एक बुक जर्नल: मुझे तुम्हारे जाने से नफरत है - प्रियंका ओम

Thursday, December 12, 2019

मुझे तुम्हारे जाने से नफरत है - प्रियंका ओम

किताब 9 अक्टूबर 2019 से अक्टूबर 14 2019 के बीच पढ़ी गई

संस्करण विवरण:
फॉर्मेट: ई बुक
पृष्ठ संख्या: 188
प्रकाशक: रेडग्रब्स बुक्स
ए एस आई एन: B079QNDQBN
मूल्य: 175(पेपरबैक) , 49 /- (किंडल) (प्राइम रीड सब्सक्रिप्शन पर मुफ्त)

मुझे तुम्हारे जाने से नफरत है - प्रियंका ओम
मुझे तुम्हारे जाने से नफरत है - प्रियंका ओम

'मुझे तुम्हारे जाने से नफरत है' प्रियंका ओम जी का कहानी संग्रह है। यह उनका दूसरा कहानी संग्रह है। इससे पहले वो अजीब लड़की नाम से उनका एक और कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुका है। वह संग्रह भी मेरे पास मौजूद है लेकिन मौका इसे पहले पढ़ने का लगा।

रेडग्रैब बुक्स द्वारा प्रकाशित उनकी इस पुस्तक में निम्न पाँच कहानियों को संकलित किया गया है। 

1.प्रेम पत्र 

पहला वाक्य:
तीनों में तीन तरह की लड़कियाँ थीं। 

काजल ,मीनू और स्वाति तीनों पक्की सहेलियाँ थी। इतनी पक्की कि इनकी दोस्ती के किस्से पूरे स्कूल में मशहूर थे। एक को मुसीबत आती तो  बाकि दोनों उसकी ढाल बनकर खड़ी हो जाती। वह तीनों तीन जिस्म एक जान थीं।

ऐसा नही था कि तीनों का स्वभाव एक सा था लेकिन इस बात से उन्हें ज्यादा फर्क नहीं पड़ता था कि तीनों के व्यवहार में जमीन आसमान का अंतर था। उनकी दोस्ती इस अंतर को पाटने वाला एक पुल थी जिसमें वे अपनी दोस्ती के फसाने लिख रही थीं।

लेकिन फिर एक प्रेम पत्र आया और सब कुछ बदल गया।

आखिर किसने लिखा था प्रेम पत्र? उससे इनकी ज़िन्दगी में क्या बदलाव आया? 

यह सब आपको इस कहानी को पढ़कर पता चलेगा।

प्रेम पत्र काजल,मीनू और स्वाति की कहानी है। ये दोस्ती की कहानी है, कस्बाई प्रेम की कहानी है और प्रेम पत्रों की कहानी है। काजल,मीनू और स्वाति बिल्कुल अलहदा किरदार है। वह उम्र के उस मोड़ पर हैं जब मन की जमीन पर उगे भावनाओ के पौधों पर इश्क की कोपलें फूटने लगती हैं। वहीं इस उम्र में इश्क और आकर्षण के बीच फर्क महसूस कर पाना भी कई बार मुश्किल हो जाता है। यही इस कहानी में इन दोस्तो में से एक के साथ होता है और उससे कहानी में मोड़ आते हैं।

वहीं कहानी पढ़ते पढ़ते आपको कस्बाई जीवन की सौंधी खुशबू महसूस होती है। अगर आप किसी छोटे कस्बे में पढ़े बड़े हैं तो इस कहानी को पढ़ते हुए ऐसी कई चीजों से आप रूबरू होते हैं जिसके चलते आपको अपने कस्बाई जीवन की याद दुबारा आ जाती है।  कोई देख न ले इस डर से बच बच कर लुक छुपकर इश्क करना मुझे अपने कस्बे के आशिकों की याद दिला गया।

कहानी में वैसे दोस्त तो तीनों हैं लेकिन केंद्र में मीनू है। उसके विषय में आपको काफी जानकारी मिलती है। वह जैसी है वैसी क्यों है इसकी जानकारी भी आपको मिलती है जिससे उससे जुड़ाव ज्यादा होता है। स्वाति और काजल के साथ ऐसा कम होता है।

