रावायण - सिद्धार्थ अरोड़ा 'सहर', मनीष खण्डेलवाल

राघवेन्द्र सिंह एक सजग पाठक तो हैं ही साथ में एक कुशल सम्पादक भी हैं। उन्होंने हाल ही में लेखक सिद्धार्थ अरोड़ा 'सहर' और मनीष खण्डेलवाल के उपन्यास रावायण पर एक टिप्पणी लिखी है। आप भी पढ़िए। 

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कई अज़ीज़ मित्रों से सिद्धार्थ अरोड़ा 'सहर' और मनीष खण्डेलवाल की इस पुस्तक 'रावायण' की बहुत तारीफ सुनी। अब क्योंकि पढ़ना मुझे उतना हीं पसंद जितना सुस्वादु भोजन तो इसे किंडल पर खरीदा और एक हीं बैठक मेँ ख़त्म किया । 

सिद्दार्थ को फेसबुक पर लम्बे समय से पढ़ा है । इनकी लेखनी प्रभावित करती है और कंटेंट व प्लॉट हर बार एक नवीन अनुभूति कराती है । इनकी एक अपराध कथा जिसका नाम भूल रहा हूँ जिसमें नायक बदला लेने जाता है बाईक से फिसल के गिरता है और उसे जिससे कोई आस नहीं थी उससे मदद मिलती है , काफी दिनों तक जेहन में  गूँजती रही थी । 

मनीष से कोई पूर्व परिचय नहीं था यद्यपि आभासी जगत में मित्र हैं पर रावायण को पढ़ने के बाद लगा कि जो कुछ सहर में कम था ठीक उतना हीं मनीष में अधिक है जिससे इस किताब का लेखन 'प्लग एंड सॉकेट' की तरह पूर्ण दिखा । 

कहानी के स्तर पर रावायण में एक नवीनता है । शुरू में हीं ये ग्रे शेड पकड़ लेती है और एक पापी परिवार का चित्रण वितिष्णा जगाता है । इसी मेँ दो किरदार जीतू और शमशेर (रावण) एक सुखद बयार की तरह हैं ।अपनी कमियों के बाद भी वो स्वाभाविक नायक हैं । लेखक द्वय ने मुँहफट जीतू और पारिवारिक जीवन में असफल शमशेर का बढ़िया चित्रण किया है । उर्मी प्रभावित करती है यद्यपि मेरा मानना है कि नायिका थी तो उसे थोड़ा मनभावन दिखाना था ना कि मोटी ,भारी आवाज़ वाली, बीयर पिलाने वाली। पता नहीं दोनों लेखकों ने अपनी किस गर्ल फ्रेंड से बदला लिया है? रामायण के प्रसंग बढ़िया बन पड़े हैं। क्लाइमेक्स के बैकग्राउंड में उसके डायलॉग मोहक है । गुलज़ार को पढ़कर बढ़िया लगा । ग़ालिब , फाकिर , मीर , शिफाई , फ़राज़ को कईयों ने कोट किया पर यहाँ "ओ साथी रे" ने ग़ज़ब का समाँ बांधा । विशाल भारद्वाज बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं और जब जब गुलजार का साथ पायें हैं कहर ढाये हैं ।  

उत्तरार्ध में कहानी एक संस्पेंस कथा का रुख अख्तियार कर लेती है और बुरे के अंत के साथ समाप्त होती है । 

शिकायत के कोटे मेँ इस कथा का संक्षिप्त होना, कहानी के अंत मेँ लेखक जब पाठक से मुखातिब है उसमें प्रूफ की कुछ गलतियाँ हैं । 

साथ हीं एक सवाल, क्या ऐसे भी परिवार हैं जिनसे इतनी नकारात्मकता झलके कि घृणा सी हो जाये। पर उपसंहार मेँ लेखक ने सबको कायदे से समेटा। दोनों को साधुवाद। लेखक सदा से समाज निर्माता रहें हैं और उनपर ये महती जिम्मेदारी कि चाहे कितनी भी आधुनिक कथा कहें पर बेसिक रूल से डेवियेट ना हो। 

क्राइम डज नॉट पे । 

और हाँ , SMP, गुलज़ार मेरे भी फेवरिट बस जगजीत को भी जोड़ लें तो फुल मैचिंग हो जाये । 

लेखक जब पाठक से मुखातिब है उसमें घटना नम्बर दो के मित्र से शायद मैं परिचित हूँ , उनका घंटाज्ञान ऐसे हीं विश्वप्रसिद्ध है तो उनकी बॉस से घंटा मिलना वेल अंडरस्टूड हीं था । 

लेखक द्वय को उज्जवल लेखन भविष्य की असीम शुभकामनाएं ...

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किताब: रावायाण , लेखक: सिद्धार्थ अरोड़ा सहर, मनीष खंडेलवाल, 
किताब लिंक: अमेज़न

लेखक परिचय:

राघवेन्द्र सिंह
राघवेन्द्र सिंह

राघवेन्द्र सिंह काशी के रहने वाले हैं। वह फिजिक्स और गणित से स्नातक हैं और उन्होंने कंप्यूटर में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा किया है। साहित्यानुरागी हैं और लेखन, पठन पाठन, संगीत और यात्रा में रूचि रखते हैं। 


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2 Comments
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  1. 😂 मनमोहक नायिका!

    ब्यूटी स्टेंडर्ड थोड़े ज्यादा ही हाई है। सबका निजी स्वाद है लेकिन इस तरह के बदलाव भी जरूरी है।

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