Friday, May 20, 2016

फ़्रिज में औरत - मुशर्रफ़ आलम ज़ौक़ी

किताब अप्रैल 22 2016 से मई 4,2016 के बीच पढ़ी गयी
संस्करण विवरण:
फॉर्मेट : हार्डबैक
पृष्ठ संख्या : 135
प्रकाशक: भारतीय ज्ञानपीठ

फ़्रिज में औरत मुशर्रफ़ साहब का कहानी संग्रह है जिसमे उनकी निम्न कहानियाँ संकलित की गयी हैं:

१) मुझे भूतों से, जानवरों से प्यार करने दो
पहला वाक्य: 
जेनी को कुत्ते और बिल्ली पसन्द नहीं थे।
यह कहानी एक ऐसे इंसान की है जिसे अक्सर धोखा ही मिला है। उसकी पत्नी भाग जाती है, उसके दोस्त उधार लेकर रफू चक्कर हो जाता है और उसके भाई को उसकी याद तभी आती है जब उसे पैतृक संपत्ति अपने नाम करवानी होती है।यह इंसान सब कुछ स्वीकार कर चुका है। उसके अंदर किसी के लिए भी द्वेष नहीं है। कहानी पढ़ते हुए मुझे लगा कुछ मायनों में मैं भी इस इंसान की तरह हूँ। लोग स्वार्थी होते हैं ये बात निहित है लेकिन अगर आप किसी से अपेक्षायें ही छोड़ दे तक जीवन अधिक सुखमय हो जाता है। लेकिन यह व्यक्ति इसे और आगे बढाता है। उसे अपेक्षा थी लेकिन वो अपने को दिलासा देता है कि जो भी कोई उसके साथ गलत कर रहा है वो असल में सही ही कर रहा है।
क्या इस आदमी का नजरिया मुझे ठीक लगा। नहीं,क्योंकि ये अपने मन में उसके साथ गलत करने वाले इंसान को सही ठहरा रहा है।उदाहरण के लिए:
फिर बरसों गुजर गये। शांगू ने अपनी शक्ल नहीं दिखाई।
हाँ बहुत बाद में उसे मालूम हुआ कि बैंक के ग़बन के इल्जाम में उसे पहले ही निकाला जा चुका है।इसी घटना के बाद वह उससे पैसे लेने आया था।
जज़्बाती आदमी! उसे यकीन था कि शांगू कहीं-न-कहीं अस्पताल बनवाने वाले काम में लगा होगा। अच्छे मकसद के लिए निकला हुआ नेक आदमी।
ये सोच अपने को दिलासा देने की है। जो कि मुझे ठीक नहीं लगी। धोखों से आदमी को सीखना चाहिये।
खैर ये मेरा नजरिया है किरदार का वैसा नजरिया हो सकता है। कहानी मुझे पसंद आई।



२) बारिश में एक लड़की
पहला वाक्य:
तब नाटक की रिहर्सल शुरू नहीं  हुई  थी। 

लेखक नाटक लिखता है।वो एक साहित्यकार है जो कि सम्मेलनों में भी हिस्सा लेता है। लेकिन अक्सर हमारे दो चेहरे होते हैं। एक बाहर दिखाने का और दूसरा असली। लेखक जब एक सेमिनार में औरत और उसकी आइडेंटिटी के विषय में बात करता है तो उसकी बातें औरत को अपनी आइडेंटिटी पाने के लिए लालायित करने वाली होती है। सेमिनार ख़त्म होता है तो उसे केवल अपने बोलने की शैली के साथ साथ अपनी प्रोग्रेसिव सोच के लिए भी वाह वाही मिलती है।इसी सेमिनार में एक लड़की उससे मिलती है और यह सवाल करती है:

"आपने अच्छी बात उठाई है।आपसे सहमत हूँ मैं। मगर, सचमुच क्या आप ऐसे ही हैं...मसलन ऐसे ही सोचते हैं। मसलन, सेमिनार से निकालकर  घर के दरवाजे तक जाने वाला आदमी 'आइडियोलॉजी' की सतह पर तो एक ही रहता है ना...?"

