कुछ कहानियाँ - 3

मैं अक्सर ऑनलाइन या मोबाइल एप्प पर काफी कहानियाँ पढ़ता हूँ। उधर तो अपने विचार लिख देता हूँ लेकिन उसका दायरा उधर तक ही सीमित रहता है। इस कारण मैंने सोचा कि मैं अपने ब्लॉग पर भी उन कहानियों के प्रति पाठकीय विचार दिया करूँगा। हर कहानी के लिए अलग पोस्ट बनाने की जगह कुछ पाँच छः  कहानियों के लिए एक पोस्ट बना लूँगा। पहले मैं ऐसा ही कुछ हफ्ते की कहानियाँ नाम से भी करता था। इस में दिक्कत यह थी कि किसी किसी  हफ्ते  मैं केवल एक ही कहानी पढ़ पाता हूँ तो उसे पोस्ट करने का मुझे कोई तुक नहीं दिखता है। फिर हफ्ते की कहानियाँ में मैं ऑफलाइन स्रोतों से भी पढ़ी कहानियों के विषय में लिखता था। परन्तु 'कुछ कहानियाँ' में मैं केवल अंतर्जाल में मौजूद कहानियाँ या एप्प में मौजूद कहानियों को शामिल करूँगा।  इससे फायदा यह होगा कि कहानी के विषय में पढ़कर आप चाहे तो उसे उनकी साइट पर जाकर भी पढ़ सकेंगे।

आशा है मेरा यह प्रयास आपको पसंद आएगा।

स्रोत: पिक्साबे


1.दास्तान ए मौत और रात का सफर - शोभा शर्मा
साईट : प्रतिलिपि

पहला वाक्य:
शन्नो की आँखें बहा-बहा कर रीत गईं थीं। 

शन्नो को जब पता चला कि उनके पिताजी की तबियत खराब थी तो उन्होंने अकेले ही मायके जाने का फैसला कर लिया। उनके गाँव तक जाने के साधन सीमित थे तो अकेला चलना दूभर होने वाला था लेकिन चूँकि जरूरी था तो जाना ही था। पर इस सफर में शन्नो के साथ कुछ ऐसा हो गया जिसकी उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी। आखिर ऐसा क्या हुआ शन्नो के साथ।

दास्ताने मौत और रात का सफर एक पठनीय और रोचक कहानी है। कहानी में नाटकीयता की कमी है लेकिन इसका साधारण होना ही इसे यथार्थ के नज़दीक पहुँचाता है। पढ़ते हुए लगता है कि ऐसा होना मुमकिन है। बस एक छोटी सी बात मुझे खटकी थी। जब ट्रैन खाली हुई थी तो साथ में बैठे लोगों ने शन्नो को जगाया क्यों नहीं? मैं मुंबई में लोकल में सफर किया करता था और कई बार हमे सोते हुए यात्री मिल जाते थे। मेरा स्टेशन विरार था जो कि आखिरी स्टेशन था। ऐसे में उन सोते लोगों को मैं या कोई दूसरा यात्री जगा दिया करता था। इधर ऐसा न होना मुझे अटपटा लगा। एक बार पढ़ी जा सकती है।

मेरी रेटिंग: 3/5
लिंक: दास्तान ए मौत और रात का सफ़र

2. बदनीयती - सुधा सिंह
साईट : स्टोरी मिरर

पहला वाक्य:
ट्रिंग ट्रिंग ट्रिंग फोन की घंटी बजी, मैंने झट से फोन उठा लिया।

अवंतिका को जब बीनू दीदी का फोन आया तो उसे हैरानी हुई। उनके बीच बीते वर्षों पर काफी कुछ हुआ था जिससे उनके बीच के रिश्ते में खटास सी आ गई थी। लेकिन आज फोन एक खुश खबरी देने के लिए था। क्या थी वह खुश खबरी?

शादी ब्याह के  मामले भारतीय समाज में किसी व्यापार से कम नहीं होते हैं। लेना देना तौलना सब इधर चलता है। लोग दहेज देने का विरोध तो करते हैं लेकिन लेते वक्त उनके विचार बदल जाते हैं। ऐसे ही समाज का चित्रण करती है यह कहानी। अपने आस पास आपको ऐसे कई चरित्र देखने को मिल जायेंगे।


रेटिंग: 3/5
लिंक: बदनीयती





3. पुस्तकें फाड़ने वाला भूत - मस्तराम कपूर 'उर्मिल'
साईट : साहित्य विमर्श

पहला वाक्य:
घंटी की आवाज सुनते ही खेल के मैदान में भगदड़ मच गई.

