Wednesday, July 12, 2017

जुर्म का जहाज - अनिल मोहन

रेटिंग : 2.75/5
उपन्यास 1 जुलाई  2017 से 4, जुलाई 2017 के  बीच पढ़ा गया

संस्करण विवरण:
फॉर्मेट : पेपरबैक
पृष्ठ संख्या : 320
प्रकाशक : राजा पॉकेट बुक्स
आईएसबीएन: 978-9332420243




पहला वाक्य :
जेल के मुख्य फाटक का छोटा सा दरवाज़ा चरमराकर खुला।

अमरनाथ तलसानियां नौ साल की सजा के बाद जब जेल से छूटकर आया तो उसके दिल में बदले की ज्वाला धधक रही थी। उसे पता था कि कम्पनी एक शिकारी की तरह उसका शिकार करने के लिए बाहर तत्पर होगी लेकिन वो भी शिकारी का शिकार करने का फैसला कर चुका था। वो अपने और अपने परिवार की बर्बादी का बदला लेने वाला था। नौ साल बाद उसे तो ये भी नहीं पता था कि उसके परिवार का क्या हुआ था?

क्या अमरनाथ तल्सनियां अपने बदले की आग को बुझा पाया? कंपनी ने उसके खिलाफ क्या कदम उठाये? क्या अमरनाथ एक ऐसा चना था जो कि  भाड़ फोड़ सकता था?

हरीश  ने जब मुंबई की धरती पे कदम रखा तो उसके मन में खाली एक विचार था : 'कंपनी की बर्बादी'।  लेकिन इस काम को करने के लिए न उसके पास असला था और न ही दौलत। वो पेट पालने के लिए बूट पोलिश करता था। ऐसे में कंपनी, जिसके पास साधनों की कमी नहीं थी, के खिलाफ वो अपनी जंग कैसे लड़ पायेगा? क्या थी उसकी योजना? क्यों चाहता था वो कंपनी को निस्तेनाबूद करना?

सवाल कई हैं? इनके जवाब तो आपको उपन्यास को पढ़कर ही पता चल सकेंगे।



'जुर्म का जहाज' अनिल मोहन जी का थ्रिलर उपन्यास है। अक्सर पॉकेट बुक्स की दुनिया में किसी लेखक के उपन्यास को थ्रिलर तब कहा जाता है जब वो उसके द्वारा लिखी जाने वाली किसी श्रृंखला का हिस्सा नहीं होता है। ये उपन्यास भी ऐसा ही लगता है।

उपन्यास एक तरह से बदले की कहानी है। उपन्यास का मुख्य पात्र हरीश तलसानियां है जो कि ऐसा जवान है जो अपने से कई गुना ज्यादा बड़ी कंपनी से टकराने का फैसला करता है। इसी बदले की कहानी को लेखक ने रोमांचक तरीके से उपन्यास के रूप में पिरोया है। उपन्यास एक्शन और ट्विस्ट से भरपूर है जो कि पाठक को पूरी तरह से बाँध कर रखता है।

वैसे तो उपन्यास में खलनायकों की कमी नहीं है लेकिन उपन्यास का मुख्य खलनायक रंजीत नहाटा नाम का अंडरवर्ल्ड डॉन है। वैसे अक्सर दिखाया जाता है कि ऐसे डॉन अपने वादे के पक्के होते हैं लेकिन नहाटा इस मामले में जुदा है। अपने मतलब हल करने के लिए वो मुँह में राम और बगल में छुरी की कहावत को चरित्रार्थ करता है । उसके विषय में पढ़कर पता चलता है कि कैसे कुछ भी करके वो अपने मकसद को पाना चाहता है। ऐसे में जबान,दोस्ती और अन्य उसूलों की उसकी ज़िन्दगी में इतनी अहमियत नहीं है। वो एक धूर्त इन्सान है और इसलिए जैसे जैसे उपन्यास में उसका चरित्र उजागर होता रहा वैसे वैसे  उसके अंत को देखने की तमन्ना मेरे मन में भी बलवती हो गयी थी। रंजीत के इलावा उपन्यास में कई ऐसे किरदार है जो कि खलनायक है और नायक का इनसे टकराना ये सुनिश्चित करता रहता है कि उपन्यास में कहीं भी थ्रिल की कमी न हो।

