क्राइम एम डी शृंखला के उपन्यास 'एसिड मैन' के लेखक द्वय डॉ रुनझुन सक्सेना और शुभानन्द से एक बातचीत


डॉक्टर रुनझुन सक्सेना और शुभानन्द 

डॉ रुनझुन सक्सेना और शुभानन्द अपराध साहित्य की उन गिनी चुनी दंपती जोड़ियों में से एक हैं जो साथ मिलकर किसी शृंखला का लेखन करते हैं। 'द सीक्रेट ऑफ चालीसा' नामक पुस्तक से पाठकों के सामने अपनी पहचान बनाने वाली डॉ रुनझुन सक्सेना और राजन-इकबाल रिबोर्न और जावेद अमर जॉन शृंखला के उपन्यासों से पाठकों के बीच अपनी जगह बनाने वाले शुभानन्द मिलकर क्राइम एम डी शृंखला के उपन्यास लिखते हैं। क्राइम एम डी शृंखला हिंदी के अपराध साहित्य से इस मायने भी अलग है क्योंकि इसमें फोरेंसिक विज्ञान के माध्यम से अपराध कैसे सुलझाया जाता है इस पर ध्यान केंद्रित रखा जाता है। इस शृंखला की पुस्तक ड्रॉप डेड वर्ष 2019 में प्रकाशित हुआ था और अब शृंखला की दूसरी पुस्तक द एसिड मैन प्रकाशित हुआ है। 

हाल ही में एक बुक जर्नल ने डॉ रुनझुन सक्सेना और शुभानन्द की लेखकीय जोड़ी से उनके नवीन उपन्यास  द एसिड मैन और उनके लेखन से जुड़ी बातचीत की है। उम्मीद है यह बातचीत आपको पसंद आएगी। 




 


प्रश्न (दोनों से): नमस्कार  डॉक्टर रूनझुन और शुभानन्द। सबसे पहले तो आपको नवीन उपन्यास के लिए हार्दिक बधाई। वर्ष 2019 में 'ड्रॉप डेड' आने के पश्चात अब तीन साल बाद 'द एसिड मैन' आ रहा है। क्या इस पुस्तक पर काम ही देरी से हुआ था या फिर कहानी ने ही इतना टाइम ले लिया?

डॉ रुनझुन: धन्यवाद! लिखना तो 'ड्रॉप डेड' पूरा होने के तुरंत बाद ही शुरू कर दिया था मगर जनवरी २०२० में मेरे पिता का स्वर्गवास हो गया था। मैं कुछ भी लिखने की स्थिति में नहीं थी। फिर उसी साल मार्च से लॉकडाउन लग गया और घर के काम बहुत ज्यादा बढ़ गए। बाहर से कोई सपोर्ट नहीं था। लेखन उस समय आखिरी चीज थी दिमाग में। 

शुभानन्द: धन्यवाद विकास। 'ड्रॉप डेड' के बाद एसिड मैन को लाने में हमने लगभग 3 वर्ष लगा दिए इसकी कई व्यक्तिगत वजहें थीं लेकिन उनमें से एक वजह यह जरूर थी कि क्राइम एमडी की कहानी और उससे जुड़े फोरेंसिक तथ्यों को लिखने के लिए हमें काफी रिसर्च करने की जरूरत पड़ी थी। फिर भी 3 वर्ष एक लंबा अंतराल है और इस बीच हम दोनों ही अपने अन्य प्रोजेक्ट्स में मशगूल थे। आपको पता ही है कि 'ड्रॉप डेड' के बाद मेरे तीन अन्य उपन्यास आ चुके हैं।


प्रश्न (दोनों से): 'द एसिड मैन' का विचार किसके मन में पहले आया? और वह चीज क्या थी जिसने इस विचार को जन्म दिया?

