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Monday, February 22, 2021

पुस्तक अंश: हत्यारे की प्रेमिका - जनप्रिय लेखक ओम प्रकाश शर्मा

हत्यारे की प्रेमिका जनप्रिय लेखक ओम प्रकाश शर्मा की जगत श्रृंखला का उपन्यास है। यह उपन्यास धीरज पॉकेट बुक्स द्वारा प्रकाशित किया गया था। आज एक बुक जर्नल हम आपके लिए इसी उपन्यास का एक छोटा सा अंश लेकर आएं हैं। उम्मीद है आपको यह अंश पसंद आयेगा। 

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पुस्तक अंश: हत्यारे की प्रेमिका - जनप्रिय लेखक ओम प्रकाश शर्मा
मुजरा आरम्भ हो गया था।

साजिंदों के साज बज उठे थे और गुलाब तथा फिरोजा के पाँवों में बंधे घुँघरू झंकृत होने लगे थे। 

यह सही है कि नाचते हुए फिरोजा और गुलाब गा भी रही थी परन्तु जहाँ वह नृत्य में प्रवीण थीं वहाँ सुमन और काजल जैसा गाती नहीं थीं। अलबत्ता गायकी का गुण वह जानती थीं और बेसुरी नहीं थीं। 

एक गीत के साथ नृत्य समाप्त हुआ तो फिरोजा स्वयं ही पानों की तश्तरी हाथ में उठाये तमाशबीनों के पास आई। 

तमाशबीन उसकी तश्तरी में से पान के बीड़े उठा रहे थे और बदले में पाँच, दस या बीस के नोट तश्तरी में रखते जा रहे थे। 

अलबत्ता जगन और बंदूकसिंह पान उठाकर सौ-सौ के नोट रख रहे थे।

फिरोजा ने उन दोनों को विशेष प्रकार से आदाब बजाया। 

पान की तश्तरी सभी तमाशबीनों में घुमाकर अब फिर वे दोनों नये नृत्य की तैयारी कर रही थीं।

तभी वहाँ एक युवक का आगमन हुआ।

अजीब वेशभूषा थी। वह काले रंग की पतलून और सफेद आधी बाँह की कमीज पहने हुए था। ऐसी सर्दी में वह केवल आधी बाँह की कमीज ही पहने हुए था जबकि और तमाशबीन सूट अथवा कोट पहने हुए थे।

लड़खड़ाता-सा वह उस स्थान पर आया जो स्थान उसके लिए खाली रखा गया था। 

वहाँ बैठते हुए उसने कहा - 'फिरोजा बाई, अब चलते-चलते वाली चीज होगी। चीज पुरानी जरूर है लेकिन साली सीधे कानों के रास्ते दिल में उतरती चली जाती है। मुझे कोई मिल गया था सरे राह चलते-चलते।'

तब जबकि वह यह कह रहा था जगन और बंदूक सिंह ने एक-दूसरे की ओर देखा। आँखों-ही-आँखों में इशारा हुआ और दोनों उठकर खड़े हो गए। 

वे दोनों दरवाजे की ओर बढ़े ही थे कि उसने टोका - "तुम दोनों कहा जा रहे हो?"

- 'हम दोनों जा रहे हैं इसलिए कि हमें फ़िल्मी चीजें पसंद नहीं है।'

- 'जानते हो मेरा नाम जगपत है?'

- 'अब जान गये हैं- जगपत जी नमस्कार।'

- 'लेकिन तुम जा नहीं सकते, यह मेरा यानी जगपत का हुक्म है।'

सहज बंदूक सिंह ने पूछा - 'आप हमें हुक्म देने वाले कौन होते हैं?'

- 'यानी यह भी बताना होगा?'

- 'बता देंगे तो मेहरबानी होगी, परन्तु यहाँ नहीं। किसी के कोठे को बदनाम नहीं किया जाना चाहिए। अगर कुछ बताना ही चाहते हैं तो नीचे चले आइये।'

इतना कहने के बाद जाते-जाते उन लोगों ने परेशान-सी फिरोजा और गुलाब की ओर हाथ जोड़े।

उधर जगपत भी उठकर खड़ा हो गया था।

परन्तु जगपत की ओर बिना देखे ही वे दोनों कोठे से उतर आये थे और वहाँ से अर्थात कोठे की सीढ़ियों से कुछ हटकर वहाँ खड़े हो गये थे, जहाँ उनकी कार खड़ी हुई थी।

उन्हें नीचे आये कुछ क्षण ही हुए थे कि जगपत भी तेजी से सीढ़ी उतरता हुआ नीचे आ गया। 

बंदूकसिंह ने कहा - 'हम इधर खड़े हैं भाई साहब!'

वह उन दोनों की ओर बढ़ा और बोला - 'मेरा नाम जगपत है।'

- 'जी हाँ, हम आपका नाम जान चुके हैं।'

- 'मेरे सामने कोठे से उतर आना मेरा अपमान है।'

- 'गलत बात है, आपका कोई अपमान नहीं हुआ है। हमें फ़िल्मी गाने पसंद नहीं हैं, इस वजह से हम जा रहे हैं।'

- 'लेकिन मेरा हुक्म भी कोई चीज है।'

- 'हमें जानकारी नहीं है कि आप और आपका हुक्म क्या चीज है।'

- 'यानी तुम्हें जानकारी देनी ही होगी?'

