प्यार की दास्तान: तुम सुनो तो कहें - दीप्ति मित्तल

संस्करण विवरण:

फॉर्मैट: ई-बुक | पृष्ठ संख्या: 32 | एएसआईएन: B09D8QSRN8

पुस्तक लिंक: अमेज़न

समीक्षा: प्यार की दास्तान तुम सुनो तो कहें | Review: Pyar ki dastan: Tum Suno To kahein | Deepti Mittal

कहानी

भीरा मुंबई से 200 किलोमीटर दूर पड़ता एक छोटा सा गाँव था जिसके नजदीक मौजूद एक जलप्रपात के बारे में अनेक किंवदंतियाँ फैली हुई थी। लोगों की माने तो उधर भूत-प्रेत का साया था। 

रिया, जो पेशे से एक पत्रकार थी, एक आधुनिक सोच वाली लड़की थी जिसे भूत-प्रेत पर विश्वास नहीं था।  रिया को जब उसकी कामवाली बाई ने इस जगह के विषय में बताया तो उसे यह जगह अपने शो के अगले एपिसोड के लिए उपयुक्त लगी। 

भले ही भीरा गाँव की कहानियाँ उनके धारावाहिक के लिए अच्छी सामग्री थी पर उसे लगा नहीं था कि उधर उन्हें कुछ मिलने वाला था। ऐसे में जब उन्होंने गाँव वालों के चेहरे पर उस जगह को लेकर सचमुच का डर देखा तो वह हैरान रहे बिना न रह सके। 

आखिर भीरा गाँव के उस जलप्रपात के विषय में कैसी कहानियाँ प्रचलित थी?

क्या उस जलप्रपात के विषय में फैली हुई कहानियाँ केवल अंधविश्वास थी या उनके पीछे कोई सच्चाई थी?

रिया और उसके साथी  को उस गाँव में जाकर क्या क्या अनुभव हुए?


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मुख्य किरदार 

रिया - एक न्यूज चैनल की पत्रकार 

अतुन - रिया का सहकर्मी और एक बहुत अच्छा दोस्त 

वीर - गाँव का एक लड़का 

सगुना - गाँव के प्रधान की लड़की 

शगुन - रायगढ़ के किले में वीर को मिली एक युवती 


मेरे विचार

व्यक्ति की मृत्यु होने के बाद उसका क्या होता है यह ऐसा प्रश्न है जो मनुष्यों को सदियों से सालता आ रहा है। क्या भूत प्रेत होते हैं? क्या जगहें भूतहा होती हैं? क्या हम जो आसपास मौजूद जगहों से जुड़े भूतहा किस्से सुनते हैं उनमें कोई सच्चाई होती है? ये कुछ ऐसे सवाल है जिनका कोई पुख्ता उत्तर शायद ही किसी के पास हो। कुछ लोग इन पर विश्वास करते हैं और कुछ लोग इन पर विश्वास नहीं करते है। पर जो भी हो इनसे जुड़े किस्से सुनने वाले (मुझको भी ) को रोमांचित जरूर कर देते है। इसलिए जब मुझे पता लगा कि लेखिका दीप्ति मित्तल की उपन्यासिका प्यार की दास्तान एक प्रेम कहानी होने के साथ साथ अपने साथ परालौकिक तत्व भी लिए हुए है तो इसे पढ़ने की इच्छा मन में जागना स्वाभाविक था। इससे पहले मैंने उनका लघु-उपन्यास ओये मास्टर के लौंडे पढ़ा था जो मुझे बहुत पसंद आया तो मन उनके इस प्रयोग का अनुभव लेने को आतुर था। मैं यह तो जानता था कि उन्होंने प्रेम में सराबोर कहानियाँ लिखी हैं लेकिन परालौकिक तत्वों के साथ उन्होंने पहले प्रयोग किया है इसका मुझे पता नहीं था। शायद इस विधा में यह उनका पहला कदम हो लेकिन जो भी है प्यार की दास्तान पढ़ने के बाद मैं यही कहूँगा कि उन्हें एक खालिस परालौकिक रोमांचकथा (सुपरनेचुरल थ्रिलर) लिखने की कोशिश करनी चाहिए।

