एक बुक जर्नल: बदनाम लड़की - विनायक शर्मा

Monday, September 21, 2020

बदनाम लड़की - विनायक शर्मा

 किताब 19 सितम्बर 2020 को पढ़ी गयी 

संस्करण विवरण:
फॉर्मेट: ई-बुक 
प्रकाशक: डेलीहंट

बदनाम लड़की - विनायक शर्मा
बदनाम लड़की - विनायक शर्मा

पहला वाक्य:
पीपल के पेड़ के नीचे जून महीने की शाम में भी ठण्डी हवा बह रही थी।

कहानी:

शेखर बी टेक करने के पश्चात छुट्टियाँ मनाने अपने गाँव आया हुआ था।  वह अपने दोस्तों नमन, अमर और नीलेश के साथ गंगा के किनारे फुर्सत के कुछ पल बिता रहा था। पूरे डेढ़ साल बाद चारों दोस्तों को इस तरह का कोई मौका मिला था।

ऐसे में उनकी बातों का सिलसिला नीतू तक आया। नीतू बरहपुर की ही लड़की थी जिसका परिवार बदनामी के चलते छः महीने पहले अपना पुश्तैनी गाँव छोड़कर बाहर चला गया था।

शेखर को नीतू के विषय में पता लगा तो उसका मन उसकी कहानी जानने को व्याकुल हो उठा।

आखिर क्या थी इस बदनाम लड़की की कहानी? 

क्यों नीतू और उसका परिवार अपना पुश्तैनी घर और कारोबार छोड़कर जाने को राजी हुआ था?

शेखर इन बातों को जानकर क्या करने का इरादा रखता था?

ऐसे ही प्रश्नों के उत्तर आपको इस कहानी को पढ़कर पता चलेंगे।

मुख्य किरदार:
शेखर - बरहपुर का एक लड़का जो कि छुट्टियों में अपने गाँव आया था
अमर, नमन, नीलेश - शेखर के दोस्त
सपना - शेखर की कॉलेज की दोस्त 
कर्मवीर सिंह - शेखर के पिता 
विजय - शेखर के साथ पढ़ने वाला लड़का 
नीतू - बरहपुर की एक लड़की जो अपने परिवार के साथ गाँव छोड़कर चली गयी थी 
सरोज यादव- नीतू के परिवार की  देखने वाला व्यक्ति 

मेरे विचार:
जैसे जैसे तकनीक का विकास हुआ है वैसे वैसे उसका दुरूपयोग भी बढ़ा है। तकनीक का यह दुरपयोग ही है कि जो क्षण दो लोगों के बीच बेहद व्यक्तिगत होते थे उनको भी कई लोग अपने स्वार्थ के चलते या अपनी ढींग हाँकने के चलते सार्वजनिक करने से गुरेज नहीं करते हैं। ऐसे क्षण जब सार्वजनिक होते हैं तो लड़कों पर तो इसका असर कम पड़ता है लेकिन लड़कियों के चरित्र की छीछालेदर होने में कोई कसर नहीं छूटती है।

हमारा समाज आज भी यौन सम्बन्धों विशेषकर एक युवती और उसके प्रेमी के बीच के सम्बन्धों को सही नजर से नहीं देखता है। स्त्री की मर्जी से उनका कोई लेना देना नहीं होता है और स्त्री की ना और हाँ में केवल उसका हक है यह बात उन्हें समझ नहीं आती है। यही कारण है जब किसी युवती का ऐसा विडियो लीक होता है वह बदनाम हो जाती है, लोग उसे एक ही नजर से देखने लगते हैं और उसका जीना दुश्वार कर देते हैं। तब लड़की का अपना शहर छोड़कर जाने के सिवाय कोई दूसरा रास्ता नहीं बचता है। विनायक शर्मा की कहानी बदनाम लड़की भी ऐसी ही एक लड़की नीतू की कहानी है।

शेखर को जब नीतू की कहानी पता चलती है तो उसे लगता है कि उसके साथ गलत हुआ है। उसे ऐसे बात की सजा दी जा रही है जिसमें उसकी गलती नहीं थी। वह तो विश्वासघात का शिकार थी। आम तौर पर जब ऐसी कहानियाँ हम सुनते हैं तो अफ़सोस जाहिर करने के अलावा और कुछ नहीं कर सकते हैं लेकिन कहानी में शेखर नीतू को वापस उसके गाँव लाना चाहता है। इसके लिए वह क्या कार्य करता है यही कहानी बनती है।

कहानी का विषय मुझे पसंद आया और इसको जिस तरह से लिखा गया है वह भी कहानी में पठनीयता जगाता है।लेखक की भाषा पकी हुई है यह भी पढ़ते हुए आपको पता चलता है।

