Thursday, January 15, 2015

बोज्यू - सुनीता जैन

रेटिंग: ४/५
उपन्यास पढ़ने की तारीक : दिसंबर ३० ,२०१४


संस्करण विवरण :
फॉर्मेट : पेपरबैक
पृष्ठ संख्या : १०३
प्रकाशक : हिन्द पॉकेट बुक्स


पहला वाक्य :
दिल्ली आने में अब अधिक देर नहीं थी

बोज्यू सुनीता जी का एक लघु उपन्यास है जो कि १९६२ में लिखा गया था और १९६५ में पहली बार प्रकाशित हुआ था। बोज्यू जब मैंने मंगवाया तो मुझे इसका मतलब पता नहीं था । मैं उस वक्त शुषम बेदी जी का उपन्यास हवन पढ़ रहा था और उसी में मैंने इसका विज्ञापन देखा था । मुझे इसके विषय में जो लिखा था पसंद आया और मैंने इसको उसी दिन मंगवा लिया था। लेकिन अब मुझे पता है बोज्यू का मतलब क्या होता है। दरअसल, 'बोज्यू' एक कुमाओनी शब्द है जिसका अर्थ 'भाभी' होता है।

बोज्यू उपन्यास दिल्ली में घटित होता है । मुक्ता को जब पता चलता है कि उनके यहाँ नए किरायेदार आये हैं तो उसे ये एहसास ही नहीं होता कि इस घटना का उसकी ज़िन्दगी में क्या प्रभाव होगा । वो देखती है कि किरायेदार के परिवार में एक पति , पत्नी और दो बच्चे हैं। वो उनसे मिलने जाती है और स्त्री को सबकी तरह बोज्यू अर्थात भाभी ही कहने लगती है । वो बोज्यू से काफी प्रभावित होती है और उनके लिए उसके मन में आदर और स्नेह बढ़ जाता है।

'उस दिन बोज्यू से बड़ी देर तक बाते होती रहीं। मुक्त तो मानो मुग्ध हो गयी उनकी बातों से । एकदम साधारण पहनावा पर उच्च विचार। '

फिर जब बोज्यू के घर में उनका छोटा भाई चंद्रमोहन आता है तो समय के साथ मुक्ता और चन्द्रमोहन में घनिष्टता बढ़ जाती है। मुक्ता\ को पता चलता है कि चन्द्रमोहन के अभिभावक शादी ब्याह के मामले में जात पात को मानने वाले हैं। और क्यूँकी वो ब्राह्मण हैं और मुक्ता कायस्थ तो उन्हें इन दोनों के मिलन पे आपत्ति होनी ही है। क्या मुक्ता और चन्द्रमोहन इस मुश्किल का हल निकाल पायेंगे ? मुक्ता की चन्द्रमोहन के साथ रिश्ते का बोज्यू पर क्या असर पड़ेगा ? ये सब चीजें तो आपको इस लघु उपन्यास को पढ़कर ही पता चल पायेंगी।




भले ही सुनीता जी का उपन्यास ६० के दशक में लिखा गया हो लेकिन इसमें दर्शायी गयी चीज़ें आज भी उतनी ही सच हैं जितना उस वक़्त थी। आज भी समाज के चलते कई लोग अपने प्रेम को उसकी दकियानूसी ख्यालों कि अग्नि में होम कर देते हैं।

उपन्यास का ताना बाना निम्न तीन किरदारों के इर्द गिर्द बुना गया है :
बोज्यू : बोज्यू मुक्ता की किरायेदार हैं। वो संयमशील हैं और मुक्ता उनसे बहुत प्रभावित होती है।

'नहीं, बोज्यू सहने की एक सीमा हती है। इसकी उद्दण्डता बढ़ती जा रही है। कैसा अत्याचारी लड़का है ? बिना पिटे मानेगा थोड़ी....' मुक्ता का स्वर क्रोध में अटक गया। बोज्यू रुई पर मलहम रख रही थीं। बड़े थके स्वर में बोलीं,' संयम बहुत बड़ी वस्तु है, मुक्ता। छोटी छोटी बातों की और ध्यान देकर अशांत होना व्यर्थ है।' बोज्यू पट्टी लेने भीतर चली गई। मुक्ता अवाक् सी उन्हें देखते रह गई।

वो घर गृहस्थी में रमी रहती है और इसके बाहर की दुनिया से उन्हें ज्यादा सरोकार नहीं रहता है । विवाह को लेकर भी वो इस पक्ष में है कि जो माँ बाप तय करें उसे बिना कुछ कहे मान लो। जब मुक्ता अनमेल विवाह का ज़िक्र छेड़ती है तो वो इसको माँ बाप की गलती न बता कर समाज की कमजोरी बता देती हैं।

'किन्तु बोज्यू , बड़ों के हाथ में सब अधिकार रहने से ही तो कितने अनमेल विवाह हो जाते हैं।'
'अनमेल विवाह के लिए दोषी सारा समाज होता है, मुक्ता! माता-पिता का दोष केवल इतना होता है कि वे मजबूर होते हैं, इतने शसक्त नहीं होते। अन्यथा कोई भी अभिभावक अपनी संतान को दुखी नहीं देखता चाहता।'