विद्यालय में कुछ दिनो से अजीब सी घटना होने लगी थी। बच्चों की पुस्तकें कोई फाड़ कर चला जाता था। विद्यालय में यह खबर फैल गई थी कि इसके पीछे किसी भूत का हाथ है। पर सुरेश इस बात पर विश्वास करने को तैयार नहीं था। क्या सचमुच विद्यालय में भूत था जो आधी छुट्टी के वक्त अपनी करामात दिखा जाता था? या जैसे सुरेश का विचार था यह किसी शरारती लड़के की शरारत थी? क्या सुरेश सच्चाई का पता लगा पाया?

यह एक बेहद पठनीय बाल कहानी है जिसे पढ़कर मुझे बहुत अच्छा लगा। हाँ, भूत सब काम एक तरह से करते हैं वाला तर्क बच्चों के भोले मन को दर्शाता है लेकिन यह कहानी के पठनीयता में कोई बाधा नहीं लाता है। रहस्य अंत तक बना रहता है। अगर आपने इसे नहीं पढ़ी है तो आपको इसे जरूर एक बार पढ़ना चाहिए।

रेटिंग: 3/5
लिंक: पुस्तकें फाड़ने वाला भूत


4. बॉडी गार्ड - रोबर्ट ब्राउन पार्कर 

अनुवादक: डॉ. दण्डिभोट्ला नागेश्वर राव


पहला वाक्य:
अपने काले चश्मे से डेविड़ की ओर देखकर रिकी ने कहा, “शिकागो से मेरा दोस्त जॉकी रॉबिन्सन यहाँ आनेवाला है।''

जॉकी रोबिनसन शिकागो से फिलेडेफिया आने वाला था। यह उन दिनों की बात है जब अमरीका में नस्ल भेद अपने चरम पर था। यही कारण था कि डेविड ने रिकी को जॉकी की सुरक्षा का जिम्मा दिया था। जॉकी एक अफ्रीकन अमेरिकन था और रिकी एक गोरा था। इस कारण उसे जॉकी की सुरक्षा का भार दिया जा सकता था। क्या रिकी अपने कार्य में सफल हुआ?

यह रोबर्ट ब्राउन पार्कर की कहानी का हिन्दी अनुवाद है। यह उस वक्त की कहानी है जब नस्लभेद अपने चरम पर था। एक रोचक कहानी जो बतलाती है कि सब साथ मिल जाये तो अतियायी के डर से आसानी से निजाद पाया जा सकता है। यह बात हर वर्ग और हर समय लागू होती है। प्रासंगिक कहानी।

रेटिंग : 3/5
लिंक : बॉडी गार्ड

5. तावीज - जेन्नी शबनम 
पहला वाक्य:
3 x 6 के बिस्तर पर लेटी धीमी गति से चलते पंखे को देख निशा सोच रही है कि ऐसे ही चक्कर काटती रही वह तमाम उम्र, कभी बच्चों के पीछे कभी जिम्मेदारियों के पीछे। 

अपने बिस्तर पर लेटी निशा पंखे को देख अपने जीवन के विषय में सोच रही है। ये सोचना कोई नई बात नहीं है बल्कि उसके रोज का एक हिस्सा बन गया है। उसके जीवन में एक तावीज है जिसे उसने काफी पहले बाँध लिया था। अब वही तावीज उसके लिए बंधन साबित हो रहा है।

तावीज जेन्नी शबनम जी की लघु कथा है। यह एक मार्मिक लघु कथा है जो एक आम स्त्री के आन्तरिक द्वन्द को दर्शाती है।इस स्त्री ने अपना काफी कुछ त्यागा है और अब वो अपने आप को बंधा सा महसूस करती है।हर क्षेत्र में खुद को हारा हुआ महसूस करती है। अपने शोषण को सहते रहने के लिए खुद को विवश सा पाती है। इसके पीछे कुछ हद तक उसकी आर्थिक निर्भरता भी शामिल है।

