Thursday, January 18, 2018

तट की खोज - हरिशंकर परसाई

रेटिंग : 3.5/5
लघु उपन्यास जनवरी 13,2018 से जनवरी 14,2018 के बीच पढ़ा गया

संस्करण विवरण:
फॉर्मेट : पेपरबैक
पृष्ठ संख्या : 108
प्रकाशक : वाणी प्रकाशन
आईएसबीएन : 978-9350000571



पहला वाक्य :
बच्चों की पुरानी स्कूल की किताबें, जब किसी काम की नहीं रह जातीं , तब पिता उन्हें अल्मारी में बंद कर, 'होम लाइब्रेरी' कहकर संतोष कर लेता है।


'तट की खोज' शीला की कहानी है। शीला एक बाईस तेईस वर्षीय युवती है जो कहने को तो बीए में पढ़ रही है लेकिन असल में शादी होने का इन्तजार कर रही है। वो ऐसे समाज से आती है जहाँ लड़की एक ऐसी किश्ती की तरह है जो पैदा होते ही किसी तट की खोज में निकल पड़ती है। और वो तट आखिरकार उसका ससुराल बनता है। जब उसकी शादी हो जाती है तो ही उसके जीवन को पूर्ण माना जाता है।

लेकिन शादी करना हँसी खेल नहीं है। शादी होना लड़की के सभी गुणों से सम्पन्न होने के इलावा उसके पिता की आर्थिक स्थिति पर भी निर्भर करता है। शीला यहीं मात खा जाती है। आखिर इस सामजिक संरचना से शीला कैसे जूझती है। क्या उसकी शादी हो पाती है? और जीवन में उसे कौन से उतार चढ़ाव देखने  पड़ते हैं? इन्हीं सब का उत्तर लेखक ने इस लघु-उपन्यास में दिया है।




मुख्य किरदार:
शीला - नायिका
महेन्द्रनाथ - शीला का पड़ोसी जो शीला से प्यार करता था और इस विषय में उसने चिट्ठी भी लिखी थी
विमला - शीला की सहेली
मनोहर - विमला का बड़ा भाई


हरिशंकर परसाई जी का व्यंग संग्रह निट्ठले की डायरी जब मैंने पढ़ा था तो ही फैसला कर लिया था कि उनका लिखा सब कुछ पढ़ना है। इसके बाद उनका एक और व्यंग संग्रह पढ़ा और कुछ और संग्रह खरीदे। लेकिन इन सबको पढ़ने के बाद भी मन में कहीं एक इच्छा थी कि उनकी किसी लम्बी रचना को इस पढ़ा जाये। फिर लघु उपन्यास को अमेज़न की ऑनलाइन दुकान में विचरण करते हुए पाया और इसे खरीदकर पढने का निश्चय कर लिया। तट की खोज के विषय में लिखते हुए परसाई जी कहते हैं कि ये उनकी उस वक्त की रचना है जब उनके अंदर भावुकता ज्यादा थी। और यही भावुकता इस कृति में भी झलकती है। वो ये भी कहते हैं कि इसको लिखने के बाद वो पछताए भी थे और जब वाणी ने इसे छापने का निर्णय लिया तो भी पछता रहे हैं। वो चाहे कुछ भी कहे लेकिन मेरा मानना है कि आदमी के अंदर भावुकता का होना कोई अवगुण नहीं है। भावुक आदमी ही व्यंग लिख सकता है। अगर व्यक्ति के  आस पास होने वाली घटनायें उसके मन में असर डालकर उसके अंदर भावना नहीं पैदा करेंगी तो व्यंग भी उतनी चोट नहीं करेगा। खैर, ये तो नजरिये की बात है और इसलिए शायद परसाई जी इसे लिखकर पछता रहे थे।

खैर, लघु उपन्यास पे आते हैं तो लेखक इसके विषय में भूमिका में ही बता देते हैं कि इस उपन्यास को उन्होंने अपने कवि मित्र द्वारा बताये गये एक लड़की से जुडी घटना के आधार पर लिखा था। यानी लघु उपन्यास का घटनाक्रम सत्य घटना पर आधारित है। लघु उपन्यास के दो हिस्से हैं। पहले हिस्से में शीला अपनी बात रख रही है और दूसरे हिस्से में मनोहर अपनी बात रख रहा है। जहाँ शीला अपनी बात खुद बता रही है वहीं मनोहर की बात शीला द्वारा उसके लिए लिखी एक चिट्ठी के प्रतिक्रिया स्वरुप है। वो बातें क्या हैं और चिट्ठी क्या है ये तो आप खैर, लघु उपन्यास पढेंगे तो जान ही जायेंगे।

