Sunday, April 19, 2020

उसके हिस्से की धूप - मृदुला गर्ग

उपन्यास मार्च 28 2020  से 30 मार्च 2020 के बीच  पढ़ा गया

संस्करण विवरण:
फॉर्मेट: पेपरबैक
पृष्ठ संख्या: 136
प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन
आईएसबीएन: 9788126720873
मूल्य : 150

उसके हिस्से की धूप - मृदुला गर्ग
उसके हिस्से की धूप - मृदुला गर्ग


पहला वाक्य:
आज अचानक जितेन से फिर भेंट हो गयी।

कहानी:
नैनीताल में जब मनीषा को जितेन चार साल बाद पुनः मिला तो वह उसके लिए एक आश्चर्य ही था। एक सुखद आश्चर्य! उसे खुद नहीं पता था कि उसे जितेन से मिलकर ऐसा लगेगा। उनके बीच एक आकर्षण अभी भी मौजूद होगा। वह तो अपने पति मधुकर के साथ यहाँ किसी काम के सिलसिले में रह रही थी।

लेकिन अब जितेन ही उसके दिमाग में घूम रहा था। यह होना तो नहीं चाहिए था लेकिन हो रहा था।

आखिर कौन था ये जितेन? 
उसका मनीषा से क्या रिश्ता था? 
क्यों उसने मनीषा के दिमाग और कुछ हद तक दिल पर कब्जा कर लिया था?
जितेन के आने से मनीषा और मधुकर के रिश्ते पर क्या असर पड़ेगा?


मुख्य किरदार:
मनीषा - कहानी की नायिका
मधुकर नागपाल- मनीषा का पति जो कि अर्थशास्त्र का प्रोफेसर था
जितेन राय - मनीषा का पुराना जानकार जिसे वह चार साल बाद मिली थी।
बसप्पा - जितेन का नौकर
सुधा सिद्प्पा - बेंगुलुरु के सैंट जोसफ कॉलेज में मनीषा की साथी लेक्चरर

मेरे विचार:
मृदुला गर्ग जी का  उपन्यास उसके हिस्से की धूप पहले बार 1975 में प्रकाशित हुआ था। वैसे तो यह उपन्यास लगभग पैंतालीस साल पहले लिखा गया था लेकिन आज भी यह उपन्यास कई लोगों के लिए प्रासंगिक होगा।

उपन्यास की बात करें तो उपन्यास तीन भागों में विभाजित है और हर भाग का नाम उपन्यास के एक किरदार के ऊपर रखा गया है। उपन्यास के तीन मुख्य किरदार हैं: मनीषा, जितेन और मधुकर। मनीषा ही उपन्यास का केंद्र बिंदु है। उसके चारों और ही कथानक रचा गया है। उसकी इच्छाओ, अपेक्षाओं, संशय और आखिरकार एक फैसले तक पहुँचने को ही उपन्यास में दर्शाया गया है।

मेरे हिसाब से यह उपन्यास एक यात्रा है जो कि नायिका कर रही है और इस यात्रा में पाठक भी उसके साथ चल रहे हैं।

पहले भाग 'जितेन' में नायिका जितेन तक पहुँचती है। वह जितेन जिसे वह अब तलक भावनाहीन समझती आ रही थी। लेकिन इस भाग में वह जान पाती है कि जितेन अत्यधिक भावुक भले ही न हो लेकिन भावनाएं उसमें भी हैं। हाँ, वो उन्हें लेकर उससे काफी ज्यादा परिपक्व है। वह वो सब है जिसकी उसे जरूरत थी लेकिन आजतक वह उसे पहचान नहीं पाई थी।

दूसरा भाग 'मधुकर' है और इस भाग में हम देखते हैं कैसे मनीषा मधुकर तक पहुँची थी। मनीषा और मधुकर के बीच के प्रेम का होना हमे इस भाग में दिखता है। मधुकर जितेन से  बिल्कुल उलट है। वह बहुत भावुक है और यह उसके हर काम में दिखता है। उसके प्रेम में भी और अपने आदर्शों में भी यही अतिरेक दिखाई देता है। उसकी यही भावुकता पर मनीषा पहले मर मिटती है लेकिन वक्त के साथ उसे यह भी नागवार गुजरने लगती है। उसे यह अपरिपक्व लगने लगती है।

