Sunday, May 29, 2016

जहाज का पंछी - इलाचंद्र जोशी

रेटिंग : 4/5
उपन्यास मई 18,2016 से मई 28,2016 के बीच पढ़ा गया

संस्करण विवरण:
फॉर्मेट : पेपरबैक
पृष्ठ संख्या: 332
प्रकाशक : लोकभारती प्रकाशन



पहला वाक्य:
तो अंत में मुझे इस गली में शरण मिली है- कलकत्ता महानगरी के इस नरक में, गन्दगी को भी गन्दा करने वाले इस घूरे में, सभ्य संसार की इस फैशन की रंगीनी आवरण के भीतर मानव-जगत् के मर्म में छिपे हुए इस कोढ़-केंद्र में!

इलाचंद्र जोशी जी का यह उपन्यास प्रथम पुरुष में लिखा गया है।नायक अपनी कहानी तो बता रहा है लेकिन कहीं पर भी वो अपना नाम नहीं बताता है। कहानी का नायक एक ईमानदार व्यक्ति है जो अपनी ईमानदारी से काम करना चाहता था लेकिन फिर उसे निजी जीवन में इतने धोखे मिलते हैं कि उसका मन उचाट हो जाता है। और हमारा नायक सब कुछ त्यागकर कलकत्ता आ जाता है। उपन्यास की शुरुआत में जब वो इधर आता है तो न उसके पास रहने के लिए घर होता है और न सर छुपाने के लिए छत। हर कोई उसे गिरहकट कहकर दुत्कारता रहता है और उसे शक की निगाह से देखता है। फिर वो विभिन्न परिस्थितियों से होता हुआ उपन्यास के अंत तक पहुँचता है जहाँ उसे अपने जीवन का मकसद पता चल जाता है। ये कौन सी परिस्थितियाँ थी ये तो आप उपन्यास पढ़कर ही जान पाएंगे।


उपन्यास के विषय में बात करूँ तो उपन्यास मुझे बहुत पसंद आया। नायक के पहले अनुभव कभी कभी मन को दुखाते भी हैं तो कभी हंसाते भी हैं। कैसे लोग उसके रूप (बढ़ी हुई दाड़ी,जीर्ण शरीर) को देखकर उसके विषय ने पहले से ही पूर्वाग्रह स्थापित कर लेते हैं, ये समाज की सोच को दर्शाता है। आज भी हम ऐसे ही अपनी सोच पहले से बना लेते है। कोई ऐसा व्यक्ति आज भी हमे दिख जाए तो उसके विषय में हमारे विचार वही होंगे जो नायक के विषय में उस समय लोगों के रहते हैं। लेकिन फिर भी नायक प्रतिभाशाली और एक कुशल वक्ता है। वो कई बार अपने आस पास के लोगों को अपनी वाकपटुता से प्रभावित करता है। 

नायक जिन जिन अनुभवों से होकर गुजरता है वो रोचक हैं। और उपन्यास को रोचक बनाते हैं। पूरे उपन्यास में वो निराश्रित की तरह एक ठौर से दूसरे ठौर तक घूमता रहता है जहाँ हालात के चलते उसे थोड़े दिनों के आश्रय पाकर फिर नए आसरे की तलाश में निकल जाना पड़ता है। 

उपन्यास में नायक के माध्यम से हमे समाज के प्रति उसके विचार समय समय पर मिलते रहते हैं। ये उपन्यास कुछ 40-50 साल पहले लिखा गया था लेकिन नायक ने समाज के प्रति जो बात उस समय नोटिस की थी वो आज भी उतनी ही मान्य है। उदाहरण के लिए :

ट्रामों और मोटरों का अटूट धारा प्रवाह जीवन की व्यस्तता की तीखी अनुभूति को और अधिक मार्मिक रूप दे रहा था। लगता था व्यक्तिगत आवश्यकताओं की पूर्ती की चिंता और अपने-अपने तुच्छ अहम् की तुष्टि की चंचल आकांक्षा ने आज के युग में प्रत्येक मनुष्य को अपने आप में इस हद तक तल्लीन बना दिया है कि भीड़ में परस्पर ठेलमठेल होते रहने पर भी एक व्यक्ति के हृदय का कण-मात्र सम्बन्ध दूसरे व्यक्ति के हृदय से नहीं रह गया है।सामूहिक रूप से संगठित कार्य करने के जो दृष्टान्त कभी कभी सामने आते है उनमे भी यह देखा गया जाता है कि प्रत्येक व्यक्ति के भीतर स्वार्थ की भावना ही प्रबल है और वह व्यक्तिगत स्वार्थ की पूर्ति के उद्देश्य से ही सामूहिक स्वार्थ में योग देता है।

