण में दर्शाया गया है। 

प्रथम पुरुष में चलता यह संस्मरण पुलिस की कार्य शैली के विभिन्न पहलुओं को दर्शाता है। कई बार मौसम के चलते कैसे सबूत खत्म होने का खतरा रहता है यह भी इसमें दिखता है। चूँकि मामला गाँव में घटित होता है जहाँ पर हर कोई एक दूसरे को जानता है तो किरदारों द्वारा झूठ बोले जाने पर भी चीजें खुल जाती हैं और पुलिस हत्यारे तक पहुँच ही जाती है। वहीं चूँकि घटना गाँव में दर्शाई गई है तो वहाँ के समाज का थोड़ा बहुत हिस्सा भी इधर देखने को मिलता है। 

हाँ, अक्सर हमारे मन में अपराधियों और उसके संभावित अपराधियों के प्रति एक पूर्वग्रह होता है जो कि हमें एक ही दिशा में सोचने को मजबूर कर देता है। पुलिस वाले भी इंसान होते हैं और इसलिए वो भी कई बार इनसे ग्रसित होते हैं। इस तहकीकात में भी यह चीज एक बार दिखती है और यह सीख दे जाती है कि शक हर किसी पर होना चाहिए। 

यह एक साधारण से मामले का ब्योरा है जिसमें चूँकि मकतूला की पहचान पता चल जाती है तो पुलिस वालों के लिए मामला काफी आसान हो जाता है। वहीं कहानी बहुत टू द पॉइंट लिखी है जिससे केवल जरूरी बातें ही इधर मौजूद हैं तो कई बार ये इंवेस्टिगेशन रिपोर्ट सी लगती है। थोड़ा मानवीय पहलुओं को और अच्छे से उघाड़ा जाता तो बेहतर होता। 

अंत में यही कहूँगा कि रोचक अपराध कथा है। हाँ, चूँकि यह उपन्यास नहीं है तो यह मामला इतना पेचीदा नहीं है इसलिए अगर किसी उपन्यास के तरह इसे पढ़ेंगे तो आप निराश हो सकते हैं। वहीं इसे पुलिस की कार्यशैली समझने के लिये पढ़ेंगे तो अच्छा रहेगा।  

(यह रचना तहकीकात पत्रिका के जनवरी 2022 अंक में प्रकाशित हुई है। )


पुस्तक लिंक: अमेज़न


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4 Comments
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  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा आज रविवार (31-07-2022) को   "सावन की तीज का त्यौहार"   (चर्चा अंक--4507)    पर भी होगी।
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    कृपया लिंकों का अवलोकन करें और सकारात्मक टिप्पणी भी दें।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. चर्चा अंक में मेरी पोस्ट को स्थान देने हेतु हार्दिक आभार।

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  2. संस्करण विवरण काफी दिलचस्प है। आगे पढ़ने की ललक पैदा हो रही है!

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