तबाही - एस सी बेदी

रेटिंग : 2.25/5
नवम्बर 18,2017 से नवम्बर 19,2017 के बीच पढ़ा गया

संस्करण विवरण :
फॉर्मेट :पेपरबैक
पृष्ठ संख्या : 78
प्रकाशक : सूरज पॉकेट बुक्स
श्रृंखला : राजन-इकबाल


पहला वाक्य:
साउदी अरब से आने वाले विमान से यात्रियों के साथ दो महिलायें भी उतरीं, जिन्होंने सफ़ेद रंग का रेशमी चोंगा पहन रखा था।

अफजल बैग ने भारतीय सीक्रेट सर्विस के जो दस्तावेज चुराये थे वो अब पाकिस्तान में थे।  इन दस्तावेजों के पीछे राजन इकबाल भी पाकिस्तान पहुँच चुके थे।

पाकिस्तान पहुँचने पर उन्हें पता लगा कि पाकिस्तानी सेना भी दस्तावेजों के पीछे पड़ी थी। दस्तावेजों का पता इमरान नाम के सैनिक को था जिसे पाकिस्तानी सेना अपने हेड क्वार्टर में रखकर जानकारी के लिए  यातनायें दे रही थी।

अब राजन इकबाल को एक ऐसी योजना की दरकार थी जिसके चलते वो इमरान को जेल से भगा पाते और दस्तावेजों के साथ वापस भारत आ पाते।

लेकिन ये सब इतना आसान न था। इसके लिए उन्हें पाकिस्तानी सेना का सामना करना था। अफजल बैग जैसे खूँखार आतंकवादी का सामना करना था।

क्या राजन-इकबाल इमरान को छुड़ाने में सफल हो पाये?

क्या उन्हें दस्तावेज हासिल हो पाये?

आखिर अपने मकसद के लिए राजन ने कौन सी योजना बना रखी थी?

मुख्य किरदार:
राजन, इकबाल, रजनी,सलमा - सीक्रेट एजेंट 99+
इमरान - भारतीय सेना का अफसर जो पाकिस्तानी सेना के कैद में था
कर्नल इशफाक - पाकिस्तानी सेना का कर्नल जिसने इमरान को कैद करके रखा था
अफज़ल बैग - पाकिस्तानी सीक्रेट सर्विस का एजेंट
कादिर - पाकिस्तान में भारत का एक एजेंट
लाली, काली - सीमा वर्ती गाँव अलमारा में रहने वाले दो व्यक्ति जिनकी मदद से कादिर बॉर्डर पार करवाता था

तबाही राजन इकबाल श्रृंखला के उपन्यास नाचती मौत का दूसरा भाग है। अगर आपने नाचती मौत नहीं पढ़ा है तो बेहतर यही होगा कि आप उसे पढ़े क्योंकि इसको पढने का मज़ा तब ही आएगा।

तबाही चूंकि कहानी का दूसरा एवं अंतिम  भाग है तो यह एक्शन से भरपूर है। इसमें कहानी अपने अंत तक पहुँचती है और उसके समापन के लिए हमारे नायकों को किन किन परिस्थितयों से गुजरना पड़ता है ये दर्शाया गया है। उपन्यास में भरपूर एक्शन है। किरदारों के बीच का समीकरण भी अच्छा है और बीच बीच में उनके द्वारा की गयी कॉमेडी मनोरंजन करती है।

इस उपन्यास में प्रिंटिंग की गलितयाँ पिछले उपन्यास के मुकाबले कम ही है। मेरी नज़र में तो शायद एक दो ही आई और ये अच्छी बात है।
वो दो गलतियाँ पढने के दौरान मेरे नज़र में आयीं वो निम्न है :
पृष्ठ २३ में मारे जा चुके की जगह मरे जा चुके लिखा है।
पृष्ठ ३३ में कादिर बोला की जगह कादिर बोली लिखा है।

इसके इलावा उपन्यास में जो कमी मुझे लगी वो एक व्यस्क होने के नाते लगी। शायद मैं बच्चा होता तो इसका ज्यादा लुत्फ़ ले पाता। उपन्यास में हमारे नायक मुसीबतों का सामना ऐसे करते हैं जैसे वो कुछ हो ही नहीं। उनके लिए सब आसान रहता है। उन्हें जूझना कम पड़ता है। ऐसे में उपन्यास कुछ ज्यादा फेंटेस्टिकल हो जाता है और पाठक के तौर पर मुझे बाँध नहीं पाता है। मुझे पता है कि राजन इकबाल अपने मकसद तक पहुँच ही जायेंगे। मुझे अपने नायक किसी खतरे में महसूस नहीं होते और इस तरह मैं कथानक के प्रति लापरवाह हो जाता हूँ।  एक अच्छे कथानक के लिए मेरे हिसाब से ये जरूरी है कि पाठक को कभी ये न लगे कि उसका नायक मिशन में कामयाब हो सकता है। अगर ऐसा होता है तो वो रोमांच पैदा नहीं होगा। इसके लिए नायक की छोटी मोटी हार दिखाने में लेखक को गुरेज नहीं करना चाहिए ताकि पाठक ये जानने के लिए उत्सुक हो कि इस हार के बाद वो जीत कैसे हासिल करेगा। इधर ऐसा नहीं दिखता है।

उपन्यास में मौजूद खलनायक भी मुझे इतना प्रभावित नहीं कर सके। कर्नल इशफाक और अफजल बैग नाचती मौत में बहुत खतरनाक दिखाए गए हैं लेकिन वो भी राजन इकबाल के सामने थोड़ी देर भी खड़े न हो सके। जो अफजल बैग भारतीय सीक्रेट सर्विस से गुप्त कागज लाने में सफल हुआ वो अफजल बैग इधर नहीं दिखता। एक तो वो उपन्यास के अंत में आता है और फिर कुछ कर भी नहीं पाता। मुझे उससे काफी उम्मीदें थी लेकिन उसने नाउम्मीद किया।  अगर उनके किरदार को ऐसा दिखाते कि राजन इकबाल को अपनी पूरी जान उन्हें हराने में झोंकनी पड़ी तो उपन्यास ज्यादा रोचक हो सकता था। अभी तो ऐसा लग रहा था कि किसी राजन इकबाल के फैन ने किताब लिखी हो जो कि राजन इकबाल की महिमा गा रहा हो। ऐसे में रोमांच थोड़ा कम हो जाता है। एक रोमांचक उपन्यास के लिए एक खतरानक विलन बहुत जरूरी है क्योंकि जितना बढ़िया खलनायक होगा उतनी अच्छी नायक की जीत होगी।

तो ऊपर लिखे बिंदुओ के हिसाब से कहानी होती तो शायद मैं इसे ज्यादा एन्जॉय कर पाता। अभी के लिए तो इतना कह सकता हूँ कि उपन्यास  मुझे ठीक ठाक लगा और मेरे हिसाब से एक एक बार पढ़ा जा सकता है।
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