रैना उवाच: क्लिष्ट दर्शन की एक सहज, सुबोध, प्रगीतात्मक शैली में कही कथा है, 'सिद्धार्थ'

गजानन रैना साहित्यानुरागी है और साहित्य के अलग अलग पहलुओं  और साहित्यिक कृतियों पर बात करने का उनका अपना अलग अंदाज है। रैना उवाच के नाम से वह यह टिप्पणियाँ अपने सोशल मीडिया पर साझा करते रहते हैं। आज एक बुक जर्नल पर पढ़िए हर्मन हेस की प्रसिद्ध रचना सिद्धार्थ पर लिखी उनकी टिप्पणी।

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Review: Siddhartha - Hermann Hesse



'सिद्धार्थ' पर हरमन हेस 1910 से काम कर रहे थे, हालाँकि यह छपा 1922 में।

यह कथा है एक ब्राह्मण युवा, सिद्धार्थ की। यह कथा है अपने आत्म के अन्वेषण की एक दुरूह यात्रा की। क्लिष्ट दर्शन की एक सहज, सुबोध, प्रगीतात्मक शैली में कही कथा है, 'सिद्धार्थ'।

समय है गौतम बुद्ध का, स्थान है कपिलवस्तु। सिद्धार्थ अपने परम मित्र गोविन्द के साथ निकलता है एक यात्रा पर। त्याग, व्रत,यम नियम और ध्यान से गुजरने और स्वयं गौतम बुद्ध से मिलने के बाद सिद्धार्थ का इस आर्ष सत्य से सामना होता है कि व्यक्ति को अपनी तलाश खुद ही करनी होती है । अपनी मंजिल की ओर हर राही को अकेले ही जाना होता है और आत्मान्वेषण के मार्ग का कोई ब्ल्यू प्रिंट नहीं होता ।

गुरु सिर्फ दूर स्थित पहाड़ी को चमकती बिजली के क्षण में झलक दिखला सकता है, पहाड़ी तक की यात्रा तो खुद ही करनी होगी। 

गोविन्द बुद्ध का अनुयायी बन रुक जाता है और सिद्धार्थ वापस चल देता है। वह एक नदी पार करता है, उसके पास उतराई के पैसे देने के लिए नहीं हैं । माँझी वसुदेव जो वस्तुतः एक परमहंस है, कहता है कि वह परेशान न हो, एक दिन उसे लौटना है।

नगर में पहुँचना सिद्धार्थ की मुलाकात एक वारांगना कमला से होती है। बुद्ध अगर विराग का साक्षात स्वरूप थे तो कमला भोग का, कामनाओं का, ऐंद्रिकता का साक्षात स्वरूप है।

कमला उसे प्रेरित करती करती है कि वह व्यापारी कामस्वामी के पास रह कर धन कमाना सीखे, ताकि कमला उसे शुल्क ले कर प्रेम की कला सिखा सके।

यहाँ सुधी पाठक समझ सकता है कि कमला माया का प्रतीक है और कामस्वामी काम का।

सिद्धार्थ प्रचुर धन कमाता है, त्याग की तरह भोग के भी शीर्ष पर पहुँचता है, लेकिन अभी भी वह अपने लक्ष्य से उतना ही दूर है।

एक दिन वह चल देता है, उस अरण्य की ओर, जहाँ एक नदी बहती थी, जहाँ एक बूढा माँझी उसकी बरसों से राह देख रहा था ।

वह वहाँ पहुँच जाता है, वसुदेव उससे कहता है कि नदी को देखो, इसके हर पल बदलते रंगों में इसको देखो। सुनो, नदी को फुसफुसाते सुनों, सुनो, वह क्या बताती है। नीरवता के इस स्वर को सुनो।

कई साल बीत जाते हैं,  सिद्धार्थ कभी नदी को प्रसन्न होते देखता है, कभी उदास होते, कभी चुप तो कभी गुनगुनाते।

इसी बीच कमला आती है और वहीं अंतिम विदा लेती है। उसकी मृत्यु के बाद उसके साथ आया लड़का (जो सिद्धार्थ का ही पुत्र है) कहीं चला जाता है।

एक दिन, नदी किनारे अपने निविड़ एकांत में बैठे सिद्धार्थ पर, नदी के मौन सुर सुनते, इस सत्य का अवतरण होता है कि काल (समय) एक भ्रम है, एक छलना है।

हर सत्य और हर तथ्य के लिये एक प्रतिसत्य, एक प्रतितथ्य होता है।

आनंद हो कि पीड़ा हो, सब प्रकृति के सतत गतिमान चक्र में एक अंतरंग, सख्य भाव में अंतर्संबंधित हैं ।

ज्ञान की प्राप्ति हेतु राग या विराग, दोनों ही अकेले दम पर्याप्त नहीं हैं ।

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किताब: सिद्धार्थ | लेखक: हरमन हेस | पुस्तक लिंक: अमेज़न

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