प्रत्येक संपन्न व्यक्ति बाहर से भरा पूरा रहने पर भी, अपने निपट संकीर्ण अहम् के कारण, अपने भीतर किसी एक अनंत हाहाकार-भरे स्पष्ट आभाव का अनुभव कर रहा है और प्रत्येक अकिंचन व्यक्ति सारे जीवन को ही अभावमय, अर्थहीन और अनावश्यक मानकर जहाँ तक सामर्थ्य है उसके भार को किसी तरह ढोता चला जा रहा है। बीच वाले व्यक्ति प्रति क्षण जीवन और मृत्यु के झूले में झूलते हुए परस्पर-विरोधी परिस्थितियों के क्रूर परिहास के शिकार बन रहे हैं।

दीवारों के कोनों में जगह जगह मकड़ी के जाले लगे हुए थे। एक बार साफ़ करने पर दूसरे दिन फिर नये जाले दिखाये देते थे। बड़े बड़े मकड़ों से लेकर छोटी-छोटी मकड़ियों तक सभी उस कमरे में निश्चिन्त और निर्भय विचरण करते रहते थे। मकड़ों और मकड़ियों को अक्सर अपने अपने जालों में निराहार ही सूखकर प्राण दे देने पड़ते थे, क्योंकि कमरे की और गली की सारी गन्दगी के बावजूद मक्खियाँ वहाँ नहीं के बराबर थीं। वे मकड़े और मकड़ियाँ पुरानी संस्कृति के प्रेमी उन व्यक्तिवादी कलाकारों की तरह थे जो पराक्रमहीन होने के कारण अपने निर्माण के जाले में ही उलझकर प्राण देना- अर्थात 'आन' पर मर-मिटना- पसंद करते हैं, पर अपने रवैये को बदलकर परिस्थिति के अनुसार नये और यथार्थवादी उपायों को काम में लाना नहीं चाहते। चींटियों के दल उन अर्थपतियों की तरह थे जो किसी अंध-संस्कार-वश केवल संचय के लिए संचय किये चले जाते हैं और जब कोई दूसरा दल जीवन-धारण की एकान्त आवश्यकता से प्रेरित होकर उनके आवश्यकता के अतिरिक्त निरर्थक संचय का हिस्सेदार बनने का प्रयत्न करता है तब उस पर पूरी तरह से टूट पड़ते हैं। चींटे उन राजनीतिक नेताओं की तरह थे जो बिना कुछ परिश्रम किये उन संचायशील चींटियों पर अपने ऊपरी दिखावे का रौब जमाकर उनके संचय में से कुछ न कुछ् झटकते रहते थे।
सभी उपनिवेश अपने-अपने क्षेत्र में मुक्त विचरा करते थे। 'फ्री-वर्ल्ड' का ऐसा सुन्दर निदर्शन बहुत कम देखने में आता है। चींटियों में काली और गोरी दोनों जातियाँ विद्यमान थीं।गोरे- जो रक्त शोषण के कारण कुछ लाल दिखाई देते थे-अधिक चतुर,अधिक संगठित और अधिक हिंसक थे। उनके डंक की जहरीली शक्ति बहुत तीव्र थी।बेचारी काली चींटियों के दल हिंसक गोरों के सुदृढ़ और सुनियमित संगठन, प्रचंड हिंसक शक्ति और संचय- सम्बन्धी विविध कलाओं के ज्ञान से चकित थे। वे भरसक गोरों से संघर्ष में नहीं आना चाहते थे और अहिंसात्मक उपायों से अपनी रक्षा करते रहते थे। पर गोरे दल बरबस उनसे छेड़खानी करना पसंद करते थे और कभी कभी तो दोनों जातियों के बीच सामूहिक युद्ध छिड़ जाता था,जिसमे गोरों के पास अधिक प्रभावशाली और तीखे अस्त्र होने से जीत उन्हीं की होती थी। 'हृदय परिवर्तनवादी' काले अपनी निरीहता के कारण मारे जाते थे।

