एक बुक जर्नल: एक ही रास्ता - सुरेन्द्र मोहन पाठक

Monday, June 15, 2020

एक ही रास्ता - सुरेन्द्र मोहन पाठक

उपन्यास जून 3 2020 से जून 5 2020 के बीच पढ़ा गया

संस्करण विवरण:
फॉर्मेट : पेपरबैक 
पृष्ठ संख्या: 304
प्रकाशक: तुलसी साहित्य पब्लिकेशनस

एक ही रास्ता - सुरेन्द्र मोहन पाठक
एक ही रास्ता - सुरेन्द्र मोहन पाठक


पहला वाक्य: 
साहिल सरीन और सुनीत सरीन माँ जाये सगे भाई थे जो कि बरसों से काठमांडू में स्थापित थे।

कहानी:
साहिल सरीन और सुनीत सरीन दो सगे भाई थे। नेपाल में बसे ये भाई अपने अपने जीवन में व्यस्त थे। दोनों ही व्यापारी थे और अपने अपने व्यापार में मशरूफ रहते थे। पर एक दिन जब सुनीत को ड्रग्स बेचने के इल्जाम में पकड़ा गया तो साहिल के पाँव के नीचे से जमीन ही खिसक गयी। उसे ये अंदाजा नहीं था कि उसके भाई का ऐशोआराम इस गैरकानूनी धंधे की नेमत थी।

वह अपने भाई के लिए दुखी था और उसे बचाने के लिए कुछ भी करना चाहता था। लेकिन साहिल कहाँ जानता था कि जिस राक्षसी धंधे ने उसके भाई को बर्बाद किया वही राक्षसी धंधा अब उसके जीवन को लीलने वाला था। परिस्थितियाँ ऐसी हो गयी कि उसे उसी दलदल में उतरने के लिए मजबूर होना पड़ा जिसमें जाकर उसके भाई सनीत की यह दुर्गत हुई थी।

उसके पास केवल एक ही रास्ता बचा था। उसे भी अब ड्रग्स का धंधा करना था।

आखिर साहिल को सुनीत के नक्शे कदम क्यों पर चलना पड़ा?
साहिल के जीवन में इस फैसले के बाद क्या बदलाव आये?
साहिल के लिए इस एक ही रास्ते पर चलने के क्या परिणाम हुए?

ऐसे ही प्रश्नों के उत्तर आपको इस उपन्यास को पढ़ने के पश्चात मिलेंगे।
मुख्य किरदार:
सुनीत सरीन - एक भारतीय व्यापारी जो कि नेपाल में बसा हुआ था और मोटा हिन्दुस्तानी के नाम से जानता था 
साहिल सरीन - सुनीत का छोटा भाई
बुद्धिमान - एक नेपाली छोकरा जो कि मुंबई में ड्रग कूरियर था 
परिजात थापा - पैनोरमा नाम की नाईट क्लब की होस्टेस 
नसरुल्लाह - एक अफगान जिससे मिलने सुनीत होटल पहुँचा था 
रज्जाक बोरीवली - मुंबई का एक ड्रग डीलर 
बिलाश सिग्देल - सुनील का वकील 
धनुष तुलाधर - नेपाल नारकोटिक्स ब्यूरो का चीफ इंस्पेक्टर 
आलोक पाटिल - भारतीय नारकोटिक्स ब्यूरो का एक अधिकारी 
दसाप्रतामा - एक ड्रग लार्ड जो कि नेपाल और आस पास के देशों में हेरोइन का धंधा करता था 
रोशन चौधरी - नेपाल का एक सफेद पोश व्यापारी जो कि ड्रग के धंधे में लिप्त बताया जाता था 
इकबाल उर्फ़ गोल्डी चौधरी - रोशन का इकलौता बेटा 
भृगु रायामांझी - चौधरी का फ्रंट 
रामरूद्र - जेल में मौजूद एक हवलदार 
स्यू अलेमाओ - एक गोवनी पत्रकार जो कि साहिल की प्रेमिका थी 
पीटर ग्रांट - अमेरिका के डी ई ए का रीजनल हेड 
माधव दीक्षित - नेपाल पुलिस में एक सब इंस्पेक्टर 
सायरस स्क्रूवाला, अरविन्द गोखले - मुंबई के ड्रग डीलर्स 
हीरानन्द अटलानी - मुंबई के ड्रग डीलर्स के साथ का बिचौलिया 
राजलक्ष्मी खनाल - रॉयल नेपाल एयरलाइन्स की एयर होस्टेस 
राम बहादुर बिष्ट - नेपाल पुलिस में एक सब इंस्पेक्टर 
योसविचित - एक बिचौलिया जिसकी चियांग माई में एक हैण्डी क्राफ्ट्स की दुकान थी 
इंस्पेक्टर इला कनितकर - नारकोटिक्स कण्ट्रोल ब्यूरो में इंस्पेक्टर 
भैरव मैनाली - भृगु रायमांझी का दायाँ हाथ