प्यार की दास्तान जैसे कि शीर्षक से ही जाहिर है एक प्रेम कहानी की दास्तान है। कहानी में एक किरदार मुख्य किरदारों को प्रेम की कहानी सुनाता हुआ दिखता है। वो कहानी जिसके कारण उस इलाके को स्थानीय लोग भूतहा कहते हैं। यह कहानी क्या है और इस कहानी को सुनने के बाद किरदार खुद में क्या चीज खोज पाते हैं यह पाठक पुस्तक पढ़कर ही जान पाएंगे। 

रिया और अतुन पुस्तक के मुख्य किरदारों में से हैं। रिया और अतुन को जितना भी लेखिका ने दर्शाया है उससे आप उनके साथ एक जुड़ाव महसूस कर पाते हैं। उनका आपसी समीकरण प्यारा है। कई बार जिंदगी में हम जिस चीज से गुजर रहे होते हैं उसको तब तक नहीं समझ पाते हैं जब तक हम किसी और के जीवन में उसकी झलक नहीं देख लेते हैं।  यह दोनों किरदार ऐसे लोग हैं जिन्हे अपनी भावनाओं का असली ज्ञान भी इस तरह होता है। 

वीर और सगुना ऐसे किरदार जिनके प्यार की दास्तान इस पुस्तक में सुनाई जा रही है। यहाँ पर इतना ही कहूँगा कि कहानी सुनाने का तरीका ऐसा है कि आप इनसे भावनात्मक जुड़ाव महसूस करने लगते हैं। किरदारों के लिए खुश होते हैं, उन पर चिढ़ते हैं और उनके लिये दुखी भी होती है।

 
वैसे तो परलौकिक तत्वो वाली कहानी को लोग रोमांच और डर पैदा करने के लिए अक्सर पड़ते हैं लेकिन लेखिका ने इन तत्वों का प्रयोग इस कारण नहीं किया है। इस पुस्तक की कहानी आपको पृष्ठ पलटने के लिए मजबूर जरूर करती है, कुछ हिस्से आपको रोमांचित भी करते हैं लेकिन इसमें जो ट्विस्ट है वो क्या होने वाला है इसका अंदाजा काफी पहले लग जाता है। इसलिए जितना उसको पढ़कर आपको चौंकना चाहिए उतना वह आपको चौंकाता नहीं है। यहाँ पर मैं यह भी कहना चाहूँगा कि चूँकि कहानी का ध्येय आपको चौंकाना नहीं बल्कि किरदारों के साथ भावनात्मक रूप से जोड़ना है तो इसका चौंका न पाना भी आपको खलता नहीं है। कहानी का जो मकसद है वह उसमें कामयाब होती है। वरना इसका प्लॉट (लोगों की भूत की तलाश में जाना और फिर भूत का उनका बैंड बजाना) ऐसा है जिस पर कई हॉरर उपन्यास लिखे जा चुके हैं।  लेखिका का इस रास्ते को न पकड़कर दूसरे रास्ते का चुनाव करना भी शायद एक कारण है जो मुझे यह कहानी पसंद आई। 

