अंधविश्वास पर तर्क की जीत की कहानी है 'कुलदेवी का रहस्य'

संस्करण विवरण:
फॉर्मैट: पेपरबैक | पृष्ठ संख्या: | प्रकाशक: नीलम जासूस कार्यालय | सीरीज: गोपाली शृंखला 

पुस्तक लिंक: अमेज़न


कहानी 

चमनगढ़ रियासत इस वक्त मुसीबत से जूझ रही थी। राज परिवार के सभी सदस्य भयभीत थे क्योंकि कुलदेवी ने राज परिवार के सदस्यों को परेशान करना शुरू कर दिया था। वहाँ के राज परिवार को लगता था कि कुलदेवी उनसे नाराज है। राज परिवार का मानना था कि अब कुलदेवी किसी न किसी के प्राणों की आहुति लेकर ही शांत होने वाली थी। 

चमनगढ़ के राजा की तबियत इस कारण बिगड़ गई थी और उन्होंने बिस्तर पकड़ लिया था। 

जब डॉक्टर तक राजा की तबीयत में सुधार न ला पाये तो राज्य के अंग्रेज रेजिडेंट क्लार्क रॉबर्टसन के माध्यम से राजा ने वायसराय से मदद माँगी। 

इसी मदद का नतीजा था नवयुवक जासूस रायकृष्ण गोपाली को चमनगढ़ रियासत भेजा गया। गोपाली का कार्य कुलदेवी के कोप के रहस्य का पता लगाकर उसे सुलझाना था। 

आखिर चमनगढ़ राज्य की कुलदेवी नाराज क्यों थी? क्या इसके पीछे कोई राज था?
क्या गोपाली कुलदेवी का रहस्य (Kuldevi Ka Rahasya) उजागर करने में कामयाब हो पाए? 
रहस्य का पता लगाने के लिए उन्हीं किन किन मुसीबतों से दो चार होना पड़ा?

मुख्य किरदार 

क्लार्क रॉबर्टसन - चमनगढ़ रियासत के रेजिडेंट
वीर बलबीर सिंह - चमनगढ़ के महाराज 
महारानी - चमनगढ़ की रानी 
छोटी रानी - महाराज की दूसरी पत्नी 
ठाकुर सिंह - छोटी रानी का भाई जिसके हाथ में चमनगढ़ की सेना की बागडोर थी 
कैप्टन हैरीसन - वायसराय के डॉक्टर 
मिस्टर कपूर - जासूसी विभाग के प्रमुख अफसर
डेनियल केनिथ - जासूसी विभाग के सेक्रेटरी जनरल 
रायकृष्ण 'गोपाली' - जासूसी विभाग के नवयुवक जासूस 
भीखूमल - नगर सेठ 
चन्दनबाई - एक वेश्या जो कि चमनगढ़ की सबसे मशहूर वेश्या हुआ करती थी 
केसरबाई - चन्दनबाई की सबसे बड़ी लड़की जो कि अब चमनगढ़ की सबसे मशहूर वेश्या थी
झींगामल, हीरामल - चमनगढ़ के जौहरी
राजवंशी - राजा का रिश्ते में भाई 
उमरावसिंह - महारानी का विशेष अनुचर जो कि पद से रिसालदार थे 
धनदास - महाराज की अतिथिशाला का प्रबंधक 
रूपा - महाराज की दासी जिसे विशेष रूप से गोपाली के लिए लगाया गया था 
तेजसिंह - चमनगढ़ की सेना का एक नायक 


