एक बुक जर्नल: पृथ्वी के छोर पर - डॉ शरदिन्दु मुकर्जी

Monday, May 4, 2020

पृथ्वी के छोर पर - डॉ शरदिन्दु मुकर्जी

किताब मार्च 22 2020 से अप्रैल 2020 के बीच पढ़ी गयी

संस्करण विवरण:
फॉर्मेट: पेपरबैक
पृष्ठ संख्या: 232
प्रकाशक: अंजुमन प्रकाशन
आईएसबीएन: 9789386027290

पृथ्वी के छोर पर - डॉ शरदिन्दु मुकर्जी
पृथ्वी के छोर पर - डॉ शरदिन्दु मुकर्जी

पहला वाक्य:
याद है, स्कूल के भूगोल की पाठ्य पुस्तक के किसी पन्ने पर पानी में तैरते हुए एक हिमखण्ड का स्केच बना हुआ था।


यात्राएँ करना जीवन में कितना जरूरी है यह बात शायद सभी जानते होंगे। यात्राओं को लेकर लिखी विभिन्न सूक्तियाँ और यात्रा करने के फायदे गिनाते लेखों से कभी न कभी आपका सामना हुआ ही होगा। लगभग सभी को पता है कि यात्राएँ हमारे सर्वांगीण विकास के लिए कितनी जरूरी हैं। अक्सर कहा भी जाता है कि अगर आपको व्यक्ति को जानना है तो उसके साथ एक लम्बी यात्रा पर चले जाएँ। जब यात्रा खत्म होगी तब आप उसके विषय में काफी कुछ जान चुके होंगे। यात्राओं के जरिये न केवल हम नई जगहें देखते हैं बल्कि यह हमारा पुनर्निर्माण भी करती हैं। हम काफी चीजें सीखते हैं, हमारी काफी आदते टूटती हैं और हर यात्रा के बाद आप खुद को कुछ अलग सा पाते हैं।

लेकिन हर व्यक्ति के लिए यात्रा करना मुमिकन नहीं होता है। फिर वह यात्रा कर भी ले तो भी दुनिया में कई ऐसी जगहें हैं जहाँ की यात्रा वो शायद ही इस जीवन में कर पायेगा। ऐसे में यात्रा वृत्तांत ऐसे साधन होते हैं जो हमे शब्दों के पंखों पर बिठाकर ऐसी यात्रा करवाते हैं जहाँ हम सशरीर न जा सकते हों। हम लेखक की नजर से चीजों को देखते हैं और कई बार कुछ ऐसा देख लेते हैं जो शायद उधर जाकर खुद भी न देख पाते। इसलिए व्यक्तिगत तौर पर मेरा मानना है कि एक यात्रा वृत्तांत भी आपको यात्रा के सभी नही तो कुछ तो फायदे दे ही देता है। इन वृत्तांतों के लेखकों के अनुभवों से आप सीखते हैं, उनके नजरिये से चीजों को देखते हैं और उस रोमांच का अनुभव तक कर लेते हैं जो लेखकों ने उस यात्रा में किया था।

इसलिए मैं जब यात्राएँ करने में खुद को असक्षम पाता हूँ तो यात्रा वृत्तांत पढ़कर अपनी  घुमक्कड़ी की इस क्षुधा को शांत कर लेता हूँ। अब सोचिये अगर डॉ शर्दिन्दु मुकर्जी जी की लिखी यह पुस्तक पृथ्वी के छोर पर नहीं होती तो क्या मुझे अंटार्कटिका घूमने आने का मौका मिलता? शायद नहीं।

