एक बुक जर्नल: सैकंड चांस - कँवल शर्मा

Sunday, August 5, 2018

सैकंड चांस - कँवल शर्मा

रेटिंग: 2.5/5
उपन्यास जुलाई 27,2018 से  अगस्त 4,2018 के बीच पढ़ा गया 

संस्करण विवरण:
फॉर्मेट : पेपरबैक
पृष्ठ संख्या: 317
प्रकाशक : रवि पॉकेट बुक्स
आईएसबीएन: 9788177890891

पहला वाक्य:
"मे आई कम इन सर!"- कैजाद ने अख़बार के मालिक असद जकरिया के ऑफिस का दरवाजा खोला और अपनी गर्दन भीतर दाखिल करते हुए पूछा। 

कैजाद पैलोंजी गोवा के सबसे महत्वपूर्ण अखबार इनसाइड कैपिटल का एक  होनहार और उभरता हुआ  क्राइम रिपोर्टर था। अपने पेशे से उसे प्यार था और उसी के बदौलत वो ये सपना देखता था कि दुनिया को बदल कर रख देगा। यही कारण था कि जब एक तगड़ा स्कूप उसके हाथ लगा तो उसे लगा कि वो कई लोगों को इंसाफ दिला पायेगा। गोवा में हो रही इस अपराधिक गतिविधि से पर्दा उठाकर न्याय की देवी को तलवार उठाने के लिए विवश कर देगा। उसे लगा न्याय की देवी की तलवार गुनाहगारो के पर कुतर देगी।

कितना गलत लगा था उसे?  उसने सोचा भी नहीं था कि न्याय की देवी की तलवार उठेगी तो जरूर लेकिन वो अपराधियों के ऊपर न गिरकर उसके ही ऊपर अपनी गाज गिराएगी।

और फिर जब तक कैजाद को इसका एहसास हो पाता, तब तक काफी देर हो चुकी थी। कैज़ाद जेल में पहुँच चुका था।

ऐसी कौन सी  खबर कैजाद के हाथ लगी थी?

आखिर क्या हुआ था उसके साथ जो कैजाद को जेल जाना पड़ा?

तीन साल बाद जो कैजाद निकला, वो एक हारा टूटा हुआ इनसान था। समाज ने उसे दुत्कारा। न काम उसे मिला और इज्जत और आदर्श तो उसने पहले ही खो दिये थे। अब शायद दौलत ही उसके लिए सब कुछ थी। वो जान चुका था इस समाज ने केवल दौलत बोलती है। आदर्श,सच और कानून सब दौलत के दरवाजे के आगे हाजिरी लगाते हैं।

यही कारण था जब उसके पास मौका आया तो उसने उसे लेने में कोई कोताही नहीं करी।  उसे खाली एक कॉल करना था और उसके एवज में उसे पाँच लाख की मोटी रकम मिल जानी थी।

ये उसकी ज़िन्दगी का सेकंड चांस था और उसे हर हाल में इसे कैश करना था।

आखिर ये कॉल किसको करनी थी? 

ये कॉल करवाने वाला व्यक्ति कौन था?

और ये कॉल क्यों करनी थी? 

और इस एक कॉल ने कैजाद की ज़िन्दगी में क्या जहर घोला? 

ये सब प्रश्न आपके मन में उठ रहे होंगे । है, न?

इनके उत्तर तो आपको इस उपन्यास को पढ़कर ही मिलेंगे।



मुख्य किरदार:
कैज़ाद  पैलोंजी - इनसाइड कैपिटल में एक स्पेशल कोर्रेसपोंडेंट
असद जाकरिया - इनसाइड कैपिटल का मालिक
सज्जन तापड़िया - गोवा का एक बड़ा रियल एस्टेट मैगनेट
जमशेद - सज्जन तापड़िया का दायाँ हाथ
दिलीप पारुलेकर - गोवा पुलिस में अफसर और कैजाद का दोस्त
तारा पैलोंजी - कैज़ाद  की पत्नी
मीरा तापड़िया उर्फ़ सिमोन बलसारा - सज्जन तापड़िया कि दूसरी बीवी जो कभी एक बार डांसर हुआ करती थी
लैला तापड़िया उर्फ़ लैला फड़के - सज्जन तापड़िया की बेटी
लव और कुश - इंजीनियरिंग के छात्र जिन्होंने पुलिस ने अपनी मदद के लिए बुलाया था