मेरे विचार:
एक ही रास्ता सुरेन्द्र मोहन पाठक जी का एक थ्रिलर उपन्यास है जो कि 2003 में प्रकाशित हुआ था।  यह उपन्यास पाठक जी का थ्रिलर उपन्यास है जो कि वो उपन्यास होते हैं जिन्हें किसी भी सीरीज में नहीं रखा जाता है। इस उपन्यास में मौजूद लेखकीय में पाठक साहब इसी विषय पर बात करते हैं कि कैसे उनके लिखे विविध उपन्यासों को थ्रिलर की श्रेणी में रखा जाता है और क्यों वह विविध से ज्यादा सही श्रेणी है। इसी लेखकीय में पाठक साहब हेरोइन नामक ड्रग्स और इसे वितरित करने वाले ड्रग लॉर्ड्स और इस धंधे के विषय में भी जानकारी पाठको को मुहैया करवाते हैं। चूँकि उपन्यास का मूल कथानक इसी ड्रग और उसके कार्टेल के इर्द गिर्द बुना गया है तो यह जानकारी रोचक हैं। 

उपन्यास के कथानक की बात करूँ तो यह कथानक आपको बाँध कर रखता है। उपन्यास की शरूआत पुलिस के फंदे से होती है जिसमें की सुनीत फँस जाता है। सुनीत के फँसने के बाद उसके भाई साहिल की जिंदगी में क्या तूफ़ान आता है और वो कैसे इस दलदल में फँसता है और फिर आखिरकार इससे निजाद पाता है यही कथानक बनता है। 

पुलिस, साहिल और ड्रग माफियाओं के बीच चलते दाँव पेंच आपको उपन्यास पढ़ते चले जाने को मजबूर कर देते हैं।  पाठक साहब के कथानकों का एक गुण यह भी होता है कि उनके चरित्र काल्पनिक नहीं बल्कि यथार्थ के निकट होते हैं तो इस उपन्यास में भी वही देखने को मिलता है। इनमें से कोई भी सुपर हीरो नहीं है। साहिल एक अच्छा इनसान है जो कि भाई के परिवार के लिए इस दलदल में फँस जाता है। उसके लिए आपको दुःख भी होता है। इला कनितकर का किरदार भी मुझे रोचक लगा। वहीं दसाप्रतामा का किरदार प्रभावशाली जरूर है लेकिन जब एक बार वो क़ानून के चंगुल में फँस जाए तो उनकी क्या दुर्गत होती है यह देखते ही बनता है। वो कहते हैं न डर सबको लगता है कहानी का अंत यही चरित्रार्थ करता है।


ड्रग्स का धंधा कैसे न केवल करने वाले को बल्कि करने वाले के मासूम रिश्तेदारों की भी जिंदगी बर्बाद कर सकता है यही उपन्यास दर्शाता है। साहिल के लिए आपको बुरा लगता है। वहीं उपन्यास में पैसे की ताकत से कैसे क़ानून खरीदा बेचा जाता है गोल्डी चौधरी वाले प्रसंग से पता लगता है। कैसे कानून के रखवाले अपनी नौकरी छोड़ अपराधियों के साथ मिली भगत करते हैं यह भी दर्शाता है। कैसे अपराधी उन्हें कभी उनकी अति महत्वकांक्षाओं के चलते या कभी मजबूरी के चलते फोड़ने में सफल होते हैं यही इसमें दिखता है। लेकिन जैसे पाँचों उँगलियाँ बराबर नहीं होती है वैसे ही इस उपन्यास में ऐसे पुलिस अफसर भी हैं जो कि कर्तव्य परायण हैं और अपने कर्तव्य के चलते अपनी जान भी जोखिम में डालने में नहीं हिचकते हैं। आलोक पाटिल, इला कनिकतर ऐसे ही अफसर हैं। ऐसे ही ईमानदार अफसरों के वजह से यह सिस्टम टिका हुआ है और हमे ऐसे ही अफसरों का शुक्रगुजार होना चाहिए। 

उपन्यास भाई भाई के प्रेम के ऊपर भी है लेकिन अंत यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या सच में भाई या रिश्तेदार के लिए गलत कदम उठाना जायज है। कई बार हम लोग रिश्ते के प्रेम में डूबकर कई गलत कदम उठाते हैं लेकिन क्या सच में वो उस रिश्तेदार का भला करते हैं या उसे और गलत कदम उठाने के लिए मजबूर कर देते हैं। यह उपन्यास सुनीत और साहिल के रिश्ते के माध्यम से यह सोचने पर भी मजबूर कर देता है।

हाँ, कई जगह कथानक की गति कम जरूर होती है लेकिन  उस वक्त किरदार इतनी जटिल परिस्थितयों में होते हैं कि यह धीमी गति आपको खलती नहीं है। एक दो जगह नामों की गलती है जैसे एक बार साहिल को राहुल कहा है और एक जगह नीली गाड़ी को सफेद कहा गया है।ऐसी छोटी मोटी दो तीन प्रूफ की गलतियाँ हैं लेकीन वो इतनी खलती नहीं है। मेरे पास जो प्रति थी उसमें एक इशू यह भी था कि पृष्ठ आगे पीछे थे जिससे कथानक पढ़ते हुए थोड़ा परेशानी हुई थी लेकिन चूँकि कोई पृष्ठ गायब नहीं थे तो ज्यादा दिक्कत नहीं हुई।

अंत में मैं तो यही कहूँगा कि एक ही रास्ता एक पठनीय उपन्यास है जो कि शुरुआत से लेकर अंत तक आपका मनोरंजन करता है। अगर आपने इसे नहीं पढ़ा है तो आपको इसे एक बार जरूर पढ़ना चाहिए।

रेटिंग: 4/5


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© विकास नैनवाल 'अंजान'

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