Sunday, November 19, 2017

नाचती मौत - एस सी बेदी

रेटिंग : 2.75/5
किताब नवंबर 17,2017  से नवंबर 18 ,2017  के बीच पढ़ी गयी

संस्करण विवरण:
फॉर्मेट : पेपरबैक 
पृष्ठ संख्या : ८० 
प्रकाशक : सूरज पॉकेट बुक्स 
शृंखला : राजन-इकबाल 

पहला वाक्य:
उस दिन पार्क में काफी लोग थे जो अपने-अपने ढंग से मनोरंजन कर रहे थे। 

भारत में अचानक आतंकवादी हमले बढ़ने लगे थे। पहले तो एक पार्क में मासूम लोगों को कुछ खूँखार आतंकवादी ने अपना निशाना बनाया। फिर क्लब और घरो में हुए विस्फोट ने लोगों के मन में दहशत भर दी थी।

राजन इकबाल संयोगवश उन स्थानों पर थे जिधर ये  दुर्घटना हुई थी। इस कारण उन्होंने कुछ ऐसे तथ्य उजागर किये जिससे उनके होश उड़ गए।

आखिर कौन था इन दुर्घटनाओं के पीछे?
भारत में आतंक की ये लहर किस मकसद को पूरा करने के लिए फैलायी गयी थी?
क्या राजन इकबाल इसे रोकने में सफल हो पाये? और उन्हें इसे रोकने के लिए क्या करना पड़ा?

मुख्य किरदार :
राजन, इकबाल,सलमा , रजनी -  भारतीय सीक्रेट एजेंटस 99+
भोला - राजन का नौकर
अफजल बैग - एक खूंखार पाकिस्तानी आतंकवादी
नूरी - एक पाकिस्तानी नृत्यांगना जो कि क्लब में नृत्य करने के बुलाई गयी थी
मोहिनी और देवदत्त - एक डकैत जोड़ी जो अक्सर राजन इकबाल की मदद भी कर देती है
नईम - मोहनी और देवत्त के संगठन का एक सदस्य
कबीर खान - क्लब में मौजूद व्यक्ति जिसके ऊपर राजन को शक हुआ था
जब्बार - पाकिस्तानी दहशतगर्द कैंप का मुखिया
जावेद - एक पाकिस्तानी दहशतगर्द
आलिया - एक पाकिस्तानी दहशतगर्द
जमील - एक पाकिस्तानी आतंकवादी
कर्नल इशफाक - पाकिस्तान की सेना में कर्नल
मेजर असलम - पाकिस्तान की सेना में मौजूद मेजर
कादिर - पाकिस्तान में मौजूद एक भारतीय एजेंट
इमरान - पाकिस्तान में मौजूद एक एजेंट जो कि कैद में था
सलीम और नजमा - पाकिस्तान में मौजूद एक युगल जो कि भारतीय एजेंट थे
उस्मान - दहशतगर्दों का सरगना जो किराये पे दहशतगर्द मुहैया करवाता था

बेदी जी के बाल उपन्यासों की एक वक्त पे धूम थी। उस समय मैं न तो उपन्यासों के विषय में जानता था और न ही बाल उपन्यासों के विषय में ही मुझे कोई जानकारी थी। इसलिए उनको पढने से मैं महरूम रह गया। मेरी दुनिया कॉमिक्स तक ही सीमित थी और जब उपन्यासों की जानकारी मुझे मिली तब तक मैं हैरी पॉटर और अन्य अंग्रेजी के बाल साहित्य में रम गया था। फिर जैसे हिंदी उपन्यासों के प्रति रूचि जगी तो राजन इकबाल का नाम भी सुनने को मिला और उसके बाद कुछ उपन्यास भी पढ़े।लेकिन उनके पुराने उपन्यास तब तक गायब ही हो चुके थे। तब यही सोचता था कि बचपन में अगर वो उपन्यास पढ़े होते तो कितना मजा आता। अब सूरज पॉकेट बुक्स के माध्यम से उपन्यास आ रहे हैं तो ये अच्छी बात है।