कँवल शर्मा जी का उपन्यास सेकंड चांस पढ़ना हुआ। इससे पहले कँवल जी जेम्स हेडली चेज के उपन्यासों का हिन्दी में अनुवाद करते आये हैं जो कि बहुत प्रचलित रहे हैं। अब उन्होंने अपने मौलिक उपन्यास लिखने शुरू किए हैं और इस तर्ज पर वन शॉट के बाद ये उनकी दूसरी कृति है। उपन्यास तो मैंने काफी पहले खरीद कर रखा था लेकिन पढने का मौक़ा अब जाकर हासिल हुआ।

उपन्यास की बात करूँ तो उपन्यास में कथानक से पहले लेखकीय है जिसमें कँवल जी ने बैंकिंग क्षेत्र से जुड़े अपने तजुर्बों को लिखा है। ये तजुर्बे रोचक हैं और कई जानकारियों से पाठकों को रूबरू करवाते हैं। इनसे लेखक की ज़िन्दगी का हिस्सा पाठक बनता है और कुछ रोचक बातें भी उसे पता लगती हैं। ये चीज मुझे अच्छी लगती है।  आपको कथानक के साथ कुछ रोचक जानकरी भी मिले तो सोने पर सुहागा हो जाता है।

उपन्यास की भाषा की बात करूँ तो उपन्यास को पढ़ते हुए पता लगता है कि कँवल जी की भाषा के ऊपर मजबूत पकड़ है। वो वाक्यों को खूबसूरती से लिखते हैं और पाठक को पढ़ने के लिए ऐसे कई नगीने दे देते हैं जिन्हें पढ़कर कुछ देर उन पर विचार करने को मजबूर हो जाता है। ऐसे ही वाक्यों के कुछ उदाहरण मैंने लेख के नीचे दिये हैं। उपन्यास के किरदार जीवंत हैं और घटनाएं ऐसी हैं जो हमारे आस पास होती रहती हैं। आजकल पत्रकारीता का उपयोग समाज में मौजूद अपराध का पर्दा फाश करने में कम ही होता है। हम आये दिन ऐसे खबरों से रूबरू होते हैं जिसमे पत्रकार अपने पास मौजूद जानकारी को जनता के सामने रखने के बजाय उस जानकारी से मोटा मुनाफ़ा पीटने के चक्कर में रहते हैं। ईमानदार पत्रकार जो होता है उन्हें मौत के घाट भी उतारा जाता है। ऐसे में उपन्यास का कथानक सत्य के करीब लगता है। कैजाद के साथ जो होता है वो किसी भी पत्रकार के साथ हो सकता है। खबरे तो यहाँ तक आती हैं कि कई बार सरकार भी इसमें लिप्त रहती है। पत्रकार उनके खिलाफ लिखे। उनकी नीतियों में कैसे पक्षपात हुआ है ये दर्शाने की कोशिश करे तो सरकार पत्रकार को ही विद्रोही दिखाकर उसे अन्दर डाल देती है। न्याय व्यवस्था, सरकार, कानून और पूंजीपतियों के इस नेक्सस से शायद ही कोई वाकिफ नहीं होगा। इसी नेक्सस का शिकार इस उपन्यास का आदर्शवादी नायक भी होता है।

फिर जब उसे होश आता है और जो बदलाव उसमें होते हैं वो बहुत अच्छे तरीके से इसमें दिखाया गया है।

