तीन दिन - सुरेंद्र मोहन पाठक

रेटिंग : 3.5/5 
उपन्यास  जुलाई 1,  2017 से जुलाई 7, 2017 के बीच पढ़ा गया

संस्करण विवरण :
फॉर्मेट : ई-बुक
प्रकाशक : डेली हंट
प्रथम प्रकाशन : 1986

पहला वाक्य :
ओरियण्टल शिपिंग कॉर्पोरेशन के विशाल एवं अत्यंत वैभवशाली यात्रीवाहक जहाज सिल्वर स्टार को बम्बई के बंदरगाह पर लगे एक घण्टा हो चुका था जब कि राहुल ने डैक पर कदम रखा। 


राहुल रामचंदानी वैसे तो ओरिएण्टल शिपिंग कॉपोरेशन के मालिक का एक लौता बेटा थे लेकिन फिलहाल इसी कंपनी के सिल्वर स्टार नामक जहाज में पर्सर की नौकरी बजा रहा था। कप्तान की माने तो जहाज का सबसे बेहतरीन कर्मचारी  राहुल जब जहाज के डॉक पे लगने के बाद ज़मीन पर जाता था तो एकदम बदल जाता था। फिर उसे पीने के सिवा और कुछ ध्यान न रहता। ऐसे जैसे वो अपने आप को बोतल में डुबो देना चाहता हो। वैसे तो ये राहुल के जीवन की व्यक्तिगत बात थी लेकिन चूँकि पीने के बाद राहुल अक्सर जहाज पर वापसी देर से करता था तो कई बार जहाज देर से चलता था। लेकिन इस बार कप्तान का ऐसा कोई इरादा नहीं था। उन्होंने राहुल को सख्त हिदायत दी थी कि मुंबई में लगा जहाज तीन दिन में अपने निर्धारित समय पे निकलेगा और राहुल अगर देर से आता है तो उसे छोड़ दिया जायेगा।

राहुल इन तीन दिनों को भी साधारण तरीके से यानी बोतल में डूबे हुए बिताना चाहता था। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था।

इन तीन दिनों में राहुल के साथ ऐसा क्या हुआ ? राहुल क्यों इतनी पीता था ? क्या इस बार भी राहुल जहाज पर देरी से चढ़ा।

सुरेन्द्र मोहन पाठक जी ने  वैसे तो कई श्रृंखलायें लिखी हैं लेकिन ऐसे उपन्यास भी कम नहीं लिखें हैं जो कि एकल हैं। यानी किसी श्रृंखला का हिस्सा नहीं है। ऐसे उपन्यासों को अक्सर उन्होंने थ्रिलर में रखा है। तीन दिन भी ऐसा ही उपन्यास है।

उपन्यास का मुख्य किरदार राहुल रामचंदानी एक भारी शरीर लेकिन कोमल दिल वाला युवक है। वो अपने जीवन में एक दुःख से गुजर रहा है और इस दुःख से पीछा छुड़ाने के लिए अपने कम्पनी के ही एक जहाज में पर्सर की तरह काम करता है। इसके इलावा जब वो जमीन पर होता है तो नशे में डूबा हुआ होता है क्योंकि होश में रहने पर उसका दुःख उसे काटने को दौड़ता है। उसे क्या दुःख था ये तो आप उपन्यास पढ़कर ही जानिये। वैसे आईडिया तो शायद आपको हो ही गया होगा। खैर, राहुल भले ही पीता ज्यादा हो लेकिन वो दिल का बुरा नहीं है। उसे लोगों की चिंता रहती है और वो उनकी मदद  निस्वार्थ भाव से करता है। राहुल के एक डायलॉग पर नज़र डालिए :

"अजीव बात है। तुम एक नितान्त अजनबी के लिए हलकान हो रहे हो ?"
"हम सभी अजनबी हैं एक-दुसरे क लिए फिर भी एक दूसरे के काम आते हैं। तुम भी तो मेरे लिए अजनबी हो लेकिन मैं तुम्हारा पर्स लौटाने आया हूँ। "


तो राहुल ऐसा ही परहितअभिलाषी है। उसे लगता है उसने नशे में किसी की मदद करनी चाही थी लेकिन वो ऐसा कर न सका। जब होश आया तो मन के कचोटने पर वो उस आदमी को ढूँढने निकल पड़ा। और यही खोज उपन्यास का कथानक बन जाती है।

राहुल के किरदार आपको उससे जोड़ देता है। उसका दुःख आपको अपना दुःख लगने लगता है और यही भावनात्मक लगाव उपन्यास को पठनीय के साथ साथ यादगार भी बनाता है।

पाठक साहब की मुंबई की भाषा और संस्कृति पर पकड़ है जो कि इधर साफ दिखती है। सारे किरदार जीवंत लगते हैं। और उपन्यास का अंत मन को छू जाता है।

उपन्यास में जो चीज खटकी वो ये कि उपन्यास में जो चीज़ राहुल के लिए रहस्य है  वो पाठक की नज़र के सामने होता है इससे उपन्यास रहस्यमयी नहीं रह पाता है। अगर राहुल के साथ साथ ही पाठक पर सारी बात उजागर होती तो उपन्यास जितना अच्छा बना है उससे काफी अच्छा हो सकता था।

अंत में खाली ये कहूँगा उपन्यास मुझे बहुत पसंद आया। और मेरी राय में आपको इसे एक बार पढना चाहिए। और इसे पढने से पहले मन में ये न बनाकर बैठे की ये थ्रिलर है, बस इसे बिना पूर्वाग्रह के पढ़े। अगर आपने उपन्यास पढ़ा है तो इसके विषय में अपनी राय जरूर दीजियेगा। अगर नहीं पढ़ा है तो एक बार जरूर पढियेगा। उपन्यास डेली हंट में मौजूद है और उधर जाकर इसे खरीदकर पढ़ सकते हैं।

डेली हंट
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