इसका जवाब लेखक के पास नहीं है। लेकिन वो लेखक से ये चीज जानना चाहती है। क्या वो जान पायी और यदि हाँ तो कैसे? और लेखक क्या सही में उसके मापदंडों में खरा उतरा।
कहानी बेहतरीन थी। 


३) फ़्रिज में औरत
पहला वाक्य:
वह चुप-चुप इस बात पर अपना सर झुका लेता था।

निर्भय चौधरी बिहार के मोतिहारी जिले से दिल्ली आया है। लेकिन दिल्ली आने के बाद उसे रिज्क कमाने के लिए कई पापड़ बेलने पड़ते हैं। अधिकतर वो जिन भी लोगों से मिलता है वो उसके बिहारी होने का मज़ाक ही उड़ाते हैं और वो चुप चाप सह लेता है। फिर जब उसका बॉस उसे पैसे की जगह अपना पुराना फ्रिज दे देता है तो वो उसे भी रख लेता है। उसका आश्चर्य की सीमा तब नहीं रहती जब इसी फ्रिज से एक औरत निकलने लगती है। आप सोच रहे होंगे ये क्या? फ्रिज से भी कहीं औरत निकलती है। तो निर्भय के मन में भी ये सवाल उठे थे। वो बातचीत  देखिये ज़रा:
"कहाँ....कहाँ से आयी हो?"
"वहाँ फ़्रिज से?"
"फ़्रिज से?"
"हाँ।"
"क्यूँ?"
"क्यूँ क्या...।"
औरत के होंठों पर बालाखेज तबस्सुम था, "बोतल से जिन्न आ सकता है। फ़्रिज से औरत नहीं आ सकती?"
क्या औरत असली थी?या निर्भय चौधरी के हारे हुए मन का वहम। अगर वो वाकई थी तो उसके आने से निर्भय चौधरी के जीवन में क्या बदलाव हुए ये तो कहानी पढ़कर ही पता चलेगा आपको?
ये एक मार्मिक कहानी थी। निर्भय चौधरी जैसे कई लोग आपको आस पास मिल जायेंगे। निर्भय का नाम तो निर्भय है लेकिन वो रहता भयभीत है। उसे शादी करने से डर लगता है, प्रेम करने से डर लगता है,बॉस से पैसे माँगने से भी डर लगता है। अपनी आर्थिक स्थिति के कारण वो सब कुछ सहता जाता है। उसका ये संवाद दिल को छू लेता है:
"ऐसे क्या देख रहे हो?" वो मुस्कुराई।
"क्या ये ख्वाब है?"
"क्यों?"
"सोच रहा था,हम जैसों के लिए ख्वाब ही क्यों होते हैं? ज़िंदा रहने के लिए भी ख्वाब, मुहब्बत करने के लिए भी ख्वाब।"
कहानी मुझे बहुत पसन्द आई।

४) नहीं ! आप शहर का मज़ाक नहीं उड़ा सकते
पहला वाक्य:
वह बहुत आराम  से  बातें कर  रहा था। 

एक व्यक्ति गाँव से शहर आता है। और फिर गाँव से शहरी बनने के वक्फे में उसके अंदर क्या बदलाव होते हैं यही इस कहानी में दिखाया गया है। कहानी में शहर खुद एक किरदार है जो उसे शहर से चले जाने को कहता है क्योंकि शहर जानता है कि उसके अंदर अभी इंसानियत बची है। लेकिन शहर में रहने के लिए उसे इसे भी दबाना पड़ेगा। तो क्या होता है उस गाँव वाले का हाल?
इसी आदमी की तरह कई लोग गाँव से सपना लेकर आते हैं। उन्हें उम्मीद होती है कि शहर उन्हें रोटी देगा,रहने को जगह देगा। लेकिन ये सब इधर मिलना इतना आसान नहीं है। आपक् कई चीजें त्यागनी पड़ती है। आप जानते हैं कि आप कई चीज खो रहे हैं लेकिन फिर भी शहर को इसका जिम्मेदार नहीं बताते। क्योंकि इसने आपको बहुत कुछ दिया है।

