विक्रम की डायरी: सुरेन्द्र मोहन पाठक की रचनाओं में मौजूद एक नायाब हीरा है 'एक करोड़ का जूता'

नीलेश पवार 'विक्रम' राज्य प्रशासनिक सेवा में कार्यरत हैं। वह होशंगाबाद, मध्य प्रदेश में रहते हैं। हिन्दी साहित्य और हिन्दी सिनेमा में उनकी विशेष रूचि है जिस पर वह अक्सर अपने विचार लिखा करते हैं। फेसबुक पर हिन्दी सिनेमा पर उनके लिखे पोस्ट जिन्हें वो विक्रम की डायरी से के अंतर्गत छापते हैं काफी चर्चित रहे हैं।

आज एक बुक जर्नल पर पढ़िए लेखक सुरेन्द्र मोहन पाठक के उपन्यास एक करोड़ का जूता पर उनकी एक पाठकीय टिप्पणी।

*****

समीक्षा: एक करोड़ का जूता | सुरेन्द्र मोहन पाठक | नीलेश पवार | विक्रम की डायरी


एक करोड़ का जूता लेखक सुरेन्द्र मोहन पाठक द्वारा लिखा गया थ्रिलर उपन्यास है। एक बालक के मन में उमड़ते विचारों की तीव्रता और भावनाओं के ज्वार को बहुत कुशलता से आधार बनाकर ये  उपन्यास पाठक साहब ने लिखा है और क्या खूब लिखा है । यह एक ऐसा उपन्यास जो दो दुनिया में एक साथ घूमता है। बचपन की दुनिया और जवानी की दुनिया।

1985 में प्रकाशित पाठक साहब का ये उपन्यास इस बात को सिद्ध करने में पूर्णतया सक्षम है कि क्यों सुरेन्द्र मोहन पाठक की लेखनी का जादू आज तक बरकरार है। किसी भी रचना की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि वो समय के सापेक्ष पठनीय रहती है या नही ? और पाठक साहब की रचनाएँ इस मापदंड पर पूर्णतया खरी उतरती है। पाठक साहब की रचनाओं में ये उपन्यास एक नायाब हीरा है जो आज भी उतना ही रुचिकर लगता है जितना अपने प्रकाशन के समय था। मानवीय संवेदनाओं के निरूपण और मनोवैज्ञानिक विश्लेषण में पाठक साहब की सिद्धहस्तता बेमिसाल है ।

भारत में शेयर मार्केट कंपनियाँ प्रारंभिक अवस्था में किस प्रकार कारोबार करती थी, तथा भारत में उस वक्त क्या बदलाव इस क्षेत्र में आ रहे थे, इसकी झलक भी इस उपन्यास में हमें मिलती है।

'एक करोड़ का जूता' एक ऐसे बेटे की कहानी है, जिसके बाप को पूरा जमाना बदमाश और लुटेरा सिद्ध करने पर तुला हुआ था और बाप था कि ढूँढे नहीं मिल रहा था। अपने पिता गोपाल को ढूँढना और सच्चाई का पता लगाना बेटे मोती  के लिए अपनी जिंदगी का अब सबसे अहम काम हो गया था क्योंकि बिना इस पहेली का हल तलाशे उसकी सफलता संदेह के घेरे में थी। क्योंकि आवतरमानी नाम धोखे का प्रतीक बन चुका था और बेटा मोती अपनी लाख योग्यता और ईमानदारी के बावजूद बाजार का विश्वास जीत पाने में असफल हो रहा था। साथ ही हर साल अपने जन्मदिन पर देश के अलग अलग स्थानों से मिलने वाले मनी आर्डर उसे ये विश्वास दिलाये रखते थे कि उसका बाप जिंदा है और अपने बेटे को आज भी भूला नही है ।

"हकीकत यही है कोतवाल साहब " - मोती तनिक कठिन स्वर में बोला -"कि मेरा बाप कैसा भी था आखिर मेरा बाप था और मैं उससे बहुत प्यार करता था। एक जिम्मेदार फरमाबरदार बेटा होने के नाते मेरा फर्ज बनता है कि मैं पता लगाऊँ कि आखिर उसे क्या हुआ था।'

