जड़ वाला कटहल - एस समुत्तिरम्

रेटिंग : ४/५
पुस्तक २२ मार्च से अप्रैल ३ के बीच पढ़ी गई

संस्करण विवरण:
फॉर्मेट : पेपरबैक
पृष्ठ संख्या :119
प्रकाशक : साहित्य अकादमी
मूलभाषा : तमिल


'जड़ वाला कटहल' में तमिल लेखक एस समुत्तिरम्   के दो लघु उपन्यासों को संकलित किया गया है। लघु उपन्यासों का हिंदी में अनुवाद विजयलक्ष्मी सुन्दरराजन जी ने किया है। एस समुत्तिरम् जी कि इस कृति को 1990 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाज़ा गया था। इस संग्रह में एस समुत्तिरम जी के निम्न दो लघु उपन्यास है:

१) जड़ वाला कटहल

पहला वाक्य :
कोई भी परिधान शरीर की पारदर्शिता को को दिखाने के लिये नहीं है, वरन अंगों को ढँकने के लिये है- इस बात को सरवणन ने सिद्धांत के रूप में अपना लिया हो, ऐसा संदेह हर किसी को हो सकता है। 

सरवणन ने अपनी मेहनत और ईमानदारी के बल पर ही अपनी नौकरी प्राप्त की थी। वो एक अच्छे ओहदे पे था और ईमानदारी से अपना काम करना चाहता था। लेकिन सराकरी दफ्तर में कार्यरत होते हुए ये काम करना इतना आसान नहीं था। यहाँ उसे जूझना था कामचोरों से,चाटुकारों से और रिश्वतखोरों से जो कि या तो उसे अपने जैसा बनाने में तुले हुए थे या फिर उसका पत्ता काटने की फिराक में थे। ऐसे में वो दफ्तर जहाँ वो काम करने के इरादे से गया था धीरे धीरे ऐसी युद्धभूमि में तब्दील होता जा रहा था जहाँ उसे मालूम नहीं था कि कौन सच में उसके साथ है या फिर कौन मुंह में राम बगल में छुरी की कहावत को चरित्राथ कर रहा है।
क्या सरवणन अपने उसूलों में कायम रह पाएगा या वो हार मान लेगा?




इस संग्रह का पहला लघु उपन्यास 'जड़ वाला कटहल' सरकारी दफ्तरों के हाल का सही सही चित्रण करता है। आज भी अगर सरकारी दफ्तरों में अगर आप जायेंगे तो उधर के हाल ऐसे ही मिलेंगे। कांट्रैक्टरों की सरकारी मुलाजिमों से सांठ गाँठ कोई नई बात नहीं है। हाँ, सरवणन जैसे किरदार मुश्किल से ही मिलते हैं। और जो होते हैं उन्हें किन परेशानियों का सामना करना पड़ता है ये इस कृति में बहुत ही सच्चाई के साथ दिखाया गया है। उपन्यास के सारे किरदार जीवंत हैं और आप अपने आस पास इनमे से कइयों को देख सकेंगे।




इसके कुछ अंश :
मुत्तमा स्तब्ध रह गयी वह बिलकुल अपने बाप की तरह है। शायद मुँह से कहने पर समझ न पाये किन्तु मन और मुँह के बीच चमगादड़ की तरह लटकते शब्दों को अवश्य समझ लेगा। मैं बैठक में आकर खड़ी हो जाती थी तो इसके बापू पूछते -"क्या घर में चावल नहीं है....? पैसे चाहिए...? " धूल के कण आँखों में गिरने पर मसलने की तरह आँखें साफ़ करती तो पूछ बैठते, "क्या मैके जाना चाहती हो...." खाने की थाली जरा ज़ोर से ज़मीन पर पटक दो तो कहेंगे..."अम्मा का स्वभाव तो तुम जानती हो, अगर मैं भी कुछ कहता हूँ तो उदास नहीं होना चाहिए" कभी तुनककर या हँसी-हँसी में कह दूँ कि क्या एक दिन भी जल्दी नहीं आ सकते.... तो उनकी हाज़िरजवाबी का भी क्या कहें... सहज रूप से कह देते "आज छोटे को अम्मा के पास सुला दो....."      

