ज़िन्दा मुर्दा - एस सी बेदी

रेटिंग : 2.5 /5
किताब 2 मई 2018 को पढ़ी गई
संस्करण विवरण:
फॉरमेट : पेपरबैक
पृष्ठ संख्या : 40
प्रकाशक : राजा पॉकेट बुक्स
श्रृंखला : राजन-इकबाल



कभी शेर खान के नाम से सारा शहर काँपता था। आमजन तो उसका खौफ खाते ही थे लेकिन पुलिस को भी उसने अपनी गैंग के साथ मिल कर कई बार नाकों चने चबवाये थे।

लेकिन अब ये बात किस्से कहानियों तक ही रहने वाली थी। लोगों के दिलों में दहशत भरने वाला शेर खान अब इस दुनिया में नहीं था। राजन-इकबाल ने न केवल उसे पकड़ाया था बल्कि उसके मरने के बाद उसकी लाश को  दफन होते हुए भी देखा था। शेर खान नामक खौफ का आखिर अंत हो गया था। अब शहर में शांति रहने वाली थी।

यही उम्मीद सबको थी। लेकिन सबकी उम्मीद तब टूट गई जब शहर के डी एस पी चौहान के लगभग पूरे परिवार को किसी ने बेहरहमी से मार दिया।

मारने के तरीके से लगता था कि शेर खान इसके पीछे है। वही शेर खान जो मर चुका था, दफ्न हो चुका था। मारने वाले का भी यही दावा था कि वो शेर खान की कुपित आत्मा है और अपना बदला पूरा करने आई है। डीएस पी चौहान तो शुरुआत हैं।

और फिर हुआ कत्ल और आतंक का ऐसा नाच कि शहर वालों की रूह काँप गई।

क्या शेर खान मरकर ज़िन्दा हो चुका था? 

राजन ये मानने को तैयार नहीं था। फिर इन खूनी और वहशी हरकतों के पीछे किसका हाथ था? क्या बाल सीक्रेट एजेंट रहस्य का पर्दा उठा पाए? उन्हें इस गुत्थी को सुलझाने के लिए क्या क्या करना पड़ा?

आपके मन में भी कई सवाल उठ रहे होंगे। सबके जवाब तो आपको एस सी बेदी जी की कलम से निकले इस हैरतअंगेज लघु उपन्यास को पढ़ने के पश्चात ही मिलेंगे।

मुख्य किरदार :
शेर खान - एक दुर्दांत अपराधी जिसकी हाल में ही मृत्यु हुई थी
राजन,इकबाल - बाल सीक्रेट एजेंट
शोभा,सलमा - राजन इकबाल की प्रेमिकाएं और उन्ही के सामान एजेंट
बलबीर - पुलिस इंस्पेक्टर
डी एस पी चौहान - एक पुलिस अफसर जिनके लगभग पूरे परिवार को बेदर्दी से मार दिया गया था
नजमा - डीएसपी चौहान की बेटी जो हत्यारे के हमले से बच गई थी
डॉ जोगेंद्र  चोपड़ा - वो डॉक्टर जिसने शेर खान की लाश की जाँच की थी और उसे मरा घोषित कर दिया था
दिनेश - डॉक्टर चोपड़ा का सहायक जो कि गायब थे
हवालदार भोलाराम - हवलदार जिसकी ह्त्या कर दी गई थी
जज सेठी - वो जज जिन्होंने शेर खान की सजा मुकर्रर की थी
मदन,गुलशन, रमजान - शेर खान के साथी

एस सी बेदी जी का लघु-उपन्यास ज़िन्दा मुर्दा पढ़ा। उपन्यास की शुरुआत जिस प्रकार हुई थी उससे पहले मुझे लगा जैसे मैंने ये कथानक पहले पढ़ा था। बाद में याद आया कि एस सी बेदी जी के ही द्वारा लिखा गया पत्थरों के रहस्य का किस्सा भी इसी से मिलता जुलता है। उधर भी एक अपराधी मरता है और उसके बाद उसकी आत्मा आतंक मचाती है। इधर भी ऐसा ही कुछ होता है। लेकिन इधर इस उपन्यास की उससे समानता खत्म हो जाती है और बाद में जो कुछ होता है वो अलग होता है।