पृथ्वी के छोर पर डॉक्टर शरदिंदु मुखर्जी के यात्रा संस्मरणों की किताब है। डॉक्टर शरदिंदु मुकर्जी एक भूवैज्ञानिक हैं जो कि भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण में कार्यरत थे। अपने कार्य के चलते उन्हें कई दुरूह प्रदेशों में जाने का मौका लगा और उन्होंने अपनी इन यात्राओं की यादों को इस पुस्तक के रूप में संजोकर अब पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया है। शरदिंदु जी ने अपने कार्यकाल के दौरान चार बार अन्टार्कटिका यात्रा की है। इन यात्राओं में से एक यात्रा (91-92 के भारतीय अभियान) में उन्होंने दल नेता की भूमिका भी निभाई है और 9 वें भारतीय शीतकालीन दल के स्टेशन कमांडर का दायित्व भी उन्होंने सम्भाला है।

इस किताब में उनके अंटार्कटिका के अभियान के संस्मरण तो मौजूद हैं ही इसके अलावा मॉरिशस की यात्रा(अंटार्कटिका जाते हुए यह एक पड़ाव होता है) और वेडेल समुद्र  क्षेत्र में किये गये अभियान के संस्मरण भी मौजूद हैं।



अंटार्कटिका हमेशा से ही एक रहस्यमय प्रदेश रहा है। सोचिये वो जगह कैसी होगी जहाँ चारो तरफ बर्फ ही बर्फ होगी? और न केवल बर्फ ही बर्फ होगी बल्कि दिन भी महीनों के होंगे और राते भी महीनों लम्बी होंगी। ऐसी रहस्यमय जगह पर कुछ समय व्यतीत करना हर घुम्मकड की चाह होगी। लेकिन अफ़सोस हम आम से जीवन जीने वाले लोग शायद ही यह इच्छा पूरी कर सके। न हमारी नौकरियाँ इसकी इजाजत देंगी और न ही हमारी जेबें।

ऐसे में यह यात्रा संस्मरण पढ़कर हम अपनी इस इच्छा को जी सकते हैं। इस किताब के विषय में मुझे जानकारी कैसी हुई यह बात भी रोचक है। मुझे इस यात्रा संस्मरण के विषय में एक यात्रा के दौरान ही पता चला था। जब जुलाई 2017 में मैं फूलों की घाटी गया था तो अपने यात्रा के साथी राकेश भाई से इस किताब के विषय में पता चला था। वो उस यात्रा के दौरान इसे पढ़ चुके थे और उन्होंने इसकी काफी तारीफ़ की थी। मैंने उस वक्त उनसे किताब को आगे जाकर पढ़ने का वादा किया था। और फिर दिसम्बर 2017 में मैंने इस किताब को खरीद कर रख लिया था। मेरी यह आदत हमेशा से ही रही है कि मैं किताब खरीद लेता हूँ और फिर उसे रख देता हूँ। यही कारण है किताबें खरीदने के काफी वर्षों बाद उन्हें पढ़ पाता हूँ। इस किताब को भी लगभग तीन वर्ष बाद ही पढ़ पाया हूँ।


किताब की बात करूँ तो किताब शुरुआत से ही आपका मन मोह लेती है। किताब छोटे छोटे छत्तीस अध्यायों में विभाजित है। लेखक बिना ज्यादा शब्द या पृष्ठ खपाए सीधे मुद्दे की बात पर आ जाते हैं और जल्द ही यात्रा के विषय में लिखने लगते हैं। छोटे छोटे अध्यायों के माध्यम से आपको यह पता चलता कि यह सफर कैसा रहा था। किधर से सफर शुरू हुआ था और कहाँ जाकर खत्म हुआ था। इस सफर के दौरान उनके अनुभव कैसे रहे थे? उनके कोतुहल, उनकी हैरानी को आप महसूस कर पाते हैं।

