Sunday, April 30, 2017

कली हूँ गुलाब की - रीमा भारती

रेटिंग : 1.5/5
उपन्यास 28 अप्रैल,2017 से 29, अप्रैल 2017 के बीच पढ़ा गया

संस्करण विवरण :
फॉर्मेट : पेपरबैक
पृष्ठ संख्या : 237
प्रकाशक : रवि पॉकेट बुक्स

पहला वाक्य :
मुंबई शहर की एक विशालकाय इमारत के विशालकाय कक्ष में एक लम्बी-सी टेबिल रखी थी।

विजय ठकराल मुंबई का एक जाना माना बिल्डर था। वो और उसके सात पार्टनर- पृथ्वीराज माथुर ,अनिल ओबेरॉय,राजीव सिंह,हर्षवर्धन ठाकरे,रतन अम्बानी,आशुतोष वीरानी और यशराज चौहान  मुंबई की जानी मानी हस्ती थे। वो पार्टनर होने के साथ साथ अच्छे दोस्त भी थे।  एक एक्सीडेंट में जब विजय और उसकी  की मौत हुई तो उसकी ढाई हज़ार करोड़ संपत्ति की मालकिन उसकी सतरह वर्षीय बेटी स्वीटी बनी।

लेकिन उसके पार्टनर्स के मन में इस दौलत को लेकर लालच आ गया। उनके अनुसार स्वीटी चूंकि बच्ची थी उसके लिए सौ करोड़ भी बहुत था और बाकी का चौबीस सौ करोड़ वो अपने व्यपार को बढ़ाने में लगा सकते थे।

लेकिन इससे पहले वो अपनी इस शैतानी चाल में कामयाब होते उनके एक पार्टनर अनिल की हत्या कर दी गयी।  और इस बाद एक चिट्ठी के द्वारा उन सभी को मौत के घाट उतारने की धमकी दी गयी।

एक हत्या के बात इस धमकी को हलके में नहीं लिया जा सकता था इसलिए उन्होंने रीमा भारती के पास जाने का फैसला किया। वो जानते थे रीमा भारती एक स्पाई है और आसानी से कातिल का पता लगा सकती है।

 क्या रीमा धमकी जारी करने वाले का पता लगा पाई?
क्या कातिल अपनी धमकी पूरी करने में सफल हुआ?
क्या पार्टनर्स अपनी शैतानी चल के तहत स्वीटी से दौलत हड़प पाए ?



रीमा भारती को पढ़े हुए एक महीने से ज्यादा हो गया था और मेरे पास उसके दो तीन उपन्यास पड़े हुए थे तो सोचा कि उनमे से एक पढ़ ही लूँ।

अब आते हैं उपन्यास पर, सबसे पहले जिस बात से मुझे थोड़ा अटपटा लगा वो ये था कि इस उपन्यास में कॉन्टिनुइटी बिगड़ी सी है। मैंने रीमा के विषय में जितने उपन्यास पढ़े हैं उसमे वो एक सरकारी संस्था आई एस सी (इंडियन सीक्रेट कोर) की एजेंट है। ऐसे में क्या वो प्राइवेट जासूस की तरह काम करने के लिए मुक्त है ? इधर उसकी संस्था का नाम अभी तक नहीं आता है। इसके इलावा मौत डरेगी मुझसे में वो एक पत्रकार की हैसियत से ऐसे प्राइवेट मामले में दखल देती है और वो भी अपने बॉस के कहने पर। उसमे ये बताया था कि लोगों को नहीं पता है कि वो स्पाई है। लोगों के सामने वो एक इनवेस्टिगेटिव रिपोर्टर है। वो उपन्यास इसके बाद आया था और इसमें वो सबको खुल्ले में बता रही है कि वो एक स्पाई है। ये बात मुझे तो जमी नहीं।  हो सकता है मैं हिंदी उपन्यासकारों से उपन्यासों  में कंटिन्यूइटी बरकरार करने की अपेक्षा कर के कुछ ज्यादा ही मांग कर रहा हूँ।

उपन्यास की शुरुआत बेहतरीन थी। सात बिजनेसमैन जिन्हें कोई मारने की कोशिश कर रहा है। एक को मार चुका है और बाकियों को मारने से पहले कातिल का पता लगाना है।

