एक बुक जर्नल: उमराव जान 'अदा' - मिर्ज़ा हादी 'रुस्वा'

Friday, May 24, 2019

उमराव जान 'अदा' - मिर्ज़ा हादी 'रुस्वा'

उपन्यास मई 9,2019  से मई 11,2019 के बीच पढ़ा गया

संस्करण विवरण:
फॉर्मेट : पेपरबैक
पृष्ठ संख्या: 96
प्रकाशन: राजकमल प्रकाशन
आईएसबीएन:9788126711413
मूल्य: 60 (एम आर पी)
मूल भाषा - उर्दू

उमराव जान 'अदा' - मिर्ज़ा हादी 'रुस्वा'
उमराव जान 'अदा' - मिर्ज़ा हादी 'रुस्वा' 

पहला वाक्य:
बाप-दादा का नाम लेकर अपना बड़प्पन जताने से क्या फायदा!

मुंशी अहमद हुसैन साहब दिल्ली से घूमने फिरने के लिए लखनऊ आये तो एक जगह कमरा किराए पर लेकर रहने लगे। वहाँ महफिलें जमने लगी। फिर कुछ ऐसा हुआ कि इन महफ़िलों में उमराव जान 'अदा' भी शामिल होने लगीं।

उमराव जान अदा कभी अपने जमाने की मशहूर तवायफ हुआ करती थी जो अब लखनऊ में एक कमरे में आराम से अपनी ज़िन्दगी गुजर बसर कर रही थी। उन्होंने बहुत रोचक ज़िन्दगी जी थी और यही कारण था कि अहमद हुसैन और मिर्जा रुस्वा उनसे उनकी कहानी को सुनने की इल्तेजा करते रहते थे।

उमराव जान ने कहानी सुनाई तो मिर्जा ने उसे लिख लिया। और अब  वही कहानी उमराव जान अदा की सहमति से पाठकों के सामने प्रस्तुत है।

तो कौन थी उमराव जान अदा? कैसे वो इस पेशे से जुड़ीं? और उन्हें इस ज़िन्दगी को जीते हुए कैसे कैसे अनुभव हुए?

यह सब आपको इस उपन्यास को पढ़कर पता चलेगा।


मुख्य किरदार:
अमीरन उर्फ़ उमराव जान अदा - एक तवायफ
मिर्ज़ा हादी रुस्वा - एक शायर जो उमराव जान को जानते थे
मुंशी अहमद हुसैन - मिर्ज़ा रुस्वा के दोस्त
दिलावर खां - अमीरन का पड़ोसी
पीरबख्श - दिलावर का साथी
करीम - पीरबख्श का साला
रामदेई - एक लड़की जिसे करीम बेचने के लिए लाया था
खानम जान - एक पचास वर्षीय स्त्री जिसके घर में तवायफ अपना व्यापार करती थीं
बिस्मिल्ला जान - खानम जान की बेटी
बुआ हुस्सैनी - खानम के घर पर काम करने वाली औरत
मिर्ज़ा गौहर - खानम जान के घर में रहने वाला एक लड़का
अमीर जान-  खानम जान के घर में रहने वाली तवायफ
खुर्शीद - खानम जान के घर में रहने वाली तवायफ
फैज़ अली - उमराव जान का एक चाहने वाला जिसे उमराव जान भी चाहती थी

उमराव जान 'अदा' जैसे की नाम से जाहिर है उमराव जान जी कहानी है। मिर्जा हादी रुस्वा के अनुसार यह उस वक्त की एक मशहूर तवायफ की असल जीवनी है।

उपन्यास की कहानी हम लोग उमराव जान के दृष्टिकोण से ही पढ़ते हैं। प्रथम पुरुष में लिखी गई यह रचना एक आत्मकथात्मक उपन्यास है। उपन्यास की कहानी अमीरन के अगुवा होने से शुरू होकर उनके उमराव जान बनने और फिर उनके इस पेशे को छोड़कर एक शांत ज़िन्दगी बसर करने तक चलती है। इस दौरान उनके क्या अनुभव रहे यह हमे उमराव जान के नजरिये से देखने को मिलता है।

उस वक्त की संस्कृति कैसी थी? तवायफ क्या काम करती थीं? उनके काम करने का तरीका क्या था? यह सब उपन्यास के माध्यम से पता चलता है। उपन्यास शुरू से लेकर आखिर तक पठनीय है।

उपन्यास पढ़ते हुए यह पता चलता है कि यह तवायफे मूल रूप से एक तरह की कलाकार होती थीं। किसी के पास हुस्न होता था तो किसी के पास नाच, किसी के पास गाने की कला होती थी तो कोई इन तीनों में ही निपुण होता था। उपन्यास पढ़ते हुए हम पाते हैं कि उमराव जान जहाँ खूबसूरती में अपने साथ ही लड़कियों से ज्यादा नहीं थी लेकिन वो शेरो शायरी और गायकी अच्छा करती थी और इनके इसी फन ने उनका नाम भी मशहूर किया था। यह पढ़ते हुए मुझे जापानी गीशाओं की याद आ रही थी। उमराव जान अदा में मौजूद तवायफ  की ज़िन्दगी एक गीशा से काफी मिलती जुलती थी। गीशाओं को भी अलग अलग कलाओं की तालीम दी जाती है। वह भी इन्हीं तवायफों की ज्यादातर एक ही मर्द की नौकर होती थीं। काफी साल पहले मेमॉयर्स ऑफ़ गीशा नाम का उपन्यास पढ़ा था। इसे पढ़ते हुए बरबस ही वह याद आ गया।


