साक्षात्कार: अभिषेक जोशी

साक्षात्कार: अभिषेक जोशी

अभिषेक जोशी मूलतः इंदौर के रहने वाले हैं। वह 1999 से लेखन क्षेत्र में सक्रिय हैं।  उनकी अब तक तीन किताबें आ चुकी हैं और लगभग आधादर्जन किताबें प्रकाशन के लिए तैयार हैं। आखिरी प्रेमगीत और कोव 19 उनकी हाल ही में प्रकाशित हुई पुस्तकें हैं। 

एक बुक जर्नल ने हाल ही में अभिषेक से उनके जीवन, लेखकीय अनुभव और किताबों को लेकर एक बातचीत की। उम्मीद है यह बातचीत आपको पसंद आएगी। 

लेखक का विस्तृत परिचय निम्न लिंक पर जाकर पढ़ा सकता है:
अभिषेक जोशी

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प्रश्न: अभिषेक जी, नमस्कार। पाठकों को कुछ अपने विषय में बताएँ। आप मूलतः कहाँ से हैं और शिक्षा दीक्षा कहाँ पर हुई?

उत्तर: नमस्कार विकास जी। सबसे पहले तो आपका बहुत-बहुत धन्यवाद जो आपने अपने लोकप्रिय ब्लॉग के लिए मेरा इंटरव्यू लेने में रूचि दिखायी। 

वैसे तो मेरे बारे में अधिक कुछ बताने को नहीं है। मैं इंदौर से हूँ। मेरा जन्म, शिक्षा, कार्यक्षेत्र, आदि इंदौर ही रहा है। जन्म 27 अगस्त `1985 को हुआ।  मेरी स्कूली शिक्षा इंदौर के होली क्रॉस हायर सेकेंडरी स्कूल और आर.आर.एम.बी. गुजराती हायर सेकेंडरी स्कूल में पूरी हुई है। बाद में मैंने पी.एम.बी. गुजराती साइंस कॉलेज से बीएससी इन इलेक्ट्रॉनिक्स किया और  इंदौर के देवी अहिल्या विश्वविद्यालय के प्रसिद्ध विभाग  ई.एम.आर.सी. से एम.बी.ए. इन मीडिया किया। मैंने एक एडवरटाइजिंग एजेंसी में कॉपी राइटिंग और एक प्रकाशन में एडिटर कम कंटेंट राइटर भी रहा।

प्रश्न: साहित्य के प्रति आपका लगाव कब जागृत हुआ? वह कौन सी रचनाएँ या लेखक थे जिन्होंने साहित्य प्रति इस लगाव को बढ़ाया?

उत्तर: आज से करीब 23-24 वर्ष पहले की बात है।  मेरे पिता का दूध, नमकीन और मिठाई का व्यवसाय था।  मैं उनके साथ दूकान पर बैठा करता था या यों कहिए कि उनकी अनुपस्थिति में मैं ही दुकान देखता था। उस समय इंदौर इतना फैला हुआ नहीं था जितना कि आज है।  उस समय सड़कों पर बहुत कम लोग दिखाई पड़ते थे।  दोपहर में तो सड़कें बिल्कुल सुनी हो जाती था। लेकिन तब भी हमारी दुकान चालू रहती थी।  अमूमन दुकानदार दोपहर को आराम करने घर चले जाते थे।  मगर हम नहीं। मैं बैठा रहता था। अधिक  ग्राहक आते नहीं थे। सुबह और शाम को ही भीड़ होती थी।  दोपहर को टाइम पास नहीं होता था।  उस समय मोबाइल, इन्टरनेट नहीं आया था। कुछ अखबार अवश्य दुकान पर आते थे जिन्हें मैं पढ़ता था।  समय काटने का कोई और जरिया नहीं था। जो अखबार वाला हमारे यहां अख़बार डालता था उससे मेरी अच्छी जान पहचान हो गयी थी। एक दिन ऐसे ही उसके झोले में मैंने निगाह डाली। मैंने देखा कि उसके पास कई सारी पत्र-पत्रिकाएँ थी। बस फिर क्या था, मैंने एक-दो पत्र-पत्रिका उससे माँग ली।  उसने मुझे पत्रिकाएँ किराए पर देना शुरू कर दिया। पत्र-पत्रिकाएँ  पढ़ते हुए मुझे दूसरी किताबों के विषय में जानकारी हुई और मैंने उन्हें भी पढ़ना शुरू कर दिया।  इस तरह पढ़ने की मेरी आदत डल गई, जो बाद में शौक बन गया।  मैंने किन लेखक-लेखिकाओं को उस समय  पढ़ा मुझे ठीक से याद नहीं। लेकिन हाँ,  प्रेमचंद, टैगोर, रोमा रोला, मंटो, जयशंकर प्रसाद, अमृता प्रीतम, खुशवंत सिंह, ओशो, विवेकानंद आदि करीब 200-400 किताबें मैंने पढ़ी।   लोक व्यवहार (डेल कार्नेगी की) पहली पुस्तक थी जिसे मैंने सबसे पहले पढ़ा था। यह पुस्तक हमारी पहली पुस्तक आज भी मेरे पास रखी हुई है। यहाँ एक बात और बताना चाहूँगा कि मैंने कॉमिक्स भी खूब पढ़ी है। विशेषकर चाचा चौधरी, पिंकी, बिल्लू और नागराज को। 

