17 रानडे रोड - रवींद्र कालिया

रेटिंग : ३.५/५
११ जून से १४ जून के बीच पढ़ा गया

संस्करण विवरण :
फॉर्मेट: पेपरबैक
प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ
पृष्ठ संख्या : ३०४


प्रथम वाक्य:
उसका नाम सुदर्शन पुरुषार्थी था, स्टेशन डायरेक्टर भटनागर उसका नाम आने पर उसे सुदर्शन शरणार्थी कहता था।

17 रानडे रोड मुख्यतः सम्पूरन ओबेराय की कहानी  है। सुदर्शन पुरुषार्थी भारत के जाने माने ग़ज़ल लेखक था जो कि बम्बई से ब्रिटेन  में बस गया था। जब उन्हें पता लगता है कि उनका दोस्त सम्पूरन नहीं रहा तो उनको एक धक्का सा लगता है। सम्पूरन उनका बेहद ख़ास मित्र था जिसके व्यक्तित्व से बहुत प्रभावित हुआ था। सम्पूरन दरहसल १७ रानडे रोड में स्थित एक फ्लैट  में रहता था और इस फ्लैट की खासियत ये थी कि इसे भूतिया होने का गौरव हासिल था। यहीं सुदर्शन और सम्पूरन ने अपने शुरूआती जद्दोजहद के दिन गुजारे थे। अब जबकि सम्पूरन नहीं रहा तो सुदर्शन उसकी पत्नी सुप्रिया को बताता है कि वो सम्पूरन की ज़िन्दगी के ऊपर आधारित एक किताब लिख रहा है। और उन्ही के बीच की बातचीत के दौरान फ़्लैश बेक में हमे सम्पूरन और सुदर्शन की  दोस्ती और सम्पूरन ने ज़िन्दगी में जो मुकाम हासिल किया वो कैसे किया , इसके विषय में पता चलता है।




उपन्यास पठनीय है और इसको मनोरंजक सम्पूरन का दिलचस्प किरदार बनाता है। सम्पूरन एक मस्त मौला इंसान है जो कभी एक कलाकार बनने मुंबई आया था लेकिन जब उसमे सफलता नहीं मिली तो एक जगह अकाउंटेंट लग गया। वो मुसीबत के आगे घबराता नहीं है बल्कि अपनी वाक्पटुता और तिकड़म बाजी से उससे निकलने की कोशिश करता है। उपन्यास में ये तिकड़म बाजी कई जगह देखने को मिलती है। ये उसकी ज़बान का जादू ही था कि उसके ऊपर इतना कर्जा होते हुए भी वो अपने देनदारों से पैसे निकलवा ही लिया करता था। और जब उसके पास पैसे नहीं होते थे तो बड़े अटपटे तरीके से उनसे पीछा छुड़वाता था। जरा गौर फरमाइये:

एक वाक्या तो भुलाये नहीं भूलता। एक दिन पार्टी शबाब पर थी कि अचानक दस्तक हुई। सुदर्शन ने दरवाज़ा खोलकर देखा, राशन की दुकान का मालिक था। सुदर्शन ने उसे बताया कि अन्दर पार्टी चल रही है, सुबह आना, मगर वो टस से मस नहीं हो रहा था। सम्पूरन ने अचानक महसूस किया कि कुछ गड़बड़ है। वह भी बाहर चला आया और पीठ से दरवाज़ा बंद किये रहा। मालूम हुआ, राशन वाले का पाँच सौ बकाया है और वह आज लेकर ही जाएगा। अन्दर पार्टी में कई करोड़पति और बाहर ये बवाल। समझ में नहीं आ रहा था कि कैसे उस जिद्दी आदमी से छुटकारा पाया जाए। आखिर जब सम्पूरन ने देखा कि कोई तर्क काम नहीं आ रहा तो उसे एक तरकीब सूझी। उसने लाला को गुदगुदी करनी शुरू की। बरामदे में खिड़की के पास एक लंबा दीवान पड़ा रहता था। वह हँसते हँसते उस पर लोट पोट हो गया। सम्पूरन था कि उसे लगातार गुदगुदाए जा रहा था,"अभी पिछले महीने ढाई सौ मिला था कि नहीं, बोल....बोल। अब तक कभी तुम्हारा बिल चैकभी किया है?".....हँसते हँसते लाला अपना पिंड छुड़ाकर भागा। अन्दर जाकर सम्पूरन बिलकुल सामान्य हो गया। किसी को अहसास ही नहीं हो पाया कि कैसे एक हंगामा होते-होते रह गया था।

ऐसे ही दिलचस्प किस्से उपन्यास में पढ़ने को मिलते हैं और मैं अपनी कहूँ तो मुझे उपन्यास पढ़ते हुए कई बार लगा कि सम्पूरन जैसे दिलचस्प और जिंदादिल इंसान अगर वाकई होता तो उससे मिलना मैं पसंद करता। सम्पूरन न केवल जिंदादिल है बल्कि एक जुझारू इंसान भी है। नाकामयाबी उसके हौसले को ख़त्म नहीं कर पाती है और वापस अपनी मंजिल की तरफ दुगने वेग के साथ बढ़ने लगता है।  उपन्यास के मुख्य किरदार यानी सुदर्शन और सम्पूरन फ़िल्मी दुनिया से तालुकात रखते हैं तो इस दुनिया का भी विवरण लेखक ने किया है। इस दुनिया की  दिखावट, जिसमे पैसे न होने पर भी चकाचोंद बनाई रखनी पड़ती है, इस दुनिया का स्वार्थी चेहरा, जहाँ मतलब होने पर तो सब आपके आसपास घूमते हैं और जब मदद करने का मौक़ा आए तो काफूर हो जाते हैं, सभी पहलूओं को लेखक ने दिखाया है।

अंत में इतना कहूँगा कि उपन्यास पढ़ते हुए मुझे कभी भी बोरियत नहीं हुई और सम्पूरन की ज़िन्दगी की कहानी ने मुझे बाँध कर रखा। उपन्यास कई बार एक  वृहद्  संस्मरण की तरह लगता है।

अगर आपने इस उपन्यास को पढ़ा है तो अपनी राय ज़रूर दीजियेगा और आपने इस उपन्यास को नहीं पढ़ा है तो निम्न लिंक पर जाकर इसे मँगवा सकते हैं :
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रवीन्द्र कालिया जी के मैंने दूसरी रचनाएँ भी पढ़ी हैं।उनके विषय में मेरी राय आप निम्न लिंक पर जाकर पढ़ सकते हैं:

रवीन्द्र कालिया
© विकास नैनवाल 'अंजान'

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