कहानी पठनीय है। कई घुमाव और मोड़ भी कहानी में आते हैं जो आपको अपने उन वर्षों  में ले जाएंगे जब पहली दफा आप इश्क में पड़े थे और आपको लगता था कि आशिक न मिला तो जी नहीं पाएंगे । यह नोस्टाल्जिया अच्छा लगता है। वहीं कहानी का अंत जिस तरह होता है उसे पढ़कर शायद आप उन दोस्तों को याद करें जो जीवन पथ पर चलते जाने के कारण कहीं पीछे छूट गये हैं या जिन्हें बचपने की किसी बचकानी हरकत के कारण आपने ही जीवन से दूर कर दिया है।

कहानी में एक पात्र ब्योमकेश बक्षी का जिक्र करता है जिसे पढ़कर मुझे तो बढा मज़ा आया। ब्योमकेश बक्षी मेरे पसंदीदा धारावाहिकों में से एक है और आज भी गाहे बगाहे मैं उसके एपिसोड देख लेता हूँ।

कहानी में एक वाक्य है जिससे मैं सहमत नहीं था।

ईश्वर ने लड़की की संरचना इसी तरह बनाई है, कि उसे प्रेम से प्रेम हो जाता है। वे चुनाव नहीं करती हैं। यह वाक्य थोड़ा सा जनरलाइज किया हुआ लगता है। 

अगर स्वप्निल इतना खूबसूरत न होता तो शायद जिस किरदार के विषय में यह लिखा गया है वह उसे भाव ही न देती। उसे शोहदा या गुंडा और बोलती। लड़कियाँ चुनाव करती हैं लेकिन उनके चुनाव के मापदंड अलग होते हैं। केवल प्रेम से प्रेम होने की बात मेरे अनुभव और जितना मैंने देखा है उस अनुभव में न लड़कियों के लिए सच हैं और न लड़कों के लिए। हाँ, आकर्षण जरूर हो सकता है इसमें कोई दो राय नहीं है।

कहानी के कुछ वाक्य जो मुझे पसंद आये:
लड़के जब तक छोटे होते हैं, तभी तक उम्र का लिहा़ज करते हैं; बड़े होते ही उम्र के छोटे-मोटे फ़ासले पार कर दोस्त बन जाते हैं।

लेकिन वा़कई में उसने सि़र्फ सुना था, समझना वो चाहता नहीं था, क्यूँकि उसके सर पर तो बदला लेने का भूत सवार था, और बदले वाला भूत सुनने और समझने की शक्ति को कच्चा खा जाता है।

एक लड़की हमेशा ही ये समझ जाती है, कि देखने वाला उसे किस ऩजर से देख रहा है; उसे ही देख रहा है या किसी और को।

मीनू तुम कुछ परेशान लग रही हो!’’ स्वाति को चिंता हो रही थी। ‘‘नहीं कुछ ख़ास नहीं, पेट में दर्द हो रहा है।’’ झूठ बोलने में एक्स्पर्ट हो गई थी। इश़्क सब सिखा देता है; झूठ बोलना भी।

मम्मी उसके बालों में तेल लगाते हुए सोच रही है कि शायद कोई भूत था, उतर गया। मगर भूत उतरा नहीं था, चढ़ रहा था... इश़्क का। असल में मम्मियाँ बहुत मासूम होती हैं; इन्हें इश़्क के भूत की ख़बर नहीं होती।

लड़के और लड़की के प्रेम में बहुत अंतर होता है। लड़की प्रेम की ख़ातिर सब सहती है, लेकिन लड़का बस तमाशा देखता है; इसलिये उसे लड़कों और प्रेम से घिन हो गई थी।

जवानी में दोस्ती, काँच सी ना़जुक होती है... ज़रा सी चोट लगते ही दरक जाती है, और इश़्क, सूरज के आग-सा सब तबाह कर देता है।



2. और मैं आगे बढ़ गई 

पहला वाक्य:
एक झटके के साथ ट्रैन अपनी जगह से हिली थी, लेकिन मैं अब भी अपने सामान के साथ अस्त व्यस्त खड़ी थी। 

वनीता और उसका बेटा रेयान ट्रेन से जमशेदपुर से राँची जा रहे थे। वनीता थोड़ी घबराई हुई थी क्योंकि उसे नहीं पता था कि ट्रेन में उसके टू सीटर कम्पार्टमेंट में बैठा व्यक्ति कौन होगा?