प्रश्न: लेखन का ख्याल आपको कब आया? क्या आपको अपनी वो पहली रचना याद है जो आपने लिखी थी? वह क्या थी?

उत्तर: लिखना का ख्याल कभी नहीं आया मुझे। शुरुआत में अपने मन की भड़ास को बाहर निकालने के लिए लिखता था। ज़्यादातर वैचारिक मंथन और द्वन्द होते थे। निबंध या दार्शनिक लेख जैसे। बाद में बाल कविताएँ, लघु कथा और कहानियाँ लिखी। लेकिन सिर्फ शौक के लिए। ये  सब 1999 से 2008 तक चला। बाद में 2010 में पहला लघु उपन्यास यात्रा लिखा जिसे 2014 स्व-प्रकाशित किया। इसके बाद बिजनौर के देवता, इश्क समंदर, एक साधक की आत्मकथा, तेरी प्रेम कहानी, आखिरी प्रेम गीत, प्रेम वृक्ष जैसी आधा दर्जन से अधिक उपन्यास लिखे।

प्रश्न: आपकी पहली प्रकाशित रचना कौन सी थी? पाठको को उस विषय में कुछ बताएं।

उत्तर: मेरे ख्याल से इस प्रश्न का उत्तर ऊपर आ चुका है। लेकिन तब भी मेरे पहले लघु उपन्यास ‘यात्रा’ के बारे में कुछ बताया जा सकता है, जोकि बहुत विशेष है। पहले इसके कथानक के विषय में जान लीजिए। यह लघु उपन्यास उन पाँच युवकों के बारें में था जो ईश्वर की खोज में  एक यात्रा करते है। उनके प्रश्न अलग-अलग है लेकिन मंजिल एक ही है। सत्य क्या है?  वह क्या है जिसे जानने के बाद कुछ भी जानने की आवश्यकता नहीं।   

‘यात्रा’ को छपवाना मेरे जीवन का सबसे बुरा, लेकिन अनुभव की दृष्टि से श्रेष्ठ विचार था। एक उपन्यास को छपवाने के दौरान क्या-क्या करना होता है? यह मुझे यात्रा को छपवाने से पता चला। साथ ही यह भी ज्ञात हुआ कि सिर्फ अच्छा लिखना काफी नहीं। अच्छा लिखा हुआ पाठकों तक पहुँचना भी जरुरी है। मैंने अपना उपन्यास छपवा तो लिया लेकिन मैं इसे बेच नहीं पाया। जिस कारण उसकी 200 प्रतियाँ मुझे मुफ्त में बाँटनी पड़ी। सौ प्रतियाँ आज भी मेरे पास रखी हुई हैं। 

प्रश्न: आपने लेखन की शुरुआत 1999 से की और लगातार लिख रहे हैं। इतने वर्षों में लेखन और प्रकाशन की दुनिया में आपने क्या फर्क महसूस किया है?