सफर में समुद्री यात्रा भी मौजूद है तो उधर के कुछ रीति रिवाज होते हैं उनका जिक्र भी किया गया है। आप इससे समुद्री यात्रा के रीति रिवाजों, उधर आने वाली परेशानियों और उनसे जूझने के तरीकों से भी वाकिफ होते हैं। वहीं लेखक और उनके साथियों को कई कई महीनों तक मानव सभ्यता से अलग थलक इधर रहना पड़ता था। इस दौरान उनकी मनः स्थिति क्या होती है उस का भी बेहतरीन चित्रण लेखक ने किया है। लेखक ने यह यात्राएं तब की थी जब न आज की तरफ जनसंचार के माध्यम इतने विकसित नहीं हुए थे। आज जाने वाले दल केअनुभवों और उस वक्त के दल के अनुभवों में क्या फर्क है इसे भी लेखक समय समय पर रेखांकित करते हैं।चूँकि लेखक ने चार बार अन्टार्कटिका की यात्रा की है तो उन्होंने हर बार की यात्रा  से जुड़े रोचक संस्मरण इधर साझा किये हैं। उन्होंने इस बात का खास ध्यान रखा है कि इन संस्मरणों को साझा करते वक्त कहीं बातों का दोहराव न हो।

अन्टार्कटिका एक रहस्यमय प्रदेश है और इधर जाने वाले व्यक्तियों को अजीबों गरीब अनुभव होना लाजमी है। इस संस्मरण में इन अनुभवो  का भी जिक्र किया गया है। रात में दिखती आग की लपटें हो या सुनसान इलाके में सुनाई देने वाली गोली की आवाज या आसमान में दिखता एक उल्टा जहाज। इस यात्रा संस्मरण में इतने अजीबों गरीब चीजें होते हुए आप पढ़ते हैं कि किताब को छोड़ने का आपका मन नहीं करता है। एक अध्याय आप समाप्त करते ही दूसरा शुरू करने की चाह मन में बलवती हो जाती है।


मुश्किल से दस-बीस कदम ही बढ़े थे कि बायीं ओर के कच्चे पहाड़ के ऊपर से बोल्डरों का गिरना शुरू हुआ और हम सँकरे, मिट्टी कीचड़ से सने रास्ते में फँस गये। हमारे दाहिनी ओर कई हज़ार फीट की खाई थी, अतः कहीं भागने का प्रश्न ही नहीं उठता था। सौभाग्य से आठ-दस फीट की दूरी पर दो बड़े बोल्डर दिखे जिनके स्थायित्व के बारे में थोड़ा आश्वस्त हुआ जा सकता था। बिना किसी आदेश या विचार विनिमय के स्वाभाविक प्रवृत्ति से प्रेरित हम दोनों ने उन दोनों ने उन विशाल बोल्डरों के नीचे उकडू बैठकर शरण ली।लगभग दो घण्टे तक छोटे-बड़े बोल्डरों की बारिश होती रही। हर पल पहाड़ के ही टूट मर ढह जाने का खतरा था। यह भी सम्भव था कि हम जिनके शरण मे बैठे थे वही दो बोल्डर लुढ़क कर हमारी जीवन लीला पर पर्दा डाल देते।
(पृष्ठ 22)

जीवन की पहली समुद्र यात्रा -जहाँ तक सम्भव हो मैं अधिकतर समय जहाज के डेक पर ही बिताता था। पूरे 360० में क्षितिज से क्षितिज तक सिर्फ और सिर्फ गहरा नीला लहराता समुद्र। पहली बार आभास हुआ स्कूल के दिनों में फाउंटेन पेन की नीली स्याही को क्यों नेवी ब्लू इंक कहा जाता था।
(पृष्ठ 25)

जहाज सामने पीछे और बायें दायें डोलने लगा। किचन में बर्तन लुढ़के, खाने की मेज से क्रोकरी। हॉल में टेबल कुर्सी जिन्हें गलती से हम बाँधना भूल गये थे, एक दीवार से दूसरे दीवार की ओर खिसकते और फिर वापिस अपनी जगह आ जाते। मेरे लिए यह असाधारण अनुभव था। एक दो बार नहीं, एक दो घंटे के लिए भी नहीं, यही स्थिति बनी रही लगातार कई दिनों तक।जहाज में अधिकतर लोग शारीरिक संतुलन बिगड़ने के कारण उलटी करने लगे।
(पृष्ठ 28)

