बच्चे - प्रियंवद

गजानन रैना साहित्यानुरागी हैं। सोशल मीडिया पर अलग-अलग साहित्यिक रचनाओं में अपने खास अंदाज में लिखते हैं। उन्होंने लेखक प्रियंवद की कहानी 'बच्चे' पर कुछ लिखा है। आप भी पढ़िए। 

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प्रियंवद | Priyanvad
प्रियंवद | स्रोत: सेतु प्रकाशन

आज बात करते हैं एक ऐसे लेखक की जो हिन्दी साहित्य के परिदृश्य से अरसे से अनुपस्थित है, अंडररेटेड है और अद्भुत प्रतिभावान है।

हम बात कर रहे हैं प्रियंवद की।

हम अभी पढ़ रहे थे,  'उस रात की वर्षा में', लेकिन यह कथा उस संग्रह में नहीं है।

बस ऐवेंई याद आ गयी। एक दिन यह कहानी हिन्दी के क्लासिक्स में शामिल की जायेगी।

कहानी का नाम है, 'बच्चे'।

ज्ञानरंजन के कहानी के परिदृश्य से बहिर्गमन के बाद, संभवतः, यह दूसरी-तीसरी  महत्वपूर्ण कहानी है। यह एक क्लासिक और कालातीत कथा है।

कहानी का नाम 'बच्चे' है लेकिन इस कहानी के मुख्य चरित्र दो वृद्ध लोग हैं, एक आदमी और एक औरत।

बच्चे यहाँ गवाह हैं। पतंग उड़ाने वाले छोटे छोटे बच्चे हैं।

इस कहानी की अनजान चुप्पी और उसकी कालातीत रचनात्मकता उद्देश्य के अर्थ विस्तार में जाकर खंडित हो जाते हैं।
 
यह प्रेम कहानी बड़े ठंडे अंदाज में कहानी की नित नवीन कथात्मकता का पाठ दिखाती है। एक किताब है जिसका पहला पन्ना यदि 'उसने कहा था ' है तो उसका आखिरी पन्ना ' बच्चे ' नाम की कहानी है।

यदि आपको याद हो तो 'उसने कहा था' में दो बच्चे निश्छल प्रेम की उत्सुकता के साथ मिलते हैं।

इनमें से एक बच्चा बड़ा हो कर प्रेम की पूरी उम्र तक अपनी सूबेदारनी के संकेत मात्र पर उसके पति, पुत्र को बचाने के लिये मरने तक लड़ता है।

वह हारता नहीं, मर जाता है, लेकिन फिर मरना हारना थोड़े ही है।
 
'बच्चे' शुरू होती है, एक कस्बानुमा छोटे से शहर में गर्मियों की एक दोपहर है। नीम का एक पेड़ है, कौवे हैं, कबूतर हैं, जीभ निकाले हुये कुत्ते हैं और हैं दो बच्चे।

ये बच्चे नूरे की दुकान खुलने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। एक बच्चा पूछता है, 'क्या करें' तो दूसरा कहता है कि शायद नूरे जल्द ही दुकान खोल दे, नहीं तो उसका और लैला का किस्सा सुनेंगे।

यह दोनों, कच्ची उमर के दोस्त माँझा खरीदने आये हैं। वे आपस में बात करते हैं कि नूरे का माँझा कोई काट नहीं सकता, क्योंकि उसे लैला बनाती है।

नूरे और लैला अब बूढे हो चुके थे लेकिन उनकी जवानी की कहानियाँ शहर की हर जुबान पर थीं। उनके किस्से 
शहर की गलियों में पुराने बाशिन्दों की तरह टहलते थे।

किस्सों के मुताबिक नूरे शहर का सबसे अच्छा पतंगबाज था। कोई उसके मुकाबले का नहीं था, फिर एक दिन उसकी मुलाकात  लैला से हुई और लैला की स्याह काली आँखों ने शहर के नम्बर एक रंगबाज, अव्वल पतंगबाज नूरे की पतंग दिन दहाड़े काट दी।

यह एक इश्क की दास्तान है, लेकिन यहाँ पेंच भी लड़ते हैं और पतंग भी  कटती है।  दरअसल ये प्रतीक हैं , जो
कहानी में अनकहे बनने लगते हैं। प्रबुद्ध पाठक तक ये प्रतीक अपना अर्थ बनाते हैं।

आगे किस्सा तवील ( लंबा ) है। वक्त की बेरहमी कि लैला कोठे पर बिक जाती है और नूरे उसका एजेंट बनने को मजबूर होता है।

जब लैला की उम्र ढल जाती है, उसके पास बिकने लायक कुछ नहीं रहता , तब यानी उसके पास जवानी नहीं है, खूबसूरती नहीं है, चरित्र नहीं है, तब वह नूरे की घर वाली बनती है।

दोनों एक दूसरे का मुँह देखकर अपने बचे खुचे दिन काट रहे हैं।

फिर एक दिन बूढ़ी हो चुकी लैला, जो कभी शहर की सबसे खूबसूरत लड़की थी, खैराती अस्पताल में मर जाती है। नूरे उसके पास बैठा हुआ है। लैला की मैयत निकलती है। यह मैयत एक कब्रिस्तान के बगल से गुजरती है लेकिन कब्रिस्तान में यह यात्रा समाप्त नहीं होती , श्मशान की ओर बढ जाती है।

लैला की चिता जब जल चुकती है तो नूरे वहीं श्मशान में लुढक जाता है। उसके जीने की इकलौती वजह जो खत्म हुई तो उसने अपनी भी साँसों से हाथ छुड़ा लिया।

अब श्मशान से एक शवयात्रा शुरू होती है, कब्रिस्तान तक पहुँचने के लिए।

- रैना उवाच 


टिप्पणीकार परिचय

गजानन रैना



गजानन रैना बनारस से हैं। वह पढ़ने, लिखने, फिल्मों  व संगीत के शौकीन हैं और इन पर यदा कदा अपनी खास शैली में लिखते भी रहते हैं। 

एक बुक जर्नल में मौजूद उनके अन्य आलेख: गजानन रैना

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