रुनझुन: शुरुआत इस आइडिये से हुई थी कि स्टैबिंग का केस बनाना है। फिर उसमें एसिड अटैक को जोड़ा। उसके चारों तरफ कहानी बनानी शुरू की। 

शुभानन्द: क्राइम एमडी सीरीज की कहानी जब हम सोचना शुरू करते हैं तो सबसे पहले यह सोचना होता है कि किस तरह का क्राइम दिखाना है क्राइम ऐसा हो जिसमें की फोरेंसिक साइंस की महत्ता दिखाने का अवसर मिले। इसी सिलसिले में पहले यही सोचा गया कि कहानी में मुख्य क्राइम क्या होगा और कैसे होगा।

 

प्रश्न (डॉ रुनझुन से): अच्छा क्राइम एम डी ही ऐसी शृंखला है जो हिंदी के साथ अंग्रेजी में भी साथ साथ ही आती है। आपका पहला उपन्यास 'द सीक्रेट ऑफ चालीसा' भी पहले अंग्रेजी में आया था? तो क्या लेखन कार्य दोनों भाषाओं में एक साथ चलता है? या पहले एक भाषा में होता है और फिर उसका अनुवाद साथ साथ होता है।

रुनझुन: मैं पहले इंग्लिश में लिखती हूँ। मेडिकल टर्म्स लिखना और बताना आसान होता है। फिर हिन्दी में हम दोनों अनुवाद करते हैं। सेकेंड रीडिंग में कुछ जुड़ता है कुछ घटता है तो वो दोनों भाषा में बदलना पड़ता है। इससे काफी चुनौतीपूर्ण स्थिति पैदा हो जाती है। दोनों भाषाओं में समानता बनाए रखने के लिये बेहद सजग रहना पड़ता है। वैसे इस बार कोशिश यही की थी कि फर्स्ट ड्राफ्ट पूरी तरह से इंग्लिश में तैयार हो जाए उसी के बाद अनुवाद शुरू किया जाए। इससे थोड़ी आसानी हुई । ड्रॉप डेड के समय काफी दिक्कत आयी थी।

 

प्रश्न (डॉ रुनझुन से):  'सीक्रेट ऑफ चालीसा' की बात चली ही है तो उसे आए हुए भी काफी समय होने को आया है? 'सीक्रेट ऑफ चालीसा' पाठकों के बीच अपनी एक जगह बनाने में कामयाब हुई थी? इसके बाद कोई नया प्रोजेक्ट आपका चल रहा है?

रुनझुन: चालीसा एक स्पिरिच्वल किताब है। उसे सभी तरह के पाठकों तक पहुँचाने के लिये और दिलचस्पी बढ़ाने के लिये थ्रिल एलिमेंट्स (रोमांच के तत्व) जोड़े थे। अगली दो किताबों पर काम चल रहा है मगर उससे ज्यादा काम में स्पिरिचुआलिटी में चल रहा है। जिंदगी के अनुभव और ज्ञान की खोज और उस ज्ञान से जिंदगी के असली अनुभवों पर आधारित किताब लिखने में काफी समय लगता है। 


प्रश्न (शुभानन्द से): आप क्राइम एएम डी शृंखला के अलावा भी कई और शृंखलाएँ लिखते हैं। ऐसे में आप कैसे इसे मैनेज करते हैं? क्या पात्रों के आर्क को याद रखने के लिए कुछ विशेष तरीका अपनाते हैं?

शुभानन्द: अलग-अलग शृंखला की कहानियाँ लिखने में यह चुनौती हमेशा रहती है की पात्रों के बारे में  सभी जरूरी जानकारी आपको याद रहे। उसके मजबूत पक्ष, कमजोर पक्ष, भय, एंबीशन। क्योंकि क्राइम एमडी एक नई सीरीज है और हमने अभी उसका एक ही उपन्यास लिखा था इसलिए एसिड में लिखते वक्त ड्रॉप-डेड कई बार दोबारा देखने की जरूरत अवश्य पड़ी थी। वैसे कहानी के प्लॉट के साथ कैरेक्टर आर्क पर भी हम नोट्स बनाते हैं जिससे लिखते वक्त मदद मिलती है।


प्रश्न ( शुभानन्द से):  प्रकाशन और लेखन आप एक साथ कर रहे हैं? क्या एक से दूसरे काम पर फर्क पड़ता है? और आप इसे मैनेज कैसे करते हैं?