लेकिन फिर उपन्यास जैसे जैसे आगे बढ़ता गया रीमा द्वारा इतनी बेवकूफियाँ तहकीकात के दौरान की गई कि कहानी का मज़ा खराब होता गया। एक जासूसी कहानी तब मज़ेदार होती है जब जासूस होशियार हो। अगर जासूस ही बेवकूफ है तो कहानी का मज़ा किरकिरा हो जाता है।

बेवकूफियों पे नज़र डालिये और खुद अंदाज लगाइये:
  1. जब वो पृथ्वी से मिलने जाती है तो बच्चे का स्केच उससे मिलकर तैयार करवाती है। ये एक अच्छे जासूस के लक्षण थे। उसने तकनीक का इस्तेमाल किया। फिर जब वो  गोपाल (वो बच्चा जिसने चिट्ठी दी थी ) से चिट्ठी देने वाले का हुलिया पूछती है तो वो उससे चित्र क्यों नहीं बनवाती है? हुलिया जानने के बाद जिस पहले शख्स का ख्याल उसे आता है उसके पास वो बच्चे को लेकर चली जाती है और बच्चा उस शख्स को पहचानने से मना कर देता है। 
  2. गाड़ी खराब होने पर वो बच्चे को अकेला छोड़कर मैकेनिक के पास चली जाती है। 
  3. वो हिटमैन से सुपारी देने वाले का पता लगा लेती है फिर भी उससे मुलाकात के लिए अपने दोस्त की पार्टी का बहाना लेती है और हनी ट्रैप बिछाती है। कहते हैं सेक्स के दौरान आदमी सबसे ज्यादा असुरक्षित होता है लेकिन वो सेक्स खत्म होने पे उसे कांफ्र्नट करती है। और बड़ी मुश्किल से उस आदमी को कण्ट्रोल कर पाती है।  अगर कोई दिमाग वाला जासूस हो तो रति क्रिया के दौरान ही आदमी को काबू करने की कोशिश करेगा। उसके बाद सवाल जवाब करेगा।  
  4. बच्चे के कत्ल की सुपारी देने वाले के पास पहुंचकर वो ये जान लेती है कि उसको इस काम के लिए पैसे किसने दिए। गाड़ी का नंबर उसके लिए जाना पहचाना था। लेकिन अब भी वो पृथ्वी की तरह स्केच नहीं बनवाती है। वो गाड़ी वाले के पास जाती है जहाँ वो आदमी दूसरा निकलता है। वो शख्स कहता भी है कि वो उस व्यक्ति को जानता है जिसने बच्चे का क़त्ल करवाना चाहा था लेकिन फिर भी रीमा स्केच के लिए नहीं कहती है। 
  5. राजीव एक लौता व्यक्ति बचा है। वो राजीव के यहाँ जाती है लेकिन मूर्ती के भेष में। मुझे ये समझ नहीं जब वो राजीव के यहाँ गयी तो उसे मूर्ति का रूप धारण करने की क्या आवश्यकता थी। राजीव ने उसे कातिल के विषय में मालूम करने के लगाया था। वो उधर सीधे आकर उसे सुरक्षा दे सकती थी। फिर चलो वो मूर्ति बनी तो  बनी लेकिन उसने किया क्या ये इस सीन में  देखिए:
वो गार्ड जवाब में कुछ नहीं बोला।
आकर राजीव के सामने खड़ा हो गया।
राजीव ने पास से उसे ध्यान से देखा तो जाना कि वह उसका गार्ड वीर सिंह नहीं बल्कि वीरसिंह का बहरूपिया है वो।
इससे पहले कि राजीव कुछ कह पाता, उस नकली गार्ड ने मूर्ति रूपी शख्स को अपनी ओर दौड़ते रूप के साथ आते देखा।(इधर तो वाक्य ही गलत बना है।)
बस फिर इसी के साथ उस नकली गार्ड ने अपनी कमर के पीछे कर अपना हाथ राजीव के सामने किया।उसके हाथ में एक खंजर था।
खंजर देखते ही मानो राजीव के दिल ने धड़कना ही बन्द कर दिया था।
फिर एक पल भी व्यर्थ न करते हुए उस नकली गार्ड ने राजीव के पेट मे खंजर घोप दिया और इसके साथ ही उसने खंजर को ऊपर की तरफ घसीटते रूप से उसके लंबे हिस्से तक मे फाड़ डाला।
तपश्चात!
वह गार्ड के रूप में आया कातिल राजीव को कत्ल करके वहाँ से बाहर की तरफ दौड़ पड़ा।
मूर्ति का भेष बनाये शख्स कोई और नहीं- बल्कि चालाक लोमड़ी रीमा भारती थी। 
अब किसी को चालाक कहने भर से कोई चालाक नहीं बन जाता। अब मुझे ये नहीं पता कि आप रीमा की जगह होते तो क्या करते लेकिन मैं जरूर अपने पास बंदूक रखता। और भागने की जगह बोलकर कातिल को कत्ल करने से पहले ही रोक देता।