लेकिन फिर आदित्य जब उसे कम्पार्टमेंट में आता दिखा तो उसकी एक चिंता तो समाप्त हो गयी। आदित्य वनीता का बचपन का मित्र था जिसे लेकर सबको यकीन था कि वनीता की शादी आदित्य से होगी।

लेकिन वनीता ने आदित्य की जगह जगह निकेतन को चुना था।

निकेतन वनीता की जिंदगी में कब आया? वनीता ने आदित्य के ऊपर निकेतन को क्यों चुना? वनीता और आदित्य के बीच क्या हुआ था?

ऐसे ही कई प्रश्नों के उत्तर पाठक को तब मिलते हैं जब वनीता आदित्य को देखकर पुरानी यादों में खो जाती है।


प्यार और शादी में बहुत फर्क होता है। कई बार किसी के प्रति थोड़े से ही आकर्षण को हम लोग प्यार समझ लेते हैं लेकिन असल में प्यार उस आकर्षण से कई ऊपर की चीज है। वनीता और आदित्य का मामला भी ऐसा ही था। दोनों साथ में बचपन में खेले थे तो अपने बीच के भावनात्मक लगाव को उन्होंने प्यार की संज्ञा दे दी थी। पर फिर कैसे वनीता को जब प्यार का अनुभव होता है और उसे फर्क का पता चलता है तो वह सही चुनाव करती है यही इस कहानी में दिखता है।

कहानी में छोटे से शहर में अक्सर जिस तरह की मानसिकता दिखती है वह भी दर्शाई देता है। लालन की जैसी हालत थी वैसी हालत आज भी कई घरों में है। उन्हें ही देखकर आगे की पीढ़ियाँ बढ़ी होती है और उनके मन में यह अंकित हो जाता है कि यह सही है। जबकि इसमें बदलाव की जरूरत है। जहाँ प्यार होता है उधर डर नहीं सम्मान होता है। हमारे समाज में कईयों को इन दोनों के बीच का फर्क आज भी नहीं मालूम है और मुझे लगता है जब तक मालूम न होगा तब तक कोई सुधार नहीं होगा।

रही आदित्य की बात तो ऐसे कई लोग मैंने देखे जिनके अन्दर वक्त के साथ बदलाव नहीं होता है। जितने बुरे वो थे उतने ही बाद में भी रहते हैं। कई बार इन्हें देखकर दया भी आती है और कई बार गुस्सा भी। फिर इन्हें नज़रन्दाज करना ही बेहतर विकल्प लगता है। हाँ, बस इस बात का सुकून रहता है कि इनके साथ हमे जिंदगी भर नहीं रहना। अगर रहना पड़ता तो जिंदगी नरक बन जाती। इनकी बेवजह की नफरत और बुराई की आग में अच्छी खासी जिंदगी झुलस जाती।

हाँ, इस कहानी में भी एक वाक्य ऐसा लिखा है जिससे मैं तो सहमत नहीं हूँ लेकिन उससे मिलता जुलता वाक्य मेरे मम्मी मुझसे बोलती थी जिससे काफी हद तक मैं सहमत हूँ।

जब भी बच्चों की कम्प्लेन करने के लिए पेरेंट्स को स्कूल बुलाया जाता है, सिर्फ मम्मियाँ ही आती हैं; क्यूँकि बच्चों की ग़लती की ज़िम्मेदार सि़र्फ मम्मी होती हैं, और अच्छाई के ज़िम्मेदार पापा।

जहाँ तक शिकायत की बात है तो अक्सर माँ इसलिए जाती थी क्योंकि पिताजी दफ्तर होते थे। मेरे मामले में पिताजी अगर फ़ौज से आये होते तो वो ही जाते थे। हाँ, ये बात मेरी माँ भी कहती थी कि लड़के अगर बिगड़ जाएँ तो वो माँ के हो जाते हैं और अगर सुधर जाए तो बाप के हो जाते हैं।  इस बात से काफी हद तक सहमत मैं हूँ।

कहानी पठनीय है। पाठक के रूप में मैं जानना चाहता था कि वनीता और आदित्य के बीच क्या हुआ था? यह पठनीयता अंत तक बनी रहती है।

कहानी के कुछ वाक्य जो मुझे पसंद आये:
मैं जवाब नहीं देना चाहती थी, लेकिन कई बार जवाब नहीं देने पर सामने वाले को लगता है, उसने जो किया वो सही किया, और वो और भी प्रोत्साहित होता है।