विचार

मुझे लगता है कि जब से मानव का विकास हुआ है तभी से मनुष्यों में अंधविश्वास का भी जन्म शायद हुआ होगा। जिस चीज को व्यक्ति समझ नहीं पाता है उसे ऐसी चीजों से जोड़कर देखने लगता है जिससे उनका कोई संबंध असल में नहीं होता है। कई बार भय के चलते ये होता है, कई बार अज्ञानता के चलते और कई बार आस्था के चलते वह यह करने लगता है। वहीं दूसरी तरफ समाज में ऐसे मनुष्य भी होते हैं जो लोगों की इस अंधविश्वासी प्रवृत्ति से अपनी स्वार्थसिद्धि करते हैं। यह चीज आज भी उसी तरह व्याप्त है जैसे पहले थी।  हमने विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में भले ही काफी विकास कर लिया है लेकिन आज भी 21 सदी में हमें कई ऐसे लोग मिल जाते हैं जो अंधविश्वासी होते हैं और कई ऐसे लोग भी मिल जाते हैं जो कि उनके इस अंधविश्वास का दोहन करते हैं। अखबारों में इस तरह की खबरे आम आती हैं जिसमें पढ़े लिखे लोग भी अंधविश्वास की गिरफ्त में पढ़कर अपना काफी बड़ा नुकसान करवा बैठते हैं। प्रस्तुत उपन्यास 'कुलदेवी का रहस्य' (Kuldevi Ka Rahasya) भी ऐसे ही घटना को दर्शाता है जिसमें कुछ लोग चमनगढ़ रियासत के लोगों के अंधविश्वास का फायदा उठाकर ऐसा खतरनाक षड्यन्त्र रचते हैं जो कि कामयाब हो ही जाता अगर उसमें गोपाली नामक जासूस अपना बड़ा सा जूता न फँसाते। 

'कुलदेवी का रहस्य' (Kuldevi Ka Rahasya) नीलम जासूस कार्यालय (Neelam Jasoos Karyalay) द्वारा प्रकाशित 118 पृष्ठ का उपन्यास है जिसका घटनाक्रम सन 1935 ईसवी में ब्रिटिश आधीन भारत में घटित होता है। यह गोपाली शृंखला (Gopali Series) का पहला उपन्यास है। उपन्यास की शुरुआत में पाठक कुछ चिट्ठियों के माध्यम से यह जान जाते हैं कि चमनगढ़ रियासत के लोग काफी अंधविश्वासी हैं और उन्हें इस पर यकीन हो चुका है कि राज परिवार की कुलदेवी उनसे रुष्ट है। महल में कुछ घटनाएँ ऐसी हो रही है जिसने महाराज और बाकी राजपरिवार की रातों की नींद और दिन का चैन हराम किया हुआ। हालत इतने बद्दतर हो चुके हैं कि चमनगढ़ एक महाराज मृत्युशैया पर लेटे हुए हैं। ऐसे में राजा और रियासत के अंग्रेज रेजिडेंट की कोशिशों के चलते नए जासूस गोपाली कुलदेवी के कोप का रहस्य का पता करने चमनगढ़ पहुँच जाते हैं। चमनगढ़ पहुँच कर वह किस तरह का जुगाड़ कर महल में पहुँचते हैं? वह कैसे राज परिवार के सदस्यों को प्रभावित करते हैं? महल में पहुँचकर उनके साथ क्या-क्या होता है और किन परेशानियों से गुजरकर वह आखिर में इस षड्यन्त्र से पर्दा उठाने का काम करते हैं यह उपन्यास का कथानक बनता है। 

उपन्यास का कथानक काफी चुस्त है। घटनाएँ एक के बाद एक ऐसी घटित होती हैं कि आप उपन्यास के पृष्ठ पलटते चले जाते हैं। कहानी में एक दो घुमाव भी आते हैं जो कि रोचक हैं।  चूँकि उपन्यास 1935 की एक रियासत में घटित होता है तो लेखक ने भाषा भी उसी वक्त की बनाने की कोशिश की है और यह भाषा मुझे पसंद आई।

उपन्यास चूँकि 1935 ईस्वीं का है और कथानक एक रियासत में घटित होता है तो पाठक को रियासत के लोगों के  जीवन का भी पता चलता रहता है। लेखक वहाँ के नागरिकों के जीवन को  कुछ इस तरह बताते हैं:

फिर भी चमनगढ़ की प्रजा अमीर नहीं थी। प्रजा को अमीर बनाना न अंग्रेज रेजिडेंट चाहता था... न भारतीय राजा चाहता था और न चमनगढ़ के व्यापरी बनिए बक्काल चाहते थे। 

हर साल का लगान, हर हमीने की सलामी से ऊबा हुआ किसान हर दिन डटकर मेहनत करता था, लेकिन हर रात दारू और कुसुंबा पीकर दरिद्रता भुलाकर राजा बन जाता था। (पृष्ठ 17)