बड़ी मुश्किल से जब मैं दक्षिण गंगोत्री की छत पर चढ़ा तो सामने का दृश्य देख कर हैरान रह गया। तूफ़ान तेज चलने के बावजूद उड़ते बर्फ के कं अब मेरी दृष्टि को बाधित नहीं कर रहे थे क्योंकि मैं जमीन से 15 फीट ऊपर था। समुद्र की तरफ मैंने देखा कि आसमान में एक जहाज उल्टा लटका हुआ है।
(पृष्ठ 52)

महीनों की थकावट से शरीर चूर चूर हो रहा था। हम दोनों बिना कोई बात किये कम्बल के नीचे घुस गये। नींद ठीक से आई या नहीं ध्यान नहीं है- बंदूक से गोली चलने की आवाज़ ने हमें तटस्थ कर दिया। आँखें खुल गयीं और एक अजीब सा डर मन में डेरा डालने लगा। बंदूक अर्थात अपराध, क्या अंटार्टिका में भी अपराध भावना हमारा पीछा नहीं छोड़ेगी?..एक...दो...तीन...लगातार तीन धमाके और हुए। अब लेटे रहना अनुचित भी था और असम्भव भी।
(पृष्ठ 60)

समुद्र के ऊपर आसमान में आग की लपटें उठ रही थीं। लग रहा था किसी बड़े शहर में भीषण आग लग गयी है और मैं 15-20 किलोमीटर दूर से उसे निहार रहा हूँ। मैं जानता था कि शहर तो दूर की बात, मनुष्य की निकटतम अवस्थिति एक सौ किलोमीटर दूर रूसी अनुसन्धान केंद्र... था..। अतः मन ने कहा यह आग किसी बड़े जहाज में लगी होगी।... तभी ध्यान आया कि समुद्र तो लगभग 2000 किलोमीटर तक जम गया है। कोई जहाज आ भी तो नहीं सकता।
(पृष्ठ 68)

जब हमने बंदरगाह में जहाज से उतरकर कदम रखे तो विचित्र अनुभूति हुई। सोलह महीने बाद किसी पक्की सड़क पर हमने पैर रखे थे। सोलह महीने बाद ट्रैफिक से बचकर चलने पर हम मजबूर हो रहे थे और सोलह महीने बाद वृक्ष, हरी घास, रंगीन फूल देख रहे थे स्वाभाविक परिवेश में। हम लोग जो शीतकालीन दल के सदस्य थे, आँखें फाड़े नजारा देख रहे थे और चिरपरिचित दृश्यों से नए सिरे से एकात्म होने का प्रयास कर रहे थे।
(पृष्ठ 124)

मैं अपनी बात कहूँ तो मैं जानबूझ कर इस किताब को बहुत धीमे पढ़ना चाहता था और इसलिए मेरी कोशिश रहती थी कि हर दिन एक अध्याय ही पढूं। पर जब  किताब उठाता  था तो दो तीन अध्याय पढ़ ही लेता था। ऐसे में यह किताब लम्बी चले इस कारण मैंने काफी गैप दे देकर इस किताब को पढ़ा और लगभग एक महीना इसे पढ़ने में लगाया। यह मेरे लिए एक ऐसी मिठाई के समान था जिसे मैं पूरी तरह एन्जॉय करना चाहता था।

चूँकि किताब में अंटार्क्टिका और वेडेल समुद्र के अभियान हैं तो आपको इन इलाकों के इतिहास और इलाकों से जुड़े रोचक अभियानों की जानकारी भी लेखक देते जाते हैं। इन रोचक अभियानो को जब मैं पढ़ रहा था तो सोच रहा था कि उन यात्रियों के संस्मरण पढ़ने को मिलते तो मजा आ जाता।

