सरदार सुरेन्द्र सिंह सोहल की धमाकेदार वापसी है 'मैं अपराधी जन्म का'

अमित वाधवानी धुले महाराष्ट्र से आते हैं। अपराध साहित्य पढ़ने में उन्हें विशेष रूचि है और सुरेन्द्र मोहन पाठक उनके सबसे पसंदीदा लेखक हैं।  विमल श्रृंखला के ताजातारीन पैंतालीसवें कारनामे  'मैं अपराधी जन्म का' पर उन्होंने अपनी टिप्पणी लिखकर भेजी है। आप भी पढ़िए।

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सरदार सुरेन्द्र सिंह सोहल की धमाकेदार वापसी है 'मैं अपराधी जन्म का'


मैं अपराधी जन्म का, नख-शिख भरा विकार,

तुम दाता दुखभंजना, मेरी करो सम्हार



अमित वाधवानी
अमित वाधवानी
'मैं अपराध जन्म का' पाठक साहब द्वारा कलमबंद विमल सीरीज का कालक्रमानुसार 45 वां नया कारनामा है जो कि मौजूदा वृहद दुकड़ी का पहला ही पार्ट है।

कथानक की शुरुआत में विमल मुम्बई--महालक्ष्मी में स्थित एक गुरुद्वारा साहिब में पनाह पाए और सांसारिक मोह-माया से निर्लिप्त एक दीन-हीन नामालूम शख्स की तरह ज़िन्दगी बसर करता दर्शाया गया है। नीलम की मौत को चार महीने बीत चुके हैं और विमल--छोटे सरदार सूरज सिंह सोहल को अपनी मुँह बोली बहन कोमल की हिफाज़त में सौंप खुद गुरुद्वारा साहिब में बतौर कार सेवादार अपने गुनाह बख्शवाने तथा सुकून की तलाश में अपनी ज़िन्दगी व्यतीत कर रहा है।

"जैसे काग जहाज को, सूझे और न ठौर"

पर जैसी की विमल की नियति है या यूँ कहा जाए की इस सीरीज की ही डिमांड है की सरदार साहब की ज़िन्दगी में "ठहराव" और "सुकून" दोनों ही वर्जित है--दोनों से ही जन्म का बैर है! इसी के चलते विमल का पुराना साथी विक्टर--विमल को उसके मौजूदा दीन-हीन बहरूप में न सिर्फ पहचान लेता है बल्कि उसकी हर तरह से मिन्नत कर उसे बाकी साथियों उसके सबसे करीबी-- इरफान और शोहाब से  मुलाक़ात के लिए भी राजी कर लेता है और इस तरह शुरू होता है मिशन "चेम्बूर का दाता" जिसके चलते दुबई के भाई से भिड़ंत का सिलसिला और कथानक की रफ़्तार दोनों ही--पाठकों को हर वाकये के साथ तीव्रता के चरम का अहसास करवाते हैं। 

चूँकि  काफी मित्रों ने शायद अब तक नावल पढ़ी न हो! इसलिए कथानक के संदर्भ में ज्यादा खोलकर लिखना न्यायोचित न होगा पर मैं इस सीरीज के संदर्भ में--कुछ निम्नलिखित विशेष बातों पर सभी का ध्यानाकर्षित करना चाहूँगा--

 गौरतलब बात है की विमल सीरीज के शुरुआती कुछेक उपन्यास  छोड़कर विमल सीरीज के सभी नॉवल, 'आर्गनाइज्ड क्राइम और उसकी झंडा बरदारी करने वाले हर शख्स का समूल नाश'-- की थीम पर आधारित रहे हैं, पर इसके बावजूद क्या बात है जो इस सीरीज ने ऐसी बेमिसाल मक़बूलियत हासिल की है जो की हिंदी क्राइम फिक्शन विधा में न सिर्फ अभूतपूर्व ही है बल्कि क़ाबिल-ए-रश्क भी है। मौजूदा सूरतेहाल में तो विमल की टक्कर का कोई किरदार गढ़ना/पैदा करना और उस किरदार को ऐसी मक़बूलियत दिलाना तकरीबन हर लेखक के लिए ऐसा मंसूबा है जिसे "डिस्टेंट ड्रीम" का दर्जा ही करार दिया जा सकता है! विमल सीरीज के शुरू से अब तक सभी नॉवल एक से ज्यादा बार पढ़कर मेरी जाती राय में इस सीरीज को हासिल कामयाबी/सफलता के जो सबसे महत्वपूर्ण फैक्टर है वो है:-