मैं अक्सर अपने लेखों में कृति की भाषा के ऊपर बात नहीं करता हूँ। व्यक्तिगत रूप से मेरा मानना है कि भाषा  से ज्यादा कहानी महत्वपूर्ण होती है। भाषा उसको कहने का केवल माध्यम है और इसलिए भाषा ऐसी होनी चाहिए जो कहानी को आगे बढ़ाए न कि पाठक का ध्यान कहानी से अपनी तरफ खींचे। ज्यादा अलंकृत भाषा हो या गलत भाषा (वर्तनी व्याकरण इत्यादि  का गलत होना) दोनों ही यह काम करती हैं जो मुझे पसंद नहीं आता है।  लेकिन अगर भाषा ऐसी है जो कि खूबसूरत तो है लेकिन उसकी खूबसूरती कहानी के कहने पर विघ्न नहीं डालती है तो ऐसी भाषा व्यक्तिगत रूप से मुझे पसंद आती है। प्यार की दास्तान की भाषा कुछ ऐसी ही है। यह भाषा न इतनी अलंकृत है कि यह कृत्रिम लगे और न इतनी ज्यादा सरल है कि पढ़ते हुए कुछ याद रखने लायक ही आपको न  मिले। भाषा बहते जल की तरह आपको  कहानी में बहा भी लेती है लेकिन इसमें बहते हुए आप कई ऐसे मोतियों जैसे वाक्यों से रूबरू होते हो जिन्हे आप सहेज कर रखना चाहते हो जो कि मुझे पसंद आया। 

अंत में यही कहूँगा कि अगर आप एक रोचक कहानी पढ़ना चाहते हैं तो प्यार की दास्तान आपको निराश नहीं करेगी। कहानी मुझे पसंद आयी। कहानी में परलौकिक तत्व जरूर है लेकिन मैं इसे हॉरर कहानी नहीं कहूँगा और न आप लोगों से कहूँगा कि आप किसी ऐसी अपेक्षा के साथ इसे पढ़ें। अगर बिना अपेक्षा के इसे पढ़ेंगे तो ज्यादा अच्छा रहेगा और इसका आप लुत्फ ले पाएंगे। 

पुस्तक के कुछ अंश जो मुझे पसंद आए

कभी कभी किसी सफ़र में कुछ राहें ऐसी मिल जाती हैं जिन्हें हम नहीं चुनते, वो हमें चुनती हैं...बिसात के मोहरों की तरह और हमें जैसा चाहें, चलाती हैं।

 

कहानियाँ ख़्वाब नहीं होती, वे कल्पनाएँ भी नहीं होती... वे भी हम इंसानों की तरह सुने जाने को तड़पती शय होती हैं... जिन्हें तभी चैन मिलता है जब कोई उन्हें चुपचाप बैठ जी भर सुन ले...वो जो हैं, जैसी हैं, उन्हें अपना ले। 

 

दुनिया में किसी भी क्षण, कुछ भी, पहले जैसा कहाँ रहता है बेटा! सब कुछ निरंतर बदलता ही तो रहता है… इंसान, इंसान की सोच, उसकी भावनाएँ, आकांक्षाएँ...सब कुछ... हम जो आज हैं वो कल नहीं थे और ना कल रहेंगे। जो कल तक ज़रूरी लगता था वो आज मिलने पर ग़ैरज़रूरी हो जाता है। बदलते इंसान की प्राथमिकताएँ भी बदल जाती हैं, इसलिए उसके रिश्तें भी बदल जाते हैं। 

 

इस दुनिया में शाश्वत् सत्य जैसी कोई चीज़ नहीं...एक पल का सच बस उसी पल में सच हो होता है, पल बदलते ही सच भी बदल जाता है...

 

स्त्री-पुरूष का पारस्परिक आकर्षण जब अपने चरम पर होता है तो ये धरती के गुरुत्वाकर्षण जितना प्रबल होता है... इस खिंचाव को तोड़ना इन दोनों में से किसी के बस की बात नहीं रहती...

 

ये मन भी बड़ा अजीब होता है...शायद इसे बनाया ही इसीलिए गया है ताकि इंसान के पैरों में चक्कर बंधे रहें... जो पास होता है उससे कभी संतुष्ट नहीं होता और जो नहीं होता या आकर चला जाता है, उसके पीछे मारा मारा फिरता है 

 

कोई कोई सफ़र ऐसा होता है जहाँ से लौट कर भी पूरा लौटना नहीं हो पाता...या तो हमारा कुछ छूट जाता है या कुछ अतिरिक्त साथ आ आता है...ऐसा कुछ जिसकी हमें उम्मीद भी नहीं होती... 

 

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