एक बुक जर्नल: पत्थर अलपत्थर - उपेन्द्रनाथ अश्क

Wednesday, January 9, 2019

पत्थर अलपत्थर - उपेन्द्रनाथ अश्क

किताब जनवरी 1,2019 से जनवरी 5,2019 के बीच पढ़ी गई

संस्करण विवरण:
फॉर्मेट: पेपरबैक
पृष्ठ संख्या: 116
प्रकाशक: हार्पर हिन्दी
आईएसबीएन: 9789350291184

पत्थर अलपत्थर - उपेन्द्रनाथ अश्क
पत्थर अलपत्थर - उपेन्द्रनाथ अश्क 

पहला वाक्य:
मुर्ग ने दूसरी बार अज़ान दी थी, जब नूर के तड़के हसनदीन की आँख खुल गई।

हसनदीन एक कश्मीरी साईस है। सैलानियों को घोड़ो की सवारी कराकर वह अपने और अपने परिवार का भरण पोषण करता है। पिछले दो दिनों से उसे कोई सवारी नहीं मिली थी तो उसकी कोई कमाई भी नहीं हुई है। यही बात उसकी परेशानी का सबब बन चुका है। उसकी एक ही दुआ है कि उसे ऐसी सवारी मिले जो कि गुलमर्ग ही नहीं अपितु खिलनमर्ग और दोनाले तक जाये।


क्या उसकी यह दुआ कबूल होगी? क्या उसे एक अच्छा सवारी मिलेगा? उसे इसके लिए क्या क्या करना पड़ेगा?


मुख्य किरदार:
हसनदीन - एक साईस
यासमन - हसनदीन की बीवी
ईदू - हसनदीन का बेटा
ममदू  - हसनदीन के दूर के रिश्ते का चचेरा भाई जो कि उसके यहाँ घोड़ों की देखभाल करता था
हरनाम सिंह - टंगमर्ग के अड्डे पर मौजूद रहने वाला सिपाही
रैना, करीम खाँ - वो सिपाही जिनकी ड्यूटी हरनाम सिंह के अलावा इधर लगा करती थी
खन्ना साहब - एक सैलानी
कुक्कू -खन्ना साहब का बच्चा
ज्ञानचन्द्र उप्पल - एक प्रोफेसर जो अपनी भतीजी के साथ घूमने आये थे
उषा - ज्ञान चन्द्र उप्पल की भतीजी
जीवानन्द - एक भारतीय मूल का अफ़्रीकी युवक जो कि घूमते हुए उप्पल परिवार से टकरा गया था और अब उनके साथ घूम रहा था

पत्थर अलपत्थर भले ही एक लघु उपन्यास हो लेकिन एक पहाड़ की ज़िन्दगी का दर्द को पूरी तरह से दर्शाने में यह कामयाब रहा है। चूँकि मैं खुद पहाड़ से आता हूँ तो उधर की गरीबी से वाकिफ हूँ। वहाँ संसाधनों की कमी के कारण परिवार को पालना हद से ज्यादा मुश्किल हो ही जाता है। गरीबी है इसलिए शिक्षा नहीं है, शिक्षा मिलती भी है तो केवल इतनी कि या तो बन्दा फ़ौज में चला जाये या कुछ काम करने लायक हो। हाँ, जहाँ पर्यटन चलता है तो युवा पर्यटन में अपनी जीविका तलाश करने लगते हैं। अगर वह भी उनसे छीन लिया जाए तो उनके हाथ आखिर में क्या बचेगा? कुछ भी नही।

ऐसी ही मार हसनदीन झेल रहा है। जब यह उपन्यास लिखा गया होगा उस वक्त गुलमर्ग में पर्यटक आना शायद शुरू ही हुए होंगे। उससे पहले असामाजिक गतिविधियों के कारण ये कम हो गये होंगे। यह बदलाव इधर दिखता है। पर्यटकों के न आने से जिस पीड़ा से हसनदीन गुजरता है उसका चित्रण लेखक ने बखूबी किया है। हसनदीन की बेबसी का अंदाजा इसी प्रसंग से लग जाता है कि चलते चलते जब वो ख्वाब में ढेरो पैसे पाने की बात सोचता है तो हर बार आखिर में वो पैसे उसे हासिल नहीं होते हैं। वो दो तीन तरह से इस ख्वाब को देखता है लेकिन हर बार पुलिस की बेड़ियों में खुद को जकड़ा पाता है।

