Friday, February 21, 2020

मानसरोवर 1.1 - मुंशी प्रेमचंद

संग्रह दिसम्बर 17, 2019 से जनवरी 14, 2020 के बीच  में पढ़ा गया

संस्करण विवरण:
फॉर्मेट: ई बुक
पृष्ठ संख्या:433
ए एस आई एन: B01MDVA7D2




मानसरोवर 1  - मुंशी प्रेमचंद

मानसरोवर  मुंशी प्रेमचंद जी की कहानियों का संग्रह है। मुंशी प्रेमचंद जी की सभी कहानियों को मानसरोवर नाम की श्रृंखला में संकलित की हुई है। इस श्रृंखला के कुल आठ भाग हैं।

मानसरोवर भाग 1 में प्रेमचन्द जी की 24 कहानियों को संकलित किया गया था। मैं अक्सर हर कहानी को पढ़कर उसके विषय में अपने विचार कुछ पंक्तियों में लिख देता हूँ जिसके चलते पोस्ट की लम्बाई काफी बढ़ गयी थी। इसलिए पोस्ट को मैंने दो पोस्ट में विभाजित कर दिया है। इस पोस्ट में मैंने पहली बारह कहानियों को रखा है। यह कहानियाँ निम्न हैं:


1) अलग्योझा 
पहला वाक्य:
भोला महतो ने पहली स्त्री के मर जाने के बाद दूसरी सगाई की, तो उसके लड़के रग्घू के लिए बुरे दिन आ गए। 

पन्ना रग्घु की सौतेली माँ थी। उन दोनों के रिश्तों ने काफी उतार चढाव देखे थे लेकिन अब उनमें प्रेम था। इसी लिए पन्ना ने जब रग्घु को उसकी बीवी मुलिया को मायके से लाने को कहा तो रग्घु एक बार को टाल गया।
रग्घु मुलिया के स्वभाव से परिचित था। उसे मालूम था कि वह आयेगी तो अलग्योझा यानी बंटवारा होकर ही रहेगा।  रग्घु बंटवारा नहीं चाहता था। पर पन्ना नही मानी और मुलिया घर में आ गयी। फिर वही हुआ जिसकी रग्घु को आशंका थी। वह अलग हो गये।

इस अलग्योझा का इस परिवार के ऊपर क्या क्या असर पड़ा यह तो आप इस कहानी को पढ़कर ही जान पायेंगे।

अलग्योझा वैसे तो गाँव की पृष्ठ भूमि में बसी हुई है लेकिन यह हर परिवार की कहानी है। फिर वह परिवार शहर में बसा हो या गाँव में इससे कम फर्क पड़ता है। मेट्रो शहर में जगह की किल्लत के कारण मजबूरन भी अलग होना पड़ता है लेकिन कई बार ऐसी नौबत भी आ जाती है कि आस पास रहने वाले भाइयों में अलग रहते हुए भी क्लेश हो जाता है। मुझे याद है बचपन में मैं कई बार बढ़ों को यह कहते हुए सुनता था कि सुखी रहना है तो रिश्तेदारों से दूरी पर रहो। कम मिलोगे और ख़ुशी से मिलोगे। नजदीक में रहने में रिश्तों में खटास सी पड़ जाती है।

बँटवारे से हमेशा नुक्सान ही हुआ है। लोगों को लगता है इससे फायदा होगा लेकिन असल में ऐसा नहीं होता है। आजकल एकल परिवार का जो चलन है उसमें जो दिक्कतें लोगों के सामने आती हैं वह किसी से छुपी नहीं हैं। यह दिक्कतें तब और बढ़ जाती है जब पति पत्नी दोनों कमाने वाले हों। बच्चों की देखभाल नहीं हो पाती है। इस कहानी में जब मुलिया को मजबूरन काम करना पड़ता है तो बच्चों के साथ पेश आने वाली इस दिक्कत से उसका भी सामना होता है।

प्रेमचन्द जी ने एक बँटवारे का परिवार पर क्या असर पड़ता है इस  बखूबी चित्रण किया है। हाँ, अंत इधर सुखद हो जाता है लेकिन अक्सर असल जिंदगी में बँटवारे का अंत बहुत कम सुखद होता है।

कहानी के कुछ अंश जो मुझे पसंद आये:

सबल की शिकायतें सब सुनते हैं, निर्बल की फरियाद भी कोई नहीं सुनता!

गाँव में स्त्रियों के दो दल होते हैं-एक बहूओं का, दूसरा सासों का! बहुएँ सलाह और सहानुभूति के लिए अपने दल में जाती हैं, सासें अपने में। दोनों की पंचायतें अलग होती हैं।

आखिर उसे धीमा-धीमा ज्वर रहने लगा। हृदय-शूल, चिंता, कड़ा परिश्रम और अभाव का यही पुरस्कार है।


2) ईदगाह 
पहला वाक्य:
रमजान के पूरे तीस रोजों के बाद ईद आई है।

आखिर ईद आ चुकी है। पूरा का पूरा गाँव ईदगाह में जाने की तैयारी कर रहा है। इन्हीं लोगों में एक हमीद भी है। हमीद के घर में उसकी बूढी दादी को छोड़कर कोई नहीं है। यही कारण है कि हमीद के पास उतने पैसे नहीं है जितने की उसके दोस्तों के पास हैं लेकिन उसके उत्साह में कमी नहीं है।

कैसी रही हमीद की यह ईद? उसने उधर क्या क्या खरीदा?