उत्तर: मेरे विचार से अधिक अंतर नहीं पड़ा है। जो चला आ रहा है वहीं चल रहा है। शायद स्वरुप थोडा बदल गया है। जैसे कि आज इन्टरनेट के माध्यम से लेखक खुद अपनी किताब तेज़ी से पाठकों तक पहुँचा सकता है। 

इसके अलावा लेखन और प्रकाशन एक व्यवसाय अधिक बन गया है। जैसा हम पढ़ते थे कि लेखक की कलम से क्रांति हो जाती थी वैसी बात अब नहीं रही। लोग इधर पढ़ते है और उधर भूलते है।  

प्रश्न: आप शिक्षण के साथ लेखन कार्य करते हैं। आप यह सामंजस्य किस तरह बनाते हैं? क्या आपका लेखन का कोई रूटीन है?

उत्तर: मैं बताना चाहूँगा कि लिखने और पढ़ने को समय देने के लिए मैंने शिक्षण क्षेत्र में जाना चुना। साथ ही अपनी आध्यात्मिक यात्रा को जारी रखने के लिए भी शिक्षण क्षेत्र में जाना चुना। अन्यथा मेरे पास एक अमेरिकन कंपनी का ऑफर था। इंदौर की प्रसिद्ध मीडिया एजेंसी का ऑफर था। मेरे बहुत से मित्र जो मुंबई की माया नगरी में फिल्मों और सीरियल से जुड़े है नित्य प्रलोभन देते है कि मैं मुम्बई आ जाऊँ। अगर मेरे जीवन का उद्देश्य किसी की गुलामी करना होता तो शायद मैं कल्पना भी नहीं कर सकता था कि मैं कभी कुछ लिखूँगा। मुझे अपनी मर्जी से जीना था, अपनी मर्जी का करना था, अपनी मर्जी का लिखना था। जिसके लिए मैं सदैव प्रयासरत रहा और ईश्वर की कृपा देखिए आज मुझे अपने जीवन को अपनी मर्जी से जीने के लिए पर्याप्त समय होता है। मेरा पूरा दिन लिखने, पढ़ने,  पढ़ाने और चिंतन में गुजरता है। मुझे कोई योजना नहीं बनानी होती कोई सामंजस्य नहीं बैठना पड़ता। मैं बस लिख लेता हूँ।

प्रश्न: अब लेखक को लेखन के आलावा मार्केटिंग भी करनी होती है। आप इस अतिरिक्त जिम्मेदारी को किस तरह देखते हैं?

उत्तर: आपने सही फ़रमाया। लेखन के साथ मार्केटिंग की जिम्मेदारी जुड़ी हुई है। लेकिन हर लेखक यह नहीं कर सकता। जो कर सकता है, किस्मत वाला है क्योंकि उसकी किताब धड़ल्ले से बिकेगी। चाहे बुरी ही क्यों न हो एक बार तो बिकेगी। आज का युग मार्केटिंग का है। जो दिखता है,  वो बिकता है।

 मगर मेरे विचार से सच्चे लेखक का काम यह नहीं होना चाहिए। कोई व्यक्ति एक काम में अच्छा होता है, कोई दूसरे काम में। जो व्यक्ति जो कर सकता है, उसे वहीं करना चाहिए। हाँ, लेखक और प्रकाशक मिलकर कुछ मापदंडों को तय कर सकते है जिसमें दोनों का हित हो। 

प्रकाशक अपने खर्चे पर छाप रहा हो तो पाठकों तक किताबे पहुँचाने की जिम्मेदारी उसकी होना चाहिए। मार्केटिंग कैसे होगी? कहाँ होगी यह भी प्रकाशक तय करें। जैसे- किसी वस्तु, विचार या सेवा की मार्केटिंग होती है वैसे ही किताब की मार्केटिंग होना चाहिए। किन्तु जिम्मेदार व्यक्ति ही इस कार्य को अपने कन्धों पर लें।

प्रश्न: आपका उपन्यास आखिरी प्रेमगीत अपने अलग विषय के चलते पाठको को काफी पसंद आया था? इस उपन्यास को लिखने का विचार कैसे आया?