५) मादाम एलिया को जानना जरूरी नहीं है
पहला वाक्य:
"दोनाली बन्दूक और ड्रेसिंग गाउन।"
पीरोज और आलिया भाई बहन हैं। उनके बचपन में कुछ ऐसा हुआ कि पिरोज तो फौजी बनकर प्रेम से विरक्त हो गया लेकिन आलिया ने प्रेम करना नहीं छोड़ा। अब दोनों अधेड़ हैं और साथ रहते हैं।उन्ही के बीच ये संवाद होता है।
एक घटना का असर दो व्यक्तियों में कैसे जुदा जुदा होता है ये इस कहानी में देखते हैं। और इस कहानी की निम्न पंक्ति ही सब कुछ् बयान कर देती है:
"मेरे प्यारे फ़ौजी, जिन्दा रहने के लिए एक मुहब्बत भी काफी होती है!"



६) मुझे उसे ज़िंदा रखना है
पहला वाक्य:
जैसाकि घरवाले बताया करते थे वो रात बहुत भयानक थी जब मैं पैदा हुआ। 

उसे लगता था कि वो नहीं है क्योंकि लोग उसे यही कहते थे।जैसे वह जब काम करने के लिए निकला तो उसे यही कहा गया:
नये जहाँ के सारे तजुर्बे नये थे, "नहीं, तुम नहीं हो। तुम होकर भी नहीं हो।" मुझे हर जगह बस यही टका सा जवाब मिलता।
लेकिन उसकी माँ को उसके होने का पता था और उन्हीं के लिए उसे बाकी  लोगों को अपने होने का एहसास दिलाते रहना था।यह कहानी पहले पढ़ने में तो अजीब लगती है लेकिन अगर सोचा जाए हमारे आसपास ऐसे कई लोग हैं जो होते हुए भी नहीं हैं। वो अपना काम करते जाते हैं लेकिन उनके होने का हमे कोई एहसास नहीं होता है। और न ही हम एहसास करना चाहते हैं। जब उसको काम देने वाला आदमी निम्न संवाद बोलता है तो आप सोचने पर मजबूर हो जाते हैं कि आखिरकार हम भी तो यही चाहते हैं कि वो अपना काम तो करते जाएँ लेकिन उनके होने का कोई भी इल्म हमे न हो।
मोटे आदमी के चेहरे पर मुस्कराहट थी,"यही हमारे लिए काम की बात है। वह है ही नहीं। वह नहीं है। बस यही ख़ास बात है और मैं इसीलिए उसे काम देना चाहता हूँ। वो नहीं है।उससे हमारी बहुत सी समस्यायें हल हो जाती हैं। समझ रहे हो न!"



७) सबसे अच्छे इनसान
पहला वाक्य:
वह दिन शीतकाल के सर्दतरीन दिनों में से एक था.... 

वह शीतकाल का बहुत ही सर्द दिन था जब बूढ़ा ताजवर अपने पिंजरे में बंद तोते के साथ जाफ़राबाद से दूर जा रहा था। ताजवर जाफ़राबाद का  सबसे खुशहाल किसान माना जाता था जिसके पास आर्थिक रूप से किसी भी चीज़ की कमी नहीं रहती थी। वो अपनी पत्नी आयेशा और पोती एलिया के साथ रहता था। लेकिन फिर क्या हुआ कि वो जाफ़राबाद छोड़कर जाने लगा?एलिया और आयेशा उसके साथ क्यों नहीं थीं?
ताजवर के पिता कहा करते थे कि इंसान ईश्वर की सबसे श्रेष्ठ 'रचना' है और उसे दूसरों से ज़्यादा उसे ज़िंदा रहने का हक है
लेकिन कभी कभी ये ही सबसे अच्छे इंसान अपने आपसी वैमनस्य के कारण क़यामत भी ला जाते हैं। लड़ाई,जंग भी इंसान के बनाये हुए हैं और ऐसे में अपने अंदर की इंसानियत को बचा पाना निहायती मुश्किल है। 
अकसर इंसान गाँव या देश के हिसाब से दो हिस्सों में बाँट लिया जाता है और फिर उससे ये अपेक्षा  की जाती है कि वो दूसरे इंसान से केवल इसलिए नफरत करे क्योंकि वो दुश्मन गाँव या देश का है। कहानी की विषय वस्तु यही है कि अगर उनकी भागीदार नहीं बनते तो क्या होता है?
कहानी अच्छी लगी।