लघु उपन्यास की नायिका शीला है। उसकी शादी नहीं हो रही है और इसके पीछे खाली एक कारण है और वो है शीला के पिता का आर्थिक रूप से कमजोर होना। बेटी के सर्वगुण सम्पन्न होने के पश्चात भी वो उसके लिए योग्य वर तलाश करने में नाकाम हो रहे हैं और उनकी परेशानी शीला से बर्दाश्त नहीं हो रही है। इसी दौरान उसे प्रेम भी होता है लेकिन प्रेम करना जहाँ आसान है उसका निर्वाह करना उतना ही मुश्किल। ये दुखदाय अनुभव भी शीला को होता है। ऐसे ही दुखदाय अनुभवों से गुजरते हुए वो लघु उपन्यास के आखिर में आकर मोहल्ला छोड़ कर चल देने का निर्णय लेती है। वो ये मानने से इंकार कर देती है कि लड़की की जीवन रूपी कश्ती के लिए ससुराल ही एक तट है। वो अपने लिए एक तट की खोज में निकल पड़ती है।

दहेज हमारे समाज में फैली ऐसी बिमारी है जो न जाने कितने घरों को लील गई है। उसके कारण जब एक बाप अपनी बेटी की शादी नहीं कर पाता तो किस तरह के मानिसिक उत्पीड़न से उसे गुजरना होता है वो इस कृति में बेहद मार्मिक तरीके से दर्शाया गया है। ऐसे पिता हम अपने चारों और आजकल के जमाने में भी देख सकते हैं।

उपन्यास की नायिका शीला का किरदार मुझे बेहद पसंद आया। वो एक सशक्त नारी है। वो दुःख सहती है, टूटती भी है लेकिन फिर बिखरने के बाद जुड़ने का प्रयास भी करती है। वो प्रेम में निराश भी होती है लेकिन फिर प्रेम करने से नहीं कतराती है। उसकी सबसे बड़ी खूबी उपन्यास में मुझे ये लगी कि वो समझौता नहीं करना जानती है। वो दया का पात्र नहीं बनना चाहती है जबकि उसके लिए उस वक्त हामी भरना आसान होता। असल ज़िन्दगी में कई लड़किया या लड़के ऐसा ही कर देते हैं। एक तरीके से एक उम्र के बाद सेटल होना भी यही समझौता दर्शाता है। जो अक्सर हम अपने आस पास अपने मित्रो द्वारा करते हुए देखते हैं।

उपन्यास में दो मुख्य पुरुष किरदार हैं। एक महेंद्रनाथ और दूसरा मनोहर। महेंद्रनाथ एक ऐसा किरदार है जो बड़ी बड़ी बातें करना तो जानता है लेकिन जब उसपर अमल करने की नौबत आती है तो अपनी रूढ़ियों की जंजीरों को तोड़ नहीं पाता। उसके हाथी के दाँत दिखाने के और खाने के और है। ऐसे कई लोग मैंने अपने आसपास देखे हैं जो प्रेम कर तो कर लेते हैं लेकिन फिर उसे उसकी मंजिल तक ले जाने की हिम्मत नहीं रखते। वहीं मनोहर इसके उलट है। पूरे उपन्यास में ऐसा कहीं नहीं दीखता कि वो बहुत बड़ी बड़ी बातें करता हो लेकिन जो वो ठान लेता है उसे करने की कूवत भी रखता है। वो सब परेशानियों से झूझने का सामर्थ्य भी रखता है। ऐसे कम ही लोग होते हैं।