तस्वीर, रियासती तस्वीर के दो पहलू...!
एक... गाँवों में फैली हुई असीम दरिद्रता और अशिक्षा। 
दूसरा पहलू... महल महलों का वैभव। जो देखे वह चकाचौंध हो जाये। (पृष्ठ 34)


जनप्रिय लेखक ओम प्रकाश शर्मा (Janpriya Lekhak Om Prakash Sharma) की एक खास बात यह भी होती थी कि वह अपने उपन्यासों में अपराधियों का मानवीय पक्ष भी दर्शाते थे। यह मानवीय पक्ष उनके उपन्यासों के खलनायकों के प्रति आपके मन में एक तरह की सहानुभूति पैदा करते हैं।  प्रस्तुत उपन्यास 'कुलदेवी का रहस्य (Kuldevi Ka Rahasya)' में भी ऐसा ही होता है। यह पक्ष क्या है यह तो आप उपन्यास पढ़कर ही जाने तो बेहतर होगा।  


किरदारों की बात करूँ तो उपन्यास के केंद्र में राय कृष्ण गोपाली हैं जिसका किरदार मुझे पसंद आया। यह एक हंसमुख किरदार है जो कि बाते बनाना जानता है और बातों से काम निकालने में पारंगत है।  गोपाली की एक खास बात यह भी है कि वह साढ़े छः फीट लंबा विशालकाय पुरुष है। ऐसे विशालकाय नायक हिंदी साहित्य में मैंने कम ही देखें हैं। आप ऐसे व्यक्ति से उम्मीद लगाते हैं कि वह अपनी शारीरिक ताकत का ज्यादा इस्तेमाल करता होगा लेकिन इस उपन्यास में जनप्रिय लेखक ओम प्रकाश शर्मा (Janpriya Lekhak Om Prakash Sharma) ने उसे शारीरिक ताकत के बजाए दिमाग से काम लेने वाला दर्शाया है।  यह देखकर मुझे अच्छा लगा। हाँ, ऐसा नहीं है कि वह ताकत का इस्तेमाल नहीं करना जानता है। उपन्यास में ही यह बताया गया है कि गोपाली जब पहली बार जासूसी के प्रशिक्षण के लिए आया तो उसने अपने अंग्रेज सार्जेंट की बहुत ठुकाई की थी। 

रायकृष्ण जब जासूस विभाग में प्रशिक्षण के लिए भर्ती किया गया तो उसने पहले ही दिन परेड कराने वाले एक अंग्रेज सार्जेंट की ऐसी ठुकाई की कि रहे नाम साईं का! (पृष्ठ 13)

मैं उम्मीद करूँगा कि कुछ ऐसे उपन्यास भी जनप्रिय लेखक ने लिखे हों जिसमें गोपाली एक्शन करते हुए भी दिखाई देते थे। ऐसे उपन्यास में जरूर पढ़ना चाहूँगा। गोपाली दिमागदार तो है ही लेकिन मन का कोमल भी है। यह कोमलता भी उपन्यास में दृष्टिगोचर होती है।  गोपाली का फलसफा 'जितना बड़ा जूता होगा उतनी ही ज्यादा पॉलिश लगेगी' भी मुझे भाया। देखना होगा कि वह आगे कितने बड़े जूतो में कितनी ज्यादा पॉलिश लगाते हैं। 

उपन्यास के बाकी किरदार कथानक के अनुरूप हैं। रूपा और केसर का किरदार रोचक है। जहाँ रूपा के किरदार के माध्यम से लेखक महल की दासियों के जीवन पर टिप्पणी करते हैं वहीं केसर के किरदार के माध्यम से वेश्या के जीवन पर भी प्रकाश डालते हैं। उपन्यास का अंत ऐसे होता है कि उनका गोपाली के अगले उपन्यासों में आने का रास्ता खुल जाता है। गोपाली रूपा और केसर के बीच के समीकरण को लेखक महोदय ने आगे के उपन्यासों में किस तरह दर्शाया और विकसित किया है यह मैं जरूर देखना चाहूँगा। 

उपन्यास की कमी की बात करूँ तो एक षड्यन्त्रकारी की पहचान उपन्यास में जिस तरह से उजागर हुई वह थोड़ा और बेहतर हो सकता था। अभी तुक्के से यह पता चल जाता है और इसके बाद सारा रहस्य खुल जाता है। मुझे लगता है यह पता लगाना थोड़ा और रोमांचक बनाया जा सकता था।

