वह फिर नहीं आई - भगवतीचरण वर्मा

रेटिंग : 2.5/5
उपन्यास १७ जून २०१६ से १८ जून २०१६ के बीच पढ़ा गया

संस्करण विवरण:
फॉर्मेट : पेपरबैक
पृष्ठ संख्या : 95
प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन



पहला वाक्य :
मैं आपको अपना परिचय नहीं देना चाहता।

ज्ञानचंद एक व्यापारी है जिसका व्यापार के सिलसिले  दिल्ली में आना जाना लगा रहता है। मूलतः कानपुर का रहने वाला ज्ञानचंद जब एक काम के सिलसिले में होटल में ठहरता है तो उसे पता नहीं होता कि उसकी ज़िन्दगी बिलकुल बदल जायेगी। होटल में उसके कमरे के बगल में रानी श्यामला नाम की औरत रहती जिसके साथ उसके घनिष्ट सम्बन्ध बन जाते हैं। वो दोनों एक दूसरे को प्यार करने लगते हैं लेकिन फिर अचानक श्यामला उसे छोड़कर चली जाती है।
कौन थी ये श्यामला? 
ज्ञानचंद का साथ उसने क्यों छोड़ा? 
और इसका ज्ञानचंद के जीवन में क्या असर हुआ?

ऊपर दिए प्रश्नों के उत्तर ही इस कहानी की कथावस्तु बनते हैं।
भगवतीचरण वर्मा जी की यह दूसरी कृति है जिसे मैंने पढ़ा है। इससे पहले मैंने उनका उपन्यास चित्रलेखा पढ़ा था।

वह फिर नहीं आई की शैली की बात करें तो लघु-उपन्यास की घटनायें घट चुकी हैं और पाठक को ज्ञानचंद इन घटनाओं को सुनाता है। इसलिए सारी घटनायें ज्ञानचंद के दृष्टिकोण से दर्शित होती हैं।

कहानी बहुत सीधी है। ज्ञानचंद विवाहित है और एक धनी व्यापरी है। जब वो श्यामला से मिलता है तो उसके ऊपर आकर्षित हो जाता है। ये आकर्षण प्रेम में बदल जाता है। इस दौरान उसकी पत्नी उसे कुछ नहीं कहती है। और न ही उसे (ज्ञानचंद को) कुछ ग्लानि होती है। 

मेरी पत्नी है, निरीह-सी भली और ममता भरी। वह कुरूप नहीं है, लेकिन वह सुंदरी भी नहीं कहला सकती। उसे पता था कि मैं बहक रहा हूँ- केवल बहक रहा हूँ, उससे हट नहीं रहा हूँ। उसने इस सम्बन्ध में मुझसे कुछ कहा भी नहीं- जैसे कहने से बात बनेगी नहीं, बिगड़ेगी ही। उसने मुझे अपने वश में रखने के लिए कोई संघर्ष भी नहीं किया, जैसे मैं तो हमेशा हमेशा के लिए उसका हूँ, उसके वश में हूँ।

वो जब चली जाती है तो ज्ञानचंद दुखी हो जाता है और इसी दुःख में अपनी कहानी सुनाता है। श्यामला ज्ञानचंद को छोड़कर क्यों गई?  इसका कारण काफी जटिल है जिसके विषय में यही अच्छा रहेगा कि आप उपन्यास पढ़े और जाने।
उपन्यास एक ऐसी नारी कि कहानी भी है जिसके जीवन में ऐसी घटनायें होती है कि उसे कई समझोते करने पड़ते हैं।उसे अपने प्रेम के लिए अपने शरीर के साथ साथ अपने मन का सौदा भी करना पड़ता है। उसे धोखा देना पड़ता है। और अंत में इन सबका उस पर क्या असर होता है यह भी रोचक है।

अगर मैं अपनी बात करूँ तो उपन्यास मुझे औसत से थोड़ा ही अच्छा लगा। इसमें केवल एक दृष्टिकोण है और शायद यही इसकी कमी है। अगर उपन्यास की कहानी में श्यामला,जीवनराम और ज्ञानचंद की पत्नी का भी दृष्टिकोण होता तो उपन्यास ज्यादा मजबूत बन सकता था। ज्ञानचन्द की पत्नी उसके इस विवाहत्तोर सम्बन्ध के विषय में क्या सोचती थी?क्यों वो लड़ी नहीं?
वहीं जीवनराम और श्यामला के जीवन में इतनी घटनायें हुईं थीं कि जिन्होंने उनकी सोच को बदल दिया था। उसके कारण उनके अंदर क्या बदलाव आया और कैसे कहानी उस अंत तक पहुँची? अगर ये सब उपन्यास में उनके दृष्टिकोण से होता तो शायद इसका कथानक ज्यादा सुदृढ़ बन सकता था। अभी ये सब बातें हमे ज्ञानचंद  की जुबानी पता चलती हैं। 
उपन्यास आप एक बार पढ़ सकते हैं। कहानी सरल है और उपन्यास पठनीय है। अगर आपने इस उपन्यास को पढ़ा है तो अपनी राय जरूर दीजियेगा। अगर आपने नहीं पढ़ा और आप पढ़ना चाहते हैं तक आप इस पुस्तक तो आप निम्न लिंक से प्राप्त कर सकते हैं:

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