उत्तर: वैसे तो इस प्रश्न का उत्तर मैंने किताब के दूसरे-तीसरे पन्ने पर दिया हुआ है। किन्तु जो वास्तविक बात है वो उसमें मैंने नहीं लिखी है। आखिरी प्रेम गीत लिखने से एक दिन पहले मैंने तेरी प्रेम कहानी नामक उपन्यास लिखा था (यह उपन्यास फ्लाईड्रीम्स से अगस्त में आने की उम्मीद है।) इसे पूर्ण करने के बाद मैं सोच रहा था कि नेक्स्ट उपन्यास कौन सा होना चाहिए? निरंतर तीन-चार दिन तक मैं नए उपन्यास के विचार में पड़ा रहा। फिर पाँचवें-छठे दिन जब मैं कक्षा में छात्रों को पढ़ा रहा था, बाहर से बैंड बाजे की आवाज़ सुनाई दी। कोई बरात निकल रही थी।  जाने कोई अच्छी धुन बज रही थी जिसे सुनते हुए मेरे मस्तिष्क में तानसेन का ख्याल आ गया। मैं कक्षा से बाहर निकला और बरात देखने लगा। एक लड़की नाच रही थी। बस उसी क्षण आखिरी प्रेम गीत की सम्पूर्ण रूप रेखा सामने तैर गई। कक्षा पूरी होते ही मैंने आखिरी प्रेम गीत का पहला अध्याय लिखा- छोटा न बड़ा शहर। 

प्रश्न: आखिरी प्रेम गीत की कहानी दो ऐसे छात्रों की है जो संगीत महाविद्यालय में पढ़ते हैं और संगीत के इर्द गिर्द उनका जीवन घूमता है। क्या आपको इस विषय पर लिखने के लिए कोई शोध करना पड़ा था? अगर हाँ तो उसके विषय में कुछ बताएं।

उत्तर:  जी नहीं। मुझे कोई शोध नहीं करना पड़ा। वास्तव में इस उपन्यास में दिखाई गई कई घटनाएँ मेरे जीवन से सीधे जुड़ी हुई है। इसलिए मुझे उन्हें लिखने में कोई दिक्कत नहीं आई। उपन्यास में दर्शायी कुछ घटनाएँ जो संगीत से संबंधित हैं, उन्हें मेरे संगीतकार मित्रों की संगत में रहने से मैं पहले से जानता था। एक दफा खुद भी संगीत की ट्यूशन लेने का अवसर मिला था सो दिक्कत नहीं आई।

प्रश्न: आपका नवीनतम उपन्यास कोव 19 है जो कि समसामयिक विषय पर लिखा गया है। अपने इस उपन्यास के विषय में बताएँ?

उत्तर: वास्तव में इस उपन्यास का पूरा शीर्षक 'कोविड 19: अंत या एक नई शुरुआत' है। प्रकाशक ने इसे COV 19 कर दिया। यह एक तेज़ रफ्तार थ्रिलर है। जिसकी शुरुआत चीन के वुहान शहर से होती है। वहाँ के एक बाजार में पहली दफा चमगादड़ बिकने के लिए आए है। गतिविधि संदिग्ध है, क्योंकि चमगादड़ लाने वाला आदमी वाइट हाउस में फोन लगाता है और कहता है कि काम पूरा हो गया है! ठीक इसके बाद अमेरिका की डेमोक्रेटिक पार्टी के एक कार्यालय में डेव नामक व्यक्ति अपनी नेता नैंसी पार्कर को ख़बर देता है कि वाइट हाउस के इशारे पर चीन में बायोवेपन का प्रयोग हुआ है। नैंसी अपने संपर्क पर जाँच करवाने लगती है। CIA और उसकी खुफिया एजेंसी जाँच करती है। अब उन्हें तलाश है एक भगोड़े की जिसका नाम है शॉन पैट्रिक। 

इसी समय अंतराल में  इटली के रोम शहर में एक पादरी प्रवचन दे रहा है। वह नॉर्बेर्ट नामक एक बूढ़े के मन में ईश्वर के प्रति आस्था जगा रहा है। जिसके लिए वह बाइबल और दूसरे धर्मों की कहानियों का इस्तेमाल कर रहा है।  वास्तव में। ये कहानियाँ उस कारण की ओर इशारा करती है जिसके कारण वायरस को बनाया गया। 

इस उपन्यास का कथानक बहुत ही ताजगी भरा है। लेखन और भाषा शैली भी अत्यंत प्रभावशाली है। कई संवाद बहुत ही जबरदस्त है जैसे- ऐसी भी क्या खबर लाए हो! क्या आज फिर किसी ने राष्ट्रपति का मीम बनाया है? आज गंगा आरती के दौरान में  दो साधुओं से मिला। बड़े विचित्र थे। कह रहे थे कि युग परिवर्तन होने वाला है इसलिए प्रधानमंत्री जी को सचेत कर दो!