एस सी बेदी जी का उपन्यास नाचती मौत दो भागों में प्रकाशित कहानी का पहला हिस्सा है। जब मैंने ये उपन्यास खरीदा था तो मुझे इस बात का अंदाजा नहीं था। मैंने पहले तबाही,जो कि नाचती मौत का दूसरा भाग है, पढ़ने के लिये उठाया था। उसके दूसरे पृष्ठ पर पहुँचा तो पता चला कि वो उपन्यास का दूसरा भाग था। संयोगवश मेरे पास पहला भाग भी पड़ा था तो मुझे इतनी दिक्कत नहीं हुई। लेकिन ये बात उपन्यास के कवर पे होनी चाहिए कि वो पहला भाग है या दूसरा भाग। सूरज पॉकेट बुक्स को इस बात का ध्यान रखना चाहिए। क्योंकि इससे पाठक भ्रमित होता है।

अब कहानी की बात करते हैं। कहानी रोचक है। राजन रजनी और इक़बाल सलमा के डायलॉग मनोरंजक हैं और कॉमेडी पैदा करते हैं। मोहिनी देवदत्त थोड़े देर के लिए आये लेकिन उनके चुटीले संवाद भी रोचक थे। इकबाल की कॉमेडी तो कभी भी पढो तो मज़ा आता ही है। उसकी हरकतें पूरे उपन्यास में गुदगुदाती रहती हैं और इस कारण उपन्यास में एक हल्का फुल्का खुशनुमा माहौल भी बना रहता है। यही राजन इकबाल के उपन्यासों का प्लस पॉइंट भी होता है। कहानी में मौजूद आलिया और जमील का किस्सा भी दिल को छू गया था। इन दोनों के जरिये लेखक ने दर्शाया है कि कैसे गरीब परिवार के बच्चों को उधर के लोग आतंकवादी बनने के लिए लालच देते हैं। पैसा उनसे ये सब करवाता है। लेकिन क्या ऐसा असल में है? शायद धर्म भी इसके पीछे एक कारण है लेकिन लेखक उस ओर नहीं गये हैं। फिर भी आलिया और जमील की कहानी मार्मिक है।

उपन्यास में एक्शन और थ्रिल  है लेकिन कथानक चूँकि बाल उपन्यासों सरीखा है तो कई पाठकों को ज्यादा सरल लग सकता है। अगर आपने पहले से राजन-इकबाल को पढ़ा है तो आपको पता होगा कि  मैं क्या कह रहा हूँ। कथानक में ज्यादा विस्तृत विवरण नहीं होता है और परिस्थितियाँ ज्यादा जटिल नहीं होती हैं। वयस्क पाठकों को कथानक इसी कारण बच्चों सरीखा लग सकता है। बच्चों की इसके विषय में क्या राय होगी ये कहना मेरे लिए मुश्किल है। लेकिन चूँकि मेरे लिए राजन इकबाल के मामले में कथानक की सरलता अपेक्षित रहती है तो मैं इसे उसी तरह से पढता हूँ और एन्जॉय कर पाता हूँ। फिर भी एक बात ऐसी थी जो मेरे को इसमें अनपेक्षित लगी।