ईदगाह एक बहुत प्यारी कहानी है। हमीद और उसके दोस्तों के माध्यम से प्रेमचंद जी ने बहुत ही बखूबी बाल मन का चित्रण किया है। कई जगह हमीद के मासूम ख्याल पढ़कर आपका मन पसीज जाता है(विशेषकर माता पिता के प्रति को लेकर जो उसकी धारणा है) और कई जगह उसकी बालसुलभ वाकपटुता(अपने ली हुई चीज की दोस्तों से तुलना करने वाला प्रसंग जिसमें वो खुद की ली हुई चीज को दूसरों से बेहतर साबित कर देता है) पढ़कर आप हँसे बिना नहीं रह सकते हैं।

ईदगाह एक बेहतरीन कहानी है जिसे आप जितने भी बार पढ़ोगे वो आपके मन को छू लेगी। बचपन में हम दोस्त लोग भी जब मेले में जाते थे तो हमारे बीच ऐसी ही बातें होती थी। हाँ, हामिद जितना वाकपटु मैं नहीं था लेकिन बचपन की याद यह कहानी ताज़ा कर देती है। कहानी का अंत भावविह्ल कर देता है।

मुझे यह कहानी बहुत पसंद आई।

कहानी के कुछ अंश जो मुझे पसंद आये:
आशा तो बड़ी चीज है, और फिर बच्चों की आशा! उनकी कल्पना तो राई का पर्वत बना लेती है।

बुढ़िया का क्रोध तुरन्त स्नेह में बदल गया, और स्नेह भी वह नहीं, जो प्रगल्भ होता हे और अपनी सारी कसक शब्दों में बिखेर देता है। यह मूक स्नेह था खूब ठोस, रस और स्वाद से भरा हुआ।

3) माँ 
पहला वाक्य:
आज बन्दी लौटकर घर आ रहा है।

करुणा का पति आदित्य देश के खातिर काराग्रह गया था। वहाँ जाकर उसने सबका नाम रौशन किया था। मरते वक्त उसकी एक ही आस थी कि उसका बेटा प्रकाश भी देश के काम आये।

क्या ऐसा हो पाया? इसका उत्तर आपको इस कहानी को पढ़कर पता चलेगा।

माँ कहानी करुणा को केंद्र में रखकर लिखी गयी है। कहानी की शुरुआत उस दिन होती है जब उसका पति जेल से घर आता है। करुणा ने इस वापसी की जो कल्पना की थी जब असल में चीजें वैसे घटित नही होती हैं तो उसे एक झटका सा लगता है।

आदित्य  का देश के खातिर जेल जाना और फिर उसके संगी साथियों का उसे भूल जाना एक कटु सच्चाई को दर्शाता है। हजारों फौजी भाई जिन्होंने अपनी जान दी है उनके परिवारों को भी ऐसी सच्चाई से रूब्रूर होना होता है। लोग कुछ दिन उनकी पीठ थपथपाते हैं और फिर भूल जाते हैं। जिंदगी की परेशानियों को परिवार को ही उठाना होता है। ऐसे में आदित्य के मन में जो ख्याल आते हैं वो किसी के मन में भी आने लाजमी हैं।

आगे की कहानी करुणा और प्रकाश के चारों और घूमती है। करुणा जिसे अपने बेटे से कुछ अपेक्षाएं हैं और वहीं उसका बेटा है जिसका जीने का नजरिया कुछ और है। अक्सर हर परिवार में ऐसा होता है। इसी टकराव को प्रेमचन्द जी ने इधर दर्शाया है।

माँ बाप होने के नाते हम लोग अपने बच्चों से एक उम्मीद सी बांध लेते हैं कि वह एक तरह का व्यवहार करेंगे लेकिन जब वह ऐसा नही करते हैं तो माँ बाप दुखी हो जाते हैं। यह कहानी भी इसी विचार के तौर पर लिखी गयी है। कहानी का अंत दुखांत है।

छोटे में जब हम कोई शरारत करते थे तो कई बड़े लोग भी सीधे माँ बाप पर ऊँगली उठाते थे। उस वक्त मुझे उनकी बेवकूफी भरी सोच पर हँसी ही आती थी। बच्चे होने के नाते मुझे इस बात का अहसास था कि मैं ऐसे कई काम करता था जिन्हें करने के पक्ष में मेरे माँ बाप नहीं ही होंगे। मुझे इस बात का काफी पहले अहसास हो गया था कि आखिर में व्यक्ति वही करता है जो वो करना चाहता है। उसके माँ बाप चाहे कुछ भी कहें वह अपनी नैतिकता का इस्तेमाल करता है। यह कहानी भी यही दर्शाती है। करुणा भी माँ होने के नाते आखिर में घुटने टेक देती है और अपने बेटे को वही करने देती है जो उसका बेटा करना चाहता है।


मुझे हमेशा से लगता है कि अपेक्षाएं ही दुःख का कारण होती हैं। आप जब लोगों से अपेक्षा रखने लगते हो और वो पूरी नहीं होती हैं तो आपको दुःख होता है। माँ बाप होने के नाते यह अपेक्षाएं बढ़ जाती हैं और इस कारण दुःख भी बढ़ जाता है। करुणा के लिए मैं दुखी तो था लेकिन जिस तरह इस कहानी का अंत हुआ वो मुझे पसंद नहीं आया। कहानी में आखिर में करुणा वह सब खुद करने लगती जिसकी उम्मीद उसने बेटे से लगाई थी तो मैं ज्यादा खुश होता। वह एक अच्छा अंत भी होता। यह दुखांत अंत थोड़े देर के लिए मर्म को छू तो जाता है लेकिन अगर आप ठहर कर सोचे तो एक कमजोरी ही दर्शाता है। क्या करुणा का पति उसकी इस कमजोरी से खुश होता? शायद नहीं।