इसके इलावा उपन्यास में कई रोचक डायलॉग हैं। उन्हें पढने में मज़ा आता है। फिर चाहे वो डायलॉग कैजाद और जाकरिया के बीच हों, कैजाद और दिलीप के बीच हों, दिलीप और जमशेद के बीच हों, कैजाद और सज्जन के बीच हों या कैजाद और मीरा का आखिरी डायलॉग हो। ये सभी डायलॉग रोचक हैं और पाठक के रूप में इन्हें पढने में मुझे मजा आया।


उपन्यास अच्छा लिखा है लेकिन एक पाठक के रूप में मुझे इसमें थोड़ी बहुत कमी लगी। कँवल जी की लेखनी जहाँ सशक्त है वहीं कथानक में कमजोरी भी है। जैसा मुझे लगा वो मैं बताऊंगा।

सेकंड चांस में थ्रिल आना 170 (30 पन्ने की लेखकीय है ) पन्नों के बाद शुरू होता है। उपन्यास में कँवल जी ने काफी पन्ने कथानक और किरदारों को स्थापित करने में बितायें हैं। इसमें कोई बुरी बात नहीं है। लेकिन जब मैं थ्रिलर या पुलिस प्रोसीज़रल या सस्पेंस उपन्यास पढ़ता हूँ (इन तीनों शैलियों के दर्शन इसमें होते हैं) तो उन उपन्यास में एक तरह की सेंस ऑफ़ अर्जेंसी (sense of urgency) होती है जिसके जरेसाया पाठक  उपन्यास के पन्ने पलटने को मजबूर सा हो जाता है।  कथानक पाठक को पकड़ सा देता है और पाठक को तब तक नहीं छोड़ता जब तक उपन्यास खत्म न हो जाये। अंग्रेजी में इसे hooked होना भी कहते हैं। लेकिन ये चीज इस उपन्यास में काफी देर में आती है। लगभग आधे से ज्यादा उपन्यास खत्म होने के बाद। ऐसा नहीं है तब तक हो रही घटनाएं बोरिंग होती हैं। वो पठनीय है लेकिन  आपको पता रहता है कि कहानी कैसे बढ़ रही है और कैसे बढ़ेगी। किताब पढ़ते हुए जो 'अब क्या होगा?' वाले भाव मन में आते हैं वो काफी देर से आते हैं। इससे उपन्यास पहले के दो सौ पृष्ठों में कथानक पठनीय होते हुए भी पेज टर्नर नहीं होता। पाठक के रूप में मेरे ऊपर कोई दबाव नहीं था कि मैं जल्द से जल्द उपन्यास के पन्ने पलटते जाऊँ। मुझे पता था कहानी में क्या होना और उसने किस गति से आगे बढना है। मेरी राय में अगर जो घटना बाद के 100 पृष्ठों में होती है उसे थोड़ा आगे सरका देते तो उपन्यास को गति मिल जाती। फिर उपन्यास में एक रहस्यमय किरदार दिखता है जो कि उपन्यास में एक बार आने के बाद गायब से हो जाता है और आखिर में दिखता है। अगर उस किरदार को समय समय पर दिखाते। तो तब भी एक सस्पेंस सा बना रहता जिससे वो सेंस को अर्जेसी उपन्यास में आती क्योंकि पाठक जानने की कोशिश करता कि ये रहस्यमय किरदार कौन है।

लेकिन फिर उपन्यास एक बार गति पकड़ता है तो  फिर अंत तक बाँधे रखता है।

उपन्यास के कथानक में काफी कुछ बातें हैं जो कि क्लियर नहीं की गई हैं या मुझे खटकी थी।

उपन्यास में एक अपहरण होता है। फिर एक लाश मिलती है जिसकी शिनाख्त करनी होती है। उस शिनाख्त के दौरान उस लाश की रिश्तेदार को बुलाया जाता है जो कहती है कि लाश उसने देखी है लेकिन शक्ल नहीं देखी। लेकिन लाश उसी की है जिसको पुलिस समझ रही है। फिर इंस्पेक्टर उसे लाश की शक्ल देखने भेजता है:

"आपने लाश की शक्ल नहीं देखी इसलिए" - दिलीप पुनः __ से सम्बोधित हुआ - "क्या यह बेहतर हो कि पहले आप जाकर इस काम को करें?"