इन संस्मरणों से  आपको इन इलाकों के रहस्यों और इतिहास का तो पता लगता ही है लेकिन मनुष्य इस इलाके में कैसे रहते हैं इसका भी पता लगता है। उनके समक्ष इधर कैसी कैसी परेशानियाँ आती हैं इसका भी आपको अंदाजा हो जाता है। यह परेशानियाँ मानसिक और शारीरक दोनों ही हो सकती हैं और दल के सदस्य इससे कैसे जूझते हैं यह देखना प्रेरक है। आप संस्मरणों  के माध्यम से दल के सदस्यों को कई परेशानियों से जूझते हुए देखते हैं और उन पर विजय पाते हुए भी देखते हैं। आप समस्याओं से जूझते हुए उनकी घबराहट और फिर उन पर काबू पाने के बाद उनके अंदर के उल्लास को महसूस कर पाते हैं।

इस निर्जन इलाके में एक अच्छे डॉक्टर की क्या अहमियत है आपको किताब में मौजूद कई अध्याओं को पढ़कर पता चलती है। कई बार तो आपको लगने लगता है कि इधर डॉक्टर को डॉक्टर कम और जासूस ज्यादा होना पड़ता है। उसे सदस्यों की गतिविधि देखकर ही अंदाजा लगाना होता है कि उन्हें क्या परेशानी हो सकती है और फिर उसका इलाज करना होता है। कई बार इलाज के लिए जरूरी  व्यवस्था न होते हुए भी इसे किसी तरह अंजाम देना पड़ता है। डॉक्टर का चमत्कार, एक बार फिर डॉक्टर का चमत्कार और विष क्रियाएँ और अन्वेषक डॉक्टर नामक अध्याय के अंतर्गत आये संस्मरण डॉक्टर की इन खूबियों को रेखांकित करते हैं। यह अध्याय काफी रोचक बन पड़े हैं।

अन्टार्कटिका वैसे तो मानव सभ्यता से काफी दूर है लेकिन यहीं  पर आपको मानवता के कई पहलू दिखाई देते  हैं। अन्टार्कटिका में कई देशों के स्टेशन बने हैं और जरूरत पड़ने पर वह एक दूसरे की मदद करने को तत्पर रहते हैं। इस दुर्गम इलाके में लोग इतने सद्भाव से रहते हैं यह जानना अच्छा लगा था। वरना तो आये दिन देशों की आपसी दुश्मनी की खबरे ही आती रहती हैं।

चूँकि लेखक भारत का प्रतिनिधित्व करने वाले मिशन के चलते  इन यात्राओं में गये थे तो यह यात्राएं काम के सिलसिले में की गयी थी। यहाँ मौज मस्ती प्राथमिकता नहीं थी इसलिए किताब पढ़ते हुए आपको भूवैज्ञानिक क्या काम करते है इसका थोड़ा बहुत अंदाजा हो जाता है। लेखक ने जायदा तकनीकी चीजों को पुस्तक में जगह नहीं दी है लेकिन आपको यह तो पता चल जाता है कि भूवैज्ञानिक अक्सर बर्फ, पत्थर इत्यादि के सैंपल इकट्ठा करते हैं और उससे अपनी रपट तैयार करते हैं। इस कार्य के दौरान उन्हें क्या क्या खतरे उठाने पड़े थे, किन किन परेशानियों का सामना करना पड़ा था उसका भी जीवंत चित्रण लेखक ने किया है। इन विवरणों को पढ़कर कभी आपकी आँखें हैरत से बड़ी हो जाती हैं, कभी आप दाँतों तले उँगलियाँ चबा देते हो और कभी रोमांच की एक लहर सी आपके बदन में चलने लगती है।

अन्टार्कटिका में विश्वबन्धुत्व का यह उदाहरण हमारे लिए एक शैक्षिक अनुभव था। इस  'हट' का या अंटार्कटिका में बहुत सी अन्य जगह पाए जाने वाले ऐसे हट का उद्देश्य ही है मुश्किल घड़ी में फँसे हुए अभियात्री को सुरक्षा प्रदान करना; जाति-धर्म-देश के बिना किसी भेद-भाव के। 
 (पृष्ठ 38)

