एक बुक जर्नल: कत्ल की आदत - जीतेन्द्र माथुर

Thursday, February 4, 2016

कत्ल की आदत - जीतेन्द्र माथुर

रेटिंग : २.५/५
उपन्यास २५ जनवरी से ४ फरबरी के  बीच पढ़ा गया है

संस्करण विवरण:
फॉर्मेट : ई-बुक
प्रकाशक : न्यूज़ हंट


पहला वाक्य:
बाबू ने श्यामगढ़ की सीमा से बाहर निकलने के बाद कार को एक सिरे पर रोका और नशे की अपनी नियमित खुराक को अपने नथुनों में उतारा।

श्यामगढ़ एक छोटा सा क़स्बा है जहाँ के लोगों की आय का मुख्य स्रोत वहाँ मौजूद बिजलीघर है। श्यामगढ़ एक शाँत इलाका है जहाँ क़त्ल की बात तो दूर चोरी चकारी की वारदात बामुश्किल होती हैं। लेकिन फिर बिजलीघर में काम कर रहे ड्राईवर बाबू की हत्या से जो सिलसिला शुरू होता है वो रुकने का नाम नहीं लेता है।
सब इंस्पेक्टर संजय, जो कि एक नौजवान नौसिखिया पुलिस वाला है, के लिए ये वाक्यात उलझाने वाले हैं। आखिर इतने कत्लों की वजह क्या थी? क्या कातिल को कत्ल की आदत पड़ चुकी थी? और कातिल कौन था या थी? क्या संजय इस गुत्थी को सुलझा पायेगा?क्या श्याम गढ़ पहले की तरह शांत हो पायेगा?




'क़त्ल की आदत' जितेन्द्र माथुर जी  का पहला उपन्यास है। उपन्यास एक मिस्ट्री के तौर पर देखा जाए तो उसमे ये खरा उतरता है। क़त्ल किसने किया ये रहस्य आखिर तक बरकरार रहता है। वैसे मुझे थोड़ा बहुत अंदेशा तो हो गया था लेकिन फिर उस अंदेशे को सही साबित करने के लिए उपन्यास आगे पढता गया। इस लिहाज से उपन्यास एक बार पढ़ा जा सकता है।
उपन्यास की कमी कि अगर बात करें तो मुझे उपन्यास में रोमांच की कमी लगी। ऐसे उपन्यास जिनमे एक कत्ल की बजाय कई कत्ल होते हैं उनमे हर कत्ल होने के वक्फे में पाठक जो टेंशन या थ्रिल महसूस करता है वो मुझे इस उपन्यास में नहीं लगा। अगर ऐसा होता तो उपन्यास में चार चाँद लग जाते।
दूसरी बात जो मैं हज्म कर पाया वो वो वजह थी जिनके कारण ये कत्ल हो रहे थे। मुझे ये बहुत कमजोर लगी।
ऐसी वजहों के चलते क़त्ल तो हो सकता है लेकिन उनको करने वाले का चरित्र जुदा रहता है। अगर क़त्ल की वजह थोड़ा ठोस रहती तो उपन्यास के अंत को पढ़ते हुए मज़ा बढ़ जाता।
अंत में केवल इतना कहूँगा उपन्यास के बार पढ़ा जा सकता है। और जितेन्द्र जी के अगले उपन्यास का इन्तेजार है।  
उपन्यास आप निम्न लिंक से खरीदकर डाउनलोड कर सकते हैं :
न्यूज़हंट
pothi.com

2 comments:

  1. हार्दिक आभार विकास जी जो आपने मेरे उपन्यास को पढ़ा और उसे समीक्षा के योग्य पाया । आपकी वस्तुपरक समीक्षा से मैं प्रभावित भी हूँ और सहमत भी । उपन्यास में विभिन्न हत्याओं के मध्य रोमांच की कमी निस्संदेह ही है और क़त्ल का उद्देश्य अधिकांश पाठकों को दुर्बल ही लगेगा । वास्तविक हत्यारे का अंत में कानून की गिरफ़्त में न आना भी अधिसंख्य पाठकों को स्वीकार्य नहीं हो सकता । मैंने हत्यारे के चरित्र को एक हाड़-मांस के बने वास्तविक संसार के व्यक्ति की अपनी परिकल्पना के आधार पर गढ़ा है और मेरी दृष्टि में ऐसे लोग होते हैं जो कि हृदय से अत्यंत उदार, उदात्त एवं संवेदनशील होते हुए भी हत्या जैसा अपराध कर बैठते हैं । जैसे अनुभव मुझे हुए थे, वैसे ही पाठकों को भी हुए हों, यह आवश्यक नहीं । जैसे लोग मैंने अपने जीवन में देखे, वैसे ही पाठकों ने भी देखे हों, यह भी आवश्यक नहीं । किन्तु आपकी समीक्षा निश्चय ही सराहनीय है । बहुत-बहुत आभार और साधुवाद ।

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  2. सर मैंने कहीं पढ़ा था कि 'truth doesn't need defending' लेकिन अफ़सोस ये बात फिक्शन पे लागू नहीं होती। अक्सर ऐसी घटनायें होती रहती हैं जिन्हें अगर कोई उपन्यास में लिखे तो पाठक कहेगा कि 'भला ऐसा भी कभी होता है' और अगर उन्ही घटनाओं के विषय में अखबार में पढ़ेगा तो कहेगा 'देखो कोई सोच सकता था ऐसा भी हो सकता है'। मैं आपकी बात से पूरी तरह सहमत हूँ कि ह्रदय से अत्यंत उदार और दयालु व्यक्ति भी कब क़त्ल करे इस संसार में कोई नहीं बता सकता। लेकिन ये इंसानी फितरत ही है कि जब तक उसके अनुभव में ये बात न हो तो जो बात थोडा लीक से हटकर होती है तो वो उसे संभव होती नहीं लगती।
    क्या आप कुछ और लिख रहे हैं? आपके अगले उपन्यास का इन्तजार रहेगा।
    धन्यवाद ब्लॉग में अपनी राय देने के लिये।

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