कहानी में एक जगह हमारे सीक्रेट एजेंट्स एक दम से काफी क्रूर हो जाते हैं। अब चूँकि कथानक हमेशा हल्का फुल्का होता है और देवदत्त् मोहिनी जैसे डकैत भी हँसी मज़ाक करते रहते हैं तो हमारे एजेंट्स को एकाएक ऊँगली काटते हुए देखना मुझे व्यक्तिगत तौर पर थोड़ा शॉकिंग लगा। वो दूसरे उपन्यासों में गोली चलाते हैं। इधर भी गोली और बम बरसाते हैं लेकिन फिर भी न जाने क्यों मुझे चाक़ू का इस्तेमाल ज्यादा क्रूर लगा था। शायद इसलिए क्योंकि गोली तो आप दूर से चलाते हो लेकिन जब चाकू से ऊँगली काटते हो तो वो ज्यादा विभीत्स होता है।  या शायद मैं ही ओवर रियेक्ट कर रहा हूँ। एक बार डोगा की कॉमिक्स भी मुझे ज्यादा क्रूर लगी थी क्योंकि उसमे गुंडे लोग पूरे की पूरी कॉलोनी को आग लगा देते हैं और मैं कल्पना करने लगा था कि कॉलोनी के वासी उस आग में कैसे तडपे होंगे।

वापिस कहानी में आते हैं। तो कहानी क्योंकि दो भागों में है तो इसका अंत ऐसे मोड़ में होता है कि पाठक कहानी का अंत जानने के लिए दूसरे भाग को पढ़ेगा ही पढ़ेगा।

अब बात करते हैं कुछ उन चीजों की जिनके ऊपर ध्यान देने की जरूरत है। मेरे हिसाब से निम्न बिन्दुओं पर ध्यान दिया जाता तो कहानी और रोचक और और अच्छी बन सकती थी।

पहला बिंदु जो है वो कहानी में होने वाले संयोग हैं। मेरे हिसाब से एक अच्छी कहानी वो होती है जिसमे संयोग कम से कम हों लेकिन इधर उनकी मात्रा जरूरत से ज्यादा है। जिस पार्क में हमला होता है उधर ही इक़बाल और सलमा घूमते रहते हैं। फिर अचानक हुए हमले में उनपर खरोंच भी नहीं आती है। ऐसे ही कथानक में एक बार ऐसा होता है कि देवदत्त और मोहिनी का एक्सीडेंट होता है और वो भी संयोग से जिन लोगों के साथ होता है वो आतंकवादी निकलते हैं। कहने को तो ये दो संयोग हैं लेकिन अठत्तर पृष्ठ के उपन्यास में ये संयोग होना भी ज्यादा प्रतीत होता है। कहानी में संयोग न ही हों तो अच्छा रहता है। इकबाल और सलमा तहकीकात करके पार्क के हमलावरों को पकड़ते तो ज्यादा सही रहता। इससे कथानक थोड़ा और बड़ा और रोचक होता।  वही दूसरी तरफ देवदत्त और मोहीनी भी किसी और ज्यादा रोचक तरीके से उन आतंकवादियों से टकरा सकते थे।

उपन्यास  में क्लब का सीन है जो कथानक के लिए महत्वपूर्ण है। क्लब में कुछ होने वाला होता है क्योंकि राजन उधर होता है। हमे पाठक के तौर पर ये भी बताया जाता है कि राजन बिना किसी मतलब के क्लब में नहीं जाएगा। लेकिन  राजन को क्लब के विषय में जानकारी कैसे लगती है ये भी कहीं क्लियर नहीं हो पाता। बस उसे होती है। ये थोड़ा अजीब सा लगता है। राजन को जानकरी कैसे लगी इस बिंदु पर विस्तार से पाठको को बताया जाता तो बेहतर रहता। अभी तो ऐसा लग रहा था कि लेखक ने अपनी मेहनत बचाते हुए किरदारों को बड़ी सहूलियत से उन उन स्थानों पर रख दिया जिधर घटना हो रही थी।

इसके इलावा कहानी की शुरुआत में मुख्य खलनायक अफजल बैग है। शुरुआत में जिक्र होने के बाद उसके विषय में कोई जानकारी पाठकों को नहीं मिलती। वो भारतीय सीक्रेट सर्विस से गुप्त कागज चुरा लेता है। ये काफी खतरनाक काम था लेकिन इसका बस जिक्र ही होता है। पाठकों को ये होते दिखाया जाता तो मेरे ख्याल से उन्हें ज्यादा रोमांचक लगता क्योंकि अफजल बैग कितना खतरनाक है इससे पता चलता। और हमारे नायक इस खतरनाक खलनायक से कैसे निपटेंगे इसके लिए पाठक उत्सुक रहते।