कहानी के कुछ अंश जो मुझे पसंद आये:
रत्नजटित मखमली म्यान में जैसे तेज तलवार छिपी रहती है, जल के कोमल प्रवाह में जैसे असीम शक्ति छिपी रहती है, वैसे ही रमणी का कोमल हृदय साहस और धैर्य को अपनी गोद में छिपाए रहता है। क्रोध जैसे तलवार को बाहर खींच लेता है, विज्ञान जैसे जल-शक्ति का उदघाटन कर लेता है, वैसे ही प्रेम रमणी के साहस और धैर्य को प्रदीप्त कर देता है।

उसके हृदय न था, भाव न थे, केवल मस्तिष्क था। मस्तिष्क में दर्द कहॉ? वहॉ तो तर्क हैं, मनसूबे हैं।

4) बेटोंवाली विधवा 
पहला वाक्य:
पंडित अयोध्यानाथ का देहान्त हुआ तो सबने कहा, ईश्वर आदमी को ऐसी ही मौत दे।

पंडित अयोध्यानाथ की मृत्यु से पहले उनके पत्नी फूलमती का एक छत्र राज घर में चलता था। उनके चार बेटे थे कामतानाथ, उमानाथ, दयानाथ और सीतानाथ और एक बेटी थी कुमुद। परिवार हँसी ख़ुशी चलता था। लेकिन फिर अयोध्यानाथ की मृत्यु के पश्चात कुछ भी वैसा नहीं रहा जैसे पहले थे। घर के सदस्य बदलने लगे। सदस्यों के बीच का समीकरण बदलने लगा।
यह बदलाव क्या था? आखिर फूलमती की जिंदगी में इसका क्या असर पड़ा? 

हमारे समाज में जब किसी स्त्री को आशीर्वाद दिया जाता है तो कहा जाता है सदा सुहागन रहो। पहली बारी को यह आशीर्वाद अटपटा लग सकता है लेकिन अगर समाज के ताने बाने का ज्ञान आप रखते हैं तो आपको पता चलता है कि यह आशीर्वाद क्यों दिया जाता है। फूलमती की कहानी उस सच्चाई को दर्शाती है जो कि अक्सर किसी औरत को तब भुगतना पड़ती थी जब वह सुहागन नहीं रह जाती थी। यह इसलिए भी होता था क्योंकि औरत अर्थ के लिए पहले पिता पर निर्भर रहती थी, फिर पति पर और उसकी मृत्यु के बाद बेटे पर आश्रित हो जाती थी। पति सलामत होता तो राज करती और उसके जाते ही आश्रिता बन जाती। फूलमती कहानी में एक जगह कहती है:

हाँ, अब उसे अपने को नई परिस्थितियों के अनुकूल बनाना पड़ेगा। समय बदल गया है। अब तक स्वामिनी बनकर रही, अब लौंडी बनकर रहना पड़ेगा। 

यही पंक्ति उसका बेबसी दर्शाने को काफी है।  कहानी का अंत दुखद है। एक स्त्री का आर्थिक रूप से स्वावलम्बी होना कितना जरूरी है यह भी इस कहानी को पढ़कर समझा जा सकता है। कहानी दिल को छू जाती है। फूलमती के लिए दिल रोने लगता है।

कहानी के कुछ अंश जो पसंद आये:
उसकी स्वामिनी कल्पना इसी त्याग के लिए, इसी आत्मसमर्पण के लिए जैसे कोई मार्ग ढूँढ़ती रहती थी। अधिकार या लोभ या ममता की वहाँ गँध तक न थी। त्याग ही उसका आनन्द और त्याग ही उसका अधिकार है। आज अपना खोया हुआ अधिकार पाकर अपनी सिरजी हुई प्रतिमा पर अपने प्राणों की भेंट करके वह निहाल हो गई।

हरि-इच्छा बेकसों का अंतिम अवलम्ब है।
5) शांति
पहला वाक्य:
स्वर्गीय देवनाथ मेरे अभिन्न मित्रों में थे। 

कथावाचक के मित्र देवनाथ की अचानक मृत्यु से उसकी पत्नी गोपा और एकलौती पुत्री सुन्नी पर विपत्तियों का पहाड़ ही टूट गया। फिर भी गोपा ने हिम्मत न हारी और किसी तरह जीवन का गुजर बसर करती रही। अब उसकी एक ही इच्छा थी कि अपनी बेटी का विवाह कर सके।  
क्या गोपा की यह इच्छा पूरी हो पाई? कथावाचक का इस इच्छा के पूरे होने में क्या भूमिका रही? 

शांति कहानी पढ़कर एक पल को आप सोच नहीं पाते हो कि आखिर ये क्या हुआ? एक तरह का खालीपन आप महसूस करते हो। गोपा की आखिर की वह प्रतिक्रिया आपको यह सोचने के लिए मजबूर कर देती है कि यह कैसा समाज रहा होगा जहाँ स्त्री के पास बेहतर विकल्प वह था जो सुन्नी ने चुना। आज भी काफी घरों से स्थिति यही है। चीजें बदली जरूर हैं लेकिन उतना नहीं जितना होना चाहिए।

कहानी में गोपा जिस तरह से शादी में अनावश्यक खर्च करती है वह देखकर भी मन दुखी होता है कि अक्सर लोग क्यों शादी बारात में ऐसा करते हैं। केवल झूठे नाम के लिए यह सब कुछ किया जाता है और फिर सब भुला दिया जाता है। जो सक्षम हैं वो तो यह वहन कर देते हैं लेकिन जो सक्षम नहीं है उनके लिए यह स्थिति नारकीय होती है।