कहानी पढ़ते हुए आपको यह अफ़सोस भी होता है कि एक लड़की की खोयी हुई इज्जत लौटाने का एक मात्र तरीका उससे शादी करना ही रह जाता है। यह एक सरल तरीका लगता है। मैं यही सोच रहा था कि अगर शेखर की कोई प्रेमिका होती तो क्या वो उसे छोड़कर केवल नीतू को न्याय दिलाने के लिए उससे शादी कर देता? क्या यह सही होता। वहीं नीतू को बहुत खूबसूरत भी दर्शाया गया है तो अगर कहीं नीतू इतनी खूबसूरत न होती तो क्या फिर भी वह उससे विवाह करता? यह कुछ ऐसी बातें हैं जिनसे कहानी को जिस तरह से अंत किया गया है वह एक असंतुष्टि का भाव मन में जगाता है।

चूँकि कहानी बिहार की पृष्ठभूमि पर है तो शराब बंदी का जिक्र भी इसमें आता है। शराब बंदी के कारण कैसे शराब रुकने के बजाय बस महँगी हुई है और इसकी तस्करी ही बढ़ी है। इस बिंदु को भी कहानी में दर्शाया गया है। व्यक्तिगत तौर पर मुझे शराब उतनी बुरी नहीं लगती है। अगर आपको पीना आता है तो इसका मजा लिया जा सकता है लेकिन देखने में ये ही आता है कि कई लोगों को पीना आता ही नहीं है। 

कहानी में प्रूफ की एक ही गलती दिखती है। जिस किरदार का नाम शुरुआत में शेखर है वह आगे चलकर राजेश ही बना दिया जाता है। यह गलती सुधारी जा सकती है।

कहानी एक विचारणीय विषय पर लिखी गयी है लेकिन इसका अंत जल्दबाजी में किया गया लगता है। अगर राजेश ऐसा कुछ करता कि बिना नीतू से शादी किये वह उसकी खोई प्रतिष्ठा वापिस ले आता तो शायद कहानी मुझे और ज्यादा पसंद आती है। नीतू मजबूरी के चलते नहीं फिर राजेश से खुद विवाह करती या किसी और से विवाह करती तो बेहतर रहता। अभी ऐसा लगता है कि लेखक द्वारा आसान रास्ता चुना गया है। वहीं राजेश के परिवार वालों का एक ही फोन में सब कुछ स्वीकार करना भी इतना तर्कसंगत नहीं लगता है। यह भी ऐसा लगता है जैसे कहानी को आसान बनाया गया है। इन दो बिन्दुओं पर मुझे लगता है और कार्य किया जा सकता था जिससे कहानी और बेहतर हो सकती थी।

अंत में यही कहूँगा कि यह एक पठनीय कहानी है जिसका अंत और बेहतर हो सकता था। 

रेटिंग: 2.5/5

जहाँ तक नीतू की बात है तो मुझे भी नहीं लगता उसने कुछ गलत किया था। उसने विश्वास किया था और अक्सर व्यक्ति अपनों पर ही विश्वास करता है। अब वह अपना ही दगाबाज निकले तो क्या किया जा सकता था। हाँ, फिर भी सावधानी सभी को बरतनी चाहिए इससे आगे आने वाली कई सम्भावित परेशानियों से वह खुद को बचा पाएंगे। ऐसी खबरे आम हैं जिसमें ऐसे विडियो बनाने के बाद लड़कियों को ब्लैकमेल किया जाता है। वहीं दूसरी ओर समाज के तौर पर हमें परिपक्व होने की जरूत है। अगर आपको पोर्न देखना ही है तो उन लोगों के देखिये जिनका यह पेशा है। अगर कोई  एम एम एस आपके पास आये तो उन्हें न तो फॉरवर्ड कीजिये और न ही उन्हें देखिये बल्कि फॉरवर्ड करने वाले की जानकारी पुलिस को दीजिये।

अगर यह कहानी आपने पढ़ी है तो आपको यह कैसी लगी? अपने विचारों से मुझे जरूर अवगत करवाईयेगा। मैंने तो यह कहानी डेलीहंट के ई-बुक एप्लीकेशन में पढ़ी थी किन्तु यह कहानी प्रतिलिपि पर भी मौजूद है। आप निम्न लिंक पर इसे पढ़ सकते हैं:

यह कहानी विनायक शर्मा के कहानी संग्रह एक्स गर्लफ्रेंड में भी संकलित की गयी है। यह संग्रह आप निम्न लिंक पर जाकर पढ़ सकते हैं:

डेलीहंट से प्रकाशित अन्य कृतियाँ जो मैंने पढ़ी हैं:


© विकास नैनवाल 'अंजान'

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