मम्मी कहती है,"यद्यपि प्रेम में सम्मान अदृश्य रहता है, लेकिन फिर भी उसपे दोनों का बराबर अधिकार होता है।" मैं अपने सम्मान के अधिकार को खोना नहीं चाहती थी, इसलिये इश्क को स्याह डब्बे में बंदकर दरिया में फेंक देना चाहती थी।

किसी अनजान शहर के अलग से माहौल में अपने शहर से किसी का मिल जाना किसी दुआ से कम नहीं।

क्यूँकि स्त्री के लिये सि़र्फ प्रेम का़फी नहीं होता; सम्मान विहीन प्रेम, नमक बिना खाना... फीका फीका।

असल में हमें जब सच में प्यार होता है, तब महसूस होता है, कि आज से पहले जो था, वो मात्र प्रेम का भ्रम था।

3. मुझे तुम्हारे जाने से नफरत है 

पहला वाक्य:
ओम जय जगदीश हरे....स्वामी जय जगदीश हरे....
एक संडे की सुबह, कॉलबेल लगातार बज रही थी। 

जनवरी की उस सर्द सुबह में जब अभिषेक के घर की घंटी बजी तो उसे पता नहीं था कि बाहर कौन आया हुआ है?
वह तो सोच भी नहीं सकता था कि श्वेता उसे अपने घर के बाहर खड़ी मिलेगी। वही श्वेता जो बस जाने के लिए उसकी ज़िंदगी में आती थी।

वह आती थी तो अभिषेक की ज़िंदगी में खुशियाँ लेकर आ जाती थी लेकिन जब जाती थी तो गम के सागर में उसे डुबो देती है। इसीलिए अभिषेक को उसके जाने से नफरत थी।

इस बार वह क्यों आई थी? अभिषेक यह नहीं जानता था। हाँ, वह उसके आने का कारण जरूर मालूम करना चाहता था।

आखिर श्वेता कौन थी? उसका अभिषेक से क्या रिश्ता था?

कई बार ज़िंदगी में हम जिससे प्रेम करते हैं उसके साथ हमारा मिलना नहीं हो पाता है। कई बार यह परिस्थितियों पर  निर्भर करता है और कई दफा अपने अहम के कारण भी हम उनसे मिलने का मौका छोड़ देते हैं। मुझे लगता है इस धरती में शायद ही ऐसा कोई इनसान होगा जिसके ज़िंदगी में ऐसा इनसान न रहा हो जिसे वह खोना तो नहीं चाहता था लेकिन ऊपर दिए दो में से किसी एक कारण के चलते खो दिया।

यह कहानी भी कुछ ऐसी है। इसमें दोनों कारणों की मौजूदगी है। कहानी रोचक है।

जैसे जैसे कहानी बढ़ती है वैसे वैसे अभिषेक और श्वेता के रिश्ते के विषय में पाठक को पता चलता जाता है। उनके मिस कॉल के माध्यम से मिलने वाला हिस्सा मुझे काफी पसंद आया। वहीं श्वेता की शादी हो चुकी है और वह अब अपने पति से अलग हो चुकी है। उसका जो कारण वो बताती है वह मुझे लगता है कई भारतीय लड़कियों की कहानी होगी।  भारतीय समाज में अभी शादी साथ के शायद कम ही होती है। उम्मीद है इस स्थिति में बदलाव आएगा।

कहानी में दी का किरदार भी है जिनके विषय में जानकर मुझे थोड़ा दुःख हुआ। उन्होंने अपना काफी कुछ खोया था। उनकी भी एक प्रेम कहानी थी जिसकी तरफ केवल इशारा इस कहानी में होता है। उम्मीद है लेखिका जी कभी दी की इस प्रेम कहानी को भी हमे बतलायेंगी।

कहानी जिस मोड़ पर खत्म होती है वह भी मुझे पसंद आया।

कहानी के कुछ अंश जो मुझे पसंद आये:
उसमें पास आने का सलीक़ा है हमेशा से। मुझमें तो न दूर रहने का हुनर है, न पास आने का अदब। मेरे कंधे पर उसका सर बहुत भारी लग रहा था। शायद उसके मन पर बहुत बोझ था।

उसका जाना इतना बुरा नहीं लगा था, जितना फिर से आना; क्यूँकि वो हमेशा जाने के लिये ही आती