सुन्नी के ससुर का यह ख्याल कि शादी के बाद उनका बिगड़ा बेटा सुधर जाएगा एक ऐसी सोच को दर्शाता है जो आज भी भारतीय समाज में व्याप्त है। लोग अपने बिगड़ैल बेटे से किसी मासूम की शादी करा देते हैं और जब वह उसे सुधार नहीं पाती है तो बेटे के दुश्चरित्र का आरोप भी उस पर  मढ़ देते हैं।

यह कहानी ऐसे कई बिन्दुओं पर प्रहार करती है। कहानी पढ़कर इन पर विचार किया जाना चाहिए। सुन्नी एक स्वालम्बी स्त्री थी लेकिन उसने जो कदम उठाया यह ठीक न था। यह दुखी कर देता है।

कहानी की कुछ पंक्तियाँ जो मुझे पसंद आई:
किसी को अपना गुलाम बनाने के लिए पहले खुद भी उसका गुलाम बनना पड़ता है।

स्त्री पुरुष में विवाह की पहली शर्त यह है कि दोनों सोलहों आने एक-दुसरे के हो जाएं। 


6) नशा
पहला वाक्य:
ईश्वरी एक बड़े जमींदार का लड़का था और मैं गरीब क्लर्क था, जिसके पास मेहनत -मजूरी के सिवा और कोई जायदाद न थी।

ईश्वरी एक जमींदार का बेटा था जो कि ठाठ बाट से रहने का आदि था। वहीं कथा वाचक एक साधारण घर से आता था। जहाँ ईश्वरी को जमींदारी में कोई बुराई नहीं लगती थी वहीं कथावाचक को इस प्रथा में बुराई के सिवा कुछ दिखता ही नहीं था।

पर क्या कथावाचक के मन में आने वाली भावना अन्य लोगों के प्रति अनुराग से थी?
यही इस कहानी को पढ़कर पता चलता है।

कहा जाता है मनुष्य का असली किरदार तब जाकर दिखता है जब उसे ताकत मिलती है। अक्सर व्यक्ति उन लोगों को कोसता रहता है जो उससे ज्यादा ताकत रखते हैं लेकिन क्या सच में उसका उनके प्रति यह भाव इसलिए होता क्योंकि वो ताकत का गलत प्रयोग कर रहे हैं या उसे उनके पास मौजूद ताकत से इर्ष्या होती है।

ऐसे कई उदाहरण मैंने अपने जीवन में देखें जहाँ लोग संस्कृति या मानवता की दुहाई देकर सामने वाले को केवल इसलिए कोस रहे होते हैं क्योंकि उनके पास वो अवसर नहीं होते हैं। यह वही लोग होते हैं जो मौक़ा मिलते हैं उन लोगों के तरह हो जाते हैं जिन्हें वो पहले कोसते रहे हैं।

मनुष्य की इसी प्रवृत्ति को इस कहानी के माध्यम से बहुत खूबसूरती से बताया है। कहानी में अंत में कथावाचक को जो अहसास होता है वह शायद ही किसी को असल जिंदगी में कभी होता हो। यह नशा ऐसा है कि जब चढ़ता है तो बड़ी मुश्किल से उतरता है।

7) स्वामिनी

पहला वाक्य:
शिवदास ने भंडारे की कुंजी अपनी बहू रामप्यारी के सामने फेंककर अपनी बूढ़ी आँखों में आँसू भरकर कहा - बहू, आज से गिरस्ती की देखभाल तुम्हारे ऊपर है। 

रामप्यारी और रामदुलारी दो सगी बहने थीं जिनका विवाह बिरजू और मथुरा से हुआ था। दोनों बहने मायके की तरह है ससुराल में भी हँसी खुशी रहती थीं।

भरी जवानी में प्यारी के पति की जब मृत्यु हो गयी तो उसके ससुर शिवदास ने यह निर्णय लिया कि वो प्यारी को घर के भण्डारगृह चाबी देकर उसे घर की स्वामिनी बना देंगे। उन्हें लगता था शायद घर की स्वामिनी बनाने से प्यारी के वैव्ध्य की यातना थोड़ी कम हो जायेगी।

शिवदास के इस निर्णय के बाद प्यारी और उसके परिवार के जीवन में क्या क्या बदलाव आये? 
क्या उसके स्वामिनी बनने से वैव्ध्य का दुःख मिटा?
परिवार के अन्य सदस्यों पर इसका क्या असर हुआ? 

कहते हैं स्वामित्व केवल अधिकार ही नहीं लाता बल्कि कई तरह की कर्तव्य भी साथ लाता है। इसके साथ वह व्यक्ति का व्यवहार भी बदल देता है। यही बदलाव हम प्यारी के व्यवहार में भी देखते हैं। अधिकार का भाव जब मन में जागता है तो वस्तुओं से आसक्ति ज्यादा हो जाती है और व्यक्ति ज्यादा जिम्मेदार भी हो जाता है। हाँ, कई बार वो अय्याश भी हो जाता है लेकिन तब उसके पास अधिकार जताने के लिए वस्तु अधिक दिन नहीं बचती है। यह प्रवृत्ति अक्सर दफ्तरों में भी देखने को मिलती है। अगर आपके साथी को अचानक से पदोन्नति मिल जाए तो उसके व्यवहार में बदलाव आ जाता है। जहाँ वो पहले बॉस को आपके साथ भला बुरा कहता रहा होगा वहीं वो अब इस कार्य से बचता है।

कहानी कहाँ जाकर रूकती है यह देखना भी रोचक है। आप किसी को कितना भी अर्थ दे दो लेकिन प्यार की दो बोली के लिए फिर भी इनसान तड़पता रहता है। विशेषकर स्त्रीयों में यह अधिक प्रवृत्ति अधिक देखने को मिलती है। यही कारण है कि अक्सर अमीर घर की औरतें जिन्हें पैसा तो पतियों द्वारा खूब मिलता है लेकिन जब वक्त नहीं मिलता है तो बाहर प्रेम खोजने लगती हैं।  स्वामिनी मानव व्यवहार को दर्शाती एक अच्छी कहानी है। मुझे यह पसंद आई।

