सिहरन - शुभानन्द

संस्करण विवरण:

फॉर्मैट: ई-बुक | पृष्ठ संख्या: 33 | प्रकाशन: बुकेमिस्ट

पुस्तक लिंक: अमेज़न

शुभानन्द की उपन्यासिका सिहरन की समीक्षा

कहानी

आकाश कई वर्षों बाद लखीमपुर वापिस आया था। लखीमपुर उसका बचपन बीता था और यही उसका दोस्त अभिषेक रहा करता था। आकाश उससे मिलने ही लखीमपुर आया था। 

पर वह नहीं जानता था कि कोई और भी है जो उसका इधर इंतजार कर रहा था। 

मुख्य किरदार

आकाश - कहानी का नायक 
अभिषेक - आकाश का दोस्त जिसका लखीमपुर में व्यवसाय था 
मंजु - अभिषेक की पत्नी 
मुरारी काका - अभिषेक के घर में काम करने वाले जो अभिषेक के पिता के देहांत के बाद घर छोड़कर चले गए थे 
कृष्णकांत शर्मा - एक पंडित 
किशोरीलाल - अभिषेक का चाचा 
शिवशंकर नाथ - आकाश के चाचा द्वारा भेजा गया व्यक्ति 
राहुल - किशोरीलाल का बेटा 

मेरे विचार

सिहरन लेखक शुभानन्द द्वारा लिखी गयी उपन्यासिका है। वैसे तो लेखक शुभानन्द अपने पाठकों के बीच अपनी अपराध कथाओं के लिए जाने जाते हैं लेकिन गाहे बगाहे वह हॉरर विधा पर भी आजमाते रहते हैं। इससे पहले भी वह राजन-इकबाल रिबोर्न शृंखला में मौत का जादू और जिस्म बदलने वाले लिखे चुके हैं और इन दोनों उपन्यासों में परलौकिक तत्व मौजूद रहे हैं। उनमें भी यह झलक दिख गयी थी कि वह सुपरनैचुरल थ्रिलर लिख सकते हैं और उनका यह उपन्यास इस विधा में रखा गया एक पुख्ता कदम कहा जा सकता  है। 

सिहरन एक ऐसे ही व्यक्ति आकाश की कहानी है जो काफी वर्षों बाद अपने कस्बे में लौट रहा है। वह यहाँ अपने दोस्त से मिलने आता है और फिर उसके साथ जो कुछ घटित होता है वह कथानक बनता है। कहानी शुरू से आपको बांधकर चलती है। आकाश के लखीमपुर पहुँचने के साथ ही उससे लगने लगता है उसके साथ ऐसा कुछ घटित हो रहा है जो कि प्राकृतिक नही कहा जाता है। यह सब क्यों कर रहा है और ऐसा कौन कर रहा है यह जानने के लिए आप रचना के पृष्ठ पलटते चले जाते हैं। चूँकि लेखक अपराध कथा लिखते हैं तो वह इसमें रहस्य रोमांच अंत तक बरकरार रख पाते हैं। परालौकिक घटनाएँ डराती हैं और रहस्य रोमांच किताब पढ़ते चले जाने के लिए प्रेरित करता है। कहानी में ट्विस्ट भी मौजूद हैं जो कि आपको चौंकाने में सफल होते हैं।  

छोटे कस्बों का अपना एक अलग आकर्षण होता है। व्यक्तिगत तौर पर मुझे वहाँ का जीवन काफी पसंद आता है और भले ही काम के चलते मुझे बड़े शहर में रहना पड़ रहा है लेकिन मन में किसी छोटे शहर में बसने की चाह हिलौरे मारती ही रहती है। अपनी यह इच्छा मैं अक्सर छोटे कस्बों में बसाये गए कथानक पढ़कर पूरा करता रहा हूँ। सिहरन में भी लेखक शुभानन्द ने छोटे शहर के इस चार्म और इन शहरों की खासियतों को दर्शाने की कोशिश की है और इसमें सफल भी हुए हैं। 

सिहरन एक तरह से विश्वास के ऊपर भी टिप्पणी करती है। कई बार हम अपने परिचितों पर जरूरत से ज्यादा विश्वास कर लेते हैं। यह एक अच्छा गुण तो है लेकिन फिर किसी पुराने से मिलने से पहले निदा फाजली का यह शेर याद रखा जाए तो बेहतर होगा:

हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी

जिस को भी देखना हो कई बार देखना 


उपन्यासिका की कमी की बात करूँ तो इसमें वर्तनी की कई जगह गलतियाँ हैं। चूँकि यह ई बुक के रूप में मौजूद है तो संस्करण को अपडेट किया जा सकता है। वहीं कथानक में प्रसंग है जब किरदार जो शक्ति उन्हे परेशान कर रही है उसके खिलाफ कदम उठाते हैं और शक्ति के खिलाफ कुछ चीजें ढूंढते रहते हैं। ऐसे में वह शक्ति उन्हे वह सब आसानी से हासिल करने देती है जो उसके खात्मे के लिए जरूरी रहता है। इस प्रसंग में थोड़ी किरदारों की मुश्किलातें बढ़ाकर उसे और ज्यादा रोमांचक बनाया जा सकता था। 

अंत में यही कहूँगा कि यह उपन्यासिका मुझे पसंद आयी। लेखक ने एक रोचक कथानक बुना है जो एक ही बैठक में पठनीय है। उम्मीद है लेखक हॉरर विधा में और ज्यादा दिलचस्पी लेंगे और ऐसे कथानक पाठकों के बीच लाते रहेंगे।

पुस्तक लिंक: अमेज़न

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