कहते हैं जिस रिश्ते की शुरूआत मीठे से होती है, उसमें ज़िंदगी भर मिठास बनी रहती है; लेकिन अक्सर ज़्यादा मीठा ही कीड़ा लगने का कारण होता है। मैंने अपनी कलाई पर बँधे फ्रेंडशिप बैंड को तोड़ दिया।

दी ने कहा मैंने तुम्हें श्वेता से दूर रहने कहा था; बहुत दूर हो जाने के लिये नहीं... वो तुम्हारे पास रहना चाहती थी, लेकिन तुमने उसे जाने दिया। ‘‘वो हमेशा जाने के लिये ही आती है।’’ ‘‘कोई जाने के लिये नहीं आता, हम उसे जाने देते हैं; मैंने भी किसी को जाने दिया था; जब वो बहुत चला गया तब एहसास हुआ कि क्या दूर हुआ है।’’ दी ने धीरे से कहा था।

4. लास्ट कॉफ़ी 

पहला वाक्य:
उस दिन पहली बार उसे लिफ्ट में देखा। 

कथावाचिका एक लेखिका हैं जो आजकल अपने उपन्यास के लिए एक किरदार के तलाश में थीं। जो किरदार उन्हें मिला था वो जम नहीं रहा था। उन्हें कुछ अलग चाहिए था।

और फिर जैसे उनकी इच्छा पूरी हुई और उनके जीवन में अडोल्फ़ आया। अडोल्फ जर्मन और भारतीय मूल का युवक था जो कि उनकी इमारत में रहता था। वह अक्सर दार सिटी आ जाया करता था। उसके अंदर न जाने ऐसा क्या था जिसे देखकर कथावाचिका के अंदर की लेखिका आकर्षित हो गयी।

वह क्यों जर्मनी से अक्सर दार सिटी आ जाया करता था?
क्या दार सिटी के समंदर ही इसके पीछे के कारण थे या कुछ ऐसा भी था जो वो अपने अदंर छुपाये बैठा था? 

ऐसे ही कई प्रश्न कथा वाचिका के मन में थे कि अचानक अडोल्फ वापस चला गया।

और कई दिनों बाद जब अडोल्फ कथावाचिका के सामने आया तो वह अपनी कहानी लिख चुकी थी। अब अडोल्फ के प्रति उसकी अंदर की लेखिका का आकर्षण थोड़ा कम हो गया था लेकिन अडोल्फ की कहानी वो जानना चाहती थी। और इसी कारण उसने अडोल्फ को एक आखिरी कॉफ़ी के लिए आमंत्रित किया।

क्या आखिर कथावाचिका को अपने प्रश्नों के उत्तर मिलने वाले थे? 

लास्ट कॉफ़ी इस संग्रह की चौथी कहानी है। जहाँ इससे पहले की सभी कहानियों में कहीं न कहीं प्रेम है वहीं इस कहानी की विषय वस्तु थोड़ा जुदा है। यहाँ एक भावनात्मक रिश्ता है जो कई बार आप किसी अनजान व्यक्ति के प्रति महसूस करते हैं। वह जुड़ाव हमेशा प्रेम नहीं होता है लेकिन उसका महत्व (वैल्यू) प्रेम से कम भी नहीं होता  है।


कहानी में दो और मुख्य विषय हैं। एक बाल यौन शोषण का जिसके विषय में अभी भी ज्यादा लोग बात नहीं करते हैं। जब भी हम यौन शोषण सुनते है तो अक्सर किसी महिला की तस्वीर ही मन में उतपन्न होती है। लेकिन यह भी तथ्य है कि छोटे छोटे लड़के भी इसका शिकार होते हैं। लेखिका ने इस मुद्दे को उठाया है और वह इसके लिए बधाई की पात्र हैं।

कहानी का दूसरा विषय लेखन से जुड़ा है। लेखन से जुड़ा व्यक्ति हमेशा अपने लिए विषय की तलाश में रहता है ।  यह विषय उसे कहीं भी मिल सकता है इसलिए हर मुलाकात, हर बात उसके लिए एक अवसर की तरह होती है। चूँकि इस कहानी को एक लेखिका ही सुना रही हैं तो पाठक को लेखन के इस पहलू के विषय में भी पता लगता है कि कैसे किसी लेखिका या लेखक को कुछ रोचक मिल जाए तो वह उसके विषय में जानने के लिए उत्सुक हो  जाता है। वह अलग बात है कि इस उत्सुकता के चलते वह जितना कुछ जानता है उससे काफी कम ही अपनी रचना में प्रयोग कर पाता है।

