कुछ कहानियाँ (पूस की रात,सुजान भगत ,चाल)

पोस्ट का शीर्षक देखकर आप सोच रहे होंगे की ये कौन सी पुस्तक है। तो मैं आपको बता दूँ ये कोई पुस्तक नहीं है। कुछ दिनों पहले मैंने न्यूज़ हंट एप्प के माध्यम से काफी कहानियाँ डाउनलोड करी थीं। इन कहानियों को मैं मौका मिलने पर पढ़ लेता हूँ। इस पोस्ट में इन्ही कहानियों के विषय में लिखूँगा जिन्हे मैंने कुछ दिनों पहले पढ़ा।

१) पूस की रात - मुंशी प्रेमचंद ३.५ /५ 


पहला वाक्य :
हल्कू ने आकर स्त्री से कहा, "सहना आया है, लाओ जो रूपये रखे हैं, उसे दे दूँ, किसी  तरह गला तो छूटे!"

प्रेमचंद के उपन्यास जितने बेहतरीन हैं उतनी ही बेहतरीन उनकी लिखी हुई कहानियाँ भी हैं। किसानो के जीवन का वर्णन जितने सच्चे और मार्मिक तरीके से उन्होंने  किया है वो शायद ही किसी और ने किया हो। ये कहानी भी किसान के जीवन के एक पहलू को उजागर करती है।

हल्कू किसान है । खेत में जी लगा कर काम करता है लेकिन फिर भी क़र्ज़ से निजात नहीं पा पाता है । अब पूस का महिना चल रहा है और उसकी फसल तैयार हो चुकी है । उस फसल की देखभाल के लिए उसे रात को खेत में पहरेदारी के लिए जाना होगा ।  रात में ठण्ड काफी हो जाती है इसलिए इससे बचने के लिए उसने कम्बल लेने की सोची थी । लेकिन वो रूपये वो अपने क़र्ज़ चुकाने के लिए दे देता है । अब हल्कू के पास कम्बल नहीं है लेकिन रात का सामना तो उसे करना ही है ।कैसे करेगा वो इस पूस की रात का सामना?

प्रेमचंद जी की यह कहानी हल्कू के माध्यम से उस वक्त के किसानों की दुर्दशा दिखाती है । हल्कू कर्जे से दबा हुआ है । वो अपनी ही खेत में मजदूर से कमतर हो चुका है क्योंकि उसकी खेती से होने वाली आमदनी का काफी बड़ा हिस्सा इस कर्जे की भरपाई के लिए चला जाता है ।  वो कितनी भी मेहनत करे वो इस कर्जे से अपना पिंड नहीं छुड़ा पाता है । कई बार उसकी पत्नी मुन्नी ने उसे खेती छोड़कर मजदूरी करने की सलाह भी दी है लेकिन अपने खेत होते हुए किसी की मजदूरी करना उसे नहीं भाता है ।  लेकिन आखिर वो कब तक लड़ेगा?कहानी के अंत में हल्कू के चेहरे में एक मुस्कान होती है लेकिन ये मुस्कान जीत की कम एक समाज से हारे हुए इंसान की ज्यादा लगती है । पूस की रात एक मर्मस्पर्शी कहानी है जो उस वक़्त के किसानो के दुःख को तो व्यक्त करती है लेकिन शायद आज के समय की स्थिति को उतने ही सटीकता से बयां करती है । अक्सर हम अखबारों में किसानों द्वारा जमीन बेच कर कुछ और करने या उनके आत्महत्या की खबर सुनते ही रहते हैं । शायद हल्कू की कहानी और उनकी कहानी में समानताएं होंगी । बहरहाल एक बेहतरीन कहानी ।अगर आपने अभी तक प्रेमचंद की कहानियों को नहीं पढ़ा है तो यकीन मानिए आप हिंदी साहित्य के कई नगीनों से महरूम  रहे हैं । मैं तो कहूँगा प्रेमचंद जी कि कहानियों को हर किसी को पढ़ना चाहिए ,फिर चाहे वो समाज के किसी भी तपके से ताल्लुक रखता हो।