शुभानन्द: मेरे लिए लेखन ही मूल काम है।  प्रकाशन सिर्फ लेखन को पाठकों तक पहुँचाने का जरिया है इसलिए मेरी कोशिश रहती है कि ज्यादा से ज्यादा दिमाग लेखन पर लगाया जाए । प्रकाशन का काम तो एक सेट प्रोसेस का हिस्सा है जो कि एक बार इस्टैब्लिश होने के बाद हो ही जाते हैं।  उसमें कुछ नया नहीं करना होता। हालाँकि लेखन के लिये आपको हमेशा नया सोचते रहना पड़ता है।


डॉ रुनझुन और शुभानन्द अपने पुत्र मानस के साथ |  Doctor Runjhun and Shubhanand with their son Manas
डॉ रुनझुन और शुभानन्द अपने पुत्र मानस के साथ


प्रश्न (दोनों से):   वापस एसिड मैन पर आते हैं। जब भी हम किसी लेखक द्वय के विषय में सोचते हैं तो सबसे पहले ये ख्याल मन में आता है वह इस कार्य को कैसे अंजाम देते होंगे? आप लोगों का काम करने का तरीका क्या है?

रुनझुन: मैं केस और केस को हल करने के लिये फोरेंसिक का क्या रोल है इस बारे में ज्यादा सोचती हूँ। एक बार फोरेंसिक का अच्छा आइडिया हो जाता है तो कहानी उसके इर्द-गिर्द बनाते हैं। 

शुभानन्द: कथानक लिखते वक्त हम दोनों ही निरंतर विचार विमर्श करते रहते हैं और कुछ हिस्से कोई एक लिखता है तो कुछ हिस्से दूसरा, फिर दूसरा उसे चेक करता है और उसको और बेहतर करता है।


प्रश्न(दोनों से): अच्छा हर लेखक का लिखने का, चीजों को देखने का नजरिया अलग अलग होता है? आप लोगों के लेखन में क्या - क्या समानताएँ और असमानताएँ हैं? और आप लोग ये सुनिश्चित करते हैं कि एक साथ लिखते हुए लेखन में तारतम्यता हो?

रुनझुन: हमारे शौक काफी मिलते-जुलते हैं। हमें एक जैसी फिल्में, टीवी शोज़ पसंद आते हैं इसलिये कहानी के प्लॉट बनाते वक़्त आसानी रहती है। 

शुभानन्द: अक्सर हमारा तथ्यों के बारे में सोचने का नजरिया अलग हो जाता है और कभी-कभार समान भी रहता है।  जब अलग होता है तो विचार विमर्श होते हैं और जो भी नजरिया कहानी में अच्छा बैठता है हम उसे चुन कर आगे बढ़ जाते हैं।


प्रश्न(दोनों से): एसिड मैन में आपका पसंदीदा किरदार कौन सा है और कौन सा ऐसा किरदार थे जिसे लिखने में आपको परेशानी आई?

रुनझुन: मेरी पसंदीदा डॉक्टर मैत्रेयी है । ऐसा कोई पात्र नहीं याद आ रहा जिसे लिखने में कोई खास दिक्कत आयी हो। 

शुभानन्द: एक लेखक के लिए तो अपने सभी किरदार प्रिय होते हैं फिर भी मुझे मैक उर्फ मकरंद राज के डायलॉग और सोच लिखते वक्त ज्यादा मजा आता है। ऐसा कोई किरदार तो नहीं है जिसे लिखने में कोई खास परेशानी आई हो।


प्रश्न (डॉ रुनझुन से): क्या इस शृंखला का कोई ऐसा किरदार है जो कि आप खुद से मिलता जुलता पाती हैं? अगर हां, उस किरदार और आपमें क्या क्या समानताएँ और असमानताएँ हैं?

रुनझुन: डॉक्टर मैत्रेयी एक फोरेंसिक एक्सपर्ट है। वो थोड़ी बहुत मेरी तरह है क्योंकि मुझे रिसर्च पसंद है मगर कॉलेज में मेरी एक प्रोफेसर थीं जिन्हें मैं मैत्रेयी में देखती हूँ। वो आज भी मेरी आदर्श हैं।  


प्रश्न(शुभानन्द से): आप उपन्यास के किस किरदार में अपना अक्स पाते हैं? उसमें और आपमें क्या क्या समानताएँ  और असमानताएँ हैं?

शुभानन्द: मुझे नहीं लगता कि इस शृंखला में कोई भी पात्र बहुत ज्यादा मेरी तरह है। वैसे भी एक लेखक अपने आपको थोड़ा बहुत अपने द्वारा पैदा किए गए सभी किरदारों में देखता है।


प्रश्न (दोनों से): अच्छा लिखते हुए क्या आप दोनों एक ही बार में किसी चीज से सहमत हो जाते हैं या पात्र, कथानक की दिशा या शैली को लेकर बहसें भी होती हैं? क्या इस उपन्यास के दौरान कोई प्रसंग ऐसा था जिसे लेकर आपकी आपसी सहमति नहीं थी? और ऐसे परिस्थिति आने पर आप उससे कैसे उभरते हैं?