८) अगली बारिश तक
पहला वाक्य:
ख़यालों पर काई की तरह धुन्ध जम गयी थी। 
रमेश और सुम्मी पति पत्नी हैं।शादी को अभी कुछ ही वर्ष हुए हैं। रमेश एक हिंदी की पत्रिका में काम करता है जहाँ से मेहनत मशक्कत करके भी उसे लगता है कि वो उतना नहीं कमा पा रहा है कि उनका वैवाहिक जीवन सुखमय हो। 
उसकी मेहनत देखकर सुम्मी भी उसका हाथ बटाना चाहती है और दूरदर्शन में काम करने लगती है। और यहीं सुम्मी एक नयी दुनिया में दाखिल होती है। यहाँ उसे कैसे अनुभव होते हैं और इसका उसके वैवाहिक जीवन में क्या असर होता है यही कहानी बनती है।
कहानी एक जोड़े की है। भले ही सुम्मी रमेश से खुश है लेकिन रमेश अपनी इंफेरिओरिटी कॉलेक्स के कारण इस बात पर विश्वास नहीं कर पाता है। उसे लगता है वो अपने परिवार को उतनी आर्थिक सबलता नहीं दे पाया है कि जितनी उसे देनी चाहिए थी। वहीं सुम्मी जब नौकरी शुरू करती है तो उसे एक नयी दुनिया देखने को मिलती है। ऐसी दुनिया जहाँ उसके काम से ज्यादा उसके औरत होने को महत्व दिया जाता है। वो अपने दफ्तर में ऐसी औरतों से मिलती है  जो इस बात को भुनाकर अपना काम निकालना जानते हैं। लेकिन सुम्मी ऐसा नहीं करना चाहती है। वो रमेश को सब कुछ बता देती है।वो चाहती है कि रमेश उसपर शक न करें। लेकिन रमेश की अपनी चिंताएं हैं।
"लोग शरीर कैसे बदलते हैं? एक दूसरा शरीर.... पराया शरीर...परपुरुष का स्पर्श।"
रमेश को लगा वो पूछे? आखिर तुम इन सवालों को लेकर इतनी फिक्रमंद क्यों हो? इन गांठों को खोलते खोलते भी एक दिन उचित-अनुचित की दीवारें टूट जाती हैं। तब पता नहीं, सम्बन्ध कायम रहते होंगे भी या नहीं। मगर वह भला कब ऐसे संबंधों को माननेवाला था।

कहानी के दोनों पहलू रोचक हैं।एक ऐसा पति जिसे लगता है वो परिवार के लिए चीजें नहीं जुटा पा रहा है। एक पत्नी जो अपने पति को ये यकीन दिलाती रहती है कि वो उससे कभी दोख़ा नहीं करेगी। और यही पत्नी ऐसी दुनिया से भी जूझ रही है जहाँ उसकी नौकरी से जुडी आकांक्षाओं का पूरा होना इस बात पे निर्भर करता है कि वो अपने बॉसेस के साथ कैसे सम्बन्ध बनाती है। कहानी तो दिलचस्प थी लेकिन इसका अंत जिधर होता है वो ऐसा पड़ाव जहाँ आप इन दोनों व्यक्तियों के भविष्य के विषय में सोचने पर मजबूर हो जाते हो। क्या हुआ होगा रमेश और सुम्मी का? रमेश की सोच में बदलाव आता दीखता है और ये देखना बाकि रहता है कि सुम्मी जिसने अभी तक कुछ समझोता नहीं किया क्या वो आगे चलकर करती। लेकिन अफसोस हमे ये सब पता नहीं चलता है। क्योंकि कहानी यहाँ तक नहीं बढ़ती है। उसे एक ऐसे स्थान पर ले जाकर छोड़ दिया जाता है जहाँ से पाठक अपने हिसाब से कहानी आगे बढ़ा सकता है। 