कहानी का आखिरी भाग का नाम मनीषा है और यह वह भाग है जिसमें मनीषा खुद तक पहुँचती है। इससे पहले वह खुद को पूरा करने के लिए कभी मधुकर के पास भागती थी और कभी जितेन के पास ही भागती है लेकिन आखिरकार उसे समझ आता है कि कमी उनमें उतनी नहीं है जितनी उसमें खुद है। उसे समझ आता है अगर व्यक्ति अधूरा है तो प्रेम ही खालीपन को नहीं भर सकता है।

इतना घनत्व प्रेम में नहीं होता कि वह अंतरिक्ष-जैसे फैले जीवन के शून्य को सदैव के लिए भर सके। कुछ थोड़े-से क्षण ऐसे अवश्य आते हैं जब वह इतना फैल जाता है कि उसका ओर-छोर ढूँढे नहीं मिलता। पर देखते ही देखते फिर सिकुड़कर यूँ सिमट जाता है कि पता नहीं चलता, वह कहाँ समा गया है। (पृष्ठ 126)

कुछ देर वहीं खड़ी मनीषा उन्हें सुनती रही, फिर सिर ऊँचा करके ठंडी हवा का एक लम्बा कश खींच, भीतर जाने के लिए मुड़ गई। एक सुख अनुभूति के साथ उसने पाया कि अकेलेपन की चिलकती धूप अब भय से उसे डरा नहीं रही, प्यार से सहला रही है। (पृष्ठ 136)

उपन्यास पठनीय है और शुरू से ही पाठक को बाँधकर रखता है। मनीषा से पहली ही मुलाकात आपको उसकी ओर आकर्षित कर देती है। वह रोचक किरदार है। उलझी हुई, जिसे शायद आप सुलझाना चाहते हैं।

जितेन जिस तरह से उसकी जिंदगी में आता है वह आना पाठक को इनके बीच क्या हुआ था यह जानने के लिए उत्सुक कर देता है। लेकिन जैसे जैसे कहानी आगे बढ़ती है वैसे वैसे आप पाते हैं कि मनीषा के अंदर की उलझन  प्रेम के कारण नहीं है बल्कि खुद के कारण है।  उसकी खुद की कमियाँ हैं जिन्हें वह देखना नहीं चाहती है और उनसे बचने के लिए वह अपने रिश्ते में कमियाँ देखने लगती है। इसके बाद कभी जितेन से और कभी मधुकर से वह इन कमियों को पूरा करने की कोशिश करती है।

कई औरते या मर्द जिनका पूरा व्यक्तित्व उनकी खूबसूरती या उनकी शारीरिक क्षमता पर टिका होता है वो जब उनकी उम्र ढलने लगती है तो दूसरों का ध्यानाकर्षित करने के लिए कुछ भी करने को तैयार होते हैं। उनके अफेयर भी इसिलिए बढ़ते हैं क्योंकि उन्हें यह वेलिडेशन चाहिए होता है कि वो चीज जो उनके व्यक्तित्व का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है वो खत्म तो नहीं हो रहा है। व्यक्ति के दूसरे गुण उम्र बढ़ने के साथ बढ़ते हैं लेकिन खूबसूरती और शारीरिक क्षमता घटती है। ऐसे में जिन व्यक्तियों का पूरा दारोमदार उनके इन्ही गुणों पर होता है जब इसे घटते देखते हैं उन्हें इससे दिक्कत होने लगती है। फिर वह उस तरफ खिंचे चले जाते हैं जो उनके इन गुणों को पोसता है ताकि उन्हें ऐसा लगता रहे है कि उन्होंने सब कुछ खोया नहीं है।  पश्चिम में एक टर्म है मिड लाइफ क्राइसिस जो कि उन पुरषों को लेकर गढा गया है जो कि चालीस के पैठे में पहुँचने पर अजीब हरकतें करने लगते हैं। यह हरकतें नई स्पोर्ट्स कार लेने से लेकर अपनी बसी बसी गृहस्थी छोड़कर अपने से आधी उम्र की लड़की से विवाह करने तक होती हैं।

यहाँ इन सब बातों को कहने का मेरा तात्पर्य यह है कि यह सब आदमी तभी करता है जब वह खुद से संतुष्ट  नहीं होता है और अपनी संतुष्टि के लिए दूसरे पर निर्भर होता है। उसे लगता है इससे वह पूरा हो जायेगा, उसे ख़ुशी मिलेगी लेकिन अक्सर यह ख़ुशी क्षणिक ही होती है और फिर से वही चक्र शुरू हो जाता है। आजकल की बात करूँ तो यह चीज हम सोशल मीडिया पर भी देख सकते हैं। कई लोग उधर झूठी जिंदगी दिखाने के लिए अपनी असल जिंदगी बर्बाद कर देते हैं। यह भी वही लोग होते हैं जिनकी जिंदगी लाइक्स और लव रिएक्शन पर निर्भर करती है।