कहानी मुझे पसन्द आई।

कहानी के कुछ अंश जो मुझे पसंद आये:
जेहन में ख़याल भी आसमान में बि़खरे बादल की तरह होते हैं; एक ज़रा से हवा के झोंके से उड़ जाते हैं

मैंने उसे अपनी पसंद और नापसंद कभी नहीं बताया; लेकिन जब दो लोग दोस्त बनते हैं, तो एक दूसरे की पसंद, बातों ही बातों में जान लेते हैं;

जिन रिश्तों के नाम नहीं होते, उन्हें दोस्ती का नाम दे दिया जाता है । ज़्यादातर लोग, जिन्हें हम दोस्त कहते हैं, वे दोस्त नहीं होते हैं; कुछ और होते हैं, या कुछ नहीं होते हैं।
इंसान जब दिल की गहराई से बोलता है, तब अपनी मातृभाषा में बोलता है।


आज फिर आवा़ज उसके दिल की गहराई से आ रही थी; और दिल की गहराई से इंसान तभी बोलता है, जब या तो वो बहुत दुखी होता है, या बहुत ख़ुश;


"भटककर कहीं दूर निकल जाओ, तो रूककर पीछे देखना; जो पीछे छूट जाता है न, वही ज़िन्दगी है।" वो फिलोसॉफिकल हो रहा था।

"जो पीछे छूट जाता था, वो यादें होती हैं; और यादों को जिया जा सकता है, यादों में लौटा नहीं जा सकता है।" मैंने उसी के लहजे में जवाब दिया।


5. वी टी स्टेशन पर एक रात 

पहला वाक्य:
नींद से मेरी आँखें दुःख रही थीं, लेकिन मैं सो नहीं पा रही थी; जबकि मेरे इर्द-गिर्द सारे लोग सो रहे थे। 

कथावाचिका अपने पति के साथ शिर्डी से दर्शन करके लौट रही है। शिर्डी से लौटते वक्त वो फैसला करती है कि वो दोनों हवाई जहाज से घर न जाकर रेलगाड़ी के माध्यम से घर जायेंगे।

कथावाचिका का तर्क है कि चूँकि रेलवे स्टेशन एअरपोर्ट की तुलना में घर के ज्यादा नजदीक है तो रेलगाड़ी का सफर हवाई जहाज की तुलना में ज्यादा आराम दायक  होगा।

और फिर कथावाचिका और उसका पति खुद को वीटी स्टेशन में पाते हैं।

आगे क्या होता है यही कहानी की कथावस्तु है।

कहानी पठनीय है। अगर आपको कभी रेलगाड़ी के इन्तजार में स्टेशन में रात बितानी पड़ी रही होगी तो इस कहानी को पढ़ते हुए वह यादें ताज़ा हो जाएँगी। वो टीटी से टिकेट का जुगाड़ करना, वो सार्वजनिक शौचालय की बुरी हालत और फिर वो सिस्टम जिसमें आप अपना जुगाड़ भिड़ाने का प्रयत्न करते हैं। इस सभी चीजों की यादें आपके दिमाग में कौंधने लगती हैं।

मैं तीन साल मुंबई में रहा हूँ लेकिन मेरा घर मुंबई की पश्चिम रेलवे में था। वीटी में जाने का मौका कम ही लगा। केवल एक या दो बार गया होऊंगा लेकिन उधर साफ सफाई मुझे ठीक ठाक मिली थी। साफ़ सफाई से जुड़ा एक तगड़ा अनुभव मुझे झाँसी के स्टेशन में हुआ था। वो एक अलग अनुभव था और मैं नहीं चाहूँगा कि किसी को हो।

कहानी में बीच बीच में आपको एक स्त्री को शादी के बाद कैसे टोका टाकी का जीवन जीना पड़ता है यह देखने को भी मिलता है। यह सब पढ़ते हुए वाकई बुरा लगता है। ऐसा नहीं होना चाहिए।

इसके आलावा कहानी में मैं अपेक्षा कर रहा था कि कुछ रोमांचक भी होगा लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ तो थोड़ी सी निराशा भी हुई। एक आध बार ऐसा मौका लगा था जहाँ कहानी रोमांचक हो सकती थी लेकिन फिर उधर से बचकर कहानी आगे बढ़ जाती है।