९)मज़्मून की आखिरी लाइन
पहला वाक्य:
इधर आँखें बोझिल हुईं, उधर सपनों के द्वार खुल गये - फिर जैसे किसी ने बहुत भोलेपन से आवाज़ लगायी हो...आँखें खोलो ना एलिस...!"
एलिस को स्तन कैंसर के विषय में पता चलता है। उसकी ज़िन्दगी इस बात से एक दम बदल जाती है। उसकी एक बेटी है और पति हैं। वो इस बात पर कैसे प्रतिक्रिया देते है ये कहानी का एक पहलू है। इसका दूसरा पहलू है कि एलिस और उसके पति के रिश्तों में क्या फर्क आता है? एलिस अपनी बिमारी के आखरी लम्हों में ये कहती है :
'ज़िन्दगी सिर्फ़ भली ही अच्छी लगी है। शायद यह बात सबके साथ है। हसीन, दिलफरेब, खूबसूरत मनाज़िर(दृश्य) और तौबशिकन, पुरकशिश(कामुक) जिस्म। अपनी लटकती,झूलती,पीप रिसती छातियों को तकती हूँ....  उस नफ़रत के उगने तक जीने की ख्वाहिश को बरकरार रखना चाहती हूँ।'

अक्सर किसी बीमार व्यक्ति प्रति लोग दया का भाव रखते हैं। लेकिन वो व्यक्ति इस बात को कैसे देखता है ये हम नहीं सोचते हैं। इस कहानी में भी अशरफ (एलिस का पति) उसके प्रति चिंतित रहता है और दुखी रहता है। लेकिन एलिस के मन में केवल एक सवाल रहता है कि क्या अब अशरफ उसे ऐसे चाह पायेगा जैसे वो पहले चाहता था।
कहानी मार्मिक है। 


१०) हम दानिश्वर
पहला वाक्य:
एक बोझल दिन की शुरुआत हो गयी थी। 

दानिश्वर का मतलब होता है अक्लमंद। लेखक अपने काम को ज़रूरी मानता है उसे लगता है वो समाज को कुछ दे रहा है। लेकिन एक तपका है जिसे वो समझता है कि वो समाज को कुछ नहीं देता। ये तपका है झोपड़पट्टियों में रहने वाले लोग। वो अपने दोस्त विशुन से कहता है :
"तुम क्या समझते हो। इनका कोई इस्तेमाल है? या हो सकता है.... ? ये पढ़े लिखे भी नहीं। अपने तौर पर कोई नजरिया भी नहीं बुन सकते। ज़ेहन का इस्तेमाल नहीं जानते। फिर ये क्यों है? किसलिए हैं?"

सवाल मुझे तो वाजिब नहीं लगा। हम क्यों किसी के अस्तित्व पे सवाल उठाए। लेकिन समाज में अक्सर ये सोच स्थापित है। अपने को ज़रूरी समझना और दूसरे को नहीं बेवकूफाना लग सकता है लेकिन ऐसा होता है। लेखक के मुकाबले विशुन इस मामले में सही राय रखता है। कहानी का अंत कैसा होता है, ये तो आप कहानी पढ़कर ही पता चलेगा। लेकिन कहानी मुझे पसन्द आई। समाज का एक दोगला चेहरा दर्शाती हुई कहानी है ये। ये चेहरा हम अक्सर देखते हैं जब कोई व्यक्ति एक रिख्शे वाले को तू  कहकर पुकारता है लेकिन अगर उसे कोई अमीर आदमी मिले तो उसे आप कहकर बुलाता है। ये एक दृष्टिकोण है और कहानी एक दूसरा दृष्टिकोण दिखाती है। कहानी ठीक लगी। 

११) एक मुट्ठी ख़ाक
पहला वाक्य:
पता नहीं क्यों मैं यह नहीं सोच पा रहा हूँ कि भइया भी यहाँ की मिट्टी के लिये इतने मजबूर और कमजोर हो सकते हैं।