"ठीक है।"

दिलीप ने आवाज़ लगाकर कांस्टेबल को वहाँ बुलाया और __ को उसके साथ भेज दिया।
(पृष्ठ 241 )
....
...
तभी __ वहाँ वापिस लौटी।

"शिनाख्त हुई?"

__ ने ऊपर से नीचे की ओर - सहमति में सिर हिला दिया।

(पृष्ठ 242)

लेकिन फिर आगे जब इंस्पेक्टर उससे इस बाबत बात करता है तो वो रिश्तेदार यही कहता है कि उसने शक्ल नहीं देखी

"मैंने लाश का चेहरा नहीं देखा था"- _ ने तत्काल सफाई पेश की - "जब मैं वहाँ पहुँची थी तो वो लाश पेट के बल बिस्तर पर औंधे मुँह पड़ी थी।"

(पृष्ठ 298 )

ऐसे में इंस्पेक्टर उसे दोबारा भेजने की बात नहीं बोलता। जिस कांस्टेबल  ने उसे दोबारा लाश दिखाई थी उसने पलटकर ही दिखाई होगी। इस बात का उधर जिक्र ही नहीं होता।

फिर दूसरी बात कि उपन्यास में दर्शाया गया है कि पुलिस आई टी टीम के साथ मिलकर काम कर रही थी। जिसका अपहरण हुआ था वो काफी जानी मानी हस्ती थी। उसका फोटो नेट से निकालना कोई बड़ी बात नहीं थी। इसके लिए सोशल साइट्स भी पुलिस वाले खंगालते हैं तो उन्हें फोटो आसानी से मिल जाती। वो उससे भी  शिनाख्त कर सकते थे। केवल एक रिश्तेदार की शिनाख्त के भरोसे क्यों रहे?

"हमने उसका फेसबुक अकाउंट ट्रेस कर लिया था।"
"उसे और खंगालो।"
...

"और भी कुछ सोशल साइट्स हैं,शायद वहाँ भी उसके एकाउंट्स होंगे"-दिलीप ने सोचते हुए बोला- "लैला जवान लड़की थी और  आजकल ऐसी लड़कियों में इन्स्टाग्राम जैसी पिक्चर शेयरिंग सोशल साईट का तो खासा रौब रहता है।"
(पृष्ठ 282) 

कहने का मतलब है कि पुलिस को लाश मिलने से पहले पता होना चाहिए था कि अपहृत कैसा दिखता है। जो चीज बाद में हो रही वो पहले होनी चाहिए  थी।

इसके इलावा तहकीकात के दौरान इंस्पेक्टर एक सी सी टी वी फुटेज देखता है। उसमें एक ऐसा महत्वपूर्ण वक्ती रहता है जिससे इंस्पेक्टर उस वक्त तो परिचित रहता है लेकिन  बाद में उससे मिलता है। लेकिन तब भी उसके दिमाग में बात नहीं आती। जबकि कैजाद उस व्यक्ति को पहचाना लेता है।
फुटेज हालाँकि साफ़ स्पष्ट नहीं थी। लेकिन फिर भी कैजाद ने उसे पहचाना। और शुक्र है कि सिर्फ उसने पहचाना, दिलीप ने नही  पहचाना।
(पृष्ठ 232)

इधर दिलीप इसलिए नहीं पहचान पाता क्योंकि उससे मिला नहीं होता है। लेकिन इसके ठीक बाद उसी किरदार से  मिलता है तो क्यों नहीं उसके ध्यान में आता कि वो सी सी टी वी वाला व्यक्ति था। एक तेज तरार पुलिस वाले से ऐसी चौकसी की उम्मीद तो की जाती है कि जब वो मिला था तो उसे खटका होता कि उसने इस आदमी को कहाँ देखा था। वैसे मुझे पता है ये बात काफी छोटी है लेकिन मुझे खटकी तो लिख दी। इस बिंदु को बाद में भी नहीं उठाया जाता है जो कि अचरच से भरा था।

इसके इलावा एक बात और है जो कि अधूरी रह गई थी।

जब फिरौती की रकम देखी जाती है तो पता लगता है कुछ भी हासिल नहीं हुआ था।

"गुनाह बेलज्जत!"- _ के मुँह से निकला।

(पृष्ठ 274 )

आखिर फिरौती का क्या हुआ? किसने बदला?