यह उपन्यास चीन, अमेरिका, इटली और भारत में विभिन्न घटनाओं को दर्शाता है। इसका अंत एक बहुत प्राचीन संगठन के मुखिया डॉ अश्वत्थामा के संवाद से होता है जो वाइट हाउस के भगोड़े को कहता है- हम फिर आएंगे। क्योंकि तीसरा विश्वयुद्ध एशिया की भूमि पर लड़ा जाएगा। यहाँ रॉ का एक एजेंट चीनी राष्ट्रपति की हत्या करने को निकलता है।

प्रश्न:  कोविड के विषय में अभी भी तथ्यात्मक जानकारी की कमी है। ऐसे में कोव 19 के लिए क्या आपने कोई शोध किया था? अगर हाँ तो किस तरह का शोध था?

उत्तर: जी हाँ! इस उपन्यास के लिए मैंने शोध किया था। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर घटी सभी घटनाओं पर मैंने लेख, खबरे और शोध पत्र पढ़े। उस समय तक जो कुछ भी मिला, उसका अध्ययन किया था। अभी भी इसके बारें में शोध कर रहा हूँ, क्योंकि उपन्यास के भाग दो पर कार्य कर रहा हूँ।

प्रश्न: कोव 19 एक थ्रिलर है जिसकी विषय वस्तु आखिरी प्रेमगीत से बिल्कुल जुदा है। क्या कोव 19 को लिखने की प्रक्रिया आखिरी प्रेमगीत से अलग थी? अगर हाँ तो इनमें क्या फर्क था? दोनों को लिखते हुए आपने क्या क्या बातें ध्यान में रखी थीं?

उत्तर: दोनों की प्रक्रिया, भाषा और शैली पूरी तरह से अलग है। जो मुख्य अंतर था वह था काल का, अनुभव का और जानकरी का। जैसे आखिरी प्रेम गीत के वाक्यों में आपको था/ थे/ थी ज़्यादा पढ़ने को मिलेगा। वहीं cov 19 के वाक्यों में है बहुत प्रयोग हुआ है।  भाषा की दृष्टि से आखिरी प्रेम गीत साहित्यिक लगता है वहीं cov 19 एक पठकथा जैसी लगती है। आखिरी प्रेम गीत जैसी रचना लिखने का मुझे अनुभव था जबकि cov 19 मेरा पहला थ्रिलर है तो इस बात पर बहुत ध्यान रखा कि पाठक हर पेज को पढ़ता जाए और उसे अंत तक मज़ा बना रहे।

प्रश्न: आपके आने वाले प्रोजेक्ट्स क्या हैं? क्या आप पाठकों को उसके विषय में बताना चाहेंगे?

उत्तर: मेरे आने वाले प्राजेक्ट्स - द रियल टाइम मशीन, तेरी प्रेम कहानी, प्रेम वृक्ष, भात से भगवान तक, तन्हाई के सत्तर हज़ार साल, cov 19-भाग दो हैं। 

प्रश्न: आखिर में अभिषेक जी बातचीत का पटाक्षेप करने पहले अगर आप पाठकों को कुछ कहना चाहें तो कह सकते हैं?

उत्तर: पाठको से केवल इतना कहना चाहूँगा कि अगर आपने मुझे अब तक नहीं पढ़ा है तो एक बार ज़रूर पढ़े। क्योंकि जो आप पढ़ेंगे वह आपने पहले कभी नहीं पढ़ा होगा। जो मैं लिखता हूँ वह इस लोक का होता ही नहीं है। मेरी प्रेरणाओं के विषय किसी अज्ञात लोक से आते है। शायद मुझे पढ़ते हुए आप भी उस लोक में विचरण कर सकेंगे जिसका आनंद उपभोग मैं करता हूँ।

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तो यह थी लेखक अभिषेक जोशी के साथ हमारी बातचीत। बातचीत के विषय में अपनी राय से हमें जरूर अवगत करवाइयेगा।

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