उपन्यास में दर्शाए बाकी सभी किरदार और समाज की स्थिति यथार्थ ही है। इधर ऐसे भी लोग हैं जो भले ही खुद कितने अनैतिक हों लेकिन स्त्री के चरित्र पर उँगली उठाने और नैतिकता का झंडाबरदार बनने में सबसे आगे रहते हैं। मनोहर की भाभी जैसे लोग भी होते हैं जो पैसे को ही सब कुछ मानते हैं। उनके अनुसार पैसा है तो व्यक्ति सर्व गुणों से संपन्न है और यदि पैसा नहीं तो व्यक्ति किसी काम का नही है। यानी उपन्यास में कहीं भी कुछ अतिश्योक्ति नहीं लगती है और सारे पात्र जीवंत हैं।

अंत में खाली यही कहूँगा कि उपन्यास मुझे पसंद आया। उपन्यास पठनीय है और कहीं भी कुछ भी कृतिम नहीं लगता है। कई बार मेरे मन में ये ख्याल भी आया था कि ऐसा शायद अब नहीं होता होगा लेकिन फिर अपने आस पास की घटनाओं के विषय में सोचा तो पाया कि अभी भी होता है।हाँ, कई जगह सुधार हुआ है।लेकिन फिर भी एक पिता जिसकी बेटी है उसकी चिंता ये रहती ही है। वो खुद को शीला के पिता की तरह निरीह न महसूस करता हो लेकिन चिंतित वो अवश्य ही रहेगा।

 हाँ, शीला के जीवन में आगे क्या हुआ ये जानने की उत्सुकता उपन्यास खत्म करके हुई थी। वो जिस  खोज में निकली उस खोज का परिणाम क्या हुआ होगा? उम्मीद है सब अच्छा ही रहा होगा। चूँकि लेखक ने इस विषय में कुछ नहीं लिखा तो पाठक के तौर पर हमे अपनी अपनी कहानी बनाने की छूट उन्होंने एक तरह से दे दी है। तो मेरे ख्याल से शीला को जीवन में सफलता मिली होगी और शायद वो खुश होगी। यही उम्मीद मैं कर सकता हूँ।


किसी भी कृति को आप अगर बिना अपेक्षाओं के खुले दिमाग से पढ़ते हैं तो उससे ज्यादा चीजें ले सकते हैं और उसका ज्यादा आनंद उठा सकते हैं। यही इसके साथ भी कीजियेगा तो उम्मीद है जितना मुझे पसन्द आया उतना ये उपन्यास आपको भी पसंद आएगा। व्यंगकार परसाई जी  की तलाश इधर करेंगे तो निराशा होगी और इस कृति में व्यंग तलाश करना मेरी नज़र में मूर्खता ही होगी। ये व्यंग नहीं है। (ऐसा मैंने इसलिए लिखा क्योंकि एक रिव्यु में इस किताब को कम स्टार्स इसी वजह से दिए थे कि ये व्यंग नहीं है।)

अगर आपने इस लघु उपन्यास को पढ़ा है तो आप इसके विषय में क्या सोचते हैं? अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर दीजियेगा। अगर आपने उपन्यास नहीं पढ़ा है और इसे मंगवाना चाहते हैं तो आप इसे निम्न लिंक से मँगवा सकते हैं:
अमेज़न- पेपरबैक
हरिशंकर परसाई जी की और रचनाओं के विषय में मेरे विचार आप निम्न लिंक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं:
हरिशंकर परसाई

4 comments:

  1. बढ़िया समीक्षा।
    यह उपन्यास मैंने नहीं पढ़ी है।मँगवाते हैं इसे भी।

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  2. पहले काफी भावुक लेखन पढ़ा है। शरतचंद्र जी का लेखन ख़ासा प्रभावित करता था प्रेमचंद जी या किसी अन्य लेखक के मुकाबले, ज्यादा पाठक साहब को पढ़ा है तो आपको बताऊँ उनके पहले लिखे नावेल ज्यादा भावुक थे हालिया नॉवेल्स के मुकाबले, किंतु अभी पता नहीं क्यों ऐसा लेखन पसंद नहीं आता शायद वक़्त अब बदल चुका है इसीलिए।

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    1. जी अमित जी ऐसा भी हो सकता है। वक्त के साथ पसंद भी बदल जाती हैं। मैं भी ऐसे उपन्यास खाली स्वाद बदलने के लिए पढ़ता हूँ। एक तरह की चीजें पढ़ते पढ़ते जब मन में बोरियत होने लगती है तो इसका स्वाद चख लेता हूँ।

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