Sunday, June 28, 2015

निरुपमा - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

रेटिंग : ३/५
मई २७ से जून ७ के बीच पढ़ा गया

संस्करण विवरण :
फॉर्मेट : पेपरबैक
पृष्ठ संख्या : १३२
प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन


पहला वाक्य :
लखनऊ में शिद्दत की गर्मी पड़ रही है।

'निरुपमा' उपन्यास की कहानी निरुपमा और कृष्ण कुमार  के चारों ओर ही घूमती है। कृष्ण कुमार ज्ञान के उपार्जन के लिए सामाजिक रूढ़ियों को तोड़कर विदेश पढ़ने चले जाते हैं। इसमें उनके घर वाले तो उनका साथ देते हैं लेकिन बिरदिरी से उन्हें निकाल दिया जाता है। जब वो डी लिट करके वापस देश लौटते हैं तो पाते हैं कि यहाँ चाटुकारिता और भाई भतीजावाद का ही बोल बाला है। लेकिन फिर भी वे निराश नहीं होते हैं और जीविका अर्जन के लिए जूते पोलिश का काम करने लगते हैं। इससे न केवल उनको बल्कि उनके परिवार वालों को भी गाँव में शोषण सहना पड़ता है। क्या होगा कृष्ण कुमार और उनके परिवार का?
वहीँ उपन्यास की नायिका निरुपमा एक पढ़ी लिखी सुशिक्षित युवती हैं। वो अपने माता पिता के देहांत के बाद अपने मामा के घर में रहती हैं। पिता के और से उनके पास अकूत सम्पति है। वो पढ़ी लिखी तो हैं लेकिन वो ऐसे युवाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं जो समाज की रूढ़ियों को तोड़ना तो चाहते हैं लेकिन फिर या तो अपनी परवरिश के कारण या शर्म के कारण इनको तोड़ने में हिचकिचाहट का अनुभव करते हैं।
फिर इन दोनों में प्रेम पनपता है और बात सारी निरुपमा के ऊपर निर्भर हो जाती है कि क्या वो अपनी परवरिश और शर्म कि बेड़ियों को तोड़ सकेगी और सही निर्णय लेगी। या सामाजिक बन्धनों के आगे घुटने टेक देगी?
एक सवाल ये भी है कि कृष्ण कुमार के परिवार का क्या होगा?
इन सवालों के उत्तर तो आपको उपन्यास पढ़कर ही मालूम हो पायेंगे।


उपन्यास की बात करूँ तो उपन्यास भले ही कृष्णकुमार और निरुपमा के प्रेम के इर्द गिर्द लिखा गया हो लेकिन ये अपने वक़्त के समाज का  दस्तावेजीकरण भी करता है। यह उपन्यास निराला जी का चौथा उपन्यास है और पहली बार १९३६ में प्रकाशित हुआ था। मेरा मानना है कि साहित्य अपने वक़्त के समाज का प्रतिबिम्ब होता है और जब जब हम किसी भी वक्त में लिखे साहित्य को पढ़ते हैं तो अक्सर उस वक़्त के समाज, उनके विचार, उनके आचार इत्यादि से भी रूबरू होते हैं। ये उपन्यास भी १९३६ के वक़्त के समाज को पाठक के सम्मुख लाता है।
कृष्ण कुमार जब  विदेश जाकर पढ़ाई करके  आते हैं तो उनके परिवार को गाँव में प्रताड़ना झेलनी होती है। यही नहीं जब उसे मन माफिक नौकरी नहीं मिलती और वो जूते पोलिश करके अपनी जीविका अर्जन करना चाहता है तो उसके परिवार वालो को गाँव वाले अछूत करार दे देते हैं। उपन्यास धर्म के ठेकेदारों का पर्दा फाश करता है जो कि गरीब आदमी को प्रताड़ित करता है अगर वो उनके हिसाब से न चले लेकिन जब अमीर आदमी वही चीज़ करता है तो धर्म कि परिभाषा बदलकर अमीरों के स्वरुप उसे गढ़ देता है।