उपन्यास में एक दो जगह रोमांचक प्रसंग भी हैं। विशेषकर उपन्यास में एक प्रंसग है जब उमराव जान इश्क में गिरफ्तार होकर खानम जान के घर से भाग जाती हैं। उसके बाद उसके अनुभव काफीबने हुए हैं। फैज़ अली का किरदार बहुत ही रहस्यमयी है। मुझे उसके जीवन को जानने की इच्छा थी। वो कौन था? जिस धंधे में था उसमें कैसे आया? और उसके जीवन के कुछ रोमांचक अनुभव क्या था? मैं यह सब जानना चाहता था। एक पूरा उपन्यास अगर उसके जीवन पर लिखा जाये तो मैं वह पढ़ सकता हूँ।

खानम जान के घर में रहने वाली दूसरी तवायफों के इश्क के विषय में भी उपन्यास में पता चलता है। ये प्रसंग भी रोचक हैं। इश्क को लेकर उनके विचार भी पता चलते हैं। उनकी ज़िन्दगी में एक न एक आदमी ऐसा जरूर होता था जिसे वो अपने पास रखा करती थीं। उसका खर्चा उठाया करती थीं। इस विषय में उपन्यास में यह लिखा है:

अमीर जान काजिम अली पर मरती थी। बरसों अपने पास से रुपया दिया। बिस्मिल्ला का कोई आशना न था। उसकी तबीयत में सुफलापना था, पाबन्द नहीं हो सकती थी। खुद खानम साहब पचास पचपन बरस के सिन में मीर औलाद अली पर जान देती थी। मीर साहब का सिन अट्ठारह-उन्नीस बरस का था, खूबसूरत,कसरती जवान थे, अच्छे अच्छों की निगाह पड़ती थी, लेकिन खानम साहब का रोब ऐसा था कि क्या मजाल कोई उससे बात ले! बेचारे गरीब आदमी थे। खानम की बदौलत सारा कुनबा पलता था। खानम ने डेढ़ हजार रुपया लगाके उनकी शादी कर दी थी, लेकिन सिवा शादी के रात के मीर साहब को कभी रात घर पर गुजारना नसीब न हुआ। दिन-रात खानम के यहाँ रहते थे, घड़ी-दो घड़ी को घर हो आते थे।

पितृस्त्ताम्क समाज में ऐसा पॉवर डायनामिक्स देखना रोचक है। कहने को तो ये सभी औरतें तबायफ हैं लेकिन अपने इलाके में इनका पॉवर स्ट्रक्चर आम समाज से उलट है।

जब हम सेक्स वर्कर्स के विषय में सुनते हैं तो उनकी ज़िन्दगी के किस्से दिल को थर्रा देते हैं। ऐसे में इस विवरण को पढकर सोच रहा हूँ कि इस तरह के पॉकेट्स अभी भी मौजूद होंगे। जहाँ वो ऐसी ताकत रखती हों?

इन सबके अलावा उपन्यास में 1857 का भी जिक्र है। इस विद्रोह का इनकी जिंदगी में क्या असर पड़ा यह हल्का सा दिखता है। मैं इसका विस्तृत वर्णन सुनना चाहता था।

उपन्यास जब खत्म होता है तो एक बार को लगता है जैसे हमने केवल सरसरी निगाहों से एक ज़िन्दगी को गुजरते हुए देख लिया हो। कई प्रसंगों को पढ़ते हुए मैं चाहता था कि इन्हें और विस्तार दिया होता तो शायद बढ़िया होता। उपन्यास पढ़ते हुए जो यह भावना मन में आती है मुझे लगता है यही उपन्यास की थोड़ी सी कमी है। ऐसा लगा इसे बहुत जल्दी निपटा दिया गया।

बहरहाल उपन्यास मुझे काफी पसंद आया। अगर उस वक्त की तवायफों की ज़िन्दगी के विषय में आप पढ़ना चाहते हैं तो उपन्यास आपको निराश नहीं करेगा।

रेटिंग : 3.5/5

अगर आपने इसे पढ़ा है तो आपको यह कैसा लगा? अपने विचारों से मुझे जरूर अवगत करवाईयेगा। अगर आपने इसे नहीं पढ़ा है और पढ़ना चाहते हैं तो इसे निम्न लिंक पर जाकर मँगवा सकते हैं:
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© विकास नैनवाल 'अंजान' 

2 comments:

  1. बहुत सुन्दर समीक्षा...। यह उपन्यास भी पढ़ा है और इस पर बनी दो फिल्में भी देखी है ।उपन्यास के अन्य स्त्री किरदार पावरफुल हैं लेकिन उमराव का किरदार मेरे नजरिए में पावरफुल न होकर हालात का मारा है जो उपन्यास की समाप्ति के साथ ही आपके मन में एक कसक छोड़ता है । मेरे ख्याल से फैज़ अली का किरदार और 1857 के विद्रोह का कथानक में समावेश कथानक और मूल पात्र के चरित्र को उभारने के साथ गति देने का काम के लिए है ।

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    1. जी आभार। मैंने दोनों ही फिल्म अभी तक नहीं देखी हैं। लेकिन अब फिल्म देखने का भी विचार है।
      मुझे लगता है बिस्मिल्ला जान को छोड़कर कोई भी लड़की उधर अपनी मर्जी से नहीं थी। सभी लायी ही गयीं थीं। खुर्शीद ने तो किसी के प्रेम में पढ़कर सब कुछ त्याग ही दिया था। हम चूँकि उमराव जान की नजर से चीजें देखते हैं तो उसी का पक्ष देखने को मिलता है। उसी की पीड़ा अधिक देखने को मिलती है।

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