वहीं उपन्यास चूँकि 118 पृष्ठों का है तो कुछ चीजें उपन्यास में ऐसी तेजी से घटित होती है जिन्हें देख लगता है कि लेखक अगर इसे विस्तृत तौर पर लिखते तो उपन्यास और रोमांचक हो सकता था। मसलन उपन्यास का एक जरूरी हिस्सा कुलदेवी का प्रकोप है पर इसे उतना अच्छी तरीके से लेखक ने दर्शाया नहीं है। कुलदेवी के कोप के विषय में पाठक केवल चिट्ठियों  से ही जानता है। कुलदेवी ने किस तरह से राज परिवारों के सदस्यों को डराया था यह बात आखिर को छोड़कर केवल बातों से पता चलती है। मुझे व्यक्तिगत तौर पर लगता है कि लेखक इस हिस्से को बातों या चिट्ठी के माध्यम से नहीं अपितु घटित होते हुए दर्शाते तो एक लोमहर्षक (डरावना) वातावरण बन सकता था जो कि पाठकों को और अधिक रोमांचित करता। यह घटित होना उपन्यास में बीच-बीच होता हुआ दिखलाया जा सकता था। अभी आखिर में जो दृश्य आता भी है वह भी जल्दबाजी में लिखा गया लगता है। महारानी को जो डर उस वक्त लगता है वह पाठक के तौर पर मुझे नहीं लगा। अगर लगता तो उपन्यास जितना पसंद आया उससे और ज्यादा पसंद आता। यही चीज मिस्टर कपूर वाले प्रसंग में भी दिखती है। मिस्टर कपूर ब्रिटिश भारत के जासूस थे जो कि रियासत गए और फिर उनके साथ कुछ हुआ। यह कुछ केवल एक पंक्ति में निपटा दिया गया है जबकि इस प्रसंग को भी आसानी से विस्तार दिया होता तो यह बेहतरीन बन सकता था और कहानी में रोमांच बढ़ाया जा  सकता था।    

इसके अलावा एक और चीज है जो कि मुझे लगता है कि उपन्यास में होनी चाहिए थी लेकिन अभी नहीं है। जैसे मैंने ऊपर कहा है कि गोपाली की लंबाई भी उसे विशेष बनाती है पर इस उपन्यास में शुरुआत के बाद से लेखक गोपाली की इस आश्चर्यजनक लंबाई का कहीं इस्तेमाल नहीं करते हैं। मतलब अगर शुरुआत में लेखक ये नहीं बताते कि वह साढ़े छः फीट लंबा था तो आगे के कथानक को पढ़ते हुए पाठक यह नहीं जान पाएगा। जबकि मुझे लगता है कि इतने ऊँचे आदमी के साथ कुछ न कुछ आम जीवन में ऐसा होता रहेगा जो कि तब न होता अगर वह आम ऊँचाई का होता। अभी यह कुछ न कुछ मौजूद नहीं है। ऐसा लगता है जैसे चमनगढ़ में साढ़े छः फीट होना आम सी बात है। 


अंत में यही कहूँगा कि  कुलदेवी का रहस्य  (Kuldevi Ka Rahasya) मुझे पसंद आया। अगर ये कहें कि यह अंधविश्वास पर तर्क की जीत की कहानी है तो कुछ भी गलत नहीं होगा। यह गोपाली शृंखला (Gopali Series) की ऐसी शुरुआत है जो इसके बाकी उपन्यास पढ़ने के लिए आपको प्रेरित कर देगा। कम से कम मुझे तो प्रेरित किया है।  हाँ, चूँकि उपन्यास कई वर्षों पहले लिखा गया तो उसी हिसाब से इसे पढ़ेंगे तो बेहतर तरीके से इसका लुत्फ ले पाएँगे। 



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4 Comments
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  1. बहुत बढ़िया समीक्षा ।

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  2. 'लाल सिग्नल' भी पढ़िए विकास भाई। गोपाली और जगत ने एक साथ मिलकर वो रंग जमाया है कि बस...।

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    1. अभी हाल में कुछ खरीदी हैं पहले धीरे-धीरे उन्हें पढ़ रहा हूँ। आप तो मेरी पढ़ने की स्पीड से वाकिफ हैं।

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