'बोज्यू, जिसे तुम स्नेह कहती हो उसका आधिक्य कभी कभी संतान के लिए अत्याचार का रूप ले लेता है। लड़के की पढ़ाई-लिखाई, धन दौलत आदि देखते समय माता-पिता लड़की की रुचि-अरूचि का भी कभी ध्यान रखते हैं? विद्वान पति को मूढ़ पत्नी और शुष्क पति को भावुक पत्नी, क्या अत्याचार नहीं....?' मुक्त उत्तेजित हो गयी थी।
'बड़े और छोटे के सोचने में यही अंतर है। छोटी आयु में दूरदर्शिता का आभाव रहता है। हम केवल सामयिक लाभ को विचारते हैं।' बोज्यू उठने के उपक्रम में थी। उठते-उठते बोलीं, 'बिना बड़ों के आशीर्वाद और उनकी शुभकामनाओं के कितना भी मनपसंद साथी हो, जीवन सुखी नहीं हो सकता। ऐसा मेरा दृढ़ विश्वास है।'

सांझ के घिरते अँधेरे में मुक्ता सीढ़ियों पर निश्चल-सी बैठी रही। आज वह सबसे जीतकर भी बोज्यू से हार गयी थी।

लेकिन क्या वो असल में खुश हैं??या अन्दर ही अन्दर एक कुढ़न का शिकार हो रही हैं । यही कुढ़न तब दिखती है जब इन्हें मुक्ता बच्चे की बधाई देती है और वो इसमें अपनी अरूची व्यक्त करती हैं । लेकिन फिर भी वो बच्चे होने पर अंकुश नहीं लगाती हैं ।
वो एक ऐसी पीढ़ी की हैं जो बेड़ियों से बंधी तो हैं और उन्हें उनसे कुछ तकलीफें हैं लेकिन फिर भी वो उन बेड़ियों के साथ हैं । उनकी परवरिश ऐसी है कि वो उन बेड़ियों के बेड़ियाँ नहीं जीवन का एक अंग मानती हैं।

वहीँ दूसरी तरफ मुक्ता है जो दिल्ली में पढ़ी लिखी है । उसका परिवार जात पात पर  ज्यादा विश्वास नहीं करता है । वो अपने आप की स्वालंबी समझती है लेकिन वो भी इन सामाजिक बेड़ियों के खिलाफ उठ नहीं पाती है । वो बेमेल विवाह को देख चुकी है। वो जानती है कि उसकी भाभी वैसे स्त्री नहीं है जो उसके भाई के लिए सही थी। इसलिए उनके बीच निरंतर हो रहे झगड़ों का कारण भी वो समझती है। लेकिन फिर भी वो बोज्यू और उनके आदर्शों के समक्ष घुटने टेक देती है। वो आजकल कि ऐसी पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करती है जो अपने परिवार या समाज या अपनी दुर्बलता के कारण इन बेड़ियों को तोड़ नहीं पाती है ।वो एक समझोता कर देते हैं लेकिन क्या उन्हें इस समझोते से खुश रह पाते हैं ? या उनके इस समझोते के कारण उनसे जुड़े उनके जीवन साथी को भी परेशानी होती है ।ये बात उपन्यास के अंत में कही गयी मुक्ता के पति की इस वाक्य से जाहिर है और उनके आने वाले भविष्य के विषय में सोचने पर मजबूर कर देती है :

'रो क्यों रही हो? क्या बात है? '
'कुछ तो नहीं, ज़रा तबियत ठीक नहीं है।'
'डॉक्टर को फोन कर दूँ?'
'डॉक्टर क्या करेगा? आप ही ठीक हो जाऊँगी।'
रजत को देर हो रही है। मुक्ता की बात से क्रोधित हो आया।
'अजीब लड़की है यह भी!' बड़बड़ाता रजत आफिस चला गया।

क्या वो खुश रहे ?लेखिका ने इस एक पंक्ति पर इस उपन्यास को खत्म करके काफी सवालों को पाठकों के समक्ष खड़ा करके छोड़ दिया है। क्या मुक्ता रजत के साथ न्याय कर पाएगी? क्या रजत की यह खीझ समय के साथ बढेगी और घरेलु कलह का कारण बनेगी।

और तीसरी तरफ चंद्रमोहन है वो एक उन लोगों का प्रतिनिधित्व करता है जो केवल इसलिए अपनी भावनाओं का गला घोट देते हैं क्यूंकि उनके साथी इन ख्यालातों के खिलाफ जाने में उनका साथ नहीं देते हैं। उनके पास कोई चारा ही नहीं बचता है।

इतने वर्षीं पहले लिखा गया उपन्यास आज की सामाजिक स्थिति को अगर बयान करता है तो ये सोचने पर मजबूर करता है कि क्या जो भी विकास हमने किया है वो भौतिक रूप से और भौतिक सुखों के क्षेत्र में किया है और सामजिक रूप में हम अभी भी उन्हीं सोचों में जकड़े हुए है। आज भी मुक्ता और चन्द्रमोहन जैसी कहानियाँ हम अपने आस पड़ोस में देखते हैं और जाने कितने वर्षों तक देखते रहेंगे।

यह एक खूबसूरत उपन्यास है जो एक समाज का सच्चा चेहरा प्रस्तुत करता है। इसके किरदार काफी जीवंत है और ज़िन्दगी के काफी निकट हैं। पढ़ते समय आपको कोई न कोई बोज्यू,मुक्ता ,चन्द्रमोहन, लता आदि याद आता रहेगा। मेरी राय तो यह होगी कि इस उपन्यास को हर किसी को पढ़ना चाहिए और फिर सोचना चाहिए कि  क्या किया जाए ?

अगर आपने इस उपन्यास को पढ़ा है तो अपनी राय ज़रूर दीजियेगा। अगर इस लेख में कोई त्रुटि रह गयी है तो आप इससे मुझे अवगत कराना न भूलियेगा, मैं आपका आभारी रहूँगा। अगर आप इस उपन्यास को  पढ़ना चाहते हैं तो आप इसे निम्न लिंक पर जाकर मंगवा सकते हैं :
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