रुनझुन: सहमति कभी होती है कभी नहीं। अगर बात के पीछे तर्क मिल जाता है तो असहमति समाप्त हो जाती है।

शुभानन्द: हाँ, अक्सर ऐसा होता है की सहमति नहीं बन पाती है ऐसे में हम उसे कुछ समय देते हैं क्योंकि ऐसा जब भी होता है इसका मतलब यही होता है कि उस विषय में और सोचना और रिसर्च करना जरूरी है।


प्रश्न(दोनों से): एक पुस्तक का शीर्षक उपन्यास के लिए बहुत महत्वपूर्ण होता है। द एसिड मैन के शीर्षक की क्या यात्रा रही है?  क्या ये शीर्षक शुरुआत में ही लॉक हो गया था या इसमें बदलाव हुआ था?

रुनझुन: पहले वर्किंग टाइटल था ‘मैन बिनिथ दि रोड’ पर उसका कोई अच्छा हिन्दी विकल्प पसंद नहीं आ रहा था। फिर एस टाइटल सोचा जो हिन्दी और अंग्रेजी दोनों में ठीक लगे और कहानी के साथ न्याय भी करे। 

शुभानन्द: उपन्यास शुरू करते वक्त से लगभग समाप्ति होने तक भी इसका शीर्षक एसिड मैन नहीं था बल्कि हम वर्किंग टाइटल ‘मैन बिनिथ दि रोड’ को लेकर चल रहे थे।  उसका हिंदी शीर्षक सोचा भी नहीं था। फिर कई शीर्षक सोचते सोचते आखिर में यह शीर्षक दिमाग में आया इस शीर्षक से कहानी का एक मुख्य मुद्दा भी उजागर हो रहा है जो हमारी समझ में जरूरी भी है।


प्रश्न(दोनों से): उपन्यास के लिए क्या आपको कोई विशेष रिसर्च करनी पड़ी थी? अगर हाँ, तो कौन से पहलुओं पर यह रिसर्च की थी?

रुनझुन: रिसर्च काफी करनी पड़ती है। मैं अभी भी रेगुलर फोरेंसिक मेडिसिन, फोरेंसिक ओडॉनटोलॉजी की किताबें और जर्नल्स नियमित तौर पर पढ़ती हूँ। 

शुभानन्द: जी हाँ, इस तरह के उपन्यास लिखने में काफी रिसर्च करनी पड़ती है काफी सारी ह्यूमन एनाटॉमी बीमारियाँ और फोरेंसिक की जानकारी मेडिकल टेस्ट केमिकल टेस्ट डीएनए टेस्ट इत्यादि जीना सिर्फ ऊपरी तौर पर बल की डीटेल में जानकारी इकट्ठा करनी पड़ती है।


प्रश्न(डॉ रुनझुन से): आपका मेडिकल बैक ग्राउंड है। इसका लेखक के तौर पर आप दोनों को विशेषकर इस तरह के लेखन में, जिसमें फोरेंसिक चीजों का ज्यादा महत्व है, कितना  फायदा होता है?

रुनझुन: बहुत फायदा होता है। यथार्थ से जुड़ी बातें लिखने में आसानी होती है। अक्सर फिल्मों में दिखाई क्राइम और फोरेंसिक से जुड़ी कई बातें पूरी तरह से सही नहीं होती हैं। मेडिकल बैकग्राउन्ड होने से सही टर्मिनालजी का प्रयोग और सही प्रोसीजर दिखा पाती हूँ।

 

प्रश्न(दोनों से): आप दोनों को किस तरह का लेखन पढ़ना पसंद है? क्या अपने अपने पसंदीदा उपन्यासकारों और उपन्यास के नाम साझा करना चाहेंगे?