उसकी ऐसी ही अंतर्दृष्टि (इनसाइट्स) से उपन्यास के कथानक के दौरान समय समय पर पाठक अवगत होते रहता है। 

नायक काफी सोचता है और वो क्योंकि संवेदनशील है तो चीजों को महसूस भी करता है। जिससे कई बार वो अवसाद का अनुभव भी करता है।

रेस्तराँ के भीतर का तीव्र प्रकाशमय वातावरण मुझे आज बहुत अच्छा लग रहा था। अपने ही भीतर के अन्धकार से ग्रस्त मेरा मन जैसे किसी पतंगे की तरह प्रकाश के लिए छटपटा रहा था, इसलिए रेस्तराँ के उस असाधारण प्रकाश में पूर्णतया मग्न रहने के सिवा दूसरी कोई भावना जैसे मेरे मन में नहीं रह गई थी। उस वातावरण में मोहक प्रभाव के कारण ऐसा अनुभव हो रहा था जैसे बाहर के कठोर संघर्षपूर्ण विषम जीवन का अन्धकार रेस्तराँ की उस असाधारण जगमगाहट की छाया के सिवा और कुछ नहीं है।

लेकिन वो पूरे उपन्यास के दौरान कभी भी इसके विषय में कुछ करने के लिए तत्पर नही दिखता है। उसे धन लोभ नहीं है और अपने पास धन का होना उसे एक बोझ लगता है।

इस प्रकार जब पहलवान के दिये हुए रूपये भी प्रायः सब जेब से निकल गये- केवल पाँच रूपये शेष रह गए- तब मुझे लगा जैसे एक बहुत बड़ा बोझ मेरे शरीर और मन पर से उतर गया। वे रूपये मुझे बुरी तरह काट रहे थे और उन्हें जेब में लिये हुए मुझे एक पल के लिये चैन नहीं मिल रहा था।

धन संचित करने से बढ़िया वो ये चाहता है कि उसे केवल दो वक्त की रोटी और रहने को भोजन मिल जाए। वो समाज के विषय में इतना सोचता है, समाज के लोगों के लिए कुछ करना चाहता है लेकिन कई दफा कर नहीं पता है क्योंकि उसके पास धन नहीं होता है। अकसर ऐसा देखा गया है कि खासकर हमारे समाज में धन की इच्छा को बुरी चीज माना गया है। लेकिन ये मानते हुए लोग भूल जाते हैं कि धन से समाज में ताकत हासिल करी जाती है। समाज में कुछ भी करना हो उसके लिए धन आवश्यक है। इसलिए मेरी व्यक्तिगत राय में धन कमाना कोई बुरी बात नहीं है क्योंकि अगर आपके पास धन है तो ही आप किसी की मदद कर सकते हैं।अगर आपके पास धन नहीं है तो चाहकर भी आप किसी की मदद नहीं कर सकते। हाँ, धनलोलुप होना जरूर मेरी नज़र में बुरा है। नायक के पास अगर धन होता तो काफी लोगों की मदद कर सकता है लेकिन इसी धन की कमी के कारण वो उपन्यास में कई लोगों की मदद नही कर पता है जिससे वो ग्लानि महसूस करता है।

उपन्यास में एक चीज जो मुझे खास  पसंद आई वो ये कि इसमें पाककला का उल्लेख था। नायक एक वक्त खाना बनाना सीखता है जिसका वर्णन लेखक ने विस्तार से किया है। ये वर्णन तीन चार पृष्ठों तक फैला है जिसे पढकर मुझे काफी आनन्द आया। ये पहली बार था जब मैंने किसी उपन्यास में खाने के विषय में इतनी विस्तृत तौर से पढ़ा और ये मुझे काफी अच्छा लगा।उदाहरण के लिए ये पढ़िए:

घी तड़क तड़क, तड़-तड़-तड़ आवाज करता हुआ जब शांत हो गया तब चाचा ने कुछ खड़े मसाले- लौंग, इलायची आदि - उसमे छोड़ दिए उसके बाद प्याज की गोल गोल कतरने उस पर छोड़ दीं। जब काफी देर बाद उन कतरनों में सुनहरा भूरा रंग चढ़ गया तब उन्होंने एक-एक करके सभी पिसे हुए मसाले छोड़ दिए और एक खुरपीनुमा करछुल से वह उन्हें भूनने लगे।काफी देर तक उसे भूनने के बाद उन्होंने अच्छी तरह धुले हुए माँस को उस देगची पर छोड़ दिया और फिर उसे भी तलने लगे। जब अच्छी तरह तल चुके तब अंदाज से उस पर नमक छोड़कर उन्होंने ढकना चढ़ा दिया। बोले-"जब पानी बिलकुल सूख जायेगा तब फिर तलना होगा।अभी काफी देर है। तब तक एक चिलम तम्बाकू बड़े मज़े से पिया जा सकता है।" और यह कहकर वो चिलम तैयार करने लगे।

उपन्यास में प्रेम प्रसंग भी हैं। जिसमे रामकली और करीम चाचा के प्रेम प्रसंग ने मुझे काफी प्रभावित किया। नायक और लीला के बीच में भी काफी प्रणय संवाद होता  रहता  है जिसे पढ़ना भी मज़ेदार था।

"चलो, तुमने भी परीक्षा करके देख लिया कि मुझे बुखार नहीं आ सकता, भले ही सिरदर्द हो जाये और वह सिरदर्द भी तुम्हारे हाथों के कोमल स्पर्श से भाग जाता है और उस सिरदर्द का दुर्भाग्य देखो कि इतना सुखद स्पर्श उसके लिए  घातक सिद्ध होता है!"
"जाओ, तुम फिर ठिठोली करने लगे!" बच्चों की तरह मुँह बनाकर शिकायत करती हुई और साथ ही आँखें और भौंहें नचाती हुई लीला बोली।

किरदार के रूप में करीम चाचा का किरदार काफी रूचिकर लगा। बेला का किरदार भी काफी रूचिकर लगा।उसके साथ आगे क्या हुआ ये जानने की इच्छा मेरे अंदर बनी रही।  क्या वो अपनी घुटन से निजाद पा पायी? आखिर क्या हुआ होगा उसके साथ?नायक के सफ़र के दौरान उसकी ज़िन्दगी में कई किरदार आये और जब नायक उनकी ज़िन्दगी से निकला मैं भी पाठक के तौर पर उनकी कहानी से बाहर हो गया। अब सोचता हूँ क्या हुआ होगा उन किरदारों का। उनके जीवन की कहानी कैसे बढ़ी होगी? ज़िन्दगी भी ऐसी होती है। कई लोगों से मिलते हैं हम और फिर वो हमारे जीवन से गायब हो जाते हैं। उनकी ज़िन्दगी चलती रहती है लेकिन हमे ये मालूम नहीं होता क्या हुआ होगा उनके जीवन में? उनके विषय में केवल स्मृतियाँ रह जाती हैं। और उम्मीद कि जो हुआ होगा अच्छा ही हुआ होगा। वो सुखी होंगे। इन किरादारों जैसे बेला,दीप्ति,फ्लोरा(जिसके पास भी रहने का ठिकाना नहीं था। क्या उसे ठिकाना मिला होगा। क्या वो सुखी हो पायी होगी),करीम चाचा, मजीद(जो जेल में नायक का दोस्त बना था और जिसकी जीवटता ने नायक को प्रेरित किया था।वो नायक से पहले रिहा हो जाता।),फ्रैंक इत्यादि की कहानी रुक सी जाती है।इन्होंने मुझे किसी न किसी रूप में छुआ और इनके विषय में भी यही उम्मीद कर सकता हूँ  कि इन्हें वो मिल गया होगा जिसकी तलाश में ये थे। एक कहानी के भीतर कई कहानियाँ होती हैं। कुछ गुम हो जाती हैं और कुछ पूरी हो जाती हैं। इस उपन्यास में नायक की कहानी तो काफी हद तक पूरी हुई लेकिन इन पात्रों की कहानी को पूरा केवल कल्पना के माध्यम से ही किया जा सकता है।