कहानी की कुछ पंक्तियाँ जो मुझे पसंद आई:
स्वामिनी का यह धर्म है कि सबकी धौंस सुन ले और करे वहीं, जिसमें घर का कल्याण हो! स्वामित्व के कवच पर धौंस, ताने, धमकी किसी का असर न होता। उसकी स्वामिनी की कल्पना इन आघातों से और भी स्वस्थ होती थी। वह गृहस्थी की संचालिका है। सभी अपने-अपने दु:ख उसी के सामने रोते हैं, पर जो कुछ वह करती है, वही होता है। इतना उसे प्रसन्न करने के लिए काफी था।

आज भी जोखू की सहानुभूति-भरी बातें सुनकर प्यारी झुंझलाती, यह काम करने क्यों नहीं जाता। यहाँ मेरे पीछे क्यों पड़ा हुआ है, मगर उसे झिड़क देने को जी न चाहता था। उसे उस समय सहानुभूति की भूख थी। फल काँटेदार वृक्ष से भी मिलें तो क्या उन्हें छोड़ दिया जाता है।
8) ठाकुर का कुआँ
पहला वाक्य:
जोखू ने लोटा मुँह से लगाया तो पानी में सख्त बदबू आई। 

जोखू कई दिनों से बीमार चल रहा था और अब वो प्यास से तड़प रहा था। वह पानी पीना तो चाहता था लेकिन उससे पानी पीते नहीं बनता था। पानी में बड़ी दुर्गन्ध आ रही थी। उसकी पत्नी गंगी को पानी लाये एक ही दिन हुआ था लेकिन शायद उस कुएँ में कुछ मर गया था जिस कारण पानी खराब था।

गंगी को जब जोखू की प्यास नहीं देखी गयी तो उसने ठाकुर के कुएँ से पानी लाने का फैसला किया। जोखू जानता था कि इस फैसला का परिणाम अच्छा नहीं हो सकता है। अगर ठाकुर गंगी को पानी निकालते देख लेता तो गंगी और जोखू को लेने के देने पड़ जाते।

क्या जोखू को साफ़ पानी मिला? क्या गंगी पानी ला पायी?


ठाकुर का कुआँ प्रेमचन्द जी की एक बहुत सशक्त कहानी है। एक तरफ तो यह समाज में मौजूद जाति व्यवस्था पर चोट करती है वहीं दूसरी तरफ स्त्रियों की हालत पर भी टिप्पणी करती है।

गंगी जब पानी लेने जाती है तो उसके ख्यालों से पाठक जान पाता है कि उसके गाँव के तथाकथित ऊँची जात वाले केवल नाम के ही ऊँची जात के हैं। उनकी हरकतों में यह ऊँचापन नहीं दिखता है।

जन्म के आधार पर यह बंटवारा जिसके चलते वह बीमार पति के लिए पानी भी नहीं निकाल सकती है उसके मन में रोष और दुःख भर देता है। आज भी कई जगह यह बंटवारा देखने को मिलता है। समाज से यंह कम हुआ है लेकिन समाप्त नहीं हुआ है।

जाति व्यवस्था पर चोट करने के अलावा यह कहानी हमारे समाज में स्त्रियों की हालत पर  भी टिप्पणी करती है। यह टिप्पणी वह ठाकुर के घर की बहुओं की वार्तालाप के माध्यम से करते हैं जो दर्शाता है कि स्त्री की स्थिति हर जगह लगभग एक जैसी है। ऊँचे घरानों में भी उसे उतना ही अपमान सहना पड़ता है जितना कि नीचे घरो में उसे सहना पड़ता है। बस एक वैभव का एक दिखावा है जो वो करती जाती है।

ठाकुर का कुआँ भले ही बहुत छोटी कहानी है पर यह सही जगह प्रहार करती है। कहानी का अंत मार्मिक है जो शायद यह दर्शाता है कि कहानी लिखते वक्त प्रेमचन्द जी को लग रहा था कि कोई कुछ भी कर ले समाज से यह व्यवस्था इतने जल्दी जाने वाली तो नहीं है। जोखू जैसे लोग गंदा बदबूदार पानी पीने के लिए अभी तो अभिशप्त हैं हीं।

कहानी के कुछ अंश जो मुझे पसंद आये:
ब्राहम्ण देवता आशीर्वाद देंगे, ठाकुर लाठी मारेगें, साहूजी एक पांच लेगें। गराबी का दर्द कौन समझता हैं ! हम तो मर भी जाते है, तो कोई दुआर पर झाँकनें नहीं आता, कंधा देना तो बड़ी बात है।

हम क्यों नीच हैं और ये लोग क्यों ऊचें हैं ? इसलिए किये लोग गले में तागा डाल लेते हैं ? यहॉ तो जितने है, एक-से-एक छॅटे हैं। चोरी ये करें, जाल-फरेब ये करें, झूठे मुकदमे ये करें। अभी इस ठाकुर ने तो उस दिन बेचारे गड़रिए की भेड़ चुरा ली थी और बाद मे मारकर खा गया। इन्हीं पंडित के घर में तो बारहों मास जुआ होता है। यही साहू जी तो घी में तेल मिलाकर बेचते है। काम करा लेते हैं, मजूरी देते नानी मरती है। किस-किस बात मे हमसे ऊँचे हैं, हम गली-गली चिल्लाते नहीं कि हम ऊँचे है, हम ऊँचे। कभी गाँव में आ जाती हूँ, तो रस-भरी आँख से देखने लगते हैं। जैसे सबकी छाती पर साँप लोटने लगता है, परंतु घमंड यह कि हम ऊँचे हैं!