इस उपन्यास के दौरान रीमा भारती कई बार अपनी डींगें मारती हुई दिखती है कि रीमा ये है , रीमा वो है लेकिन उसकी हरकतें ऐसी हैं कि वो एक बेवकूफ लड़की से ज्यादा कुछ नहीं लगती। उसे एक टास्क दिया जाता है उन व्यापरियों की सुरक्षा का लेकिन वो उसमे भी सफल नहीं होती है। बस डींगे मारती रहती है। 

कई बार उपन्यास के बीच में वाक्य खाली जगह भरने के लिए इस्तेमाल किये हैं। एक अच्छा एडिटर होता तो इस तरह के वाक्यों को इधर आने ही नहीं देता। मैं अक्सर ऐसी बातें नज़रअंदाज कर देता हूँ अगर हद से ज्यादा न हो तो इसलिए इधर जितने उदाहरण मैं दूँगा उससे काफी ज्यादा मूल उपन्यास में होंगे ये बात निश्चित है। उदाहरण"

तब राजीव खामोश हो गया।
मौन साधे रहकर वो मानो कुछ सोच रहा था ।
चन्द लम्हों तक आशुतोष खामोश बैठा राजीव के चेहरे से उत्पन्न भाव देखकर सोच रहा था कि कब उसकी सोच खत्म हो और कब वो बात को बढ़ावा दे।
आशुतोष राजीव के चेहरे पे उत्पन्न भाव देखकर इस बात का आभास कर चुका था कि उसकी सोच में अवश्य ही कोई गंभीर बात चल रही है।
जब तक राजीव अपनी सोच से खुद नही उभर पाया, तब तक आशुतोष शांत ही बैठा रहा।
कुछ देर तक सोचते रहने के बाद राजीव ने गंभीरतापूर्वक कहा -
(पृष्ठ 49)

अब गौर करें तो पहले और आखिरी वाक्यों के बीच लिखे गये शब्द कहानी में खाली जगह भरते हैं और कुछ इसमें इजाफा नहीं करते हैं। इस पूरे विवरण को इतना खींचने की जरूरत ही नहीं थी। पहले दो वाक्यों और आखिरी के वाक्य को मिलाकर भी काम हो सकता था।

इसके इलावा कथानक में कई चीजें ऐसी हुई जिनका कोई तुक नहीं था। असली कातिल उपन्यास में बहुत चालाक दिखाया गया है लेकिन वो भी कई बेवकूफियाँ करता है। सबसे पहले गोपाल को क्यों मारा। गोपाल को चिट्ठी किसने दी थी ये अंत तक पता नहीं लगता। फिर बच्चे को मारने का तरीका भी बेतुका था। इससे कुछ हुआ नहीं बस एक बूढ़ा गवाह तैयार हुआ जिसके माध्यम से वो सिद्धार्थ तक पहुँची।

