Monday, January 18, 2016

झूला नट - मैत्रयी पुष्पा

रेटिंग : ४/५
उपन्यास ८ दिसम्बर से १० दिसम्बर के बीच पढ़ा गया

संस्करण विवरण:
पृष्ठ संख्या: 163
फॉर्मेट : पेपरबैक
प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन

पहला वाक्य:
"ओ बालकिसना। जाग रे।"
पच्चीस वर्षीय इकहरी देह का बालकिशन बिस्तर पर सोया हुआ है।

बालकिशन पचीस वर्ष का है। उसके ब्याह के बाद वो अपनी पत्नी शीलो और अपनी माँ के बीच में हो रहे झगड़ों से परेशान है। वो इन दोनों के बीच अपने को घुटता महसूस करता है।
लेकिन सदा से ऐसे हालात नहीं थे। शीलो और बालकिशन के माँ के बीच कभी लड़ाईयाँ न ले बराबर होती थी। लेकिन वो तब की बात है जब शीलो बालकिशन के बड़े भाई सुमेर की पत्नी हुआ करती थी।
फिर ऐसा क्या हुआ जो बालकिशन शीलो के साथ रहना लगा। ऐसा क्या हुआ कि शीलो और बालकिशन की माँ के बीच ऐसी लड़ाईयाँ होने लगी। वही शीलो जिसके गुण गाते गाते बाकिशन की माँ  कभी थकती नहीं थी, उसी शीलो के लिये अब कभी कोई अच्छी बात उनके मुख से नहीं निकलती थी।



गाँव की पृष्ठभूमि में लिखे इस लघु उपन्यास के चरित्र जीवंत हैं और गाँव के समाज का सच्चा रूप प्रदर्शित करते हैं।
झूला नट है कहानी शीलो की जिसको उसके पहले पति के द्वारा किये गए तिरस्कार ने एक दूसरी औरत के रूप में बदल दिया है। समाज से लड़ते लड़ते वो अब उतनी मृदु भाषी नहीं जितना वो अपने ब्याह के वक्त थी। लेकिन दिल की वो अभी भी अच्छी है जिस बात को बालकिशन भली भाँति समझता है। वो अब इनसिक्योर हो गयी है जो बालकिशन को जानते हुए भी उस पर इसलिए भड़क जाती है क्योंकि वो शीलो की छोटी बहन को लाड कर रहा था।
वहीं यह कहानी बालकिशन की भी है। छोटे भाई होते हुए वो पहले से ही दबकर रहना सीख चुका है। इसलिए उसका व्यक्तित्व इतना सबल नहीं है। उसने अपनी भाभी का तिरस्कार होते हुए देखा है और इससे उनके प्रति उसके अन्दर सांत्वना पैदा हो जाती है। इसलिए जब उसकी माँ उसे शीलो के पास भेजती है तो वो उससे शारीरिक सम्बन्ध भी बना लेता है। लेकिन वो अपने  माँ और बीवी , जो कि दोनों ही तेज तर्रार हैं ,के बीच के   द्वन्द में अपने को पिसता हुआ पाता है।
और ये घुटन इतनी बढ़ जाती है कि वो सब छोड़-छाड़ कर चला जाता है।
इसके इलावा उपन्यास के अन्य किरदार हैं जो गाँव के जीवन और उसके समाज का खाका पाठकों के सम्मुख पेश करते हैं। वो गाँव के लोगों की मान्यता और उनकी सोच की दिशा को सटीक तरीके से दर्शाते हैं।
यह उपन्यास गाँव को उन लोगों के सम्मुख लाने का काम करते हैं जो कि शहर में हैं और जिनका  खुद का गाँव में रहना का अनुभव नगण्य है।
उपन्यास मुझे बेहद पसंद आया। हाँ बालकिशन का किरदार काफी कमजोर था। और उसके साथ मेरे हिसाब से वो सब घटित नहीं होता अगर उसका व्यक्तित्व थोड़ा ताकतवर होता।
उपन्यास आप सब को पढ़ना चाहिए।
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