एक बुक जर्नल: जो लरे दीन के हेत - सुरेन्द्र मोहन पाठक

Tuesday, January 20, 2015

जो लरे दीन के हेत - सुरेन्द्र मोहन पाठक

रेटिंग: ४/५
उपन्यास ख़त्म करने की दिनांक: २ जनवरी,२०१५

संस्करण विवरण :
फॉर्मेट : पेपरबैक
पृष्ठ संख्या : ३१४
प्रकाशक : हार्पर कॉलिंस हिंदी
सीरीज : विमल #४२

पहला वाक्य :
विनीता चावला अपने पति से खफा थी क्योंकि खफा रहना उसका स्वभाव बन गया था।

'जो लरे दीन के हेत'(Jo Lare Deen Ke Het) सुरेन्द्र मोहन पाठक जी का विमल सीरीज में लिखा गया ४२ वाँ उपन्यास है। उपन्यास हार्पर कॉलिंस द्वारा २०१४ में प्रकाशित किया गया था। इस उपन्यास की कहानी का पाठक जी के उपन्यास ६५ लाख की डकेती (Painsath lakh ki daketi) से सीधे तालुकात हैं। ऐसा इसलिए है क्यूंकि यह उपन्यास की कहानी उन्हीं पैसठ लाख रूपये से शुरू होती है जो उस वक़्त  विमल को मिल नहीं पाए थे। इसलिए मेरा मानना है कि आप अगर पहले पैंसठ लाख की डकेती (Painsath Lakh ki Daketi) को पढ़ें तो अच्छा रहेगा। ये ज़रूरी तो नहीं लेकिन इससे आप इस उपन्यास में आने वाले खलनायकों के विषय में ज्यादा जान पायेंगे। पैंसठ लाख की डकेती के विषय में आप मेरी राय निम्न लिंक पर जाकर जान सकेंगे :

पैंसठ लाख की डकैती

जो लरे दीन के हेत (Jo Lare Deen ke het) की कहानी शुरू होती है उन पैंसठ लाख रुपयों से जिन्हे खन्ना ने कहीं छुपा दिया था। भारत बैंक की डकैती को हुए सवा  साल बीत चुके हैं।  उस डकैती के पैंसठ लाख का कुछ भी पता नहीं लग पाया था। विमल इन सवा सालों में जुर्म की दुनिया में काफी नाम कमा चुका है। वो चेम्बूर का दाता  बन चुका है और पैंसठ लाख के वाकये को बिलकुल भूल चुका है। बस  इस बात को कोई नहीं भूला है तो गरेवाल और कॉल जिनको घायल अवस्था में खन्ना की बीवी के लिए विमल छोड़कर चला गया था। वो अभी जैल की हवा खा रहे हैं और इस उम्मीद में जी रहे हैं कि वो विमल को निस्तेनाबूद कर देंगे। इस बात में उनकी मदद करेंगे वो पैंसठ लाख रूपये जिनके वजह से वो जेल में पहुंचे थे और जिनके कारण ही उन्हें विमल ने अधमरा कर दिया था।  क्या वो इन रुपयों को पा पायेंगे ? क्या वो विमल से बदला ले पायेंगे ? और वो इसके लिए क्या तरकीब निकालेंगे ? जानने के लिए पाठक साहब का ये उपन्यास पढ़ना नहीं भूलियेगा।



मुझे जो लरे दीन के हेत(Jo Lare Deen ke het) काफी रोमांचक उपन्यास लगा।  ये मेरा विमल सीरीज का दूसरा उपन्यास था। उपन्यास ने अंत तक मुझे बांधे रखा और पढ़ने पर मजबूर करता रहा।

उपन्यास में कुछ बातें भी मुझे खली।  सबसे पहली बात तो मुझे इस उपन्यास की टाइम लाइन खली। पैंसठ लाख की डकैती (Painsath lakh ki daketi) और जो लरे दीन के हेत (Jo Lare Deen ke het) में पाठक सर ने केवल सवा साल का अंतराल रखा। मेरी दिक्कत इसमें नहीं है कि ये अंतराल  कम  क्यों था ? दिक्कत ये है कि पैंसठ लाख की डकैती (Painsath lakh ki daketi)  ७० के दशक का उपन्यास था। अब कई बार एक किरदार को एक दशक में रोक दिया जाता है और फिर वो वक़्त ही उस किरदार और दुनिया की 'यू एस पी' बन जाती है और विमल के लिए भी यही होता तो मुझे कोई आपत्ति नही थी बल्कि विमल शायद अपनी तरह का भारितीय साहित्य में इकलौता किरदार होता।  लेकिन अफ़सोस इसमें ऐसा देखने को नहीं मिला। इस उपन्यास में वक़्त तो सवा साल का बीता लेकिन तकनीक इस समय की इस्तेमाल की गयी हैं जिससे मेरे लिए थोड़ा मज़ा कम हुआ।  

दूसरी बात जो खली वो थी कि विमल इस कहानी में इतना शसक्त नहीं लगा। विमल एक ऐसे राजा की तरह था जिसने कभी अपने पराक्रम की वजह से काफी बड़ा राज्य स्थापित किया था लेकिन अब केवल अपने उसी नाम के वजह से राज करता है। वो उपन्यास में काफी मर्तबा ऐसी स्थिति में फंसता है जिससे वो केवल अपने नाम और शुभ चिंतकों की वजह से निकलता था।  इससे उपन्यास की रोचकता पे तो कहीं कमी नही आती लेकिन जो विमल के प्रशंशक हैं उन्हें थोड़ी निराशा होगी।  व्यक्तिगत तौर पे मैं कहूँ तो मुझे इस बात से ज्यादा फ़र्क़ नहीं पढ़ा क्योंकि ये विमल सीरीज का दूसरा उपन्यास था जो मैंने पढ़ा।

इसलिए अगर आप किरदार को नहीं और रोमांच को तवज्जो देते हैं तो ये उपन्यास आपको ज़रूर पसंद आएगा।  इस उपन्यास को आप निम्न लिंक्स पर जाकर मंगवा सकते हैं :
अमेज़न
फ्लिपकार्ट

आपको ये उपन्यास कैसा लगा इस विषय में अपनी राय ज़रूर दीजियेगा। और अगर इस लेख में कहीं कुछ त्रुटि है तो उसे भी इंगित करने में नहीं झिझकिएगा।
 

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