- 'जी हाँ, अगर आप इस प्रकार की जानकारी देंगे तो आपकी मेहरबानी होगी।'

- 'मैं तुम दोनों पर मेहरबानी जरूर करूँगा।'

इतना कहकर जगपत ने अपनी पतलून की जेब में हाथ डाला और तभी बंदूकसिंह ने झपटकर उसका हाथ पकड़ लिया। 

यूँ जगपत ऐसा अनुभव कर रहा था, जैसे उसका हाथ लोहे के शिकंजे में जकड़ लिया गया हो। 

फिर भी उसके स्वर में रोब था। आदेश के स्वर में उसने कहा - 'अगर ज़िन्दगी चाहते हो तो मेरी कलाई छोड़ दो।'

- 'जी नहीं, हमें जिंदगी की नहीं मौत की तलाश है।'

जगपत दूसरे हाथ से बंदूकसिंह को काबू में करना चाह रहा था परन्तु पहले हाथ की कलाई बंदूकसिंह ने इस प्रकार मरोड़ दी थी कि वह कुछ तिरछा हो गया था।

बंदूकसिंह ने उसकी कलाई को ऊपर की ओर झटका दिया।

हाथ जेब से बाहर निकल आया। 

उस हाथ को थामे ही बंदूकसिंह ने उसकी जेब में दूसरा हाथ डाला। जेब के अन्दर से खूब बड़ा और आधुनिक ढंग का चाकू निकला। देखकर बंदूकसिंह मुस्कराया - 'वाह जगपत जी! यानी जेब में चाकू रखकर कोठे पर आते हैं।'

वह बिना खुला चाकू बंदूकसिंह ने अपनी जेब में रख दिया था।

- 'जाइए जगपत जी, हर समय अकड़ में मत रहा कीजिये। अब आप कोठे पर चले जाइए। शौक़ीन आदमी की तरह मुजरा सुनिए और इस तरह चाकू या छुरी जेब में रखा कीजिये।'

परन्तु जगपत ने पलटकर बंदूकसिंह पर मुक्का चलाना चाहा। 

बंदूकसिंह सावधान था, वह उसके वार को बचा गया और फिर उसने जगपत के कंधे पर एक मुक्का मारा तो वह चाहकर भी सम्भल नहीं सका। फुटपाथ पर ठीक कोठे की सीढ़ियों के सामने गिरा।

आश्चर्य!

जगन और बंदूकसिंह दोनों ने ही अब देखा कि फिरोजा और गुलाब के अतिरिक्त सभी तमाशबीन कोठे से नीचे आ गये थे और सभी ने शायद जगपत की दुर्गत होते देखी थी। 

यह भी अच्छा मजाक था कि बंदूकसिंह ने ही उस पर मुक्के का वार करके उसे गिराया था और उसने ही सहारा देकर उसे उठाते हुए पूछा - 'जगपत जी, चोट तो नहीं लगी।'

कुपित जगपत ने कहा - 'आज नहीं तो कल तुम जान जाओगे कि तुमने काले नाग को छेड़ा है।'

हँसा बंदूकसिंह - 'आप काले नाग नहीं हैं जगपतजी, आप इनसान हैं और इनसान की तरह ही अपना रहन सहन रखिये।'

- 'इस बात को दावे के साथ कह रहा हूँ कि तुम दोनों मेरे हाथ से ही मरोगे।'

- 'तब तो आपको जल्दी ही इस तरह का कार्यक्रम बनाना होगा।'

- 'कल तुम्हारी जिंदगी का आखिरी दिन होगा।'

- 'ओह! जानकर ख़ुशी हुई परन्तु हमें आप पाएँगे कहाँ?'

- 'दुनिया के दूसरे पर्दे पर भी चले जाओगे तो वहाँ भी खोज लूँगा।'

- 'इतनी दूर जाने की जरूरत नहीं है। हम यहाँ के नूरजहाँ होटल में ठहरे हुए हैं।'

- 'देख लूँगा।'

- 'मेरा नाम बन्दूकसिंह है।'

- 'बहुत से बन्दूकसिंह देखे हैं।'

- 'शायद देखे हों, परन्तु आपका चाकू मेरी जेब में है। अगर चाकू वापस चाहें तो भले आदमी की तरह नूरजहाँ होटल आ जाएँ।'

इतना कहने के बाद बंदूकसिंह ने फिरोजा और गुलाब की ओर फिर से हाथ जोड़े। इस छोटे-से हँगामे में जगन मात्र दर्शक ही रहा। 

बड़े इत्मीनान से बंदूकसिंह ने कार का ताला खोला और कार स्टार्ट कर दी। 

जगपत हतप्रभ सा खड़ा था, नहीं जानता था कि इधर जाए या उधर जाए।

(नोट: इस अंश का लक्ष्य पाठक के मन में लेखक की कृति के प्रति उत्सुकता जगाना भर है।)

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किताब की समीक्षा: हत्यारे की प्रेमिका

© विकास नैनवाल 'अंजान'

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