आज का उद्धरण

मृदुला गर्ग | उसके हिस्से की धूप | हिन्दी कोट्स

अपनी आदत के अनुसार, मनीषा जब उससे आगे निकल गई तब जाकर ख्याल आया कि मंजिल तो पीछे ही रह गई। कहीं जाने के लिए निकलने पर उसके साथ यही होता है। जब तक राह परिचित लगती है, यह बिना उसकी ओर देखे अंतः प्रज्ञा द्वारा आगे बढ़ती जाती है। फिर, जब आसपास की अपरिचितता बरबस उसक ध्यान अपनी ओर खींच लेती है वह चौंककर रुक जाती है और कदम लौटा देती है। सड़कों के साथ यह करना जितना आसान है, ज़िन्दगी के साथ उतना ही कठिन। आदमी जब तक लौटे-लौटे मंजिल बदल जाती है।

- मृदुला गर्ग, उसके हिस्से की धूप

किताब लिंक: पेपरबैक | हार्डबैक

Post a Comment

6 Comments
* Please Don't Spam Here. All the Comments are Reviewed by Admin.
  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (28-02-2021) को    "महक रहा खिलता उपवन"  (चर्चा अंक-3991)     पर भी होगी। 
    -- 
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
    --  
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ-    
    --
    सादर...! 
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 
    --

    ReplyDelete
    Replies
    1. जी चर्चा अंक में मेरी प्रविष्टि को शामिल करने के लिए हार्दिक आभार....

      Delete
  2. सही कहा अनुज।
    सादर

    ReplyDelete

Top Post Ad

Below Post Ad