सिद्धार्थ तक पहुँचने के बाद भी उसको मालूम नहीं था आगे किधर जाना है।  फिर उसकी गाड़ी में चिट्ठी रखने की क्या जरूरत थी। सिद्धार्थ को सुपारी किसने दी थी ये भी पता नहीं चला।  चिट्ठी लिखकर रीमा को बुलाने के क्या जरूरत थी।  उपन्यास में आगे चलकर ये पता लगता है कि वो रीमा को मारना नहीं चाहते लेकिन फिर ऐसा ही था तो उसे चिट्ठी द्वारा बुलाकर बम से क्यों मरवाया। और अगर मरवाना ही था तो बाद में उन्हें रीमा को मारने के कई मौके मिलते हैं तो उन्होंने उसे क्यों नहीं मारा। एक बार तो वो रीमा को जेल में बंद करवा देते हैं और फिर खुद ही छुडा देते हैं। ऐसी बेतुकी हरकतें पूरे उपन्यास के दौरान होती रही।

उपन्यास में अंत में हर्ष बच जाता है और उसके विषय में कुछ नहीं बताया गया कि उसका कैसे हुआ। इसके इलावा जो कारण क़त्ल के बताये गये वो भी कम बेतुके नहीं थी। मुझे अंदाजा तो हो गया था कि ऐसा क्यों हो रहा है और अंत में वैसा ही हुआ लेकिन फिर भी इस बात के लिए क़त्ल करना ओवररिएक्शन से ज्यादा और कुछ नही था।

इसके इलावा एक अच्छे एक्शन उपन्यास में फाइट सीन्स महत्वपूर्ण होते हैं। वो रोमांच बनाने में सहायक होते हैं लेकिन इसमें ऐसे यादगार फाइट सीन भी नहीं है। लेखक कोशिश करता है लेकिन बुरी तरह विफल होता है। सीन अप्राकृतिक लगते  हैं।

अगर किताब की बात करूँ तो जहाँ पृष्ठों की गुणवत्ता अच्छी है वहीं इसकी बाइंडिंग बेकार है। मैंने ये उपन्यास दो दिन में पढ़ा दो दिन में ही इसकी बाइंडिंग उखड़ गयी है। प्रकाशक कहानी में गुणवत्ता नहीं रख सकते तो कम से कम बाइंडिंग तो दुरुस्त रख सकते थे। लेकिन उधर भी ये निराश करते हैं।




हाँ, रीमा भारती पाठक वर्ग में ग्राफ़िक सेक्स सीन्स के लिए कुख्यात है तो इसमें ऐसे कोई सीन नहीं है। एक सीन है भी तो उसमे कुछ भी ऐसा विवरण नहीं है जिससे अति संवेदनशील पाठकों को शर्म या मज़ा आये। एक यही अच्छी बात इसमें है कि इसमें सेक्स को बिक्री के लिए इस्तेमाल नही किया गया है।

मुझे लगता है ये पोस्ट इतनी लम्बी हो गयी है इसलिए अब इसे समाप्त करना चाहूँगा। अंत में केवल इतना कहूँगा कि उपन्यास का आईडिया अच्छा था जिसके साथ एक अच्छा लेखक काफी कुछ कर सकता है।

 इस उपन्यास को कायदे से प्रकाशक की टेबल से वापस लेखक के पास चला जाना चाहिए था। अगर प्रकाशक के पास थोड़ी भी गैरत होती तो वो इसे कभी नहीं छापते।  हिंदी के अपराध लेखक और प्रकाशक पाठक न होने का रोना रोते रहते हैं। वो कहते हैं अब लोग पढ़ नहीं रहे हैं तो मेरा उनसे यही कहना है कि अगर ऐसा  अधकचरा नोवल आप प्रकाशित करते रहोगे तो पाठको आपको क्या ख़ाक पढेंगे। अगर आप अच्छे नावेल नहीं प्रकाशित कर सकते तो दुकान बंद कीजिये। साल में एक या दो नावेल निकाले लेकिन अच्छे निकाले। वरना इस कचरे में अगर आप अच्छे नावेल भी निकालेंगे तो वो भी नहीं पढ़े जायेंगे।

अगर आपके टेस्ट उपन्यास में मेरी तरह है तो इस उपन्यास में अपना पैसा बर्बाद करने की न सोचियेगा। बाकी आगे आपकी मर्ज़ी। 

9 comments:

  1. हिंदी उपन्यास जगत में यह आम बात हो गयी के पाठक मूर्ख है उसे कुछ भी थमा दो वो पढ लेगा। प्रकाशक महोदय या लेखक यह क्यों नहीं सोचता की आपका घटिया साहित्य पाठक एक बार तो पढ लेगा लेकिन अगली बार वह आपके नाम से ही दुर हो जायेगा।
    ऐसे एक नहीं अनेक लेखक हैं जिन्होने कचरा उपन्यास लिखे और उपन्यास जगत से पाठकों को कम करने का महत्वपूर्ण दायित्व निभाया।
    मैंने रीमा भारती के कई उपन्यास पढे हैं लेकिन ऐसा कोई भी उपन्यास नहीं जो पाठक पर छाप छोङ जाये।
    आपकी अच्छी समीक्षा के लिए धन्यवाद ।

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    1. मेरा रीमा भारती के उपन्यासों के साथ अभी तक का अनुभव ठीक ठाक रहा है. कुछ उपन्यास अच्छे थे कुछ ठीक ठाक लेकिन इससे पहले वाला और ये उपन्यास तो बेकार ही था. ऐसा लग रहा है कि बस नाम को भुनाने के लिए कुछ भी कैसे भी पेश किया जा रहा है.

      दुःख की बात ये है कि इस उपन्यास में अगर काम होता तो इसकी कमियाँ दूर की जा सकती थी. प्रकाशक इसे छापने से पहले एक बार पढ़ लेता तो वो लेखक को बता सकता था किन बिन्दुओं पर काम करने की जरूरत है और इसे ठीक ठाक उपन्यास बनाया जा सकता था लेकिन उतनी जहमत भी प्रकाशक ने नहीं उठाई. ये दर्शाता है कि उनका उपन्यास के पाठकों के प्रति कितना उदासीन रवैया है. उन्हें कोई फर्क ही नहीं पड़ता कि पाठक के पास क्या जा रहा है. क्योंकि उन्हें पता है जब तक चल रहा है तब तक कुछ भी दे दो. अगर बंद हो गया तो हम गाइड तो बेच ही सकते हैं. इससे नुक्सान उभरते हुए लेखकों का भी है.

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  2. मुझे काफी पहले शक हो गया था की लेखक बदल गया है. Quality became very bad all of sudden

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    1. जी, सही कहा। एक तो लिखता भी कोई और है और दूसरा प्रकाशक भी छापने से पहले यह सुनिश्चित नहीं करता कि वह क्या चीज छाप रहा है। अगर उसने इस किताब को पढ़ा होता तो उसके मन में यही सवाल उपजते जो मेरे मन में हैं और वह लेखक को इन उलझनों को सुलझाने के लिए कहता। अगर ऐसा होता तो यह उपन्यास बेहतर बनता। लेकिन अफसोस ऐसा भी नहीं हुआ। हिन्दी अपराध साहित्य छापने वालों को एक अच्छे सम्पादक की जरूरत है।

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  3. Mujhe Reema Bharati ki kitaabe kahan milengi. Online par hain nahin aur dukaan par milti nhi hai.

    Please help

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    1. कुछ किताबें रवि पॉकेट बुक्स से प्राकशित हुई हैं। उन्हें आप उनसे डायरेक्ट मंगवा सकतीं हैं। वो लोग पे टीएम से पैसे लेकर किताब भेज देते हैं।
      ये उनका फेसबुक पृष्ठ है। आप उनसे कांटेक्ट कीजिये। वो आपको नंबर दे देंगे। आप अपना पता और पैसे उन्हें भेज दीजियेगा तो। तो आपको किताब मिल जाएगी।

      https://www.facebook.com/ravipocketbooks/

      जहाँ तक मेरा सवाल है मैं गुरुग्राम में रहता हूँ और इधर बस स्टैंड में मौजूद एक स्टाल में किताब मिल जाती है। रेलवे स्टेशन में मौजूद स्टाल्स में भी किताब मिल जाती है। तो आप अपने घर के नजदीक रेलवे स्टेशन में मौजूद स्टाल्स पर भी जाकर पता कर सकती हैं।

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    2. रीमा भारती के किस टाइप के उपन्यास आपको चाहिए?

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  4. Online novel kaise reading karte hai. Koi site bata do reema bharti ke

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    1. ऑनलाइन यह अभी मौजूद नहीं हैं। मैं तो खरीद कर ही पढ़ता हूँ रीमा भारती की किताबें।

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