‘खान खाने चले और हुक्म हुआ कि ताजा पानी भर लाओं। घड़े के लिए पैसे नहीं है।’ हम लोगों को आराम से बैठे देखकर जैसे मरदों को जलन होती हैं।’ ‘हाँ, यह तो न हुआ कि कलसिया उठाकर भर लाते। बस, हुकुम चला दिया कि ताजा पानी लाओ, जैसे हम लौंडियाँ ही तो हैं।’ ‘लौडिंयाँ नहीं तो और क्या हो तुम? रोटी-कपड़ा नहीं पातीं ? दस-पाँच रुपये भी छीन-झपटकर ले ही लेती हो। और लौंडियाँ कैसी होती हैं!’ ‘मत लजाओं, दीदी! छिन-भर आराम करने को ती तरसकर रह जाता है। इतना काम किसी दूसरे के घर कर देती, तो इससे कहीं आराम से रहती। ऊपर से वह एहसान मानता ! यहाँ काम करते-करते मर जाओं, पर किसी का मुँह ही सीधा नहीं होता।’

9) पूस की रात 
पहला वाक्य:
हल्कू ने आकर स्त्री से कहा - सहना आया है।

हल्कू एक किसान है जो किसानी तो करता है लेकिन इस कारण हलकान भी रहता है। किसानी में हाड़तोड़ मेहनत करने के पश्चात भी वो इतना धनोपार्जन नहीं कर पाता है कि अपने लिए उपयोगी चीजें ले सकें।

पूस की रात है और अब हल्कू के पास कंबल नहीं है। उसे खेत में रात गुजारनी है।

क्या हल्कू यह कर पाया? इस रात के बाद उसके जीवन में क्या बदलाव आया? 

पूस की रात एक मार्मिक कहानी है जिसका अंत झिंझोड़ देता है। यह किसान की बेबसी को दर्शाता है जिसमें किसानी उसके लिए एक ऐसा निवाला हो चुका है जिसे न वो निगल सकता है और न ही उगल सकता है। फसल जब तक खड़ी है वो उसका मोह त्याग नहीं पाता है लेकिन जब  किसी कारणवश वह खराब हो जाती है तो उसे दुःख से ज्यादा एक तरह की आज़ादी का अनुभव होता है चलो कम से कम इस परेशानी से पीछा तो छूटा। अब एक बहाना तो उसके पास है।

आज भी हाल ज्यादा अच्छे नहीं हुए हैं। सिस्टम आज भी ऐसा बना हुआ है कि किसानों को उनका हक नहीं मिल पाता है और यही कारण है कि वो किसानी से दूर जाते जा रहे हैं। लोग किसानी से बेहतर मजदूरी समझते हैं क्योंकि उससे कम से कम यह तो सुनिश्चित रहता है कि कुछ तो मिलेगा।

पूस की रात एक बार मैंने पहले भी पढ़ी थी लेकिन न जाने क्यों फिर भी मेरे मन में एक ख्याल था कि इस कहानी के अंत में हल्कू मर जाता है। इसलिए मैं कहानी पढ़ते हुए घबराया हुआ था। लेकिन कहानी का अंत स्याह जरूर है लेकिन इतना स्याह नहीं है।

एक प्रसंग भी आता है जब हल्कू अपनी पत्नी मुन्नी से एक मामले को लेकर एक बहाना बनाता है। उसका वो बहाना बिलकुल बच्चों जैसा है जो उसकी मासूमियत को दर्शाता है और उसे पढ़कर बरबस ही मेरी हँसी छूट गयी थी।

हल्कू रात अपने कुत्ते जबरे के साथ जिस तरह बिताता है वह पढ़कर दया भी आती है लेकिन उसकी जिजीविषा देखकर यह भी लगता है कि हम लोग कैसे छोटी छोटी चीजों को भी बढ़ा बना लेते हैं और कई लोग ऐसे हैं जो हमसे कितनी कठिन परिस्थितियों में जीवन बिताते हैं। हल्कू और जबरे के बीच के दृश्य मन को छू जाते हैं।

एक बेहतरीन कहानी।

कहानी के कुछ अंश जो मुझे पसंद आये:

मैं कहती हूं, तुम क्यों नहीं खेती छोड़ देते ? मर-मर काम करों, उपज हो तो बाकी दे दो, चलो छुटटी हुई। बाकी चुकाने के लिए ही तो हमारा जनम हुआ हैं। पेट के लिए मजूरी करों। ऐसी खेती से बाज आयें।

कुत्ते की देह से जाने कैसी दुर्गंध आ रही थी, पर वह उसे अपनी गोद मे चिपटाए हुए ऐसे सुख का अनुभव कर रहा था, जो इधर महीनों से उसे न मिला था। जबरा शायद यह समझ रहा था कि स्वर्ग यहीं है, और हल्कू की पवित्र आत्मा में तो उस कुत्ते के प्रति घृणा की गंध तक न,थी। अपने किसी अभिन्न मित्र या भाई को भी वह इतनी ही तत्परता से गले लगाता। वह अपनी दीनता से आहत न था, जिसने आज उसे इस दशा कोपहुंचा दिया। नहीं, इस अनोखी मैत्री ने जैसे उसकी आत्मा के सब द्वार खोल दिए थे और उनका एक-एक अणु प्रकाश से चमक रहा था।
10) झाँकी
पहला वाक्य:
कई दिन से घर में कलह मचा हुआ था। 

जन्माष्टमी का अवसर था लेकिन कथा के नायक के घर में कलह मचा हुआ था। उसकी पत्नी और माँ के बीच में ठनी हुई थी और नायक बेचारा किसी का पक्ष भी नहीं ले सकता था। घर की स्थिति देख वह अवसाद में जा रहा था कि उसके घर उसका दोस्त आया जयदेव आया और खींचखांचकर सेठ घेरुमल की झाँकी  देखने ले गया।

अवसाद में घिरे नायक पर इस झाँकी में शामिल होकर क्या असर पड़ा?

