Friday, May 11, 2018

महाशक्ति - एस सी बेदी

रेटिंग :2/5
किताब 9 मई 2018 से 10 मई 2018 के बीच पढ़ी गई 

संस्करण विवरण:
फॉर्मेट : पेपरबैक 
पृष्ठ संख्या : 40
प्रकाशक : राजा पॉकेट बुक्स 
श्रृंखला : राजन-इकबाल


पहला वाक्य:
"राजन! अब मुझसे बर्दाश्त नहीं होते।"

सीक्रेट सर्विस के चीफ परेशान थे। भारत के कई महत्वपूर्ण व्यक्तियों, जिसमें कई वैज्ञानिक,इंजिनियर,डॉक्टर इत्यादि शामिल थे, के अपहरण हो रहे थे। सीक्रेट सर्विस की परेशानी का ये ही सबब था। इसलिए जब उन्होंने इस विषय को लेकर एक गुप्त मीटिंग बुलाई तो राजन-इकबाल और शोभा सलमा को उस मीटिंग में बुलाना उचित ही था। 

लेकिन फिर किसी ने इकबाल और शोभा की गाड़ी पे हमला किया। हमले का कारण उन्हें इस मुद्दे पर जासूसी करने से रोकना था। उन्हें बाकायदा धमकी मिली थी कि वो इस मामले से दूरी बनाकर रहे। हमले की जिम्मेदारी महाशक्ति नाम के शख्स ने ली थी। 

तो कौन था ये महाशक्ति? 

क्या वो ही इन अपहरणों के पीछे था? अगर ऐसा था तो वो क्यों ये कर रहा था?

क्या राजन इकबाल की टोली इस महाशक्ति का राज फाश कर सकी? 

और इस काम के लिए उन्हें किन किन मुसीबतों से दो चार होना पड़ा?

ऐसे ही मन में कुलबुलाते प्रश्नों के उत्तर आपको इस उपन्यासिका को पढ़कर मिलेंगे।


मुख्य किरदार:
राजन इकबाल सलमा शोभा - बाल सीक्रेट एजेंट्स
पवन, विक्टर ,पूनम, आफताब - दूसरे एजेंट्स जो राजन इक़बाल के साथ इस केस पर काम कर रहे थे
प्रोफेसर मदान, प्रोफेसर अजीत घोष, डॉक्टर रामाराव - जाने माने वैज्ञानिक जिनके पास राजन और शोभा महाशक्ति का राज जानने गए थे
ज़रीन -  महाशक्ति की सेविका
प्रोफेसर विनायक राव पाटिल - एक वैज्ञानिक जिन्हें राजन जानता था

एस सी बेदी जी द्वारा रचित उपन्यासिका महाशक्ति पढ़नी अभी खत्म करी है। उपन्यास की बात करें तो उपन्यास विज्ञान गल्प की श्रेणी में रखा जा सकता है। इसमें एक ऐसा खलनायक है जो गायब हो सकता है, जिसे छूने से उसको छूने वाला जल कर राख हो सकता है। और ये सब चीजें उसने विज्ञान के बल पर हासिल की है। वहीं कभी कभी कथानक में प्रयोग किया गया विज्ञान फंतासी का रूप भी ले लेता है। जैसे कथानक में एक दवाई का जिक्र है जो अगर इनसान पी ले तो एक पिशाच में तब्दील हो जाता है और उसके बाद वो अप्राकृतिक शक्ति का स्वामी बन जाता है। कुछ कुछ हल्क की तरह। तो उपन्यास के ये दो बिंदु विज्ञान गल्प में रखे जा सकते हैं। ये चीज उपन्यास में मुझे पसंद आई। उपन्यास की दूसरी बात जो मुझे अच्छी लगी वो ये कि इसमें लेखक ने रेड हेरिंग(रेड हेरिंग जासूसी उपन्यासों में इस्तेमाल की जाने वाली तकनीक है। इसमें लेखक कुछ ऐसे पात्र, या घटनाएँ पाठक के सामने रख देता है जिसके कारण पाठक कातिल या अपराधी के विषय में गलत नतीजा निकालता है। कई बार कुछ संदिग्ध किरदारों का इस्तेमाल करके ये काम किया जाता है।) का प्रयोग किया है। वैसे तो ये साधारण तकनीक है लेकिन मैंने अब तक राजन-इकबाल श्रृंखला के उपन्यासों में इसको नहीं पढ़ा था। इधर पढ़ा तो अच्छा लगा।

