एक बुक जर्नल: गोवा गलाटा - सुरेन्द्र मोहन पाठक

Friday, June 17, 2016

गोवा गलाटा - सुरेन्द्र मोहन पाठक

रेटिंग : ५/५
उपन्यास मई २१, २०१६ से मई २२,२०१६ के बीच पढ़ा गया

संस्करण विवरण:
फॉर्मेट : पेपरबैक
पृष्ठ संख्या : ३२०
प्रकाशक : हार्पर हिंदी
सीरीज : जीत सिंह #८




पहला वाक्य:
कुत्ता भौंका।

गोवा गलाटा कि कहानी कोलाबा कॉन्सपिरेसी कि कहानी के आगे बढ़ती है। जीत सिंह अब दोबारा अपनी ज़िन्दगी जी रहा है। इसी के तहत वो एक नेता बेहराम जी कांट्रेक्टर के यहाँ चोरी करने में शामिल हो जाता है। लेकिन उधर कुछ ऐसा होता है कि जीत सिंह को भागकर गोवा में छुपना पड़ता है। वो पोंडा जाकर रहता है और उसकी तकदीर उसे उधर ऐसी पटखनी देती है कि वो वहाँ के बाहुबली लॉरेंस बर्गेन्ज़ा के सामने अपने को पाता है। वो लॉरेंस ब्रगैंज़ा जिसकी इज़ाज़त के बिना पौंडा में पत्ता भी हिलता, जीत सिंह उससे टकराने को क्यों तैयार हो गया? क्या होगा इस टकराव का अंत? वहीं दूसरी और बेहराम कांट्रेक्टर को भी जीत सिंह चाहिए-ज़िंदा या मुर्दा। तो जीत सिंह अपने आपको उसके चंगुल में फंसने से कैसे बचाएगा?क्या इन दो विकराल दुश्मनों से जीत सिंह लड़ पायेगा। ये तो उपन्यास पढ़ने के बाद ही आपको पता चलेगा।


पाठक साब के साथ मेरा रिश्ता कोलाबा कांस्पीरेसी से शुरू हुआ जो मैंने अप्रैल,२०१४ में पढ़ा था। उसके बाद पाठक साब के काफी उपन्यास पढ़ चुका हूँ लेकिन जीत सिंह सीरीज के साथ जो लगाव है वो जारी है। 'गोवा गलाटा' की कहानी शुरुआत उधर से होती है जहाँ से कोलाबा की खत्म होती है। जीत सिंह अपनी मुसीबतों से उबर चुका है और फिर वो अपनी ज़िन्दगी में रम चुका है।
 उपन्यास के घटनाक्रम 27 मई ,बुधवार से शुरु होते हैं और 9 जून मंगलवार को खत्म होते हैं।यानी तकरीबन दो हफ्ते का ब्यौरा हमे मिलता है। इन दो हफ़्तों में उपन्यास के अन्दर चोरी है, दगा है, रोमांच है,साजिश है,रोमांस है  यानी कि वो सब कुछ है जो उपन्यास को पठनीय पूरा पैसा वसूल बनाता है।
इस समय भी जीत सिंह अपने से बढे और खतरनाक दुश्मनों से पंगा ले लेता है और ये देखने में मज़ा आता है वो अपनी मुसीबतों से कैसे निजात पाता है। 
उपन्यास में एक ट्विस्ट भी है लेकिन मुझे उसके विषय में अंदाजा पहले ही हो गया था। लेकिन उसने भी उपन्यास के मज़े को कम नहीं किया।
अगर किरदारों की बात करें तो जीतसिंह अभी भी खुश नहीं दिखता है और शायद जबतक कोई लड़की उसकी ज़िन्दगी में नहीं आएगी तब तक उसका यही नकतात्मक रवैया जारी रहेगा। उपन्यास में मिश्री का किरदार मुझे पसन्द आया। जीतसिंह का उसके रोमांटिक एंगल बन सकता है और बनना ही चाहिए।
खलनायकों की बात करें तो इसमें दो महत्पूर्ण खलनायक हैं: 
पोंडा में लॉरेंस ब्रागांजा और नेता जी बहरामजी कांट्रेक्टर। दोनों ही खलनायकों के किरदार अच्छे गढ़े गए हैं। दोनों ही बेहद खतरनाक हैं और जीत सिंह की उनके साथ लड़ाई डेविड और गोलिआथ सरीखी है। बहरामजी कांट्रेक्टर के आदमी इकबाल रज़ा ने भी मुझे बहुत प्रभावित किया और उसका जीतसिंह के साथ सामना बहुत रोमांचक था। 
लारा और उसके परिवार विष्णु काम्बले(लारा का जेठ) और हेमंत काम्बले (लारा का पति) के किरदार भी सही गढ़े हुए थे।  उपन्यास में लारा कहती है कि वो अपने पति से प्यार करना छोड़ चुकी थी और अपने जेठ के पार्टनर आशीष पाटिल के ऊपर आकर्षित थी। कहानी में ये बिंदु महत्वपूर्ण है लेकिज इस बात के कारण को जितना स्पष्ट करना चाहिए था मेरे हिसाब से नहीं किया गया। ये प्रेम त्रिकोण भी उपन्यास को रोचक बनाता है। 
इनके इलावा उपन्यास में एक डोलसी परेरा का किरदार है जिसे जीतसिंह पोंडा में मिलता हैं और उनके बीच रोमांस होता है। उम्मीद है अगर मिश्री नहीं तो आगे के उपन्यासों में डोल्सी के किरदार की वापसी होगी। लेकिन क्योंकि डोल्सी गोआ की है और जीतसिंह मूलतः मुम्बई में काम करता है तो उसको मुम्बई स्थानांत्रित करना होगा।
 उपन्यास के विषय में आखिर में केवल इतना कहूँगा कि मुझे बहुत पसंद आया। अगर आप एक रोमांचक (थ्रिलर) उपन्यास पढने के इच्छुक हैं तो इसको जरूर तरजीह दीजियेगा।
अगर आपने उपन्यास पढ़ा है तो इसके विषय में अपनी राय जरूर दीजियेगा।  और अगर आपने उपन्यास नहीं पढ़ा है तो आप इसे निम्न लिंक से प्राप्त कर सकते हैं:
अमेज़न
किंडल
पढ़कर जरूर बताइयेगा की उपन्यास कैसा लगा। 

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