झाँकी कहानी पढ़ते हुए मुझे लोकल ट्रेन के सफर की याद आ गयी थी। ट्रेन में भी अक्सर यह होता था। लोग बाग़ चढ़ते थे और ट्रेन में भजन कीर्तन करते हुए घर को जाते थे। यह करते हुए वह बहुत प्रसन्न दिखाई देते थे। उन लोगों को कुछ चिंतायें जरूर होंगी पर इस दौरान वह सब चिंताएं वे लोग भूल जाते थे। इसलिए तो मनुष्य को सामाजिक प्राणी कहा गया है। जितना वह एक दूसरे से मिलता जुलता है हँसी ठट्ठा करता है गाता बजाता है उतना ही वह अपने गमो को भूलता जाता है। एक तरह की प्रसन्नता उस पर तारी हो जाती है। यही इस कहानी में भी दृष्टिगोचर होता है।

यह चीज केवल भक्ति संगीत पर ही निर्भर नहीं करती है। रॉक कंसर्ट्स में जाने वाले लोग भी इस चीज को अनुभव करते है। यह बस साथ मिलकर किसी चीज का लुत्फ़ उठाने का ही असर होता है। कहानी अच्छा संदेश देती है कि अगर कभी गम,गुस्सा अवसाद इत्यादि नकारात्मक भावनाओं  में घिरे हो तो ऐसी जगह जाओ जहाँ लोग झूम रहे हों, खुश के फव्वारे से अपने भीतर मौजूद इन नकारात्मक भावनाओं को मिटा दोगे।

वही कथा के नायक की स्थिति का वर्णन भी वह बखूबी करती है जो माँ और पत्नी के बीच पिसता चला जाता है। वह जानता है उसकी पत्नी ठीक है लेकिन माँ को आदरवश कुछ कह नहीं पाता है। ऐसे परिस्थिति से कैसे जूझा जाए उसे पता नहीं है। यही चीज उसे सीखने की आवश्यकता है क्योंकि तनाव लेने से तो कुछ हल निकलेगा नहीं।

कहानी के कुछ अंश:
मैं बड़े संकट में था। अगर अम्माँ की तरफ से कुछ कहता हूँ , तो पत्नीजी रोना- धोना शुरु करती हैं, अपने नसीबों को कोसने लगती हैं: पत्नी की-सी कहता हूँ तो जनमुरीद की उपाधि मिलती है। इसलिए बारी-बारी से दोनों पक्षों का समर्थन करता जाता था: पर स्वार्थवश मेरी सहानुभूति पत्नी के साथ ही थी। खुल कर अम्माँ से कुछ न कहा सकता थ: पर दिल में समझ रहा था कि ज्यादती इन्हीं की है।

अगर अम्माँ ने अपनी सास की साड़ी धोई है, उनके पाँव दबाए हैं, उनकी घुड़कियाँ खाई हैं, तो आज वह पुराना हिसाब बहू से क्यों चुकाना चाहती हैं? उन्हें क्यों नहीं दिखाई देता कि अब समय बदल गया है? बहुएॅं अब भयवश सास की गुलामी नहीं करतीं। प्रेम से चाहे उनके सिर के बाल नोच लो, लेकिन जो रोब दिखाकर उन पर शासन करना चाहो, तो वह दिन लद गए।

उनकी वह रत्नजटित, बिजली से जगमगाती मूर्ति देखकर मेरे मन में ग्लानि उत्पन्न ह ई। इस रुप में भी प्रेम का निवास हो सकता है? मैंने तो रत्नों में दर्प और अहंकार ही भरा देखा है। मुझे उस वक्त यही याद न रही, कि यह एक करोड़पति सेठ का मंदिर है और धनी मनुष्य धन में लोटने वाले ईश्वर ही की कल्पना कर सकता है। धनी ईश्वर में ही उसकी श्रद्धा हो सकती है। जिसक पास धन नहीं, वह उसकी दया का पात्र हो सकता है, श्रद्धा का कदापि नहीं।


11) गुल्ली-डण्डा
पहला वाक्य:
हमारे अँग्रेजी दोस्त मानें या न मानें मैं तो यही कहूँगा कि गुल्ली-डंडा सब खेलों का राजा है।

कथावाचक को  इंजिनियर बनकर अपने बचपन के कसबे में लौटकर आने का अवसर मिला था।

लौटकर आते ही उसे बचपन की स्मृतियों ने घेर दिया और इन स्मृतियों में सबसे अग्रणी थी गुल्ली डंडे की स्मृति। बचपन की स्मृति लौटी तो बचपन के दोस्तों की स्मृति भी आई और ऐसे ही एक दोस्त गया से मिलने का कथावाचक को अवसर मिला। गया गरीब था लेकिन कथावाचक को इससे फर्क नहीं पड़ता था और वह बचपन की तरह  दोस्तों के साथ गुल्ली डंडा का खेल खेलना चाहता था।

पर क्या यह मुमकिन हो पाया? क्या बचपन की उन मीठी यादों को वह दुबारा जी पाया?