इस अनुभव से हमे सीख मिली कि विपत्ति आये तो उससे जूझना चाहिए, पीठ दिखाकर भागने में कोई बुद्धिमानी नहीं है। दलनेता का हमारी क्षमता पर विश्वास और दूर दृष्टि के कारण ही भारत वॉल्थट पर्वत के भू वैज्ञानिक मानचित्रण के क्षेत्र में सशक्त कदम उठाने में सफल हुआ था।
(पृष्ठ 44)

इधर छः घण्टे के अथक प्रयास के बाद भी दूसरे लापता वैज्ञानिक का कोई पता किसी भी बचाव दल को नहीं मिला। स्टेशन के बाहर दूर-दूर तक नर्म बर्फ का पहाड़ जमा हो रहा था और हर पल यह लग रहा था शायद अब हम लोग उन्हें कभी देख नहीं पाएंगे। 
(पृष्ठ 55)

हवा की गति तेज हो गयी और यंत्रों के माध्यम से प्राप्त उपग्रही चित्रों ने हमें बताया कि अगले तीन चार दिन तक इस भयावह तूफ़ान से कोई राहत नहीं मिलने वाली थी। हमारे डॉक्टर रेडियो द्वारा पिस्टन बुली में फँसे हमारे साथियों को लगातार सुझाव दे रहे थे कि कैसे खुद को गर्म रख सकते हैं। हमारी आँखें उस यंत्र पर जमी हुई थीं जिससे उपग्रही चित्र लिये जा रहे थे। हमारी आँखें उस यंत्र पर जमी हुई थीं जिससे उपग्रही चित्र लिये जा रहे थे। सारी आशाओं और प्रार्थना के बाजूद प्रकृति का अट्टहास तीव्र से तीव्रतर होता जा रहा था। हमे खबर मिली कि गाड़ी के अंदर बहुत ही सीमित जगह में सबके हाथ और विशेषकर पैर की माँसपेशियाँ खिंचने लगी थीं। ठण्ड और ऊपर से अपर्याप्त भोजन का असर धीरे-धीरे हावी होने लगा था।
पृष्ठ (98)

गॉगल्स पहने रहने के बावजूद आँखें चौंधिया देने वाली रोशनी में बर्फ की सतह का सटीक अंदाज लगा पाना मुश्किल था। जमीन से 25 फीट ऊपर हेलीकाप्टर ले जाकर कमांडर ने उसे रोका। मैंने अपनी ओर का दरवाजा खोला और जेब में वॉकी टॉकी तथा हाथ में जियोलॉजिकल हैमर लगाकर छलाँग लगा दी। यह निश्चित तौर रूप से पता नहीं था जहाँ मैं उतरूँगा वहाँ दरार है या नहीं। 
(पृष्ठ 154)

किताब में आखिरी यात्रा भी अंटार्कटिका से जुड़ी हुई है। यह यात्रा दिल्ली से ब्राजील और फिर वापसी की है और यह भी काफी रोचक है। यह यात्रा भी कई घुमावों से भरी हुई है जो कि आपका मनोरंजन करेगी।

किताब में यात्राएँ तो हैं ही और इनके साथ लेखक की कवितायें भी हैं। यह कवितायें लेखक ने इन यात्राओं के दौरान लिखी थी। इन कविताओं के माध्यम से लेखक ने अपने मन में उमड़ते हुए भावों को बेहद खूबसूरती से साझा किया है।
बर्फ तोड़कर जहाज के आगे बढ़ने से उत्पन्न उथल-पुथल के साथ ही समुद्र में लहरें उठने लगीं और मेरे मन में आनन्द की हिलोरें। मैंने लिखा- 
सागर का उल्लास कैसा 
श्वेत मुकुट ले शीश पर 
इन लहरों का गगन को 
पाने का यह प्यास कैसा
सागर का उल्लास कैसा (पृष्ठ 148)