एक मुट्ठी ख़ाक दो भाइयों की कहानी हैं। एक भाई पाकिस्तान जाता है और दूसरा भारत में रहना पसन्द करता है। जो पाकिस्तान जाता उसे लगता है उधर उसे वो सब मिलेगा जो यहाँ नहीं मिल पाया। वो तरक्की भी करता है और जब कभी भी भारत आता है तो अपने भाई को इस विषय में अवगत कराना नहीं भूलता है। लेकिन अपनी ज़मीन अपनी ही होती है। और हर आदमी यही सोचता है जब वो ख़ाक में बदले तो अपनी ज़मीन ही उसे नसीब हो। यही इस कहानी का मंतव्य है। 

बहुत दिनों से सोच रहा था कि इस संग्रह के विषय में लिखूँ। क्या लिखूँ ये समझ नहीं आ रहा था?
 एक कहानी संग्रह को रेट करना हमेशा से ही मुश्किल रहता है। एक तो उसमे कई रचनायें होती है जो आपको अलग अलग तरह से प्रभावित करती हैं। ऐसे में मैं हर रचना को अलग से रेट करता हूँ। इस पुस्तक में संकलित रचनाओं को रेट करने में अपने आप को अक्षम पा रहा हूँ। केवल इतना कहूँगा कि सारी कहानियाँ मुझे पसन्द आई।  संकलित कहानियों में उर्दू का असर ज्यादा देखने को मिलता है जिससे संवाद पढने में मुझे आनंद आया। (वैसे मुझे ये पता है मुशर्रफ जी उर्दू के लेखक हैं। इसलिए इन कहानियों में उर्दू का असर लाज़मी है। ) इसके इलावा कुछ कहानियों जैसे 'फ्रिज में औरत' और 'नहीं! आप शहर का मज़ाक नहीं उड़ा सकते।' में फंतासी का तत्व है। पहली कहानी में एक औरत है जो फ्रिज से प्रकट होती है और दूसरी कहानी में शहर एक किरदार के रूप में दिखता है। ये कहानी में एक नयापन लाता है। सभी कहानियों की विषय वस्तु अलग है इसलिए पढने में एकरसता नहीं दिखती है।
इसके इलावा जो दूसरी बात इस संग्रह में मुझे दिखती है वो ये कि कहानियाँ जरूर हिंदी में हैं लेकिन सभी कहानियाँ भारतीय परिवेश में नहीं घटती हैं।  कहानियों के पात्र भी भारतीय नहीं हैं। मुझे ऐसी कहानियाँ पढने में मज़ा आता है जो हिंदी में लिखी गई हो लेकिन उसके पात्र और जिधर ये घटती है वो क्षेत्र हिंदी भाषी न हो।  इससे हम एक हिंदी भाषी के दृष्टिकोण से उस समाज को देखते हैं। ये अनुवाद से अलग होता है और इसको पढने का अनुभव भी अलग होता है।
संग्रह के विषय में आखिरी में इतना ही कहूँगा कि संग्रह मुझे काफी पसन्द आया और इसे पढना एक अलग अनुभव था। मैं ज़रूर इनकी दूसरी रचनाओं को पढने की कोशिश करूँगा। उन्होंने उर्दू में भी काफी काम किया है। अगर वो हिंदी में उपलब्ध हुई तो ज़रूर उन्हें पढूँगा। 
आप इस किताब को निम्न लिंक से  मँगवा  सकते हैं :

4 comments:

  1. आपने अच्छी समीक्षा लिखी है।
    धन्यवाद ॥

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  2. आज अचानक यह समीक्षा नज़र से गुज़री। .मैं जितना उर्दू का हूँ दोस्त , उतना ही हिंदी का। इन में बेश्तर कहानियां हिंदी में ही लिखीं और पहली बार यह हिंदी में ही प्रकाशित हुईं ,,,

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    1. शुक्रिया,सर। मैंने यह संग्रह पढ़ने के बाद आपका लिखा काफी ढूँढा है। बड़ी मुश्किल से मिल पाता है। आपने आकर कमेंट किया इससे बेहतर बात मेरे लिए क्या हो सकती है। एक बार फिर से शुक्रिया, सर।

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