अंग्रेजी उपन्यासों में एक चीज को बार बार इस्तेमाल करा जाता था जो कि आगे चलकर क्लिशे बन गया। उसे hooker with a heart of gold कहते हैं। इस उपन्यास की दूसरी मुख्य किरदार सरिता यही है। वो हरीश की ज़िन्दगी में तब आती है जब हरीश के पास केवल हौसला होता है लेकिन अपने निर्णय को पूरा करने का साधन नहीं। अगर मैं कहूँ  वो हरीश की ज़िन्दगी बदल देती है तो ये अतिश्योक्ति नहीं होगी। इसके बाद इनका रिश्ता क्या मोड़ लेता है वो तो उपन्यास पढ़कर ही आप जानेंगे लेकिन मेरे लिए उनका मिलना और इस सरलता से सरिता का अपनी उम्र से छोटे हरीश की मदद करना कुछ अटपटा था। ये ऐसी फंतासी है जिसके विषय में हर कोई सोचता तो है कि उससे उम्र में बड़ी औरत उस पर फ़िदा है, लेकिन वो पूरी हो जाए इस ऊपर उसे खुद विशवास नहीं होता है। ऐसा ही एक और किरदार शीतल पांडेय इसी उपन्यास में है। इधर ये न समझा जाए ये उपन्यास में इस तकनीक का इस्तेमाल उपन्यास की कमी है बस इधर मेरा मकसद ये बताने का है कि सरिता और हरीश की मुलाक़ात को ऐसा बनाया जा सकता था कि पाठक उस पर विश्वास कर सके। लेखक इस बिंदु पर काम करता तो ये और रोचक हो सकता था। जैसे शीतल और हरीश की मुलाक़ात यथार्थ के काफी नज़दीक थी। थ्रिलर और मिस्ट्री उपन्यासों में hooker with a heart of gold उपयोग किया जाता रहा है और किया जाता रहेगा।

एक आध चीज उपन्यास में  थोडा आसानी से होती दिखीं। जैसे खलनायक के अड्डे पर नायक बड़ी आसानी से फतह पा लेता है। आजकल क्या कई दशकों से सुरक्षा के हेतु सी सी टी वी कैमरा का उपयोग होता आया है।   इसका उपयोग एक अंडरवर्ल्ड डॉन अपने ठिकाने के बाहर नहीं करेगा ये सोचना ही थोडा अटपटा लगता है। फिर गेट के बाहर केवल दो गार्ड का होना भी अजीब है जबकि मामूली सुरक्षा में भी कुछ गार्ड गेट पे तैनात होते हैं और कुछ रात भर उस जगह के चक्कर काटते हैं। ये बात मुझे बहुत खटकी थी। आखिर में भी हरीश आसानी से उस जगह पहुँच जाता है जहाँ उसका दुश्मन था। उधर भी सुरक्षा में ये कमी दिखी। अगर इस सुरक्षा व्यवस्था को  और पेचीदा बनाया जाता तो उपन्यास ज्यादा रोचक हो सकता था।