उपन्यास की कथावस्तु हसनदीन के सवारी पाने और उन्हें घुमाने के इर्द गिर्द है। भले ही एक ही सवारी का किस्सा हमे लेखक सुना रहे हैं लेकिन उसके माध्यम से हसनदीन की रोज की ज़िन्दगी का पता चल ही जाता है।

दो दिन के बाद एक सवारी हसनदीन को मिलती है। वो उन्हें गुलमर्ग,खिलन मर्ग और भी दूसरी जगह ले जाने के लिए कैसे पटाता है और यात्रा एक दौरान उसके साथ क्या क्या होता है? उसकी क्या इच्छाएं हैं,अपेक्षाएं हैं, यह सब इसी यात्रा से उजागर होता है। अपने दुखों को छुपाकर भी हँसी का मुखोटा ओड़कर वो लोग कैसे पर्यटकों का मन बहलाने का काम करते है यह देखकर मन पसीज जाता है।

उपन्यास का अंत मन को झकझोर कर रख देता है। आदमी की लालच की पराकाष्टा देखने को मिलती है। जहाँ  वह गिद्ध से भी बद्दतर हालत में है। गिद्ध कम से कम जीव के मरने का तो इन्तजार करता है। पुलिस के रूप में मौजूद गिद्ध तो मरते हुए आदमियों का  माँस नोचने को तत्पर रहते हैं।

किरदारों के बात करूँ तो किरदार जीवंत हैं। सैलानियों के तौर पर खन्ना जी जैसे कई सैलानियों से मैं वाकिफ हूँ जो बातें तो बढ़ी बढ़ी करते हैं लेकिन मन उनके छोटे होते हैं। वहीं पुलिस वालों की दादागिरी से तो कौन वाकिफ नहीं होगा? गरीबों पर अक्सर उनकी दादागिरी शहर में भी ऐसे ही चलती है। हाँ, कुक्कू का किरदार मुझे काफी पसंद आया। उसका भोलापन मन मोह लेता है। वो मम्मी को मम्मो और पापा को पापो कहता है। जब भी वह इन शब्दों का प्रयोग करता है बरबस ही मुस्कान चेहरे पर आ जाती है।  चूँकि कुक्कू खन्ना जी का बेटा है तो दोनों के किरदारों के बीच का फर्क एक दम से चित्रित होता है। कुक्कू की मासूमियत और खन्ना जी का काईयापन देखने के बाद मैं यही सोच रहा था कि कब तक कुक्कू की मासूमियत बरकरार रहेगी। शायद कुछ ही दिनों में वह भी अपने माँ बाप की तरह हो जायेगा और ये सोचकर भी मुझे हल्का सा दुःख हुआ था।

आखिर में यही कहूँगा कि पत्थर अलपत्थर एक पठनीय उपन्यास है। यह कश्मीर या किसी भी पहाड़ी स्थानों पर मौजूद साईसों, डोली वालों, कुलियों इत्यादि जैसे लोगों की ज़िन्दगी का मार्मिक चित्रण यह लघु उपन्यास करता है। वो किन किन परेशानियों से गुजरते हैं। कैसे एक एक पैसे के लिए उन्हें चिरोरी करनी पड़ती है? और कैसे कई बार पर्यटक अपने पैसे तो देखते हैं लेकिन न उन्हें इन लोगों की मेहनत दिखती है और न खुद अपने द्वारा किया इनके प्रति किया जा रहा  अमानवीय व्यवहार उन्हें दिखता है। अंत  मन को झकझोर सा देता  है और शोषण करने वालों के प्रति गुस्सा फूटने लगता है।

मुझे लगता है आपको इस किताब को अवश्य पढ़ना चाहिए। फिर आप शायद कहीं घूमने जाएँ तो उधर मौजूद लोगों को कुछ अलग तरीके से देखें।

मेरी रेटिंग: 5/5

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4 comments:

  1. बेहतरीन समीक्षा विकास जी । आपकी रेटिंग और समीक्षा किताब पढ़ने की रूचि बढ़ा रही है ।

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    1. आभार मैम। किताब वाकई दिल को छू लेती है। अंत झकझोर सा देता है।

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  2. बहुत बढिया रिव्यू लिखा है पूरी कहानी पढना चाहूंगा ाअब

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    1. जी पढ़कर अपने विचारों से जरूर अवगत करवाईयेगा।

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