ऐसे ही कई जगह ये लगता है कि कहानी को जल्दबाजी में लिखा है और इस कारण  विवरण की कमी हुई है। जैसे कहनी में रजनी जूड़े से चाकू निकालती है। ये चाकू किस तरह का था ये लेखक ने बताया होता तो बेहतर रहता। अभी पढ़ते हुए जूड़े से चाकू निकालने वाली बात मुझे खटकी थी। बालों के पिन का मैंने सुना है जो हथियार के तौर पर काम लाया जा सकता है। आप चाकू शब्द सुनते हो तो मन मे एक चित्र उत्पन्न होता है जो कि जूड़े में फिट नहीं होता। इसलिए लेखक उस चाकू का विवरण देते तो ज्यादा सही रहता।

कहानी के मुख्य किरादार इसी उपन्यास में पाकिस्तान भी जाते हैं। कहानी के इस हिस्से में भी कुछ और चीजें जोड़ी होती तो बेहतर रहता।  उदाहरण के लिए:

कथानक में दुश्मन को पता रहता है कि हमारे हीरो उनकी जमीन पर दाखिल हो चुका है लेकिन फिर हमारे हीरो को खाली दो ही सिपाहियों का सामना करना पड़ता है। उन्हें भागने के लिए आसानी से गाड़ी भी मिल जाती है। पृष्ठ ४८ में चारो तरफ से बंद जीप में वो फरार हो जाते हैं। अब बंद जीप को उन्होंने कैसे खोला।  उन्हें चाबी कैसे मिली? उन्होंने गाड़ी कैसे स्टार्ट की? इन सब बिन्दुओ को ऐसे ही हवा में उड़ा दिया है। नायकों के आगे मुसीबत इतनी नहीं आई जितना आनी चाहिए थी। अभी तो ऐसे लग रहा था कि सब कुछ उन्हें आसानी से मिल रहा था। इधर थोड़ा लम्बा फाइट सीक्वेंस होता तो ज्यादा रोमांचक होता। एक आध पृष्ठ कहानी भी बढती और कहानी में थ्रिल भी होता।

पाकिस्तान में जब नायक घुसते हैं तो उधर के माहौल का वर्णन इतना नहीं था जितना की होना चाहिए था। मैंने पाकिस्तान टीवी की कुछ खबरे सुनी है और इस कारण उनके बोलने के लहजे में मौजूद फर्क से वाकिफ हूँ। लेकिन किरदारों की बातचीत में वो फर्क नहीं दिखता। किरदारों की बातचीत के लहजे पे काम होता तो ज्यादा अच्छा प्रभाव पड़ता। फिर आस पास के जगहों का विवरण  दिखता तो यथार्थ के नज़दीक कथानक लगता। 

इसके इलावा कथानक में इमरान नाम का किरदार आता है। वो जेल में बंद है और पाकिस्तानी सेना उसे टार्चर कर रही है। वो जेल में क्यों बंद हुआ ये मेरे हिसाब से रोमांचक घटना थी जिसे कुछ ही लाइन्स में निपटाया गया। अगर इस बिंदु को विस्तार देते तो कथानक और रोचक हो जाता। क्योंकि इसमें थ्रिल पैदा करने की काफी संभावनाएं थी।

ये कुछ बिंदु थे जिनके ऊपर यदि काम किया जाता तो कथानक और ज्यादा रोचक बन सकता था। और पाठकों को मेरे हिसाब से और ज्यादा मज़ा आता।

इसके इलावा उपन्यास में कई जगह छोटी छोटी गलतियाँ है जो कि पढने के बहाव में उभरी तो मैंने दर्ज कर ली। उदारहण के लिये :