मुझे तो यह किताब बहुत पसंद आई। किताब पठनीय है और आपको बाँध कर रखती है। भाषा सरल है, वर्णन सजीव है  और कहीं भी चीजें कृत्रिम नहीं लगती है। किताब पढ़ते हुए मुझे लेखक की किस्मत से रश्क भी हो रहा था। अन्टार्कटिका एक ऐसा इलाका है जहाँ कोई भी घुमक्कड़ जाना चाहेगा। मैं भी जाना चाहता हूँ लेकिन शायद ही इस जीवन में जा पाऊँगा। किताब पढ़ते हुए मैं सोच रहा था कि अगर यह किताब मैंने बारहवीं के बाद पढ़ी होती तो अपने कैरियर के तौर पर मैं भूवैज्ञानिक बनना ही चुनता।  मुझे लगता है यह किताब अगर छात्र पढेंगे तो कई छात्र इस क्षेत्र की तरफ इसे पढ़कर जरूर आकर्षित जरूर होंगे।

अगर आप किसी नई, विचित्र और रोमांचक जगह की यात्रा करना चाहते तो इस किताब को एक बार जरूर पढ़ें। मुझे यकीन है लेखक के साथ इस जगह की यात्रा करना आपको जरूर भायेगा।

रेटिंग: 5/5

अगर आपने इस पुस्तक पढ़ी है तो आपको यह कैसी लगी? मुझे अपने विचारों से जरूर अवगत करवाईयेगा।

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मैंने दूसरे यात्रा वृत्तांत भी पढ़े हैं। उनके विषय में आप निम्न लिंक पर जाकर पढ़ सकते हैं:
यात्रा वृत्तांत

अन्य कथेतर साहित्य(नॉन फिक्शन) जो मैंने पढ़ा है:
कथेतर साहित्य

© विकास नैनवाल 'अंजान'

10 comments:

  1. मैंने यह यात्रा वृतांत पढा है एकदम अलग है। इतना रोमांच भरा सफर है, इतनी दिलचस्प घटनाएं हैं और उस पर जबरदस्त लेखन।
    - बर्फ में आग लगना
    - वैज्ञानिक का गुम हो जाना
    - रूस के यात्रियों के वहाँ पार्टी पर जाना
    - अंटार्कटिका में गोली चलना।
    आदि घटनाएं बहुत मजेदार है।
    धन्यवाद। ।
    गुरप्रीत सिंह, राजस्थान
    - https://rb.gy/u0k5kj

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    1. जी सही कहा। यह संस्मरण पढ़कर मजा आ जाता है। आभार।

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  2. मैंने ये किताब तो नहीं पढ़ी पर नीरज मुसाफिर की लिखी हमसफर एवरेस्ट जरूर पढ़ी है।

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    1. जी दोनों के विषय बिल्कुल अलग हैं। इसे भी पढ़ियेगा। निराश नहीं होंगे।

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  3. मैं अभिभूत हूँ । मेरी पुस्तक को इतना मान दिया आपने, इससे बड़ा पुरस्कार और क्या हो सकता है!

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  4. मैं अभिभूत हूँ । मेरी पुस्तक को इतना मान दिया आपने, इससे बड़ा पुरस्कार और क्या हो सकता है!

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    1. शुक्रिया सर। उम्मीद है जल्द ही कुछ और भी पढ़ने को मिलेगा।

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  5. Congrats Dr Mukherjee for an excellent book on the Indian Antarctic Expedition. You are the most experienced & respected scientists in this field. Our Kudos & Best Wishes to you. I was member of 8th expedition as part of IAF contingent.Warm regards...Air Cmde PS Shinde(retd)

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    1. Glad to know that you were part of expedition. Dr Mukherjee's book is not only an exciting travelogue but it would also raise interest of students in geology. Thank you for your valuable comment.

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