इसका अंदाजा पाठक लगाना चाहे तो लगा सकता है लेकिन अच्छा होता कि लेखक ही इस बिंदु को क्लियर करते। क्योंकि मुझे आईडिया नहीं ऐसा क्यों हुआ। सज्जन फिरौती में हेर फेर क्यों करेगा। और फिरौती देने से पहले ये क्यों नहीं परखेगा कि जो उसे मिला वो माल ठीक था या नहीं। फिर फिरौती का क्या हुआ? उसका ज़िक्र भी बाद में मेरे ख्याल से शायद नहीं आता है। आया हो तो मुझे याद नहीं। हो सकता है मुझसे मिस हो गया हो।

उपन्यास के एक  दो और प्रसंग भी मुझे अटपटा लगे। एक लाश को ले जाना होता है। उसके लिए गाड़ी की आवश्यकता होती है। किरदार की बीवी खुद के नाम पर गाड़ी लाने को बोलती है। जब ये प्रसंग हो रहा था तो मुझे अजीब लग रहा था। किरदार एक रिपोर्टर था। अपराधिक गतिविधियों से जुड़ी रिपोर्टिंग करता था। और उसका प्लान था कि किराएं में गाड़ी लो और उसमें लाश को छोड़कर पुलिस को फोन करो। इस बात में कितना बड़ा झोल है ये कोई आम आदमी भी समझ सकता है लेकिन न बीवी के समझ आई और न किरदार के। इसी तर्ज पर जिधर लाश मिली थी वो जगह भी किरदार के नाम पर बुक थी। लेकिन तफतीश के दौरान न ये बात किसी पुलिस वाले ने मालूम करना चाही और न ही इससे जुड़ी कोई घटना ही उपन्यास में दिखी। ये बातें कमजोर पक्ष ही दिखाती हैं उपन्यास का।

इन बातों के अलावा पाठक के सामने ये पानी की तरह साफ़ होता है कि किसने झोल किया होगा। मैं सोच रहा था कि कुछ ट्विस्ट होगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ। कुछ नई बातें पता चली जिससे एंडिंग अच्छी हुई लेकिन ऐसा कोई बड़ा ट्विस्ट न था जिसका अंदाजा न हो सके। बीच में एक डायलॉग था जहाँ अपराधी से बात चीत होती है और वो अपना गुनाह भी कबूल करता है। उपन्यास की शुरुआत में दिखाया गया है फोन पर मौजूद टेप रिकॉर्डर का इस्तेमाल एक किरदार ने किया है लेकिन ऐसे मौके पर वो ये काम नही करता। ये मुझे अजीब लगा। क्योंकि उसे पता था कि अपराधी कौन है और उससे मिलने के लिए ही वो उधर गया था।

"ऐसे कि कातिल पकड़ा जायेगा।"
"तुम जानते हो कि कातिल कौन है?"
"हाँ - मैं जानता हूँ। "

(पृष्ठ 286)

 अपराध में जो रहस्यमय पार्टनर था उसका हल्का हल्का अंदाजा मुझे हो गया था। लेकिन तब भी एंडिंग संतुष्ट करती है क्योंकि उसके विषय में नई जानकरी हासिल होती है।

