मुखौटे का रहस्य - अनुराग कुमार सिंह

उपन्यास 19th May 2019 को पढ़ा गया

संस्करण विवरण:
फॉर्मेट: पेपरबैक | पेज काउंट: 160 | प्रकाशक: सूरज पॉकेट बुक्स | श्रृंखला: त्रिमूर्ति #1

पुस्तक लिंक: किंडल | पेपरबैक


मुखौटे का रहस्य - अनुराग कुमार सिंह
मुखौटे का रहस्य - अनुराग कुमार सिंह 

पहला वाक्य:
तीव्र अपने स्टडी रूम में था।


कहानी


अरण्य एक छोटा सा कस्बा था जो कि मूलतःएक शांत इलाका था।

अनिल सहाय एक पुरातत्ववेत्ता थे जो कि अरण्य शहर में अपनी किसी खोज के सिलसिले में आये थे। पर अब किसी ने उनको मौत के घाट उतार दिया था। पुलिस का मानना था कि अनिल की खोज पूरी हो चुकी थी। और शायद वही खोज उनकी मौत का कारण बनी थी।

तीव्र और सिया सोलह साल के युवा थे। वो लोग अरण्य शहर में अपना जीवन व्यतीत कर रहे थे। जहाँ तीव्र पढाई लिखाई में अव्वल था वहीं सिया खेल कूद और मार्शियल  आर्ट में अव्वल थी। दोनों अच्छे दोस्त थे।

यही कारण था कि वह दोनों सिया के चाचा के लड़के चतुर्भुज को लेने के लिए अरण्य के रेलवे स्टेशन गये थे। वहाँ जाकर हालात कुछ ऐसे बने कि उन्होंने खुद को अनिल सहाय के कत्ल के मामले में उलझता हुआ पाया। उन्हें इतना तो पता लग गया था कि सहाय की खोज एक मुखौटा थी और उसी के कारण उनकी ह्त्या हुई थी।

आखिर तीव्र,सिया और भुज के साथ रेलवे स्टेशन में क्या हुआ था? कैसे वो इस मामले में पड़े? आखिर क्या था इस मुखौटे का रहस्य? क्यों लोग मुखौटे के पीछे पड़े थे? क्या ये बच्चे इन सब बातों से पर्दा उठा पाए? इसके लिए उन्हें कैसी कैसी मुसीबतों से गुजरना पड़ा?

ऐसे सभी सवालों के जवाब आप इस उपन्यास को पढ़कर पता चलेगा।

मुख्य किरदार:

तीव्र - एक सोलह साल का लड़का जो कि अरण्य शहर में रहता था 
सिया - तीव्र की दोस्त जो मर्शिय्ल आर्ट में एक्सपर्ट थी 
चतुर्भुज उर्फ़ भुज - सिया के चाचा का लड़का 
जोजो - अनिल सहाय का सहायक 
इंस्पेक्टर अनुज - सिया के पापा 
अनिल सहाय - एक पुरातत्ववेत्ता जो अरण्य शहर में अपनी खोज कर रहे थे 
सुनील सहाय - अनिल सहाय का भाई 
हवलदार दयाल -इंस्पेक्टर अनुज के थाने में मौजूद एक हवलदार 
समीर - अरण्य स्टेशन में मौजूद एक कंप्यूटर ओप्रेटर 
कालिया - अरण्य शहर में मौजूद एक गुंडा
अहमद - कालिया का दोस्त जो कि अरण्य शहर में एक ट्रेवल एजेंसी चलाता था 
रमा देवी - तीव्र की माँ 
त्रिनेत्र - तीव्र के पिताजी जो कि एक सरकारी स्कूल के शिक्षक थे 
गरूड 11 - एक गुप्त संस्था का सदस्य जो कि गरूड़ के नाम से जाने जाते थे 
बाबर आजम - अरण्य शहर में मौजूद एक माफिया सरदार 
अबू इस्लामी - बाबर आजम का छोटा भाई 
रमन्ना - बाबर आजम का दुश्मन जो कि बाबर आजम की जगह लेना चाहता था 

मेरे विचार


'मुखौटे का रहस्य' अनुराग कुमार सिंह जी की पहली किताब जरूर है लेकिन यह पहली दफा नहीं है जब उन्होंने कुछ लिखा है। राज कॉमिक्स में उन्होंने लेखक के रूप में कई कॉमिक्स की कहानी लिखी हैं। कॉमिक्स के लिए लिखते वक्त सबसे जरूरी चीज यह रहती है कथानक चुस्त होना चाहिए और साथ में रोचकता बरकार रहनी चाहिए क्योंकि आपकी सीमित पृष्ठों में अपनी बात कहनी होती है। इस कारण जो व्यक्ति कॉमिक्स के लिए लिखता है उसके लेखन में कसाव अपने आप आ जाता है। या खूबी उनकी पहली किताब में भी झलकती है। कहीं पर भी अनावश्यक विवरण नहीं है। कहानी की गतिशीलता कभी भी कम नहीं होती है और पाठक कहानी पढ़ता चला जाता है।