लेखकीय में इस सेट में मौजूद तीन उपन्यासों के नाम लिखे हैं जिसमें तबाही  की जगह ठंडी रेत  लिखा है। ये चीज प्रिंट कैसे हो गयी ये मुझे समझ नहीं आया। ऐसा नहीं था कि लेखकीय काफी लम्बा है। वो तो मुश्किल से एक पृष्ठ का है। ऐसी लापरवाही से बचना चाहिए।

पृष्ठ 50 में पाकिस्तान में मौजूद भारतीय एजेंट का नाम आसिफ कहते हैं लेकिन बाद में वो कादिर हो जाता है। कुछ देर तक तो मैं आसिफ के आने का इंतजार करता रहा लेकिन उपन्यास के अंत तक वो नहीं आया तो यही सोचा कि नाम में गलती हुई थी।

दूसरी तरफ मिंटो रोड पर जो आतंकवादियों का अड्डा था उसे इंस्पेक्टर बलबीर स्पोर्ट्स ने तबाह कर दिया था। (पृष्ठ २५) अब इधर शायद 'बलबीर सिंह' होना था क्योकि बलबीर स्पोर्ट्स का कोई तुक मुझे नहीं लगता।
पृष्ठ ५२ में 'दोनों वहीं ढेर हो गये' को 'दोनों वहीं देर हो गए'  किया गया है।
पृष्ठ ६७ थक गए कर्नल ने इमरान से मरे स्वर में पूछा - "तुम्हे साँस  लेने के लिए छोड़ा है। हम फौजियों पर ज्यादा अत्याचार नहीं करते।" अब इस वाक्य से मुझे थोड़ा कंफ्यूजन हुआ। इधर  शायद 'थके हुए कर्नल ने इमरान से मरे हुए स्वर में बोला' होना चाहिए था क्योंकि पूछने जैसे तो कुछ हो ही नहीं रहा। या ये डायलॉग ऐसे भी होना चाहिए था  -'थक गए कर्नल'-इमरान ने मरे स्वर में पूछा। 'तुम्हे साँस लेने के लिए छोड़ा है। हम फौजियों पर ज्यादा अत्याचार नहीं करते। ' लेकिन जो छपा है उसमें  कोई तुक नहीं है।
पृष्ठ ६८ 'क्या सलमा से मिले हो?'
'हाय! किसी नशीली चीज का नाम ले किया।'
 इसमें शायद 'हाय! किस नशीली चीज' होना चाहिए था। बस यही छोटी मोटी गलतियाँ मुझे प्रिंटिंग में लगी जो अगले संस्करण में सुधारा जा सकता है। सूरज पॉकेट बुक्स को इस तरफ संजीदगी से ध्यान देना चाहिए क्योंकि ऐसी गलतियाँ उनकी अमूमन हर किताब में होती हैं।

अंत में केवल इतना कहूँगा ये एक बाल उपन्यास है जिसे बाल उपन्यास की तरह पढेंगे तो ज्यादा एन्जॉय कर पाएंगे। मुझे तो उपन्यास ठीक ठाक लगा अगर राजन इक़बाल के फैन हैं तो इसे एक बार पढ़ सकते हैं।  अगर आप वयस्कों की तरह पढेंगे तो शायद कई जगह बचकाना लगे। हो सकता है सरल कथानक पहले चलते रहे हो लेकिन बेदी साहब को कथानक में थोड़ी और जटिलता रखनी चाहिए। एडिटर को भी इसके विषय में सुझाव उन्हें देने चाहिए। हाँ, मैं इस उपन्यास के प्रति बच्चों की राय जानना चाहूँगा। अगर आपके परिवार में किसी बच्चे ने इसे पढ़ा है तो उसकी राय से मुझे जरूर अवगत करवाईएगा।

अगर उपन्यास आपने पढ़ा है तो आपको ये कैसे लगा? कमेंट में बताइयेगा। अगर उपन्यास नहीं पढ़ा है तो आप उपन्यास को निम्न लिंक से मँगवा सकते हों:

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