रुनझुन: मैंने तरह-तरह की किताबें बचपन से पढ़ती आयी हूँ। एनिड ब्लाइटन (Enid Blyton), कैरोलीन कीन (Carolyn Keen) का  नैन्सी ड्रयू (Nancy Drew), एरिक सीगल (Eric Seagal)रॉबिन कुक (Robin Cook), अर्ल स्टेनली गार्डनर (Erle Stanley Gardner) का  पैरी मैसन (Perry Mason), सिडनी शेल्डन (Sidney Sheldon), अमीश त्रिपाठी (Amish Tripathi) का शिवा ट्रायलॉजी (Shiva Triology),   अश्विन सांघी (Ashwin Sanghi), डैन ब्राउन (Dan Brown) की लगभग सारी किताबें । मगर अब सालों से में दार्शनिक और अध्यात्म से जुड़ी किताबें पढ़ रही हूँ। इनमें स्वामी रामा, परमहंस योगानन्द, अघोरा, पुराण आदि शामिल हैं। अब मैं भगवत गीता पढ़ने की शुरुआत करने वाली हूँ। 

शुभानन्द: मैंने अपने जीवन में काफी विविध साहित्य पड़ा है हिंदी अंग्रेजी दोनों में। बचपन में एस सी बेदी (S C Bedi)एनिड ब्लाइटन (Enid Blyton), फिर वेद प्रकाश शर्मा (Ved Prakash Sharma), सुरेंद्र मोहन पाठक (Surender Mohan Pathak) को काफी पढ़ा। अंग्रेजी में सिडनी शेल्डन (Sidney Sheldon)एरिक सीगल (Eric Seagal), रॉबर्ट लुडलम (Robert Ludlum), रिचर्ड बाक (Richard Bach)डैन ब्राउन (Dan Brown)अमीश त्रिपाठी (Amish Tripathi), चेतन भगत (Chetan Bhagat) आदि कई लेखकों को पढ़ा है।


प्रश्न (दोनों से): आपके दोनों के आने वाले प्रोजेक्ट्स कौन से होने वाले हैं? क्या आपका एक साथ कोई अन्य शृंखला लिखने का इरादा है?

रुनझुन: आगे का मुझे पता नहीं। जिस दिन देवी का आशीर्वाद होगा उस दिन किताब आएगी। 

शुभानन्द: संयुक्त लेखन में फिलहाल कोई नई श्रृंखला तो नहीं बनाने का विचार आया पर क्राइम एम डी के अगले प्रोजेक्ट पर जल्दी ही काम शुरू करेंगे फिलहाल मेरा जावेद अमर जॉन सीरीज का नया उपन्यास ‘ड्रैगनफ्लाई’ अपने अंतिम चरणों में है और जल्द ही मार्केट में आ जाएगा।


प्रश्न(दोनों से): आखिर में बातचीत का पटाक्षेप करते हुए क्या आप पाठकों कोई विशेष संदेश देना चाहेंगे?

रुनझुन: आजकल किताब पढ़ना बहुत कम हो गया है। लोग ऑडियो शोज़, रील्स, यू-ट्यूब, पर ज्यादा समय बिताते हैं। मगर मेरा यही कहना है कि किताब पढ़ना कभी नहीं छोड़ें। हर तरह की किताब पढ़नी चाहिए । अपने दिमाग को किसी एक सोच से बांध कर रखना नहीं चाहिए। बहुत कुछ है दुनिया में जानने के लिये। 

शुभानन्द: पाठकों से बस यही कहना है कि ड्रॉप-डेड को उन्होंने जिस तरह से मौका दिया उसके लिए हम धन्यवाद करते हैं और उसी उत्साह को देखते हुए हम इस सीरीज को आगे बढ़ा पाए और अब द एसिड मैन आ चुका है इसे पढ़कर आपको कैसा लगा अच्छा या बुरा जैसी भी राय हो हम तक अवश्य पहुँचाएँ।


*****


तो यह थी लेखक द्वय डॉ रुनझुन सक्सेना और शुभानन्द से बातचीत। इस बातचीत के प्रति अपनी राय हमें आप टिप्पणी के माध्यम से बता सकते हैं। 

द एसिड मैन (The Acid Man) मार्केट में आ चुका है। आप इस पुस्तक को अमेज़न या सूरज पॉकेट बुक्स से मँगवा सकते हैं:

हिंदी संस्करण: अमेज़न | सूरज पॉकेट बुक्स

अंग्रेजी संस्करण: अमेज़न | सूरज पॉकेट बुक्स


पुस्तक का ट्रेलर 



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4 Comments
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  1. प्रकाशन और लेखन को अनूठा समर्पण। सराहनीय बातचीत। साधुवाद आपको विकास जी

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