मेरा हमेशा से मानना रहा है कि स्त्रियों को आर्थिक रूप से हमेशा ही आत्मनिर्भर होना चाहिए। यह बहुत जरूरी है। कब कैसा वक्त आ जाये कोई नहीं जानता। कौन कब बदल जाये, कोई नहीं जानता। ज्यादातर रिश्तों में स्त्रियाँ शोषण यही सोचकर सहती रहती हैं कि रिश्ते को तोड़कर वो आखिर आगे कहाँ जाएँगी? वो अपना सब कुछ होम कर देती हैं और अंत में अपना कुछ कहने के लिए उनके पास नहीं बचता है। ऐसी ही स्त्रियों  स्त्रियों के जीवन और उनके मन के अंदर रोज चलते द्वंद को दर्शाती है लघु कथा। पठनीय।

रेटिंग : 4/5
लिंक: साझा संसार

6. नीच - रज़िया सज्जाद ज़हीर
अनुवाद : नूर ज़हीर

पहला वाक्य:
शामली को देख कर सुलताना को लकड़ी के उन बेढंगे टुकड़ों का ख़याल आ जाता था जिन को अलग अलग देखो तो आड़े तिरछे और बेडौल, लेकिन ठीक से मिलकर बनाओ तो ऐसे नमूने, ऐसी तस्वीरें निकले कि क्या कहने!


 शामली को जब सुल्ताना ने देखा तो उसे एक तरह का लगाव उससे हो गया। शामली एक आत्मविश्वासी महिला थी जिसने दूसरे आर्थिक रूप से कमजोर लोगों की तरह आर्थिक रूप से सम्पन्न लोगों के आगे झुकना नहीं सीखा था। लेकिन फिर जैसे जैसे वक्त बीता वैसे वैसे शामली के विषय में बाते होने लगी।

शामली तथाकथित छोटी जात की थी और इसको लेकर उसके चरित्र पर टिप्पणियां होने लगी। सुल्ताना, जो कि बचपन से ऐसी बातें सुनते आ रही थी, को पहले ये बातें अटपटी लगी। वह जात के साथ जुड़े इन दकियानूसी ख्यालो को नहीं मानती थी। पर फिर ऐसा कुछ हुआ कि सुल्ताना को लगने लगा कि इन धारणाओं के पीछे कुछ सच्चाई तो होती है।

आखिर ऐसा क्या हुआ?

शायद ही कोई ऐसा इनसान हो जो पूर्वग्रह से ग्रसित न हो। हम  अपनी परवरिश के कारण कई बार कई पूर्वग्रह पाल लेते हैं और अक्सर उनको तोड़ने की कोशिश करते हुए भी कई बार उनके अनुसार चीजों को देखने लगते हैं। यही चीज सुल्ताना के साथ भी इस कहानी में घटित होती है। इधर उसकी आँखों में जात का पूर्वग्रह तो है ही लेकिन फिर शामली चूँकि औरत है तो औरतों के प्रति जो पूर्वग्रह होते हैं वो भी दिखाई देते हैं। हम किसी औरत के विषय में कुछ सुनते हैं और फिर कैसे धारणा बना लेते हैं कि वो कैसी होगी यह भी दिखता है। सुल्ताना का शामली से पूछना कि वो इतनी अच्छी है लेकिन फिर उसने अपने पति को क्यों छोड़ा ही कई पूर्वाग्रहों को दिखाता है। सुल्ताना बिना उसकी बात जाने यह सोच लेती है कि गलती शामली की होगी, क्योंकि पति को शामली ने छोड़ा है तो उसे शामली के अच्छे होने पर आश्चर्य होता है। यह सब आम बाते हैं जो समाज में अभी भी व्याप्त हैं। यह कहानी इन बातों को उठाती है और दर्शाती है कि कैसे हमारी धारणाएँ गलत भी हो सकती हैं। कहानी का अंत मुझे पसंद आया। हाँ, शामली के निर्णय का कारण सुल्ताना को पूछना पड़ा यह देखकर हैरानी हुई। सुल्ताना एक समझदार महिला थी। उसे यह बात समझ  जानी चाहिए थी पर पूर्वग्रह ने शायद उसके आँखों पर एक पट्टी बाँध दी थी। बेहतरीन कहानी। पढियेगा इसे।