कहानी पठनीय तो है लेकिन मुझे इस संग्रह की सबसे कमजोर कहानी लगी।



अगर पूरे कहानी संग्रह की बात करूँ तो  सभी कहानियाँ जीवन के अलग अलग बिन्दुओं को दर्शाती हैं।

प्रेम पत्र में जहाँ प्रेम के कारण तीन दोस्तों के बीच खटास आ जाती है, वहीं और मैं आगे बढ़ गयी में नायिका प्रेम का असली मतलब जान जाती है और यह भी समझ जाती है कि कुछ लोग कभी नहीं बदलते हैं। मुझे तुम्हारे जाने से नफरत है भी एक जटिल प्रेम कहानी है। कई बार केवल प्रेम ही किसी को रोकने में सक्षम नहीं होता है यह भी यह दिखाती है। लास्ट कॉफ़ी यह दर्शाती है कि कई बार एक आम सा लगने वाला रिश्ता कितना गहरा हो जाता है और कई बार आम से लगने वाले व्यक्ति अपने अंदर क्या क्या छुपाये होते हैं।

इनके अलावा कहानी कई जगहों पर पात्रों के माध्यम से भारतीय समाज में स्त्री को जो गाहे बगाहे जो सहना पड़ता है उस पर टिप्पणी करती हैं। यह टिप्पणियाँ आपको सोचने पर विवश करती है। इनकी ख़ास बात यह भी है कि यह टिप्पणियाँ उसी तरह कथानक में बिखरी हैं जिस तरह समाज में यह व्यवहार हैं। इन्हे केंद्र में नहीं रखा गया है और इस कारण कहानी पढ़ते हुए जब आप इनसे रूबरू होते हैं तो ठिठकने के लिए विवश से हो जाते हैं। 

आप कहानी पढ़ते हो और देखते हो कि यह तो हमारे आस पास के लोगों की कहानी है। इसके पात्र आपको अपने जीवन में देखने को आसानी से मिल जायेंगे।

संग्रह में इक्का दुक्का बातें जो मुझे ऐसी लगी कि जो न होती तो शायद संग्रह और बेहतर हो सकता था वो निम्न हैं:

कहानियों में अंग्रेजी भाषा के शब्द इस्तेमाल किये हैं, जिससे मुझे कोई दिक्कत नहीं है लेकिन कई जगह उन शब्दों को देवनागरी में लिखा है और कई जगह उन्हें रोमन में लिखा है। कौन से शब्दों को रोमन में लिखना है और किन्हें देवनागरी में यह कैसे तय किया गया इसका मुझे पता नहीं चला। अगर सभी को एक ही लिपि में लिखा जाता तो शायद बेहतर होता। अभी कभी देवनागरी और कभी रोमन में उन्हें पढ़ना थोड़ा अटपटा लगता है।

संग्रह जब मैंने पहली बार पढ़ा था तो मुझे लगा था कि कुछ कहानियों को अनावश्यक रूप से विस्तार दिया है। विशेषकर प्रेम पत्र, और मैं आगे बढ़ गयी और मुझे तुम्हारे जाने से नफरत के साथ यह मुझे ज्यादा लगा था। प्रतंतु जब दूसरी बार इन कहानियों को पढ़ा तो यह शिकायत मुझे नहीं हुई। अब सोच रहा हूँ ऐसा क्यों हुआ है? क्या ऐसा है पहली बार जब मैं यह कहानी पढ़ रहा था तो मैं अजनबियों की दास्तान पढ़ रहा था और सोच रहा था कि जल्दी खत्म करो यार लेकिन जब दूसरी बार मैं इन कहानियों में गया तो शायद तब तक इन किरदारों से रिश्ता सा बन गया था। अब मैं आराम से इनकी कहानी, इनकी परेशानी, इनकी खुशियों के विषय में सुनना चाहता था। मुझे नहीं पता क्या कारण था लेकिन कुछ बदलाव तो हुआ था।

संग्रह मुझे पसंद आया। एक बार आप भी पढ़िये। शायद आपको भी पसंद आ जाए।

मेरी रेटिंग: 3.5/5


अगर आपने इस कहानी संग्रह को पढ़ा है तो आपको यह कैसा लगा? अपने  विचारों से मुझे जरूर अवगत करवाइएगा। अगर आप इस कहानी संग्रह को पढ़ना चाहते हैं तो इसे निम्न लिंक्स पर जाकर खरीदा जा सकता है:


© विकास नैनवाल 'अंजान'

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