किताब के  मुख्य किरदार तीव्र,सिया और भुज हैं। तीनो सोलह वर्षीय बच्चे हैं। तीनों की अपनी अपनी खूबियाँ हैं। जहाँ तीव्र इस टीम का दिमाग है वहीं सिया और भुज इस टीम की ताकत का काम करते हैं। भुज और तीव्र के बीच का समीकरण रोचक है। दोनों का स्वभाव बिलकुल अलग है और इस कारण उनके बीच टकराव होते रहता है। यह टकराव कई रोचक स्थितियाँ पैदा कर देता है। सिया किस तरह उनके बीच बार-बार उभरते इस घर्षण को कम करने की चेष्टा करती है यह देखना मजेदार है।

कहानी का घटनाक्रम तेजी से घटित होता है। किरदार तेजी से आते हैं और कहानी को आगे बढ़ाते हैं। एक्शन लगातार बना रहता है। उपन्यास में कई रहस्य बने रहते हैं। एक से पर्दा उठता है तो उसके जगह दूसरे रहस्य आ जाते हैं। कहानी में ट्विस्ट भी हैं जो कि कहानी में पाठक की रूचि बरकरार रखता  हैं। एक ट्विस्ट वेद जी की याद दिलाता है।

कहानी में जहाँ नायक 16 वर्षीय हैं वहीं खलनायक सभी वयस्क हैं। नायकों को समय समय पर मदद मिलती रहती हैं। खलनायक भी कई बार नायकों पर भारी पड़ते हैं तो रोमांच बना रहता है। यह बच्चों का पहला एडवेंचर है कई बार उनसे गलतियाँ भी होती हैं जिनसे वो सीखते हैं। आगे की कहानियों में कैसे ये तीनों किरदार विकसित होंगे यह देखना रोचक रहेगा।
उपन्यास में कमिया तो कुछ ज्यादा नहीं थी लेकिन कुछ चीजें खटकी थीं। वो निम्न हैं:

हमे केवल यह बताया जाता है कि अनिल और सुनील सहाय केवल भाई हैं। उनके विषय में एक मह्त्वपूर्ण बात, जो कि देखने वाला सबसे पहले नोटिस करता, नहीं बताई जाती है। अगर वह बताकर भी लेखक रहस्य बरकरार रख पाते तो अच्छा होता लेकिन ऐसा नहीं है।यह मुझे थोड़ा कमजोर कड़ी लगी।

गरूड़ प्रमुख को सारी बातें कैसे पता चलती थी? यह गुत्थी आखिर तक मेरे लिए रहस्य ही बनी रही।इस किताब में तो इस विषय में कुछ ज्यादा बताया नहीं गया है उम्मीद है अगली किताब में जरूर बताया जाएगा।

इसके अलावा इसमें दर्शाया गया है कि तीव्र गैजेट्स बनाने में माहिर है। अरण्य जैसे शहर में इसके लिए उसके पास उपकरण कैसे आते हैं और एक निम्न मध्यमवर्गीय परिवार से आने के बावजूद वह कैसे अपनी इस शौक को पूरा कर पाता है इसके पीछे कोई ऐसा ठोस कारण नहीं दिया है जिससे यह सब मुमकिन लगे।

अंत में यही कहूँगा कि अनुराग जी ने एक अच्छी श्रृंखला की शुरुआत की है।

मुखौटे का रहस्य एक फंतासी उपन्यास है और भले यह एक आम शहर में बसाया गया है लेकिन कई फंतासी के तत्व इसमें मौजूद हैं। आपको जिस दुनिया में लेखक लेकर गये हैं आप अगर उस पर आसानी से विश्वास कर सकते हैं तो आप इस उपन्यास का ज्यादा लुत्फ़ ले पाएंगे। मुझे लगता है कि आपको ऐसे ही इस उपन्यास को पढ़ना चाहिए।

मुझे यह उपन्यास पसंद आया। बाल साहित्य में रोमांच से भरे उपन्यास आते रहने चाहिए। मुझे बचपन में ऐसी ही कहानियाँ पढ़नी अच्छी लगती थी। मुझे इस श्रृंखला की अगली कड़ी की प्रतीक्षा रहेगी।


अगर आपने इस उपन्यास को पढ़ा है आपको यह कैसे लगा? अपने विचारों से मुझे जरूर अवगत करवाईयेगा।

पुस्तक लिंक: किंडल | पेपरबैक


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