यही चीज मनीषा में भी देखने को मिलती है। जितेन से उसकी लड़ाई इसलिए ही थी क्योंकि उसके प्रेम करने का तरीका ऐसा नहीं था जिसकी मनीषा अपेक्षा करती थी। जितेन खुद में पूरा था। एक व्यस्क था। प्रेम उसकी जिंदगी का हिस्सा था, पूरी जिंदगी नहीं थी। बाद में मधुकर के साथ उसका इशू यही रहता है कि वह उससे स्वतंत्र नहीं है। वह हर चीज उसके साथ करना चाहता है। जो स्वतन्त्रता उसे जितेन के साथ चुभती थी, जैसा व्यवहार वो चाहती थी कि जितेन करे वही चीजें उसे मधुकर के साथ खटकने लगती है।  और इस तरह से वह फिर जितेन की तरफ आकर्षित हो जाती है और रिश्तों की एक खिचड़ी सी बना देती है।

इन रिश्तों की खिचड़ी जो मनीषा ने पकाई है उसका अंत कैसा होता है यह तो आप कहानी पढ़कर ही जान पायेंगे।

कहानी में एक और बिंदु कई बार मनीषा उठाती है। वह प्रश्न स्त्री स्वतन्त्रता का है। लेकिन मनीषा जिस जगह पर है उसे इस स्त्री स्वतंत्रता का प्रश्न उठाते हुए देखना थोड़ा अजीब लगता है। उसके जिंदगी में जो दोनों ही पुरुष हैं उनमे से कोई ऐसा नहीं है जो उसकी आज़ादी को रोके। मधुकर केवल प्रेम नहीं बाँट सकता है लेकिन अगर वह उससे अलग होना चाहती तो शायद ही मधुकर उसे रोकता। वह नाराज जरूर होता। थोड़ा लड़ता झगड़ता लेकिन जैसा उसका चरित्र है उसमें वह उसे हानि नहीं पहुँचाता और आखिरकार अलग होने के लिए राजी हो जाता। वहीं जितेन तो प्रेम के मामले में भी उदार था। ऐसे में यह प्रश्न बचकाने और मधुकर के पीठ पीछे किसी और से रिश्ते बनाने को सही ठहराने के बहाने ही लगते हैं। यह सब मनीषा की लफ्फाजी ज्यादा लगती है। यह नहीं होता तो उसे अपने घर में आने पर इस बात का डर न होता कि उसका पति पहले न पहुँच गया हो। या वह पहले ही अपने पति से बातें साफ करती। लेकिन ऐसा कुछ वह करती नहीं है।

मनीषा को जहाँ तक मैं समझ पाया हूँ उसे ओपन मैरिज में रहना चहिये था। वह ओपन मैरिज में ज्यादा खुश रहती और इसलिए जितेन उसके लिए सही रहता। पर अंत में भी वह कुछ और फैसला लेती है। उपन्यास एक बिंदु पर खत्म होता है जो मनीषा के लिए तो ठीक है लेकिन क्या मधुकर के लिए ठीक है? शायद नहीं! हाँ, अगर वह मधुकर को सब कुछ बताती और उसके बाद वो आगे बढे होते तो शायद मनीषा के लिए मेरे मन में सम्मान बढ़ता। अभी तो वह एक अवसरवादी ही प्रतीत होती है।

अगर मैं अपनी बात करूँ तो मेरा मानना है कि जब आप रिश्ते में जाते हैं तो एक जिम्मेदारी भी आपके ऊपर आती है। इस दायित्व का निर्वाह आपको करना होता है। यह दायित्व क्या होगा यह वह व्यक्ति ही निर्धारित करता है जिसके साथ आप रिश्ते में जा रहे हैं। अगर आपको पसंद नहीं है तो आप उस रिश्ते में न जाइए या आपको लगता है कि आपको अब कुछ अलग चाहिए तो अपने साथी से बात कीजिये और अलग हो जाइये। कई लोगों के लिए यह सम्भव नहीं होता, विशेषकर स्त्रीयों के लिए। वह रिश्ते में कैद सी हो जाती हैं और अगर मनीषा ऐसा किरदार होती तो शायद मेरी सहानुभूति उसके साथ होती लेकिन अभी ऐसा कुछ नहीं है। मनीषा के पास ये विकल्प हैं। वह बस उन्हें लेना नहीं चाहती।

