Tuesday, January 3, 2017

ओस की बूँद - राही मासूम रज़ा

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रेटिंग : ४.५/५
उपन्यास 4 सितम्बर 2016 से 6 सितम्बर 2016 के बीच पढ़ा गया
उपन्यास जनवरी, 1 2017 से  जनवरी 2,2017 के बीच पढ़ा गया
संस्करण विवरण:
फॉर्मेट : पेपरबैक
पृष्ठ संख्या : 112
प्रकाशन : राजकमल प्रकाशन
आई एस बी एन : 9788126701988


पहला वाक्य :
डायरी लिखना बड़ी बेवकूफी की बात है ; क्योंकि डायरी में सत्य लिखना पड़ता है, और कभी कभी सत्य लिखना नहीं होता।  

गाजीपुर एक छोटा सा क़स्बा है। यहाँ सदियों से हिन्दू और मुसलमान एक साथ रहते आए हैं। यही दीनदयाल और वजीर हसन रहते हैं। जो बचपन के दोस्त हैं। लेकिन अब वक्त बदल रहा है। अब मुस्लिम लीग और महासभा का जमाना है। अब लोग हिन्दू और मुसलमान हैं। आजादी आने वाली है और मुस्लिम लीग की एक अलग मुल्क की माँग बढ़ रही है। सब सियासी बातें है लेकिन इन बातों का गाजीपुर और उसमे रह रहे लोगों पे क्या असर पड़ेगा?और अगर ये अलग मुल्क की बात मान ली जाती है तो गाजीपुर पे इसका क्या असर पड़ेगा। यह उपन्यास आपको इसी चीज़ से रूबरू कराता है।


राही मासूम रज़ा का लिखा हुए इस उपन्यास को मैंने कल दूसरी बार पढना खत्म किया। वैसे तो यह उपन्यास ११२ पृष्ठों में सीमित है लेकिन इसकी पहुँच बहुत बड़ी है। उपन्यास लेखक ने अपनी जन्मभूमि को केंद्र में रखकर लिखा है। वो ये बात साफ़ कर देते है कि गाजीपुर में आखिरी बार बलवा सन बत्तीस में हुआ था।  लेकिन ये बात भी सच भारत के अन्य भागों में हुए बलवे की कारण उससे जुदा नहीं है जो इधर दर्शाए गये हैं। चूँकि उपन्यास की पृष्ठभूमि लेखक ने अपनी जन्मभूमि को बनाया तो इसमें एक आत्मकथात्मक गुण भी है।
 उपन्यास में दो चीजें मुख्यतः देखने को मिलती हैं।

एक तो पाकिस्तान के बँटवारे से लोगों के ऊपर क्या असर हुआ। एक ही परिवार के कुछ लोग इधर रह गये और कुछ लोग उधर चले गये। उसका परिवार पे असर पड़ा। बीवियों के शौहर उधर चले गये, माओं के बेटे उधर चले गये। वो इन हालातों से कैसे निपटी?

दूसरा धर्म की राजनीति जो आज़ादी से पहले शुरू हुई थी उसका गाजीपुर के रहने वालों पे क्या असर पड़ा? गाजीपुर में रहने वाले विभिन्न किरदारों जैसे हयातुल्लाह अंसारी, वजीर हसन, दीनदयाल, राम अवतार और उनके परिवारों के लोगों के माध्यम से लेखक ने इन चोटों को दिखाने का प्रयत्न किया है और वो उसमे सफल भी होते हैं। हम किरदारों की  राजनीति से परिचित होते हैं, उनकी सोच से परिचित होते हैं और वो राजनीति और वो सोच समाज पर क्या असर डालती है इसे देखते हैं।

उपन्यास में दो पीढ़ियों हैं। एक पीढ़ी वो जो धर्म के नाम की राजनीति आने से पहले की है और एक पीढी वो जो इसके आने के बाद बनी है। एक ही परिवार के इन पीढ़ियों के बीच की सोच में कितना अंतर है ये आपको निम्न अंश से  से पता चल सकेगा:

वजीर हसन मुस्कुरा दिए और  बोले,"मियाँ, तुम नहीं समझोगे ये बातें। वह दीनदयाल जो अब बाबू दीन दयाल हो गया है ना, और जो मुसलमानों को हर वक्त गाली दिया करता है ना, मेरा लंगोटिया यार है। हम दोनों साथ अमरुद चुराने जाया करते थे। हम दोनों ने एक साथ कुंजड़ों की गालियाँ खाई हैं। जो मैं चला जाऊँगा तो उसके बिना मैं वहाँ अधूरा रहूँगा और मेरे बिना वह यहाँ। ऐसी बहुत सी बातें हैं मेरे पास, जो मैं सिर्फ दीनदयाल से कह सकता हूँ और उसके पास भी ऐसी हजारों बातें हैं, जो वह सिर्फ मुझी से कह सकता है। तो उन बातों का क्या होगा? मुस्लिम लीग हो या महासभा, वह दीन दयाल और वजीर हसन से बढ़ी नहीं हैं। लेकिन तुम यह बातें नहीं समझ सकते; क्योंकि हमे हमारे बुजुर्गों से कुछ रवायते मिली थीं। और तुम्हे अपने बुजुर्गों से सिर्फ कुछ सियासी नारे मिले। कसूर तुम्हारा नहीं है। कसूर हमारा है।.... "