उपन्यास की शुरुआत मुझे बेहतरीन लगी। बहुत भयानक तरीके से एक परिवार मारा जाता है और उसके पश्चात भी खलनायक कई दिल दहलाने वाले काम करता है। ऐसा प्रतीत होता है कि खलनायक हमेशा राजन-इकबाल से दो कदम आगे ही है और ये फर्क पूरे कथानक में बरकरार रहता है। इस वजह से उपन्यास पढ़ने में मुझे मजा आ रहा था क्योंकि पहली बार राजन इकबाल को इतने सशक्त दुश्मन से टकराते देख रहा था। राजन इकबाल कई मुश्किलों से इसमें जूझते है जिससे कहानी में रोमांच बना रहता है।

फिर उपन्यास में एक मोड़ आता है और आत्मा का राज खुलता है। वो राज मुझे इतना जंचा नहीं। वैसेक्या नहीं जँचा ये मैं कहना तो चाहता हूँ लेकिन उससे पूरी कहानी उजागर होने का खतरा है इसलिए अभी के लिए केवल इतना कह सकता हूँ कि अगर आपके पास कोई ताकत हो जिससे आप सामने वाले को कोई शक्ति दे सकते हैं तो आप किसे चुनेंगे? एक दुर्दांत हत्यारे को या किसी अच्छे इनसान को। मैं तो एक दुर्दांत अपराधी पर भरोसा नहीं करूँगा भले ही वो कितने वादे कर ले। यही बात मुझे खटकी थी और कहानी का कमजोर पक्ष लगी। ये तर्क संगत नहीं था। इसकी जगह ये काम मजबूरी में होता दिखलाया जाता तो ज्यादा सही रहता।

अगर आपने इस लघु उपन्यास को पढ़ा है तो आपको आईडिया हो गया होगा कि मैं किस विषय में बात कर रहा हूँ। आपकी क्या राय है? ये जरूर बताना। अगर आपने इसे नहीं पढ़ा तो पढ़कर बताईयेगा।

खैर, इस कमी के चलते ही उपन्यास की रेटिंग मैंने साढ़े तीन से ढाई करी। उपन्यास में बाकी राजन-इकबाल वाले सारे तत्व मौजूद हैं। राजन इकबाल के आपस का समीकरण वैसा ही है। इकबाल की कॉमिक टाइमिंग और झख मजेदार है। हाँ,सलमा और शोभा वैसे तो कथानक में आती हैं लेकिन एक्शन में नहीं थी तो ये कमी खटकी। सलमा और शोभा जब दुश्मनों को पछाड़ती है तो वो पढ़कर मुझे तो बड़ा मजा आता है।

ये एक बाल उपन्यास है तो उसी के हिसाब से पढेंगे तो एक बार पढ़कर एन्जॉय कर सकते हैं। जो कमी बताई वो न होता तो उपन्यास और अच्छा बन सकता था।

अगर आपने यह लघु-उपन्यास पढ़ा है तो आपको ये कैसा लगा? अपने विचार आप कमेंट के माध्यम से बता सकते हैं।

यह उपन्यास राज कॉमिक्स द्वारा पुनः प्रकाशित राजन इकबाल सेट का हिस्सा था। आप चाहे तो इसे निम्न लिंक पर जाकर प्राप्त कर सकते हैं।
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2 Comments
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  1. मुझे बचपन में पढ़े उपन्यास की हल्की सी स्मृति है, पर शायद उसका नाम 'जिंदा आत्मा' था, जो बहुत ढूंढने पर भी नहीं मिल पाया कभी। शायद यही उपन्यास नाम बदलकर छपा हो। क्या आपके लिए यह सम्भव है कि आप इसके शुरुआती कुछ पन्नों की तस्वीर स्कैन कर या पीडीएफ अपलोड कर सकें।

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    1. जी यह किताब तो फिलहाल मौजूद नहीं है मेरे पास .....जब घर गया तो जरूर इसका एक छोटा सा अंश इधर ब्लॉग पर प्रकाशित करने की कोशिश रहेगी....

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