एक बुक जर्नल: कौवों का हमला - अजय कुमार

Friday, July 27, 2018

कौवों का हमला - अजय कुमार

रेटिंग : 4.5/5
उपन्यास जुलाई 15 2018 से जुलाई 21 2018 के बीच पढ़ा गया।


संस्करण:
फॉर्मेट : पेपरबैक
पृष्ठ संख्या : 143







पहला वाक्य:
"जानवरों को परेशान नहीं करना चाहिए, वो बहुत प्यारे होते हैं" उन्नत किताब में लिखी इस बात को बोलते हुए सोचने लगा कि क्या ये  बात सच है।


उन्नत और आशी उस शाम को नीचे आये थे तो उनके मन में दो ही बातें थी। एक तो अपने दोस्त मूलचंद को खाना देना और दूसरा उसके साथ खेलना। मूलचंद को कॉलोनी के सभी लोग भले ही कुत्ता समझते थे लेकिन आशी और उन्नत के लिए वो उनका दोस्त था। मूलचंद भी उनको अपना दोस्त मानता था इसलिए न केवल उनको देखकर खुश होता था बल्कि उनके साथ खेलता भी था।

यह एक साधारण सी शाम थी जो कि असाधारण बनने वाली थी।

उन्नत,आशी और मूलचंद अपनी ही दुनिया में खोये हुए थे जब उन्होंने देखा कि कौवों के एक झुंड ने एक मछली बेचने वाली आंटी पर हमला बोल दिया था।

कौवों का मकसद मछली वाली आंटी की टोकरी से मछली चुराना था। और वो इसमें सफल भी हो जाते अगरचे मूलचंद,आशी और उन्नत ने अपनी सूझ बूझ न दिखाई होती।

लेकिन इस हार से वह कव्वे तिलमिला गये थे।

उन्हें बदले की दरकार थी और जब उन्होंने उन्नत आशी और मूलचंद की तिकड़ी पर हमला बोला तो तीनों के अलावा उन्नत के माता पिता की जान भी सांसत में फँस गई। फिर कुछ ऐसा हुआ कि उन सबको अपना घर छोड़ना पड़ा और कहीं और जाना पड़ा।

आखिर कौवों ने ऐसा क्या किया?

उन्नत,आशी और मूलचंद ने कौवों का सामना कैसे किया?

उन्नत और आशी की मम्मी, जिन्हें मूलचंद के साथ उन दोनों की दोस्ती पसंद नही थी, उनकी  इस हमले के ऊपर क्या प्रतिक्रिया रही?

क्या कव्वे अपनी हार का बदला ले पाए?

क्या घर छोड़ने के बाद उनको कव्वों से छुटकारा मिला?

ऐसे ही सब प्रश्नों का उत्तर इस रोमांचक उपन्यास में आपको पढ़ने को मिलेगा।



मुख्य किरदार:
उन्नत - एक सात वर्षीय लड़का
आशी - उन्नत की छोटी बहन
पापा - आशी और उन्नत के पापा
मम्मी - आशी और उन्नत की मम्मी
मूलचंद - एक कुत्ता जो कि आशी और उन्नत की बिल्डिंग के बाहर रहता था और उनका दोस्त था
आर्या - होटल में ठहरी हुई एक लड़की जो कि उन्नत के विद्यालय से थी और उसकी दोस्त बन गई थी
सरदार - कव्वों कासरदार
कलूटा - एक कव्वा
काकोर - एक और कव्वा
शर्मा जी - उन्नत और आशी के पड़ोसी और पापा के दोस्त

जब फेसबुक के माध्यम से मैं अजय जी के साथ जुड़ा और तब ही पता चला कि उन्होंने एक किताब कौवों का हमला लिखी है।फिर पता चला कि भले ही यह उनकी पहली किताब है लेकिन वे काफी अरसे से लेखन क्षेत्र में सक्रिय हैं और टीवी और फिल्म इंडस्ट्री में काफी कुछ लिख चुके हैं।