कहानी में बीच में सुधा का किरदार भी मुझे रोचक लगा। उसके जैसे कई लोगों से मिला हूँ जो कि प्रेम में तो जाति, धर्म इत्यादि नहीं देखते हैं लेकिन जब शादी की बारी आती है तो यह सब चीजें उन्हें दिखाई देने लग जाती है। उसके तर्क काफी भौंथरे हैं  लेकिन वह समाज का एक हिस्से का प्रतिनिधित्व करती है? इस बात में जहाँ मनीषा उससे बेहतर है लेकिन कई और मामलों में वह भी मनीषा से बेहतर है। उसे पता है उसे क्या चाहिए। वह प्रेम को भी पहचानती है। प्रेम को लेकर उसके और मनीषा के बीच के वार्तालाप अच्छे बने हैं।

उपन्यास की लेखनी बहुत खूबसूरत है। उपन्यास ऐसे कई वाक्यों से भरा हुआ जिन्हें आप बार बार पढ़ना चाहेंगे या सहेज कर रखना चाहेंगे। लेकिन चूँकि यह लेखन मृदुला जी का है तो यह होना लाजमी है।

उपन्यास की कुछ पंक्तियाँ जो मुझे पसंद आई:
अपनी आदत के अनुसार, मनीषा जब उससे आगे निकल गई तब जाकर ख्याल आया कि मंजिल तो पीछे ही रह गई। कहीं जाने के लिए निकलने पर उसके साथ यही होता है। जब तक राह परिचिय लगती है, यह बिना उसकी ओर देखे अन्तः प्रज्ञा द्वारा आगे बढ़ती जाती है। फिर, जब आसपास की अपरिचितता बरबस उसक ध्यान अपनी ओर खींच लेती है वह चौंककर रुक जाती है और कदम लौटा देती है। सड़कों के साथ यह करना जितना आसान है, ज़िन्दगी के साथ उतना ही कठिन। आदमी जब तक लौटे-लौटे मंजिल बदल जाती है।(पृष्ठ 15)

यह वैवाहिक-जीवन भी अजीब चीज है, वह सोच रही थी। जो करो एक साथ। साथ बैठो,साथ बोलो, चाहे बोलने को कुछ हो, चाहे नहीं, साथ घूमो, साथ दोस्त बनाओ, चाहे एक का दोस्त दूसरे को कितना ही नामुराद क्यों न लगे, साथ खाओ और साथ सोओ, चाहे एक के खर्राटे दूसरे को सारी रात जगाए क्यों न रखे। (पृष्ठ 17)

वह दोनों एक दूसरे के सामने दो सर्वथा स्वतंत्र व्यक्तियों की तरह खड़े हैं, जो अपने अपने औचित्य का निर्णय स्वयं कर सकते हैं। न कोई बंधन है, न कोई कर्तव्य, न लोभ। बिना झिझक उसने प्रत्युत्तर दे डाला। सच, वासना को कर्तव्य बना देना, शरीर को बंधक रख देना, इससे बड़ी विडम्बना इनसान के साथ और क्या हो सकती है। (पृष्ठ ३५)

आज पहली बार मनीषा ने समझा और स्वीकारा कि शरीर का अपना एक वैभव और औचित्य है। अब तक जब भी वह उससे टकराई थी, छिटककर दूर जा खड़ी हुई थी और अपने आसपास प्यार की छोटी खुशनुमा सीढ़ियाँ खोजने लगी थीं, इतनी सतर्कता के साथ कि उस उनींदेपन से ही बाहर तैर आई थी जो उसे पाने के लिए जरूरी था।  (पृष्ठ 35)

वह तो अलौकिक वस्तु थी न? प्रथम प्रेम! यही कहा था न उसने? यही सुना पढ़ा था न? प्रेम एकनिष्ठ होता है, प्रेम अटूट होता है, प्रेम अनश्वर होता है... पर क्या निरंतर भी? (पृष्ठ 52)