कँवल जी लिखते अच्छा हैं और ये सशक्त लेखनी उपन्यास में दिखती है। उपन्यास में थोड़ा स्ट्रक्चर की दिक्कत मुझे लगी।  थोड़े पृष्ठ भी घटाए जा सकते थे। अगर किरदारों का हल्का खाका खींचने के बाद सीधे अपराध से उपन्यास शुरू करते और पीछे की चीजों के लिए फ़्लैश बैक का इस्तेमाल करते तो शायद उपन्यास के कथानक की रफ्तार तेज होती। बाकी इस लेख में लिखी कुछ बातें हैं जिन्होंने मेरे मन में प्रश्न खड़े किए। हो सकता है ये खाली मेरे साथ हुआ हो। लेकिन चूँकि ये चीज थी तो लिख दी।

कँवल जी खूबसूरत तरीके से लिखते हैं। उपन्यास में कई वाक्य ऐसे थे जो मुझे पसंद आये:

"बर्खुरदार इस फानी दुनिया में ठोकर लगने से जब सभी चीजें टूट जाती हैं तो ये सिर्फ दोपाया होता है जो ठोकर लगने के बाद उस हासिल तजुर्बे से दोबारा बन, फिर उठ खड़ा होता है।

वो उसके साथ अब पूरी तरह खामोश थी और - जब बीवी हद से ज्यादा खामोश हो तो उसे और ज्यादा गौर से सुना जाना चाहिए।

खुश रहना और कामयाब होना दो जुदा अहसास हैं जिन्हें लोग अक्सर आपज में गड्ड-मड्ड कर देते हैं। आप कामयाब हैं तो भी बहुत मुमकिन है कि आप खुश न रह सकें,वहीं इसके ठीक उलट अगर आप खुश रह सकें तो उस मार्फ़त ज़िन्दगी के कई मोर्चों पर कामयाबियाँ जरूर हासिल ओर सकते हैं।

कुछ मोर्चों की हार से हासिल सीख हमें आगे बड़ी लड़ाइयों में ज्यादा बड़ी,ज्यादा मानीखेज कामयाबी दिलाती है।

औरत की खामोशी भी एक जुबाँ होती है और इसीलिए औरत- खासतौर पर जब वो बीवी हो- खामोश रहे तो उसे ज्यादा गौर से सुनना चाहिए।

यूँ हर गलती एक तजुर्बा है जो तुम्हें खुद के भीतर झाँकने और खामियों को ढूँढकर उसे दूर करने का एक मौका देता है और आगे फिर यही तजुर्बा आदमजात को दानिशमंद और हुनरमंद बनाता है।

अगर आपने इस उपन्यास को पढ़ा है तो आपको ये कैसा लगा? अपने विचारों से मुझे अवगत करवाईयेगा। अगर नही पढ़ा है तो निम्न लिंक से मँगवा कर पढ़ सकते हैं:


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11 comments:

  1. विकास जी,

    सेकंड चांस पर आपका सुविस्तृत नज़रिया पढ़ने को मिला. आपका कहना कि कथानक शुरू में तेज रफ्तार नहीं था - से में भी सहमत हूँ. दरअसल कथानक में नायक को स्थापित किया जाना जरूरी था. एक पत्रकार का किसी गैरकानूनी कांड में लिप्त पाया जाना हालांकि कोई बड़ी बात नहीं लेकिन एक लेखक के तौर पर में अपने नायक - जिसे मैंने पत्रकार दिखाया था - को नैतिक रूप से ऊंचे स्तर पर दिखाना चाहता था. ऐसे में अगर उसने आगे किसी अपहरण के किस्से में इनवॉल्व होना था तो जाहिर है बावजह होना था. बस उस वजह को स्थापित करने में कुछ अतिरिक्त पृष्ठ लगे. फिर ऐसी ही ज़रूरत कहानी में इसके दो अन्य मुख्य पात्रों के साथ थी.

    बहरहाल - कथानक को छापे कुछ अर्सा हो चुकने के बाद जब मैंने इसे खुद पढ़ा तो मुझे भी लगा कि कथानक शूरी में सुत्त बन पड़ा था.