  1. हर बार मिशन चाहे सेम पर हर बार "नया और इतना अनूठा कथानक" की पाठकों को उस बात का भान ही न हो कि वो सेम थीम पर कोई कथानक पढ़ रहे हैं।
  2. मुम्बइया भाषा शैली पर पाठक साहब का आउटस्टैंडिंग कमांड/प्रभुत्व और साथ ही हर नए कथानक के साथ नित नए मुम्बइया शब्दों की रचना।
  3. विमल का अनूठा किरदार जो की एक वांटेड क्रिमिनल है पर खुदा से खौफ खाता है, गरीब-गुरबा के लिए सखी हातिम है, पर-काज के लिए अपनी जान अपने परिवार को दांव पर लगाता है,पीर-पैगम्बरों सी सलाहियत रखता ऐसा भावुक किरदार जिससे पाठक ऐसा जुड़ाव महसूस करते हैं मानो वो कोई किरदार न होकर सचमुच का मानस हो और उनका कोई अजीज हो, इस तरह के करिश्मेसाज़ किरदार गढ़ना पाठक साहब के लेखन की ऐसी अदभुत कला जिसमें कोई उनका सानी नहीं, और जो कि साथ ही अपने आप में सीरीज की सबसे बड़ी यू.एस.पी. है।
  4. कथानक की रफ्तार और प्रशस्त लेखन शैली ही हर नॉवल की सबसे बड़ी विशिष्टता होती है मेरी नज़र में यह फैक्ट है कि इस विधा में इस फ्रंट पर निःसंदेह पाठक साहब का वर्चस्व स्थापित है ही।

 उपरोक्त पॉइंट्स हाईलाइट करने के पीछे मेरा सिर्फ यही मक़सद था कि, मौजूदा कथानक जो कि अनायास ही "विमल की वापसी" वाला कथानक बन पड़ा है--उपरोक्त सभी विशेषताएं अपने आप में समेटे हुए है। काफी अरसे बाद विमल सीरीज का पुराने अंदाज़ वाला तेज़-रफ़्तार कथानक पढ़ने को मिला। हालाँकि यह दुकड़ी का पहला और बुनियादी पार्ट है इसलिए उम्मीद थी कि शायद सुस्त रफ्तार होगा, पर!!...

विमल के अकबर और खैरू के साथ के न सिर्फ संवाद-- बल्कि पूरा सीन ही लाजवाब बन पड़ा है, साथ ही-- इंस्पेक्टर महाडिक और एसीपी वाला सीन और कथानक का अंत दोनों ही माइंड-ब्लोइंग और वाह-वाह। 

नीलम की मौत के बाद तकरीबन सभी पाठकों की मंशा विमल को फिर से उसी पुराने चिरपरिचित-- 'क़हरबरपा' और 'रौद्र-पूर्ण' अंदाज़ अख्तियार किये देखने की थी, जो की पिछली दुकड़ी में न देख पाए, पर इस कथानक में अगली-पिछली पूरी कसर निकलती देखेंगे।

कहना होगा---

       "द घोस्ट हु वॉक्स" इज़ बैक..


"जिसु तिसु भावे तिवें चलावै जीव होवै फरमानु।"


 वेलकम बैक--"सरदार साहब"...

दुकड़ी की दूसरी/आखरी कड़ी का बेसब्री से इंतज़ार रहेगा...

- अमित वाधवानी

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किताब: मैं अपराधी जन्म का | लेखक: सुरेन्द्र मोहन पाठक | प्रकाशक: हिन्द पॉकेट बुक्स | मूल्य: 175 | श्रृंखला: विमल #45
किताब लिंक: पेपरबैक - अमेज़न

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10 Comments
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  1. सही लिखा अमित वाधवानी ने।

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  2. बहुत बेहतरीन व सटीक विश्लेषण। आप अमित जी फ़ेसबुक पर अब समीक्षा नही शेयर कर रहे हैं। आपसे रिक्वेस्ट है कि फेसबुक पर भी इसे शेयर कीजिये।

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