गुल्ली डंडा पढ़ते हुए यह ख्याल मन में आया कि क्या असल में ऐसा नामुमकिन है कि बड़े होने के बाद पद और प्रतीष्ठा के अलग रख कर दोस्ती नहीं हो सकती।

शायद यह सच भी हो क्योंकि कई बार ना चाहते हुए ऐसी दोस्ती में पद और प्रतीष्ठा का ख्याल आ ही जाएगा। ऐसे में एक तरह की सकुचाहट एक व्यक्ति के मन में तो उठ ही सकती है फिर वह व्यक्ति गया की तरह कम प्रतीष्ठा का हो या कथावाचक की तरह ऊंची प्रतीष्ठा वाला। ऐसे ही तो नहीं कहा गया है दोस्ती बरबार के लोगों में निभती है क्योंकि जहाँ बराबरी नहीं है वहाँ सहजता नहीं रह जाती है।

12) ज्योति
पहला वाक्य:
विधवा हो जाने के बाद बूटी का स्वभाव बहुत कटु हो गया था।

बूटी के पति के मृत्यु के बाद उसके स्वभाव में कटुता आ गयी थी। उसका ज्यादातर समय अपने मृत पति को कोसते हुए या लड़ते झगड़ते बीतता था।  हर किसी से वो परेशान रहती थी। वह चाहती थी कि जैसे उसे दुःख हो वैसे सभी दुखी रहें। सबसे ज्यादा परेशान वो अपने बड़े बेटे मोहन से रहा करती थी जो कि दिन भर गृहस्थी के लिए खटता रहता था।

ऐसे में जब उसे पता चला कि मोहन को रूपा से प्रेम हो गया है और वो दोनों चोरी छिपे मिलते हैं तो उसके गुस्से का ठिकाना न रहा। उसने मोहन को आदेश दे डाला कि अगर वह रूपा से मिला तो वह अपने प्राण त्याग देगी।
मोहन अपनी माँ को बहुत मानता था लेकिन रूपा में भी उसकी जान बचती थी।

क्या मोहन ने बूटी की बात मानी? क्या वह अपने प्रेम को भूल गया?

दुःख एक ऐसी चीज है जो व्यक्ति को बदल देती है। कई लोग इससे दीन बन जाते हैं और कई लोग अपने दुःख में घुले बहुत उग्र बहुत कठोर हृदय हो जाते हैं। अक्सर हम लोग इन कठोर हृदय लड़ाखू लोगों से बचने में ही भलाई समझते हैं लेकिन कई बार प्रेम के दो बोल भी ऐसे लोगों के अंदर काफी बदलाव ले आते हैं। यही चीज प्रेमचंद जी ने इस कहानी के माध्यम से दर्शायी है। प्रेम में बहुत ताकत है। अगर हम किसी के अंदर के दुःख को समझे, उससे प्रेम के बोल बोलें तो काफी हद तक उसके अंदर की कड़वाहट मिट जाती है।

इस संग्रह में मौजूद कई कहानियों में यह देखने को भी मिलता है कि उस वक्त कई समाजों में विधवा विवाह का प्रचलन भी था। केवल शायद उच्च जातियों में यह ठीक नहीं माना जाता था और उनकी देखा देखी इन समाज की स्त्रियों ने  भी विधवा रहना शुरू किया। कहानी की एक पंक्ति कुछ ऐसी है:

जब बहुत जी जलता तो अपने मृत पति को कोसती-आप तो सिधार गए, मेरे लिए यह जंजाल छोड़ गए। जब इतनी जल्दी जाना था, तो ब्याह न जाने किसलिए किया। घर में भूनी भॉग नहीं, चले थे ब्याह करने ! वह चाहती तो दूसररी सगाई कर लेती। अहीरों में इसका रिवाज है। देखने-सुनने में भी बुरी न थी। दो-एक आदमी तैयार भी थे, लेकिन बूटी पतिव्रता कहलाने के मोह को न छोड़ सकी।

यह पंक्ति यह भी  बता देती है कि व्यक्ति झूठे नाम और प्रतिष्ठा के लिए क्या क्या करने को तैयार हो जाता है।
ज्योति एक सुन्दर कहानी है जो प्रेम की ताकत को दर्शाती है।

कहानी के कुछ अंश:
प्रेम के शब्द में कितना जादू है! मुँह से निकलते ही जैसे सुगंध फैल गई। जिसने सुना, उसका हृदय खिल उठा। जहाँ भय था, वहाँ विश्वास चमक उठा। जहाँ कटुता थी, वहाँ अपनापा छलक पड़ा। चारों ओर चेतनता दौड़ गई। कहीं आलस्य नहीं, कहीं खिन्नता नहीं।

तो यह थी इस संग्रह की पहली 12 कहानियाँ। क्या आपने इन्हें पढ़ा है? आपकी इनके विषय में क्या राय थी।
अगर आपने इन्हें नहीं पढ़ा है तो आपको इन्हें जरूर पढ़ना चाहिए।

रेटिंग:5/5


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मुंशी प्रेमचन्द जी की दूसरी कृतियों को भी मैंने पढ़ा है। उनके विषय में मेरी राय निम्न लिंक पर जाकर पढ़ सकते हैं:
मुंशी प्रेमचंद

© विकास नैनवाल 'अंजान'

2 comments:

  1. बेहद सुखद अनुभूति हुई मुंशी प्रेमचंद जी की कहानियों की गहन और हृदयस्पर्शी समीक्षाएँ पढ़ कर । लगा ब्लॉग की पोस्ट नही हिन्दी साहित्य के किसी कक्षा कक्ष में बैठ कर व्याख्यान सुन रहे हो ।


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    1. जी आभार। इस वर्ष प्रेमचन्द जी को पूरा पढ़ने का मन है। उन सभी कृतियों के विषय में लिखूँगा। काफी कुछ सीखने और समझने को मिल रहा है। आभार।

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