'हमारा-इनका जितना व्यवहार है, उतना न तोड़ना चाहिए, क्यूँकी हमारा-इनका सदा सम्बन्ध-व्यवहार रहेगा। ये जमींदार हैं, हम रियाया। फिर जब कड़ाही हमारी है तब क्या बात है, चाहे जिनके घर में ब्याह करते हों ये।'

ये सामाजिक ठेकेदारी और दोगलापन जितनी उस वक़्त थी उतनी अभी भी कुछ कुछ मौजूद है।

दूसरी बात इस उपन्यास में दिखती है वो है कृष्ण कुमार को कोई नौकरी न मिलना क्यूँकी उसकी कहीं भी जान पहचान नहीं होती है। वो पढ़ा लिखा है लेकिन फिर भी उसकी शैक्षिक योग्यता से ज्यादा उसकी सामजिक पहुँच को महत्ता दी जाती है। इस तरह का भाई भतीजावाद से भी युवाओं को अकसर रूबरू होना पड़ता है। उपन्यास पढ़कर सचमुच हैरत होती है कि इतने सालों में भी चीज़ें उतनी नहीं बदली हैं जितना हम सोचते हैं।

शरत चन्द्र जी के उपन्यासो के जैसे ही इधर भी ब्रहमो समाज और हिन्दुओं के बीच का द्वन्द दिखता ही है। कमल एक स्वछंद ख्यालों की महिला है जो कि निरुपमा की तरह अपने परवरिश की बेड़ियों से जकड़ी हुई नहीं है। उसे पता है क्या सही है और क्या नहीं और समाज में फैली रुड़ियों को नही मानती है। निरुपमा से दुनियादारी में भी वो ज्यादा परिपक्व जान पड़ती है। इसके उपन्यास में काफी उदाहरण मिलते हैं।

अंत में केवल इतना ही कहूँगा कि उपन्यास मुझे काफी अच्छा लगा। कहानी पठनीय है और ऐसे समय को दर्शाती है जहाँ युवक समाज के विद्रोह के चलते उनकी रूड़ियों को तोड़ने का प्रयास कर रहे थे। आज भी हम उन्ही रूड़ियों से जकड़े हुए हैं इसलिए आज भी ये उपन्यास उतना ही प्रासंगिक(relevant) है जितना कि उस वक्त था। उपन्यास के सारे पात्र जीवंत लगे और पढ़कर कहीं लगा ही नहीं कि कोई काल्पनिक किस्सा पढ़ रहे हों। उनकी जद्दोजहत, परेशानियाँ और उनसे जूझने का तरीका इस तरह का है कि आपको इस चरित्रों में अपने आस पास के लोगो को देखेंगे।

हाँ, निरुपमा और कृष्ण के बीच जो प्यार पनपा था वो पहली नज़र में प्यार वाला किस्सा था जो कि उपन्यास को थोडा नाटकीय बनाता है। लेखक ने भी लिखा है कि निरुपमा पहले कृष्ण के रूप पर ही रीझी थी।

कोई भी कुमार को सुन्दर कहेगा।
....
सुन्दर को सभी आँखें देखती हैं। अपनी वस्तु को अपना सर्वस्व दे देती हैं। क्यों देखती हैं, क्यों दे देती हैं, इसका वही कारण है जो जलाशय की ओर जल के बहाव का। रूप ही दर्शन कि सार्थकता है। वहाँ एक रूप ने दुसरे रूप को- आँखों ने सर्वस्व-सुन्दर आँखों को चुपचाप क्या दिया, हृदय ने चुपचाप दोनों और से क्या समझा - मौन के इतने बड़े महत्त्व को मुखरा भाषा कैसे व्यक्त कर सकती है!

सोचने पर विवश होता हूँ कि अगर कुमार 'सुन्दर' न होता तो कहानी का क्या होता?खैर, ये दर्शा कर लेखक ने सच ही को दिखाया है।

अगर आपने इस उपन्यास को पढ़ा है तो अपनी राय ज़रूर दीजियेगा। अगर नहीं तो आप इसे निम्न लिंक के माध्यम से मँगवा सकते हैं। 

अमेज़न


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