उपन्यास के कमजोर पक्ष की बात करूँ तो उपन्यास में खलनायक और नायको (क्योंकि सारे एजेंट ही नायक हैं) कि मुठभेड़ मुझे जमी नहीं। हो सकता है खलनायक ने जो किया वो ओवर कॉन्फिडेंस में किया लेकिन फिर भी अगर मैं उसकी जगह होता तो वो नहीं करता। मसलन मैं खुद एजेंट्स के सामने खुद को जाहिर नहीं करता। मेरा जो मकसद था उस पर ध्यान देता। फिर यदि मैंने जाहिर भी कर दिया तो एजेंट्स को खुद अपने अड्डे तक नहीं ले जाता। दूसरी बात खलनायक अगर बनो तो पूरी तरह से बनो। इधर खलनायक खून नहीं बहाना चाहता है इसलिए वो रक्त पात करने से बचता है। यही उसकी कमजोरी भी है।

'आप हमे आदेश दें, हम उन्हें खत्म कर देंगे।' तीसरा सदस्य बोला। 
'नही! हम फिजूल का खून खराबा पसंद नहीं करते। खून हम तभी बहाते हैं - जब हमारा काम आसानी से न हो।'
(पृष्ठ 15)

अगर वो राजन इकबाल को मौका लगते ही मार देता तो कथानक वैसे खत्म नहीं होता जैसे हुआ। मुझे यही कथानक की कमजोरी भी लगती है। क्योंकि अंत में नायकों का रुख ऐसा नहीं होता है। वो बेतरतीब तरीके से खून खराबा करते हैं। खलनायक का अंत जैसा होता है वो भी दर्शाता है कि खलनायक अगर खून खराबा करता तो शायद बच जाता। अगर नहीं भी बचता तो कथानक और रोमांचक हो जाता। अभी इतना रोमांचक नहीं रह पाता है। क्योंकि नायको को खलनायक तक पहुँचने के लिए ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती है। दूसरा पहुँचने के बाद भी ऐसा नहीं है कि उन्हें यातनाएं दी गई हों। उन्हें आराम से रखा जाता है तो वो जद्दोजहद नहीं रहती है तो होनी चाहिए। इसके इलावा भी खलनायक की समाप्ति का भी आसान सा तरीका बेदी जी ने ढूंढ लिया था। वो अपनाने के बाद सारे नायक अजय हो जाते हैं। अब पाठक के रूप में मुझे ऐसे नायक पसंद नहीं आते जो अजय हों। अगर नायक को कहानी में कुछ संघर्ष न करना पड़े तो उस कहानी को  पढ़ने  का मजा नहीं रह जाता। इसके बनिस्पत अगर बेदी जी ने राजन इकबाल को दिमागी सूझ बूझ और जासूसी ट्रेनिंग के इस्तेमाल के द्वारा खलनायक पे विजय पाते दिखलाया होता तो उपन्यास और रोचक बन पड़ता। इसकी वजह से उपन्यास का कथानक भी बढ़ सकता था जो कि पाठक के लिए अच्छी बात होती।

खैर,चूँकि ये बाल उपन्यासिका है तो उस तौर पर एक बार पढ़ा जा सकता है। लेकिन हमे ध्यान रखना चाहिए कि आजकल बच्चे पर्सी जैक्सन,इंकवर्ल्ड ट्राइलॉजी  जैसे कथानक पढ़ते हैं जो कि काफी जटिल होते हैं। तो उन्हें हिन्दी में भी उसी स्तर का कथानक देना पड़ेगा।

अगर आपने इस उपन्यासिका को पढ़ा है तो आपको ये कैसी लगी? कमेंट के माध्यम  से मुझे जरूर अवगत करवाईयेगा। 
अगर आपने इसे नहीं पढ़ा है और पढना चाहते हैं तो राज कॉमिक्स की साईट से इसे मँगवा सकते हैं:
मैंने एस सी बेदी जी के अन्य उपन्यास पढ़े हैं। उनके विषय में मेरे विचार आप निम्न लिंक से प्राप्त कर सकते हैं:

राजन-इकबाल श्रृंखला के अन्य उपन्यास भी मैंने पढ़े हैं और उनके विषय में मेरे विचार आप निम्न लिंक पर जाकर पढ़ सकते हैं:

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