लगता है अच्छी शिक्षिका बनने की गुण उसमें विद्यमान नहीं हैं। अपने यहाँ अच्छा शिक्षक वही माना जाता है जिसके पास अपना सोचने-कहने को कुछ न हो, जो दूसरों को पढ़कर वर्ण-अक्षर सहित याद रखने में जितना माहिर हो, रटे-रटाये को नोट्स की भाषा में लिखवाने में उतना ही पारंगत। (पृष्ठ 69)

मेरे विचार में तो प्रेम का होना और दाँत में दर्द का होना एक ही बात है। जब होता है मनुष्य उसे छोड़ संसार-भर से वैरागी हो उठता है: दत्तचित्त, भावप्रण, उसकी सेवा-शुश्रूषा करता है, अन्य भौतिक पदार्थों से घृणा करने लगता है। पर फिर जब वह चुक जाता है तो सब सामान्य हो जाता है; उसकी स्मृति की कसक-भर शेष रह जाती है, और कुछ नहीं। (पृष्ठ  81)

मनुष्य जब विश्वास को बीच में ले आता है तब तर्क बेकार हो जाता है। (पृष्ठ 81)

वह खड़ी थी और मकड़ी के धागे-सा महीन भावना का जाला उसके चारों और बुना जा रहा था। जानबूझकर, वह उसके बीच खड़ी थी और जाले में फँसती जा रही थी। धागा इतना महीन था कि एक झटके में उसे तोड़कर कभी भी बाहर निकला जा सकता था। पर वह निकलना चाहती ही कहाँ थी? वह चाहती थी, धागा खिंचे, उसके चारों ओर लिपटे, खिंचे और फिर लिपट जाए। (पृष्ठ 100)

क्षण के आगे समर्पण करके सदा के लिए उसे स्मृति में सँजोया जा सकता है, पर घटित समय में बाँधकर नहीं रखा जा सकता। (पृष्ठ 101)

लिखूँगी कुछ, उसने अब सोचा, लिखूँगी यही सब, जो मेरे भीतर इतने दिन तक खदबदाता रहा है। लिखूँगी अपने में निहित इस व्यक्तित्व की कहानी, जो बिना लिखे अब और अपने भीतर मुझसे रखी नहीं जा सकेगी। (पृष्ठ 132)

अंत में यही कहूँगा कि उपन्यास एक अपने में उलझी हुई किरदार की यात्रा है जो उपन्यास के खत्म होने तक खुद तक पहुँचती है और अपनी उलझन को काफी हद तक दूर कर देती है। अंत में उसके लिए कुछ निर्णय मुझे पसंद नहीं आये लेकिन  उपन्यास सोचने के लिए आपको काफी कुछ दे जाता है।
मुझे उपन्यास बेहद पसंद आया।

रेटिंग: 4/5

अगर आपने इस उपन्यास को पढ़ा है तो आपको यह कैसा लगा? अपने विचारों से मुझे आप टिप्पणियों के माध्यम  से अवगत करवा सकते हैं। अगर आपको यह उपन्यास पढ़ना है तो आप इसे निम्न लिंक से जाकर खरीद सकते हैं:
पेपरबैक
हार्डबैक


मृदुला गर्ग जी की दूसरी रचनाओं को मैंने पढ़ा है। उनके विषय में मेरी राय आप निम्न लिंक पर जाकर पढ़ सकते हैं:
मृदुला गर्ग

हिन्दी साहित्य की दूसरी कृतियों के विषय में मेरी राय आप निम्न लिंक पर जाकर पढ़ सकते हैं:
हिन्दी साहित्य 


© विकास नैनवाल 'अंजान'

4 comments:

  1. वाह ! आप बहुत अच्छी और स्तरीय समीक्षा लिखते हैं।

    ReplyDelete
    Replies
    1. जी, आभार विजय भाई....लेख आपको पसंद आया यह जानकर अच्छा लगा। ब्लॉग पर आते रहियेगा।

      Delete
    2. मृदूला जी का लिखा चित्तकबरा अविश्वसनीय कृति हैं इसे भी ध्यान मे रखिए

      Delete
    3. जी चितकोबरा उपन्यास पढ़ा है और वह भी काफी अच्छा है। आभार ब्लॉग पर आकर विचार प्रकट करने के लिए।

      Delete

Disclaimer:

Ek Book Journal is a participant in the Amazon Services LLC Associates Program, an affiliate advertising program designed to provide a means for sites to earn advertising fees by advertising and linking to Amazon.com or amazon.in.

लोकप्रिय पोस्ट्स