फिर यह जानकर ख़ुशी और बढ़ गई कि यह किताब एक बाल उपन्यास है। मुझे बाल उपन्यास पसंद हैं। मेरा मानना है कि हिन्दी में पाठक कम इसलिए भी हो रहे हैं क्योंकि बच्चों के पास पढ़ने के लिए ज्यादा सामग्री नहीं रहती है। बचपन में वह  अंग्रेजी की किताबें ही पढ़ते हैं। ऐसे में जिसने बचपन से ही अंग्रेजी में पढ़ा हो उससे बाद में हिन्दी के साहित्य को पढ़ने की उम्मीद रखना हास्यास्पद ही होगा। वो उसी भाषा में पढ़ेगा जिसमें बचपन से पढ़ता आया है। यही कारण है जिससे मैं अच्छे बाल उपन्यासों की तलाश में रहता हूँ। अगर वह उपन्यास मिलते हैं तो उन्हें पढ़ने के लिए मन उत्सुक रहता है। एक तो इससे मैं खुद अपने बचपन में पहुँच जाता हूँ और दूसरा मुझे अपने छोटे भाई बहन, भांजे भतीजियों के लिए गिफ्ट का आईडिया मिल जाता है।

इसलिए मैं अजय जी का उपन्यास खरीदने के लिए ललायित था। पहले जब यह उपन्यास किंडल के लिए मौजूद था तो मेरा मन होते हुए भी मैं इसे नहीं पढ़ पाया था। इसका कारण यह  था कि किंडल में मेरे पास अत्यधिक किताबें हैं और उन्हें ही पढने का वक्त नहीं मिलता है। फिर मैं हार्डकॉपी को पढ़ने में भी ज्यादा तरजीह देता हूँ। मुझे किताब के पन्ने पलटते हुए पढ़ना पसंद है। ऐसे में जब लेखक ने घोषणा की कि उन्होंने किताब का पेपरबैक संस्करण निकाला है तो मैंने एक प्रति अपने लिए आर्डर कर दी।


अब जाकर किताब पढ़ी है और सबसे पहली बात तो यही कहूँगा कि किताब मुझे  बहुत पसंद आई है।

किताब एक बाल उपन्यास है और इसमें फंतासी के तत्व हैं। कव्वों से जुड़ी एक कहानी 'A Crow for all Seasons' मैंने  कुछ महीनों पहले पढ़ी थी। वह कहानी कव्वों के दृष्टिकोण से लिखी गई थी और लिखने वाले रस्किन साहब थे। यह कहानी उनकी किताब टाइम स्टॉप्स एट शामली में छपी थी। (अगर आपने नहीं पढ़ी है तो जरूर पढ़िएगा।) उसमें भी पाठक को कव्वों के मन उभरते भाव देखने को मिलते हैं और इस उपन्यास में भी यह देखने को मिलता है।काकोर, कलूटा,सरदार और दूसरे कव्वों के विचार हम न केवल सुनते हैं बल्कि उनके दृष्टिकोण से भी कहानी के कुछ हिस्से को पढ़ते हैं। कव्वों से जुड़े होने के कारण ही मुझे वो कहानी याद  आई वरना इन दोनों में बाकि कोई समानता नहीं है।

बहरहाल, इस उपन्यास की बात करूँ तो उपन्यास बेहद रोमांचक है।आप सीधे कहानी में दाखिल होते हैं तो कहानी आप बाँध सी देती है और आप पढ़ते चले जाते हैं। अजय जी चूँकि फिल्म और टीवी के लिए लिखते हैं तो उपन्यास में वैसे ही रोमांच बना रहता है जैसा टीवी के नाटकों में जरूरी होता है।

मैंने जब यह उपन्यास पढ़ना शुरू किया तो एक बार को मन में आया कि एक ही बार में इसे पढ़ लूँ। लेकिन फिर मैंने इसे आराम-आराम से पढ़ने की सोची। मैं उन्नत, आशी और मूलचंद के साथ ज्यादा से ज्यादा वक्त बिताना चाहता था। ऐसा इसलिए भी था क्योंकि बचपन से लेकर कॉलेज तक हमारे पास पालतू जानवर रहे हैं। और मेरी बहन भी मुझसे तीन साल छोटी है। तो उन्नत और आशी के बीच के समीकरण को देखकर मुझे अपने बचपन के दिन याद आ रहे थे। हम भी ऐसे ही रहते थे बस फर्क ये था कि मैंने अपनी बहन को अपने को कभी भैया बोलने को नहीं कहा। मेरा मानना था कि असल भाई बहन ये फॉर्मल शब्द इस्तेमाल नहीं करते और इसलिए वो मेरा नाम ही लेती थी। लेकिन हम साथ में खूब धमाचौकड़ी मचाते थे और यही कारण था कि उन्नत,आशी और मूलचंद को साथ देखकर मुझे ख़ुशी हुई थी और मैं इस माहौल में जितनी देर तक हो सके उतनी देर तक रहना चाहता था। एक और बात से मुझे जुड़ाव महसूस हुआ। आशी जब उन्नत को कहती है कि मूलचंद उसका भाई है तो उन्नत की एक प्रतिक्रिया होती है जिसे वो समझ नहीं पाता है। लेकिन मैं उस रिएक्शन और उसके मन में उठते भावों को समझ गया था क्योंकि अगर उसकी जगह मैं भी होता तो  मेरे मन में भी उस वक्त ऐसी ही प्रतिक्रिया होती।