इसके इलावा एक सुमेर सिंह नाम का किरदार आखिरी में आता है। वो नहाटा से धोखा खाया इंसान है। उसने धोखा क्यों खाया ये संवाद का हिस्सा बनता है जो कि मेरे हिसाब से थोडा छोटा हो सकता था। उसे बेमतलब खींचा गया जिससे उपन्यास की गति मुझे धीमी पड़ती महसूस हुई। यहीं  उपन्यास में एक और किरदार मानकचंद आता है। वो भी नहाटा से धोखा खाया व्यक्ति है। उनमे दुश्मनी क्यों होती है इस बात को बताने के लिए भी  ज्यादा वक्त लिया गया। ऐसा मुझे इसलिए भी महसूस हुआ क्योंकि ये किरदार उपन्यास के अंत में आते हैं जहाँ मैं क्लाइमेक्स पढने को मरा जा रहा था। अंत में नये किरदारों और उनकी बेक स्टोरी को बताना मुझे हजम नहीं होता है। ये कहीं बीच में होता तो शायद मुझे इतना न खटकता। थ्रिलर उपन्यास के अंत में तो मैं  मुख्य कहानी पे रहना चाहता हूँ बजाय फ़्लैशबेक में जाने के।

इन सब चीजों के इलावा एक बात मुझे काफी खटकी। उपन्यास की शुरुआत में अमरनाथ तल्सनियां को काफी तवज्जो दी गयी थी लेकिन बाद में इस किरदार को पूरी तरह से नज़रअंदाज कर दिया गया। इस किरदार में कई संभावनाएं थी जिन्हें कि लेखक इस्तेमाल कर सकता था लेकिन अफसोस वो ज़ाया ही हुई। अगर इस किरदार पे ध्यान दिया जाता तो  जितना अच्छा बना है उससे और अच्छा बन सकता था। हमारे पास दो हीरो हो सकते थे। उनके बीच के रिश्ते के कई पहलुओं को दर्शाया जा सकता था। कई अच्छे सीन लिखे जा सकते थे।

हाँ, उपन्यास में इंस्पेक्टर अमित कक्कड़ का किरदार मुझे काफी पसंद आया। वो रोचक है।

अंत में कहूँ तो उपन्यास एक्शन से भरपूर है। अगर आप तेज रफ़्तार कथानक के साथ एक्शन से भरपूर उपन्यास पढने की शौक़ीन हैं तो इसे एक बार जरूर पढियेगा। ऊपर लिखी बातें वो हैं जो मुझे खटकी थी या जिनके होने से  मुझे लगता है कि उपन्यास और बढ़िया हो सकता था। उन सब के बिना भी उपन्यास मनोरंजक थ्रिलर है।

अगर आपने उपन्यास को पढ़ा है तो इसके विषय में अपनी राय जरूर कमेंट बॉक्स पर दीजियेगा। अगर आपने उपन्यास नहीं पढ़ा तो आप इसे निम्न लिंक से मंगवा सकते है :
अमेज़न
राजकॉमिक्स

4 comments:

  1. काफी अच्छी समझी लिखी है।
    इन दिनों अनिल मोहन का 'कानून का शिकंजा'थ्रिलर उपन्यास पढा।
    जो की कोई विशेष रोचक न था। उपन्यास की कहानी पाठक को 'राउङी राठौङ' फिल्म की याद दिलाती है।
    अब पता नहीं उपन्यास पहले लिखा गया था या फिल्म पहले बनी थी।
    पल्प उपन्यास की एक कमी/चालाकी ये भी है की उपन्यास पर कहीं कोई सन् आदि नहीं छपा होता।

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    1. जी, ये तो होता है। वैसे भी पल्प लिखने वाले राइटर आइडियाज उठाने के बहुत मशहूर हैं। कोई बड़ी बात नहीं उधर से ही उठाया हो।और ये भी कोई बड़ी बात नहीं फिल्म वालों ने किसी विदेशी फिल्म से उठाया हो। फिल्म वाले भी आइडियाज उठाने के मामले में पीछे नहीं हैं।

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  2. ये उपन्यास मेरे पास कुछ दिन मे पहुच जायेगा तब पढ़ के आपको बताऊंगा की कैसा लगा

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  3. ये उपन्यास मेरे पास कुछ दिन मे पहुच जायेगा तब पढ़ के आपको बताऊंगा की कैसा लगा

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