उपन्यास का अंत एक बलवे से होता है। यह बलवा क्यों होता है? यह तो आप इस उपन्यास को पढेंगे तो जानेगे।

उपन्यास के सारे किरदार जीवंत हैं और उनकी भाषा उपन्यास की पृष्ठभूमि के अनुरूप ही लिखी गयी है। इसी वजह से इसमें गालियाँ भी है। व्यक्तिगत तौर पर मुझे गालियों से कोई दिककत नहीं होती है। वो हमारे समाज का हिस्सा है और उस समाज का अगर चित्रण करना हो तो हम उन्हें छुपा के रख नही सकते हैं। इसलिए मुझे तो ज्यादा फर्क नहीं पड़ा बल्कि इससे किरदारों ज्यादा रियल ही दिखते हैं। इसके इलावा  भाषा बेहद खूबसूरत है और इसे पढने में मुझे काफी आनन्द आया।

उपन्यास के कुछ अंश :
घर! देखने और सुनने में कैसा फटीचर लगता है ये शब्द! परंतु यह एक शब्द मनुष्य की हज़ारों- हज़ार शताब्दियों का इतिहास है। तो मनुष्य अपने इतिहास से भागकर कहाँ जाए? यह शब्द दुम की तरह साथ लगा रहेगा।…घर। यह शब्द मुहब्बत, नफ़रत, धर्म और भगवान सबसे बड़ा है।

वह रोने लगती। और मिरासनें ढोल बजा-बजाकर गाने लगतीं:
"कारी कामर वारे से जोड़ी प्रीति मैं।
लोग कहे कारी कामरिवारे, म्हारे लाख करोड़ी।.."
बेचारी मिरासनों को क्या मालूम था कि यह 'कारी कामरि' वाला मुहम्मद नहीं कृष्ण है। अरब का गड़रिया नहीं बल्कि हिंदुस्तान का अहीर है।
पता यह चला कि असल चीज़ मुहम्मद या कृष्ण नहीं है, बल्कि असल चीज़ 'काली कमली' है।

कल राही भाई भी आ गए थे। पता चला कि कोई आबेदा ज़ैदी हैं, जो अब तक भाई साहब की राह देख रही हैं।और एक तो वही शरीफा घोड़ी है। अब तक ठंडी साँसे लेती हैं।राही भाई कह रहे थे कि उनकी ठंडी साँसों की वजह से अलीगढ़ का मौसम बदल गया है।पिछले तीन साल में गर्मी नहीं पड़ी है और खरबूजे की फसल खराब हो रही है और खरबूजेवाले डेपुटेशन लेकर आने वाले हैं भाई साहब..."
दोनों सहेलियाँ खिलखिलाकर हँस पड़ी।

शहला का प्यार बिलकुल पर्दे की बूबू था। वह उसे दुनिया भर के ख़यालों के गूदड़ में छिपाकर रखती थी। बस जब आसपास कोई न होता तो दिमाग के तमाम दरवाज़े और दरीचे खूब जमका के बंद करने के बाद वह गूदड़ी की पोटली निकालती और उसमे से अपने प्यार के टुकड़े अलग करती और अपनी उँगलियों से सहला-सहलाकर उनकी शिकनें दूर करती।
यह अपना देश भी अजीब है कि यहाँ राजनीति विचारों से नहीं पहचानी जाती, बल्कि टोपियों से पहचानी जाती हैं। अधिकतर लोगों के पास तो कोई विचारधारा होती ही नहीं है- केवल टोपियाँ होती हैं। और जिनके पास विचारधारा होती भी है, वे भी टोपियों पर ज्यादा भरोसा करते हैं।

यह पीढी जो मुस्लिम लीग की जवानी में पैदा हुई, बड़ी बेचारी है। नफरत, शक और खौफ़ की जमीन पर इसका अँखुआ फूटा है। माजी अतीत से इसका नाता कट गया है। नाम वहशत अंसारी हो या शिवनारायण, दोनों ही के लिए इतिहास महमूद गजनवी पे रुक जाता है।

मैं तो चाहूँगा की हर कोई इस उपन्यास को पढ़े। धार्मिक सोहार्द, आपसी प्यार, विश्वास  एक ओस की बूँद के समान पवित्र और खूबसूरत हैं। इन्हें हमे धर्म की राजनीति, जो कि नफरत की आग में अपनी रोटी सेकतीं हैं, से बचाना पड़ेगा। हम एक दूसरे को जानेगे तभी इस राजनीति की नियत समझ पायेंगे। अगर एक दुसरे से कटे रहेंगे तो इस प्यारी सी बूँद को वाष्पीकृत  होने से कोई नहीं रोक सकेगा। और अगर ये हुआ तो समाज और संस्कृति को टूटने से कोई नहीं रोक सकता।

अगर आपने इस उपन्यास को पढ़ा है तो आपको ये कैसा लगा जरूर बताइयेगा।  अगर नहीं पढ़ा है तो आप निम्न  लिंक से मँगवा सकते हैं:
अमेज़न

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