किताब वैसे तो शुरू से अंत तक आपको बांधे रखती है लेकिन  थोड़ा बहुत किताब की रफ़्तार तब धीमी पड़ती जब सभी एक रिसोर्ट में जाते हैं। उस वक्फे में कौवों का पूरी तरह से कहानी से गायब होना मुझे थोड़ा सा अजीब लगा था। वैसे तो ये खाली दो अध्याय है और दूसरे अध्याय के अंत में कव्वे फिर दाखिल होते हैं लेकिन अगर बीच में एक छोटा सा हिस्सा होता जिसमें कव्वों की गतिविधि दिखाई जाती (जैसे कव्वे उन्हें ढूँढ रहे हैं, या बदले की कुछ योजना तैयार कर रहे हैं इत्यादि) तो शायद ये धीमापन महसूस नहीं होता और रोमांच बना रहता। लेकिन दूसरे अध्याय के बाद में फिर एक बार जब दोबारा कौवों का कहानी में प्रवेश होता है तो रोमांच बढ़ जाता है और उसके बाद अंत तक बढ़ता ही रहता है।

कहानी के अंत मुझे बहुत पसंद आया और मुझे एक एज ऑफ़ द सीट थ्रिलर(edge of the seat thriller) का एहसास हुआ।

कहानी में कमी तो मुझे नहीं दिखी। हाँ, कई जगह भाषा की थोड़ी सी दिक्कत है।  बोलते हुए अक्सर लोग 'लिया है' कि जगह 'ली', 'किया है' कि जगह 'की', 'उसने' की जगह 'वह' का इस्तेमाल करते हैं जिससे एक आंचलिक टच भाषा में आता है। अगर यह चीज डायलॉग में होती है तो मुझे उससे परेशानी नहीं होती है।डायलॉग में यह चीज होने से करैक्टर थोड़ा यथार्थ के नज़दीक लगता है। लेकिन इधर यह चीज कहानी में वर्णन के दौरान भी है तो थोड़ी खटकती है। फिर चूँकि ये बाल उपन्यास है और बच्चे आसानी से  प्रभावित हो जाते हैं तो अगर ऐसे भाषा वो पढ़ेंगे तो वह लोग इसका इस्तेमाल करने लगेंगे जो कि मेरे हिसाब से गलत है। इसलिए इन त्रुटियों को अगले संस्करण में लेखक सुधारे यही उनसे उम्मीद होगी।

उदाहरण:

उसने ध्यान से सुना कि पैरों के गिरने और उठने पर हल्की सी चिप-चिप की आवाज़ हो रही है, जो फर्श पर नंगे पैर चलने से होती है। वह सोचा (इधर उसने सोचा ज्यादा ठीक रहेगा, या वह सोचने लगा) (पृष्ठ 6 )

आशी दरवाजे पर पहुँचकर अपना जूता हाथ में उठा ली('आशी ने दरवाजे पर पहुँचकर अपने जूते हाथ में उठा लिये' ज्यादा ठीक रहेगा ), बाहर जाकर पहनने के लिए, लेकिन उन्नत ने उसको रोककर पहले जूते की तरफ इशारा किया और फिर उसके छोटे छोटे पैरों की तरफ। (पृष्ठ 10)

ऐसे ही कई जगह प्रयोग किया है।

बाकी कहानी के विषय में तो इतना कहूँगा कि भले ही यह एक बाल उपन्यास है लेकिन वयस्क भी इसका आनंद ले सकते हैं। मुझे तो पढ़ने में बड़ा मज़ा आया।  अगर आपके घर में बच्चे हैं तो उन्हें इस उपन्यास को आप ज़रूर पढ़ाएं। मुझे यकीन है कि मूलचंद, उन्नत और आशी से मिलकर बच्चे ज़रूर खुश होंगे।

अगर आपने इस उपन्यास को पढ़ा है तो आपको ये कैसा लगा? अपने विचारों से मुझे इस पोस्ट पर टिप्पणी के माध्यम से अवगत करवायें।

अगर आप उपन्यास खरीदना चाहते हैं तो आप इसे निम्न लिंक्स से खरीद सकते हैं:
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किताब का पेपरबैक वर्शन आप सीधे लेखक से मँगवा सकते हैं:
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