२) बस,एक दिन 

पहला वाक्य:
उस भीड़ को देखते ही अनुमान लगाया जा सकता है कि वह कैसी भीड़ है....अपने राजनैतिक सिद्धांतों के जयघोष के अनुरूप सेवकों का दल, गुंडों का दल, इस प्रकार अपने नकली चेहरे के अनुरूप बार-बार नकली दल बनाने पर भी मद्रास के आम लोगों के लिए ऐसी भीड़ को पहचानना आसान है।

वेलु अपनी पत्नी अन्नवडिवु के साथ काम की तलाश में शहर आता है। वो दूसरे की जमीन पर खेती करने वाला मजदूर था।किसी कारणवश उसे शहर आना पड़ जाता है। उधर वो काम की तलाश में सड़क में इतंजार कर रहे मजदूरों के समूह के बीच खड़ा हो जाता है। इस समूह में पेंटर हैं, बड़ई है, मिस्त्री हैं जो कि रोज काम की तलाश में सड़क में खड़े हो जाते हैं और अगर ठेकेदार को उनकी ज़रुरत होती है तो वे उसके साथ काम करते हैं अन्यथा खाली ही रहते हैं।
इस समूह के लोग गरीब जरूर हैं लेकिन दिल के अमीर हैं। वेलु और उसकी पत्नी को अपने समूह में ऐसे स्वीकार कर लेते हैं जैसे वो अजनबी नहीं बल्कि बरसों के जान पहचान वाले हों। यह उपन्यास वेलु और अन्नवडिवु के जीवन के इर्द गिर्द ही घूमता है। कैसे उन्हें इस समूह में नए रिश्ते मिलते हैं। स्रोतों की कमी के होते हुए भी कैसे ये लोग साझा जीवन व्यतीत करते हैं? इनके संघर्ष क्या हैं? और लोगों का इन मजदूरों के प्रति नजरिया क्या है? यह सब इस उपन्यास में दर्शाया गया है।

उपन्यास बहुत मार्मिक है। जिस भीड़ का वर्णन शुरुआत में इस उपन्यास में किया गया है वो हम अक्सर सुबह सुबह देखते हैं। जब मैं विरार में था तो  विरार तालाब के सामने सुबह सुबह लोग ऐसे ही इकठ्ठा हो जाते थे। यही भीड़ मैंने सुबह सुबह देहरादून के लाल पुल में देखी है। कहने का मतलब है हर शहर में लोगों की ऐसी ही भीड़ आपको देखने को मिल जायेगी। ये वो लोग है जो अपने गाँव से पलायन करते हैं ये सोचकर की उन्हें शहर में दो वक्त की रोटी तो नसीब होगी। कई लोग वेलु जैसे हैं जिन्हें केवल इसलिए भागकर आना पड़ता है क्योंकि वो अपनी बीवी पर बुरी नज़र रखने वाले गाँव के अमीर व्यक्ति का विरोध करते हैं। वे लोग शहरों में कैसे रहते है इसका जीवंत चित्रण उपन्यास में किया है। उनके संघर्ष, उनकी आकांक्षायें  और कैसे उनके हक़ को अमीर वर्ग मारता है इसका बहुत मार्मिक चित्रण इधर किया है। 

पुस्तक में संकलित की गयी दोनों लघु उपन्यास मुझे बेहद पसन्द आये। मैं एस समुरित्तम् जी की अन्य रचनाओं को पढ़ने की कोशिश करूँगा। अगर आपने इसे नहीं पढ़ा है तो मैं तो यही सलाह दूँगा कि आपको इसे पढ़ना चाहिए। अगर आपने इसे पढ़ा है तो आपको ये कैसा लगा ये कमेंट बॉक्स में जरूर बताईयेगा। उपन्यास को आप निम्न लिंक से मँगवा सकते हैं:
अमेज़न
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