    सो इस विषय पर आपसे सहमत.
    बाकी अन्य जिन बातों, मसलों को आपने उठाया है उनकी बाबत एक विस्तृत उत्तर में आपको अलग से लिखूंगा.

    आपने पुस्तक पड़ी, पढ़ कर उस बाबत अपना नजरिया - अच्छा, बुरा दोनों, यहां शेयर किया - उसके लिए लेखक आपका ऋणी है.

    हरिदै से आभार.

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    1. शुक्रिया,सर। आपने अपना बहुमूल्य समय देकर ब्लॉग पर कमेंट किया इसके लिए मैं आपका आभारी हूँ।

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  2. कंवल जी का उपन्यास रोचक है। लेकिन जो बिंदु आपने उठाये हैं वह भी कमाल के हैं।

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    1. जी शुक्रिया। उपन्यास निसंदेह पठनीय है। बस पढ़ते हुए जो विचार मन में उठे इधर लिख दिये हैं।

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  3. ye book kaha se milega
    please reply

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    1. भाई पोस्ट में ही बुक का लिंक दिया है। अगर उधर से नहीं मंगवानी तो सीधे रवि पॉकेट बुक्स से कांटेक्ट कर सकते हैं।
      https://www.facebook.com/ravipocketbooks/
      ये उनका फेसबुक पृष्ठ है। इधर उनसे बात कीजिये। वो पे टीएम से पैसे लेकर भी बुक प्रेषित कर देते हैं।इनके अलावा रेलवे के बुक स्टाल्स में पता कर सकते हैं पर चूँकि उपन्यास काफी पहले आया था तो उधर (रेलवे के बुक स्टाल्स में) मिलने की उम्मीद कम है। ब्लॉग पर आने का शुक्रिया।

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  4. विकास जी आपकी समीक्षा पढने के बाद मुझे कंवल जी की लेखनी में पाठक साहब का अक्स नजर आया।कंवल जी की लिखने की खुबसूरती कुछ कुछ पाठक साहब जैसी लगी।
    आपकी समीक्षा पढने के बाद मैंने कंवल जी की लिखी सभी बुक्स का आर्डर रवि पाकेट बुक्स को कर दिया।पार्सल मिलने के बाद जैसे ही मैंने पार्सल खोला।मै बहुत निराश हुआ।क्योंकि बुक्स के पेजों की क्वालिटी और बाईनडिंग बहुत ही घटिया निकली।पेज पलटाने में ही पेज लटक गए।बुक्स व्यक्ति दो बार तो क्या एक बार पढले तो ही गनीमत है।बुक्स के मूल्य के हिसाब से बुक्स की क्वालिटी नहीं है।लेखक को इस पर ध्यान देना चाहिए।
    इस मामले में आपका अनुभव कैसा रहा विकास जी।

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    1. जी मैंने कुछ ही किताबें मंगवाई थी। वो तो ठीक निकली। मैं ज्यादातर स्टाल से खरीदता हूँ पुस्तकें तो देखकर ही लेता हूँ। आप उन्हें इस विषय में बताएं।किताब की बाइंडिंग की दिक्क्त के विषय में काफी लोगों ने बोला है। मैंने सुलग उठा सिन्दूर ली थी तो उसकी बाईडिंग भी एक ही रीडिंग में उतर गयी। आप प्रकाशक को बोलें इस बाबत।

      यह प्रकाशक का फेसबुक पृष्ठ है:
      https://www.facebook.com/ravipocketbooks/

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  5. अच्छी समीक्षा की है। और हमेशा की तरह आपने नॉवेल में से अच्छे पॉइंट उठाये है । आपकी ऐसी विस्तृत समीक्षा हमेशा अच्छी लगती है।

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    1. जी हार्दिक आभार। मेरी यही कोशिश रहती है कि अच्छे बिंदुओं पर प्रकाश डालूँ। आपको अच्छा लगा यह जानकर ख़ुशी हुई। अपने विचारों से ऐसे ही अवगत करवाते रहियेगा।

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  6. This comment has been removed by the author.

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