'एक करोड़ का जूता' एक ऐसे बाप की कहानी है जो अपनी व्यवसायिक मजबूरियों के कारण वक्ती तौर पर कुछ गलत कदम उठाने के लिए मजबूर हुआ लेकिन ऐसा उसने अपने आने वाले समय में व्यवसायिक रूप से सफल होने तथा अपना और अपने बेटे का भविष्य सुखद बनाने के लिए ही किया ।

"इंसान अपनी तकदीर खुद बनाता है, बेटा । लेकिन अगर अपने बनाने वाले की रहनुमाई रहे तो मन को तसल्ली रहती है, इस "चैन" के माध्यम से तुझे हमेशा याद रहेगा कि तेरा साईं तेरे साथ है और तेरे सिर पर उसकी मेहर की छतरी हमेशा मौजूद है।"


'एक करोड़ का जूता' एक ऐसी प्रेयसी की कहानी है जो मिसेज आवतरमानी बनना चाहती थी पर बन न पाई।

"एक बात बताओ"- कुछ क्षणों बाद वह बड़े संकोच पूर्ण स्वरों में बोली- "कभी अपने डैडी की कोई खबर मिली"

गोपाल आवतरमानी ,मोती आवतरमानी, रानी, चक्की उर्फ शरदेंदु चक्रवर्ती, तम्हाणे, शंकरराव कोतवाल,भट्टाचार्य, ग्रेगरी अंकल, सोफिया, शांता, सुजाता, चौधरी, राज बुन्देला तथा कई अन्य किरदार है जो बहुत प्रभावित  करते है ।

1966 की दीवाली की रात, बिन माँ के अपने प्यारे बेटे मोती से बिना मिले, उसे सोता छोड़कर जब गोपाल अपना सफेद सूट पहनकर, तोते जैसी नाक वाले आदमी  के साथ घर से  निकलता है तो उपन्यास का  पूरा मध्यबिंदु यह क्षण बन जाता है। इसके बाद गोपाल का कुछ पता नही  चलता।            

17 साल बाद, दीवाली की रात को गायब हुए गोपाल आवतरमानी की तलाश करने के लिए खड़े हुए दोस्तो और दुश्मनों के साथ, जब मोती की अपने पिता को ढूँढने की लालसा जुड़ जाती है, तो कई पुराने किरदार नेपथ्य से आकर  वर्तमान में खलबली मचा देते है। इसी दौरान एक दिन अचानक गोपाल आवतरमानी अपने बेटे मोती को टेलीफोन करता है।

क्या गोपाल अपने प्यारे पिता से मिल पायेगा ?

क्या मोती अपने पिता को पहचान पायेगा ? क्या 'नशेमन' बन पाया ? एक करोड़ का जूता किसका था?उसमे एक करोड़ का क्या सामान था ? जूता आखिर किसे  मिला ? मोती अपने बाप गोपाल आवतरमानी से मिलने कहाँ गया ? क्या' गोपाल टावर' का  निर्माण पूरा हो पाया? क्या सकलानी को उसके पैसे वापस मिले ? ऐसे बहुत सारे सवाल पाठक को उपन्यास से बांधे रखते है और कहानी में दिलचस्पी बनाये रखते है।

एक बंधी हुई कहानी, उम्दा चरित्र चित्रण, सधे हुए डायलॉग, सस्पेंस ,थ्रिल और एक्शन का जबरदस्त कॉम्बिनेशन। बहुत बेहतरीन, बेजोड़ कहानी, जिसे आप बार बार पढ़ना चाहेंगे।

******

किताब: एक करोड़ का जूता | लेखक: सुरेन्द्र मोहन पाठक | पुस्तक लिंक: अमेज़न

यह भी पढ़ें



FTC Disclosure: इस पोस्ट में एफिलिएट लिंक्स मौजूद हैं। अगर आप इन लिंक्स के माध्यम से खरीददारी करते हैं तो एक बुक जर्नल को उसके एवज में छोटा सा कमीशन मिलता है। आपको इसके लिए कोई अतिरिक्त शुल्क नहीं देना पड़ेगा। ये पैसा साइट के रखरखाव में काम आता है। This post may contain affiliate links. If you buy from these links Ek Book Journal receives a small percentage of your purchase as a commission. You are not charged extra for your purchase. This money is used in maintainence of the website.

Post a Comment

0 Comments
* Please Don't Spam Here. All the Comments are Reviewed by Admin.

Top Post Ad

Below Post Ad