उपन्यास की भाषा मुझे काफी अच्छी लगी। उपन्यास के ज्यादातर पात्र मुझे जीवंत लगे। कई पात्र भावुक है और उनकी भावुकता का असर मुझ पर भी हुआ। उपन्यास के विषय में मैं ये नहीं कह सकता कि अपने वक्त की समाजिक स्थिति दिखाता हैं क्योंकि आज के हालात मुझे इस उपन्यास में दर्शाये गए हालातों से जुदा नहीं लगे। इस उपन्यास में दर्शाये समाज और चरित्रों में आप शायद अपने आस पास के समाज और लोगों के प्रतिबिम्ब देख पायेंगे। 

हाँ,उपन्यास में जिस तरह लीला एक ही बार में नायक से आकर्षित हो गयी थी वो मुझे थोड़ा अटपटा लगा। ऐसा इसलिए कि मेरे व्यक्तिगत अनुभव में मैंने ऐसा होते नहीं देखा है कि कोई नारी किसी पुरुष पे इतनी जल्दी मोहित हो जाये और वो भी तब जब वो उसके पास नौकर की हैसियत से आये। खैर, ये मेरा व्यक्तिगत अनुभव है जो कि अभी इतना है भी नहीं। इसके इलावा उपन्यास के विषय में कोई भी बात मुझे अखरी नहीं।

अंत में इतना ही कहूँगा कि उपन्यास मुझे बहुत पसन्द आया और मैं इसे भविष्य में दोबारा पढूँगा।
क्या आपको इस उपन्यास को पढ़ना चाहिये? तो मैं कहूँगा कि ज़रूर इस उपन्यास को आपको पढ़ना चाहिए।अगर आपने इस उपन्यास को पढ़ा है तो आपको ये कैसा लगा ये कमेंट बॉक्स में बताईयेगा। अगर इसके जैसा कोई उपन्यास आपको पता हो तो उसका नाम भी ज़रूर साझा करियेगा। और अगर आपने या उपन्यास को नहीं पढ़ा तो आप इसे निम्न लिंक से मँगवा सकते हैं।

11 comments:

  1. इलाचन्द्र जोशी जी का काफी प्रसिद्ध उपन्यास है थे।
    WWW.yuvaam.blogspot.com

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    1. जी, उपन्यास बहुत अच्छा लगा मुझे और इसने मुझे उनके अन्य उपन्यासों को पढने के लिये प्रेरित भी किया है। मैंने उनका एक उपन्यास जिप्सी खरीदा है जिसे इसी साल पढने का मन है।

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  2. कृपया मुझे इस उपन्यास की pdf फ़ाइल चाहिए ।

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    1. पियूष जी मैंने ये उपन्यास खरीद कर पढ़ा था। पीडीएफ के मामले में मैं आपकी मदद नहीं कर पाऊँगा। कमेंट करने के लिए शुक्रिया। किताब खरीदनी हो तो उसका लिंक लेख के अंत में दिया है।

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  3. मंगवाता हु इस उपन्यास को 😊

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    1. पढ़कर अपनी राय जरूर बताइयेगा।

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  4. मंगवाता हु इस उपन्यास को 😊

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  5. इस उपन्यास की तरह बिमल मित्र का उपन्यास"मैं"पढ़ा था कई वर्षों पूर्व ।अच्छा लगा, लेखक ने समाज का वास्तविक स्वरूप पेश किया है।इसकी मूल चेतना समाज के ढांचे के भीतर ही हमारी है ।

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    1. ब्लॉग पर अपने विचार व्यक्त करने के लिए आभार वीणा जी। बिमल मित्र जी के कई उपन्यास मैंने पढ़े हैं। मैं भी पढ़े जाने वाले उपन्यासों की सूची में जोड़ ली है। आभार। ब्लॉग पर आते रहियेगा।

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  6. Maine ye upnnyas padha kintu nayak k nam ko kahi bhi likha nhi paya, aage fir se kosis karunga ki nayak k bare me pta karu,....uska name kya tha ?

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