रेटिंग : 4.5/5
लिंक: नीच


7.श्यामला - अविनाश झा

पहला वाक्य:
श्यामला ने आज फिर मां को काफी खरी खोटी सुनाई थी।

श्यामला ने ट्रान्सफर तो इसलिए लिया था ताकि अपनी माँ की सेवा कर सके लेकिन ऐसा हो नहीं पाया था। घर आकर उनके बीच लड़ाई बढ़ने लगी थी। और फिर श्यामला कहीं चली गई। आखिर वह किधर गई? श्यामला की घरवालों से बहस किस कारण होती थी?

अविनाश झा जी की यह लघु-कथा पठनीय तो है लेकिन इसमें एक अधूरापन सा है।
श्यामला ने घर क्यों छोड़ा यह बात कहानी में साफ नहीं होती है। श्यामला के घर वाले श्यामला की बात मानने के लिए राजी तो थे ही। इस कारण कहानी में  एक अधूरापन सा है  जो कि खटकता है। कई बार हम जिद में फैसला ले लेते हैं और फिर बाद में पछताने के लिए भी हमे वक्त नहीं मिलता है। श्यामला के साथ भी ऐसा ही हुआ। शायद ही वो कभी ग्लानी से मुक्त हो पाये।

रेटिंग: 2/5
लिंक : श्यामला


8. मृत्यु का देवता - प्रज्ञा गौतम 
साईट : रचनाकार

पहला वाक्य:
प्रशांत महासागर की अशांत लहरें तट पर सर पटकतीं और फिर अथाह जल राशि में विलीन हो जातीं।

यह वर्ष 2150  था। अटाकामा नाम की जगह में एक वैज्ञानिक संगोष्टी होने वाली थी। इस संगोष्टी की अध्यक्षता डॉ आर्नोल्ड कर रहे थे। डॉक्टर आर्नोल्ड एक युवा वैज्ञानिक थे जिन्होंने काफी कम समय में काफी नाम कमा दिया था। और फिर अचानक वह अपने फ्लैट में मृत पाये गये। इसके बाद दो और लोग उसी संदिग्ध हालत में मृत पाए गये। आखिर ये कैसे हुआ किसी को इसके विषय में कोई जानकारी नहीं थी। जितने लोग थे उतनी बातें। आदिवासी लोग इसे भगवान का प्रकोप मान रहे थे। उन्होंने कुछ दिनों पहले उधर हो रहे खनन का विरोध किया था। वहीं हमारे कहानी वाचक को लग रहा था कि आर्नोल्ड  किसी साजिश का शिकार हुए थे।
आखिर सच गया था?

मृत्यु का देवता प्रज्ञा जी की एक रोचक लघु कथा है। यह शुरुआत से ही रहस्य बनाकर चलती है जो पाठक को अंत तक पढने को मजबूर करता है। हाँ, इसमें थोड़ा रोमांच और डाला जा सकता था। शक की सुई एक आदमी पर घूमती है तो उसे एक रेड हेरिंग की तरह इस्तेमाल कर सकते थे। खैर, अभी भी पठनीय कहानी है।



रेटिंग: 3/5
लिंक: मृत्यु का देवता

कुछ कहानियाँ की दूसरी कड़ियों को आप निम्न लिंक पर जाकर पढ़ सकते हैं:
कुछ कहानियाँ
© विकास नैनवाल 'अंजान'

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6 Comments
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  1. आपकी समीक्षाएं अच्छी लगी ।

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  2. आप अच्छी और उपयोगी समीक्षाएं लिखते हैं विकास जी । मेरे आग्रह पर सुरेंद्र मोहन पाठक साहब की एक बहुत पुरानी लघुकथा - 'ताश के पत्ते' पढ़िए । मैं इसे पढ़कर इतना प्रभावित हुआ था कि मैंने इसकी समीक्षा लिखी । आशा है कि पहली बार 1964 में प्रकाशित हुई यह छोटी-सी कहानी आपको भी पसंद आएगी ।

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    1. जी मुझे लगता है यह कहानी मैंने पढ़ी होगी लेकिन इसके विषय में लिखा नहीं था। अब दुबारा जरूर पढूँगा। शुक्रिया।

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