२) सुजान भगत - मुंशी प्रेमचंद ३ /५ 


पहला वाक्य :
सीधे-सादे किसान धन हाथ आते ही धर्म और कीर्ति की और झुकतें हैं।   

सुजान महतो की जब खेती में बरगत हुई तो उन्होंने धर्म कर्म की तरफ ध्यान लगाया। वो धर्म कर्म में ऐसे राम गये कि खेती उन्होंने अपने बेटों के हाथ में छोड़ दी ।अब वो  सुजान महतो से सुजान भगत बन चुके थे।  अब जबकि वो कुछकाम नहीं कर रहे थे तो उन्हें उस दिन झटका लगा जब अचानक उन्हें महसूस हुआ की अब उनके घर में उनकी स्थिति स्वामी की नहीं एक मंदिर के देवता सी हो गयी है जिसे केवल भक्त जो चढ़ा दे उसी में खुश रहने का अधिकार है बाकी अपनी इच्छा से कुछ करने का अधिकार नहीं है । ऐसी क्या बात हुई थी उनके साथ?और फिर सुजान भगत ने कैसे इस स्थिति का सामना किया?

एक अच्छी कहानी । संसार के नियम को दिखलाती है । अभिभावक  का पैसा बच्चे का तो हो सकता है लेकिन क्या बच्चे का पैसा अभिभावक का हो सकता है ? शायद , ये नहीं हो सकता है । दुखद लेकिन कटु सत्य शायद यही है । लेकिन फिर ये कहानी ये भी दिखाती है कि अपनी इज्जत अपने हाथ में होती है। अगर सुजान भगत के जैसे कोई चाहे तो वो अपने परिश्रम से अपनी इज्जत को खोने के बाद दुबारा वो उसे अख्तियार कर सकता है । परिवार की सच्चाई को दर्शाती एक कहानी।

३) चाल - सुरेन्द्र मोहन पाठक ३ /५ 


पहला वाक्य :
"हरामजादी! सूअर की बच्ची!"

जानकी और हरगोपाल में लड़ाई होना सामान्य बात थी। उनके पड़ोसी तक उनके आपसी झगड़ों से परेशान थे।  फिर एक दिन उनके बीच झगड़ा हुआ और जानकी कमरे से गुस्से में बाहर आ गयी। उसके कमरे से निकलने के कुछ देर बाद ही कमरे से गोली चलने की आवाज़ आई।  और जब लोग उधर पहुंचे तो हरगोपाल की लाश को उन्होंने कमरे में पाया। पुलिस को बुलाया गया तो एक अजीब घटना हुई। वो घटना ये थी कि हरगोपाल की लाश कमरे से गायब हो गयी थी। 

किधर गयी उसकी लाश ? 
और क्यों हरगोपाल ने आत्म हत्या की ? 
और क्या ये आत्महत्या थी या जानकी ने हरगोपाल का खून किया  था? 

गुत्थी काफी गहरी थी और यही प्रश्न लोगों के मन में उठ रहे थे। तभी तो ब्लास्ट के  रिपोर्टर सुनील को इस गुत्थी को सुलझाने के लिए बुलाया था। क्या सुनील गुत्थी को सुलझा पाया या वो खुद ही इसमें उलझ गया।  जानने के लिए इस कहानी को पढ़ना न भूलियेगा।

मैंने अभी तक सुनील सीरीज के किसी भी कारनामे को नहीं पढ़ा था।  ये उससे मेरी पहली मुलाकात थी। कहानी मुझे औसत लगी।  ऐसा नहीं है कि पढ़ने में मज़ा नहीं आया लेकिन ये मज़ा उतना नहीं था जितना अमूमन पाठक साहब की रचनाओं को पढ़ने में आता है।  खैर, कहानी को एक बार पढ़ा जा सकता है।     


आप भी इन कहानियों का आनंद न्यूज़ हंट एप्प डाउनलोड करके ले सकते हैं। प्रेमचंद जी की काफी कहानियाँ उधर मुफ्त में उपलब्ध हैं। सुरेन्द्र मोहन पाठक जी कि कहानी की कीमत ४  रूपये है जो कि मुझे वाजिब लगी। अभी के लिए इतना ही। आगे जैसे जैसे कहानियाँ पढता जाऊँगा उनके विषय में आपको बताता जाऊँगा। आशा है आप भी इन कहानियों को पढ़ेंगे। अगर आपने इन कहानियों को पढ़ा है तो आप इनके विषय में अपनी राय टिपण्णी बक्से में देना न भूलियेगा।

कहानियों के लिंक्स:
पूस की रात
सुजान भगत
चाल



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